रुद्राक्ष धारण करने के लाभ जानकर चौंक जाएंगे आप
रुद्राक्ष को साक्षात महादेव का प्रतीकस्वरूप माना गया है. शरीर पर रुद्राक्ष और मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड धारण करने वाला चांडाल भी सबके द्वारा पूज्य हो जाता है. शिवपुराण में रुद्राक्ष के प्रकार, उसे धारण करने का मंत्र स्वयं शिवजी ने बताया है.
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रुद्राक्ष की उत्पत्ति को लेकर एक पौराणिक कथा आती है. कहते हैं रूद्र से मिलने एक बार देवतागण आए. वे असुरों के अत्याचार से त्रस्त थे और मारे-मारे फिर रहे थे. महादेव ने सारी बात सुनी और ध्यान लगाया. उन्हें देवताओं की जो स्थिति दिखी उससे द्रवित हो गए. महादेव को इस बात का दुख था कि असुरों में देवों को सताने की शक्ति स्वयं उनके वरदान से ही आ गई है. रूद्र द्रवित हुए तो उनकी आंखों से जल की बूंद धरती पर गिरी. उसने तत्काल वृक्ष का रूप धारण कर लिया.
ब्रह्माजी ने तत्काल उसे संभालकर अपने कमंडलु में रख लिया. यह देखकर शिवजी को बड़ी प्रसन्नता हुई कि ब्रह्माजी ने उनके आंखों से बहे जल का इतना मान किया. शिवजी ने कहा कि इस बीज से निकले फल को मेरे समान ही समझना. रूद्र के अक्ष यानी आंखों से उपजे होने के कारण ब्रह्मा ने इसे रुद्राक्ष कहा.
रुद्राक्ष में जो फल लगता है उसे खाया नहीं जाता क्योंकि वह रूद्रस्वरूप है. उसे सुखाकर उससे ही बनता है रुद्राक्ष. रुद्राक्ष को विधि-विधान से धारण करने वाले व्यक्ति के साथ शिवजी का अंश सदा विद्यमान रहता है. वह शिवकृपा की छाया में आनंदित रहता है, सुख-समृद्धि सहज प्राप्त करता है. रूद्राक्ष को धारण करने के कुछ नियम बताए गए हैं. शिवपुराण में स्वयं शिवजी पार्वतीजी को रुद्राक्ष के बारे में बताते हैं.
पार्वतीजी ने भोलेनाथ से रुद्राक्ष का परिचय देने को कहा. शिवजी ने रुद्राक्ष के तेरह प्रकारों का परिचय देते हुए कहा-
रुद्राक्षाः विविधाः प्रोक्तास्तेषां भेदान् वदाम्यहम्। शृणु पार्वति सद् भक्तया भुक्तिमुक्तिफलप्रदान्।।शिवजी कहते हैं रुद्राक्ष के चौदह भेद हैंः
- एकमुख को साक्षात शिव का रूप समझना चाहिए. उसके तो दर्शन होने से ही दुरितों का नाश होता है.
- द्विमुखी का नाम देवदेवेश है, जिसके दर्शन से सभी साधन सुलभ हो जाते हैं.
- चतुर्मुखी को ब्रह्माजी का प्रतीक समझना चाहिए जिसके दर्शन से चौतरफा फल की प्राप्ति होती है.
- पंचमुखी का नाम कालाग्नि है जो पंचानन शिव का प्रतीक है.
- षड्मुखी कार्तिकेयजी का प्रतीक है और इसे दाहिनी भुजा में धारण करना चाहिए.
- सप्तमुखी का नाम अनंगी है और यह कामदाहक शिव का प्रतीक है.
- अष्टमुखी का नाम वसुमूर्ति है और यह भैरवजी का प्रतीक है.
- नवमुखी कपिलमुनि का प्रतीक है.
- दसमुखी स्वयं भगवान नारायण का प्रतीक है.
- एकादशमुखी भगवान रूद्र का प्रतीक है.
- द्वादशमुखी यानी बारह मुख वाला रुद्राक्ष भगवान सूर्य का प्रतीक है.
- त्रयोदशमुखी यानी 13 मुख वाला विश्वदेव का प्रतीक है.
- चतुर्दशमुखी यानी चौदह मुखी परमशिव का प्रतीक है.
शिवजी बोले- देवी रुद्राक्ष को साक्षात मेरा अंश समझो. इसे विधि-विधान से धारण करना चाहिए.
महादेवी ने भगवान भोलेनाथ से रुद्राक्ष धारण करने के विधि-विधान के बारे में विस्तार से पूछा. शिवपुराण, लिंगमहापुराण, कालिकापुराण, महाकाल संहिता, मन्त्रमहार्णव, निर्णय सिन्धु, बृहज्जाबालोपनिषद् में रुद्राक्ष के धारण करने संबंधी विधि-विधानों की चर्चा है. रुद्राक्ष को तब तक रूद्र का स्वरूप नहीं मानना चाहिए जब तक उसे सिद्ध न कर लिया जाए. सिद्ध करने के बाद ही रुद्राक्ष फलदायी होता है. इसे रुद्राक्ष की प्राण-प्रतिष्ठा भी कहा जाता है.
कैसे होती है रुद्राक्ष की प्राण-प्रतिष्ठा. जानिए अगले पेज पर.धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-शिवपुराण के अनुसार पार्वतीजी को रुद्राक्ष के प्रकारों के बारे में बतलाते हुए शिवजी कहते हैं- देवी रूद्राक्ष में बड़ी शक्ति है. यह पापियों के पाप को नष्ट करने का सामर्थ्य रखता है. इसे धारण करने से न सिर्फ मनुष्य के पाप कटते हैं बल्कि वह मेरा प्रिय भी हो जाता है. अब मैं आपको किस रूद्राक्ष को धारण करते समय किस मंत्र का प्रयोग करना चाहिए इसके विषय में बताता हूं.
- रुद्राक्ष धारण करके मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, सहजन, आदि पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिए. जो लोग रुद्राक्ष धारण करते हैं उन्हें सुबह-शाम शिवजी का ध्यान करना चाहिए एवं ऊँ नमः शिवाय मंत्र की एक माला अवश्य जपनी चाहिए.
- स्त्रियों को मासिक धर्म के दौरान रूद्राक्ष निकालकर रख देना चाहिए.
- जिस रुद्राक्ष माला से जप करते हों उसे धारण करने से बचना चाहिए. जिस माला को धारण करते हों उससे जप करने से बचें.
- किसी और व्यक्ति के द्वारा पहले धारण किए गए रुद्राक्ष अथवा रुद्राक्ष माला को धारण नहीं करना चाहिए.
- प्राण-प्रतिष्ठा करवाने के पश्चात उसे शुभ मुहूर्त में ही धारण करें.
- रुद्राक्ष धारण कर शयन नहीं करना चाहिए. रात को सोते समय निकालकर रख दें.
- रुद्राक्ष को हाथ की कलाई, गला और हृदय पर धारण किया जा सकता है. कुछ शास्त्रों में संन्यासियों द्वारा कमर पर भी धारण करने की बात कही गई है.
- कलाई में 12 दाने, गले के चारों ओर 36 दाने और ह्रदयस्थल को छूने वाली माला में 108 रुद्राक्ष दानें श्रेष्ठ माने गए हैं.
- रूद्राक्ष माला को लाल धागे में गूथा जाना चाहिए.
- एकमुखी के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
- द्विमुखी के लिए- ऊँ नमः
- त्रिमुखी के लिए- ऊँ क्लीं नमः
- चतुर्मुखी के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
- पंचमुखी के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
- षड्मुखी के लिए- ऊँ ह्रीं हुं नमः
- सप्तमुखी के लिए- ऊँ हुं नमः
- अष्टमुखी के लिए- ऊँ हुं नमः
- नवमुखी के लिए- ऊँ ह्रीं हुं नमः
- दशमुखी के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
- एकादशमुखी के लिए- ऊँ ह्रीं हुं नमः
- द्वादश मुखी के लिए- ऊँ क्रौं क्षौं रौं नमः
- त्रयोदशमुखी के लिए- ऊँ ह्रीं नमः
- चतुर्दशमुखी के लिए- ऊँ नमः
रुद्राक्ष धारण के लाभ जिन्हें जानकर चौंक जाएंगे आप…धार्मिक व प्रेरक कथाओं के लिए प्रभु शरणम् के फेसबुक पेज से जु़ड़े, लिंक-कुछ ग्रंथों में रूद्राक्ष के सताईस प्रकार तक कहे गए हैं. अब जानते हैं किस मनोकामना की पूर्ति में कौन सा रूद्राक्ष सबसे उत्तम माना गया है.
एकमुखी रुद्राक्षः एकमुखी रुद्राक्ष उत्तम एवं पवित्र है, यह रुद्राक्ष भाग्यशाली को ही मिलता है. इसके दर्शन मात्र से ही पापों का नाश होता है.इसे धारण करने से सम्पूर्ण अनिष्ट दूर होकर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
दोमुखी रुद्राक्षः दोमुखी रुद्राक्ष शिव-पार्वती का स्वरुप है. मन की एकाग्रता, मानसिक शांति, आध्यात्मिक शांति तथा कुण्डलिनी जाग्रत करने के लिए इसे धारण किया जाता है. एकमुखी रूद्राक्ष की ही तरह दोमुखी रुद्राक्ष भी अत्यंत दुर्लभ है.
तीनमुखी रुद्राक्षः तीनमुखी रुद्राक्ष अग्नि का स्वरुप है. इसे धारण करने से अगम्यागमन अर्थात परस्त्री गमन के पापों का निवारण होता है. घर में धन धान्य की वृद्धि होती है और ब्रह्महत्या जैसे घोर का पाप का शमन होता है.
चारमुखी रुद्राक्षः उच्च शिक्षा प्राप्ति में आने वाली बाधाओं के नाश में चारमुखी रुद्राक्ष धारण करने से बड़ा लाभ होता है. जिसकी स्मरण शक्ति कमजोर हो, बोलने में हकलाता हो या मंद बुद्धि हो उसे चारमुखी रुद्राक्ष पहना देना चाहिए. इससे उसके वाणी और बुद्धि के दोष दूर होते हैं.
पांचमुखी रुद्राक्षः पांचमुखी रुद्राक्ष कालाग्नि के समान रूद्र का ही स्वरुप है. पंचमुखी रुद्राक्ष परमेश्वर स्वरुप माना गया है और सर्वफलदायी है. यह सबके लिए सुलभ है तथा इसे सभी धारण कर सकते हैं. देखा जाए तो आज के युग में इस रूद्राक्ष को ही सबसे उत्तम मानना चाहिए. इसे धारण करने से सभी मनोकमानाएं पूरी होती हैं.छहमुखी रुद्राक्षः छहमुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय का प्रतीक हैं. इसे बायीं भुजा में धारण करना चाहिए. धन-धान्य की प्राप्ति और रोजगार-व्यापार में सफलता दिलाता है. छहमुखी रुद्राक्ष धारण करने से व्यक्ति विद्वान होता है. इसे मनुष्य की छह प्रकार की बुराइयों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, और मत्सर को नष्ट करने वाला कहा जाता है. हिस्टीरिया, मूर्छा आदि रोगों में यह आश्चर्यजनक रूप से लाभदायी है.
सातमुखी रुद्राक्षः सात मुखी रुद्राक्ष नौकरी एवं व्यवसाय में उन्नति दिलाने वाला और धनदायक माना गया है. इसे धारण करने से व्यक्ति निरोग होता है.
आठमुखी रुद्राक्षः अष्टमुखी रुद्राक्ष कालभैरव एवं गणेशजी का स्वरुप है. इसे धारण करने वाले से शत्रु भी भय खाते हैं और वश में हो जाते हैं. यह रुद्राक्ष ऋद्धि -सिद्धि और लक्ष्मी प्रदान करता है.कोर्ट-कचहरी के मामलों में भी इसे धारण करने से सफलता मिलती है. यह साहस प्रदान करता है. दुर्घटनाओं से रक्षा होती है, भूत-प्रेत की बाधाएं मिटती हैं.
नौमुखी रुद्राक्षः नौमुखी रुद्राक्ष को दायीं भुजा में धारण करने वाले पुरुष को यम का भी भय नहीं होता.
दसमुखी रुद्राक्षः दसमुखी रुद्राक्ष धारण करने वाला कभी शत्रु से परास्त नहीं हो सकता. ग्रह बाधा मिटती हैं, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि प्रयोग निष्फल हो जाते हैं.
ग्यारहमुखी रुद्राक्षः ग्यारहमुखी रुद्राक्ष धारण करने का फल एकादशी व्रत करने के फल जैसा है. बांझ स्त्री श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक धारण करे तो वह संतानवती होती है. शिखा में ग्यारह मुखी रुद्राक्ष धारण करने से अश्वमेध यज्ञ एवं वाजपेय यज्ञ समान पुण्य होता है.
बारहमुखी रुद्राक्षः बारहमुखी रुद्राक्ष चोट-चपेट, चोरी एवं अग्निभय से रक्षा करता है. असाध्य रोगों से निराश लोगों को इसे धारण करना चाहिए. यह औषधि की तरह काम करता है और स्वस्थ बनाता है.
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