स्यमंतक मणि कथाः श्रीकृष्ण पर लगा चोरी का आरोप, मिल गईं दो पटरानियां
स्यमंतक मणि कथाः श्रीकृष्ण पर लगा चोरी का आरोप, फिर सत्यभामा और जामवंती से कैसे हुआ विवाह
जगत के पालनहारी भगवान श्रीकृष्ण पर एक बार चोरी का आरोप लगा था. भगवान पर ऐसा कलंक क्यों लगा, इसके पीछे एक कथा है जो भागवत में आती है. द्वारकाधीश पर आरोप लगा था कि उनके मन में स्यमंतक मणि के लिए लालच आ गया. इसके लिए उन्होंने एक निर्दोष की हत्या तक की थी.
आखिर ऐसा क्या रहस्य था स्यमंतक मणि में कि भगवान पर उसे चुराने और उसके लिए किसी के वध का दोष लगाया गया था.
चलिए जानते हैं स्यमंतक मणि की कथा.
सूर्यदेव से स्यमंतक मणि की प्राप्ति और उसकी महिमा:

द्वारकापुरी में एक परम सूर्यभक्त रहते थे सत्राजित. वे यादवों के बड़े जमींदार या धनिक थे. सत्राजित प्रतिदिन समुद्र के पानी में कंठ तक खड़े होकर सूर्यदेव की कठोर उपासना किया करते थे. गर्मी की तेज धूप में और समुद्र के कठोर पानी में जहां शरीर की चमड़ी तक गलने लगती थी, खड़े होकर तप करना सामान्य बात नहीं थी. उसी तरह सर्दी में पानी में खड़े होकर वे तप करते थे.
सत्राजित के वर्षों के उग्र तप से भगवान सूर्य उन पर प्रसन्न हो गए. एक दिन जब सत्राजित नेत्र बंद कर सूर्य के ध्यान में मग्न थे, तब समुद्र तट पर सहस्रों सूर्यों के समान एक अलौकिक दिव्य प्रकाश फैल गया. स्वयं भगवान सूर्यदेव ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर सत्राजित से कहा—“हे सत्राजित! तुम्हारी अगाध भक्ति और नियमबद्ध तप से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। वर मांगो.”
सत्राजित ने हाथ जोड़कर विनय की—“हे सूर्यदेव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे कोई ऐसी वस्तु प्रदान करें जो तीनों लोकों में दुर्लभ हो. हे भगवन! मैं रात्रि में आपके दर्शन नहीं कर पाता इसलिए कोई ऐसी वस्तु दें जिसमें आपकी छवि मुझे रात में भी दिखती रहे. “
भगवान सूर्य ने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने कंठ से एक दिव्य मणि निकाली. वह मणि देखने में ऐसे प्रतीत होती थी जैसे साक्षात छोटे आकार का सूर्य हो.
उन्होंने वह मणि सत्राजित को सौंपते हुए कहा—“यह स्यमंतक मणि है. जब तक तुम पवित्र भाव से इसकी पूजा करोगे, यह तुम्हें और तुम्हारी प्रजा को अपार ऐश्वर्य प्रदान करेगी।”
सत्राजित ने स्यमंतक मणि को अपने गले में धारण कर लिया और द्वारका लौटे. उनका तेज इतना प्रखर था कि दूर से देखने पर द्वारकावासियों को लगा कि स्वयं सूर्यदेव द्वारका पधार रहे हैं.
वह साधारण मणि तो थी नहीं. तो आइए थोड़ा स्यमंतक मणि के रहस्यों को भी जान लेते हैं.
स्यमंतक मणि का अलौकिक चमत्कार और महिमा

श्रीमद्भागवत महापुराण और विष्णु पुराण के अनुसार स्यमंतक मणि कोई साधारण रत्न नहीं, बल्कि साक्षात सूर्यदेव की कृपा थी. स्यमंतक मणि का सबसे बड़ा चमत्कार यह था कि विधि-विधान से पूजा करने पर यह प्रतिदिन आठ भार (लगभग 80 किलो तक) खरा और शुद्ध सोना प्रदान करती थी.
स्यमंतक से प्राप्त होने वाले अक्षय स्वर्ण के कारण सत्राजित रातों-रात असीम वैभव के स्वामी हो गए. इसके अलावा स्यमंतक मणि का एक चमत्कार यह भी था कि जिस नगर या राज्य में मणि स्थापित रहती थी, वहाँ कभी अकाल, सूखा या दुर्भिक्ष नहीं पड़ता था.
मणि के प्रभाव से पूरे क्षेत्र में किसी भी प्रकार की महामारी नहीं फैलती थी। हिंसक पशुओं, विषधरों और दैहिक-दैविक-भौतिक तापों का भय स्वतः समाप्त हो जाता था.
इस तरह सत्राजित अथाह धन-ऐश्वर्य के स्वामी तो बन ही गए उनकी हर तरफ जय-जयकार होने लगी. वे पूजनीय हो गए.
लेकिन स्यमंतक मणि को धारण करना भी उतना सरल नहीं था. मणि जितनी फलदायी थी, उसका नियम उतना ही कठोर था. यदि कोई पवित्र और सदाचारी पुरुष इसे धारण या पूजित करे, तो यह अमृत तुल्य फल देती थी; किंतु यदि कोई अपवित्र, पापी या दुराचारी व्यक्ति इसे अपने पास रखे, तो यह मणि ही उसके समूल विनाश का कारण बन जाती थी.
अचानक मिला धन और अनायास मिला यश किसी को भी बर्बाद करने की क्षमता रखता है. सत्राजित के साथ भी यही हुआ. वे बहुत अभिमानी हो गए थे. श्रीकृष्ण से तो वे पहले से ही द्वेष रखते थे और प्रभु की बुराई का कोई मौका नहीं छोड़ते थे.
सत्राजित की अत्यंत रूपवती और शस्त्र-विद्याओं में एक कुशल पुत्री थीं- सत्यभामा. सत्यभामा जो देवी लक्ष्मी का अंशरूप थीं, श्रीकृष्ण से बचपन से ही प्रेम करती थीं. यह बात सत्राजित को पता थी लेकिन भगवान को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने एक चाल चली.
सत्राजित ने कृष्ण के मित्र सात्यकि के बेटे से सत्यभामा के विवाह का प्रस्ताव दिया. सत्राजित ने दूर की सोची थी. श्रीकृष्ण अपने परम मित्र के प्रति न द्वेष करेंगे और न ही विवाह में कोई बाधा खड़ी करेंगे. इसके साथ ही सात्यकि श्रेष्ठ योद्धा थे और उनके पास बड़ी सेना भी थी. तो यदि सत्यभामा का रिश्ता सात्यकि के परिवार में हो जाए तो सत्राजित श्रीकृष्ण को धन और बल दोनों से चुनौती देने में समर्थ हो जाएंगे.
सात्यकि यह बात जानते थे कि सत्यभामा श्रीकृष्ण से प्रेम करती हैं. इसलिए उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया. इसके बाद सत्राजित का श्रीकृष्ण के प्रति बैर और बढ़ गया. लेकिन श्रीकृष्ण कोई बैर नहीं रखते थे.
वह सत्राजित और उनके वैभव की प्रशंसा किया करते थे. इससे सत्राजित को लगता था कि श्रीकृष्ण की नजर उसकी स्यंतक मणि पर है.
श्रीकृष्ण पर स्यमंतक मणि चोरी का आरोप और जामवंती से विवाह का प्रसंग

एक बार सत्राजित के भाई प्रसेनजित स्यंतक मणि को धारणकर शिकार खेलने गए. वहां एक शेर उन्हें मारकर खा गया लेकिन मणि उसके गले में ही फंस गई.
रीक्षराज जामवंत जिन्होंने श्रीराम की लंका विजय में सहायता की थी, ने उस सिंह को देखा. उनके मन में इतना कौतूहल हुआ कि उन्होंने उस सिंह का वध कर दिया और उसके गले से मणि निकाल ली. उन्होंने यह सब कौतूहल में किया था, उन्हें मणि की आवश्यकता तो थी नहीं सो उन्होंने स्यमंतक मणि अपने पुत्र को दे दी.
प्रसेनजित और स्यमंतक मणि के गायब होने से सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर स्यमंतक चोरी का आरोप लगा दिया.
चोरी का कलंक लगने से क्षुब्ध श्रीकृष्ण कुछ बहादुर लोगों के साथ प्रसेन को खोजने निकले. एक गुफा से निकलती चमक को देखकर उन्होंने साथियों से गुफा के बाहर प्रतीक्षा करने को कहा और खुद अंदर चले गए.
गुफा में जामवंत से उनका युद्ध आरंभ हुआ. ब्रह्मा के पुत्र जामवंत को आशीर्वाद था कि श्रीकृष्ण के अलावा कोई और उन्हें द्वंद्व में नहीं हरा सकता. जामवंत के साथ श्रीकृष्ण का युद्ध 22 दिनों तक चला. उन्हें समझ में आ गया कि स्वयं प्रभु के साथ वह युद्ध कर रहे हैं तो पैरों में गिर गए.
उन्होंने श्रीकृष्ण को स्यमंतक मणि सौंपते हुए उनसे विनती कि वह उनकी पुत्री जामवंती से विवाह कर लें.
भगवान जामवंती से विवाहकर स्यमंतक मणि लेकर द्वारका लौटे और सारी बात महाराजा उग्रसेन जी को बताई.
भगवान ने मणि सत्राजित को वापस कर कलंक से मुक्ति पाई. सत्राजित लज्जित हुए. उन्होंने श्रीकृष्ण को स्यतंक मणि दे दी.
उन्होंने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया. सत्यभामा को प्रभु ने पटरानी का दर्जा दिया.
जिस दिन सत्राजित ने प्रभु पर आरोप लगाया था वह भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी थी. मान्यता है कि इस दिन चंद्र दर्शन करने से कोई बड़ा कलंक लगता है. उससे मुक्ति के लिए कृष्ण और सत्यभामा के विवाह की कथा जरूर सुननी चाहिए.
भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है. इस दिन यदि भूल से भी चंद्रमा पर नजर पड़ जाए तो गणेश जी के शाप के कारण चंद्रमा को देखने वाले व्यक्ति पर कोई न कोई कलंक जरूर लगता है.
चंद्रमा से ऐसा क्या अपराध हो गया था कि उनके दर्शन करने मात्र से कलंक लग जाता है? गणेश जी ने उन्हें ऐसा शाप क्यों दे दिया था? यह एक बड़ी रोचक कथा है. इसे आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं-
गणेश चतुर्थी को कलंक चतु्र्थी क्यों कहते हैं? कलंक चौथ का चांद दिख जाए तो करें 3 सरल उपाय
कलंक चौथ के दोष से मुक्ति के लिए तीन प्रमुख उपाय कहे गए हैं उनमें से एक है स्यमंतक मणि की कथा सुनना और सुनाना. वही कथा जिसे संक्षेप में आपने ऊपर पढ़ा.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
स्यमंतक मणि की यह कथा आपको कैसी लगी, अपने विचार हमें कमेंट में जरूर लिखिएगा. यदि आप कोई और कथा पढ़ना या जानना चाहते हैं तो वह भी बताएं. हम आपके लिए वह कथा भी पोस्ट करेंगे.
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