कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधिः व्रत, मंत्र, भोग और जन्मोत्सव की सबसे सरल विधि
कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि: सरल नियम, मंत्र, भोग और मध्यरात्रि जन्मोत्सव
कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का अत्यंत पावन पर्व है। हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि 12 बजे भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लिया था। जन्माष्टमी का व्रत अनंत गुना पुण्यदायक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत से जो पुण्य प्राप्त होता है, उससे भी कहीं अधिक फल जन्माष्टमी व्रत से प्राप्त होने की मान्यता बताई गई है। यदि आप घर पर बाल-गोपाल की सेवा कर रहे हैं, तो यह कृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि आपके लिए अत्यंत उपयोगी और फलदायी सिद्ध होगी।
भगवान श्रीकृष्ण केवल भाव के भूखे हैं, इसलिए यदि सभी वैदिक सामग्रियां उपलब्ध न हों, तब भी सच्ची निष्ठा और श्रद्धा से की गई पूजा भगवान स्वीकार करते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा सामग्री
कृष्ण जन्माष्टमी पूजा शुरू करने से पहले निम्नलिखित सामग्री एकत्रित कर लें:
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प्रतिमा व श्रृंगार: भगवान श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की मूर्ति, झूला/पालना, पीले या लाल वस्त्र, मोर मुकुट, मोरपंख और बांसुरी।
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अभिषेक सामग्री: शुद्ध जल, गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, देशी घी, शहद और शक्कर)।
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पूजन द्रव्य: चंदन, रोली, अक्षत (अक्षत बिना टूटे चावल), पुष्प, मौली/कलावा, यज्ञोपवीत (जनेऊ), दूर्वा और तुलसी दल।
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नैवेद्य व भोग: ताजा माखन, मिश्री, धनिया की पंजीरी, पंचमेवा, मौसमी फल, खीरा (डंठल वाला), नारियल, पान और सुपारी।
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आरती सामग्री: देशी घी का दीपक, धूपबत्ती, अगरबत्ती, कपूर और घंटी/शंख।
कृष्ण जन्माष्टमी पूजा से पहले शुद्धीकरण और आचमन
पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। स्वयं स्नान करके स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
हाथ में थोड़ा जल लेकर स्वयं पर, आसन पर और संपूर्ण पूजा सामग्री पर छिड़कते हुए इस पवित्र शुद्धि मंत्र का उच्चारण करें:
शुद्धीकरण मंत्र:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
सरल हिंदी अर्थ:
“मनुष्य चाहे किसी भी अवस्था में हो—वह अपवित्र हो, पवित्र हो अथवा जीवन की किसी भी अच्छी-बुरी स्थिति में क्यों न पड़ा हो; जो व्यक्ति कमल नयन भगवान विष्णु (पुंडरीकाक्ष) का स्मरण कर लेता है, वह बाहर (शरीर) और भीतर (मन व आत्मा) दोनों तरह से पूर्णतः पवित्र और शुद्ध हो जाता है।”
भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान व संकल्प

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा का आरंभ भगवान के बाल रूप के ध्यान के साथ शुरू करना चाहिए। अब हाथ जोड़कर बाल-गोपाल के सुंदर स्वरूप का ध्यान करें:
ध्यान मंत्र:
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
सरल हिंदी अर्थ:
“वसुदेव जी के पुत्र, दिव्य स्वरूप, कंस और चाणूर जैसे दुष्ट दैत्यों का संहार करने वाले, माता देवकी को परम आनंद प्रदान करने वाले और समस्त संसार के गुरु (मार्गदर्शक) भगवान श्रीकृष्ण की मैं वंदना करता हूँ।”
संकल्प विधि:
दाहिने हाथ में थोड़ा जल, अक्षत, पुष्प और एक सिक्का लें। मन में यह भाव रखें कि आप परिवार के कल्याण और प्रभु कृपा प्राप्ति हेतु श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत और पूजा कर रहे हैं:
संकल्प मंत्र:
यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः कार्यसिद्ध्यर्थं कलशाधिष्ठितदेवतासहितं श्रीजन्माष्टमीपूजनं महं (अहं) करिष्ये।
सरल हिंदी अर्थ:
“अपने मनोरथ व कार्यों की सिद्धि के लिए, जो भी पूजन सामग्री यथासंभव मुझे उपलब्ध हो सकी है, उसी के द्वारा मैं कलश में स्थापित समस्त देवी-देवताओं सहित श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पूजन करता हूँ (या करती हूँ)।”
मंत्र के उपरांत हाथ की सामग्री प्रभु के चरणों के समीप जलपात्र में छोड़ दें।
लड्डू गोपाल का पंचामृत अभिषेक और स्नान
भगवान श्रीकृष्ण को एक बड़े स्वच्छ तांबे या पीतल के पात्र में विराजमान करें।
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शुद्धोदक स्नान: सर्वप्रथम दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल युक्त शुद्ध जल भरकर प्रभु को स्नान कराएं।
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पंचामृत अभिषेकः इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और मिश्री मिलाकर बनाए गए पंचामृत से प्रभु का अभिषेक करें।
पंचामृत मंत्र:
पञ्चामृतं मयानीतं पयोदधिघृतं मधु।
शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥
सरल हिंदी अर्थ:
“हे प्रभु! मैं आपके पावन स्नान के लिए दूध, दही, घी, शहद और शर्करा (मिश्री/चीनी) के शुभ मिश्रण से बना यह पंचामृत लेकर आया हूँ। कृपा करके स्नान हेतु इसे स्वीकार कीजिए।”
अभिषेक के बाद पुनः शुद्ध जल से स्नान कराएं और एक साफ, मुलायम वस्त्र से प्रभु के विग्रह को धीरे-धीरे पोंछें।
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इत्र व शुद्ध स्नान: पंचामृत के उपरांत सुगंधित इत्र अर्पित कर पुनः गुनगुने शुद्ध जल से स्नान कराएं। इसके बाद एक अत्यंत कोमल और स्वच्छ वस्त्र से प्रभु के श्रीअंग को धीरे-धीरे पोंछें।
वस्त्र, यज्ञोपवीत और अलौकिक श्रृंगार
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पीतांबर वस्त्र: प्रभु को सुंदर पीले वस्त्र अर्पित करें।
शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम्।
देहालंकरणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥
सरल हिंदी अर्थ:
“हे प्रभु! यह वस्त्र सर्दी (शीत), वायु (वात) और गर्मी (उष्ण) से शरीर की रक्षा करता है, लज्जा का उत्तम रक्षण करता है तथा देह की शोभा बढ़ाता है। अतः इस पावन वस्त्र को स्वीकार कर मुझे परम शांति और कल्याण प्रदान करें।”
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यज्ञोपवीत: भगवान को जनेऊ अर्पित करें।
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥
सरल हिंदी अर्थ:
“यज्ञोपवीत (जनेऊ) अत्यंत पवित्र है, जिसे सृष्टि के प्रारंभ में स्वयं प्रजापति (ब्रह्मा जी) ने उत्पन्न किया था। यह दीर्घायु प्रदान करने वाला, अग्रगण्य (श्रेष्ठ) और शुभ्र (धवल/पवित्र) है। इस पावन यज्ञोपवीत को धारण करने से बल, आत्मिक शक्ति और तेज की प्राप्ति हो।”
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चंदन लेपन: गोपी चंदन या अष्टगंध का तिलक लगाएं।
मंत्र:
श्रीखण्डचन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥
सरल हिंदी अर्थ:
“हे देवश्रेष्ठ (प्रभु)! मलय पर्वत से उत्पन्न यह श्रीखंड चंदन अत्यंत दिव्य, मनमोहक सुगंध से परिपूर्ण और मन को हरने वाला है। शरीर पर लेपन के योग्य इस पावन चंदन को आप कृपा करके स्वीकार करें।”
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श्रृंगार: अब कान्हा के शीश पर मोर मुकुट, मोरपंख सजाएं और हाथों में प्यारी बांसुरी पकड़ाएं। इसके बाद ताजे सुगंधित पुष्प, वैजयंती माला और दूर्वा अर्पित करें।
लड्डू गोपाल की सेवा विधि: नियम, दैनिक दिनचर्या, सूतक और पीरियड्स में पूजन के नियम
कृष्ण जन्माष्टमी पर कान्हा जी को जरूर लगाएं माखन-मिश्री और धनिया पंजीरी का भोग
कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर प्रभु को विशेष रूप से सात्त्विक और पारंपरिक नैवेद्य अर्पित किया जाता है:
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माखन-मिश्री भोग: गाय के दूध से मथे हुए ताजे श्वेत मक्खन में मिश्री मिलाकर चांदी या मिट्टी की मटकी में भरकर भोग लगाएं।
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धनिया पंजीरी: कृष्ण जन्माष्टमी पर अन्न का भोग नहीं लगाया जाता, इसलिए पिसे हुए सूखे धनिए को देशी घी में धीमी आंच पर भूनकर उसमें मखाना, काजू, बादाम, पिस्ता, चिरौंजी और बूरा मिलाकर धनिया पंजीरी तैयार की जाती है। यह कृष्ण जन्माष्टमी का सर्वप्रमुख प्रसाद माना गया है।
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तुलसी दल का अनिवार्य नियम: भगवान श्रीकृष्ण के किसी भी भोग में तुलसी का पत्ता रखना अनिवार्य है। शास्त्रों के अनुसार:
तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन च। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः॥
अर्थात एक तुलसी दल और एक चुल्लू जल के समर्पण से ही प्रभु स्वयं को अपने भक्त के अधीन कर देते हैं। बिना तुलसी के कान्हा कभी भोग स्वीकार नहीं करते।
भोग अर्पित करते समय श्रद्धापूर्वक बोलें:
“इदं नानाविधि नैवेद्यानि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, देवकीसुतं समर्पयामि।”
मध्यरात्रि 12 बजे जन्मोत्सव और खीरा चीरा परंपरा
कृष्ण जन्माष्टमी की सबसे पावन घड़ी मध्यरात्रि 12 बजे की होती है। इस समय रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के पावन संयोग में प्राकट्योत्सव का विधान संपन्न किया जाता है:
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खीरा काटना (नाल छेदन विधान): एक ऐसा ताजा खीरा लें जिसमें डंठल और पत्ती लगी हो। डंठल वाले भाग को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना जाता है। ठीक मध्यरात्रि 12 बजते ही किसी नए सिक्के अथवा चांदी के चम्मच की सहायता से खीरे को उसके डंठल से काटकर अलग कर दिया जाता है। यह भगवान श्रीकृष्ण के गर्भ से प्राकट्य और नवजात शिशु की गर्भनाल विच्छेदन का शास्त्रोक्त प्रतीक है।
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शंखध्वनि व घंटानाद: ठीक 12 बजे शंख की गूंज, घंटियों की ध्वनि और थाली बजाकर प्रभु के अवतरण का स्वागत करें। चारों दिशाओं में यह जयघोष गूंज उठे—“नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की! हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की!”
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झूला झुलाना: नवजात बाल-गोपाल को सुंदर सजे हुए पालने में विराजमान कराएं। परिवार का प्रत्येक सदस्य श्रद्धापूर्वक रेशमी डोरी से प्रभु को तीन बार प्रेमपूर्वक झूला झुलाएं। श्री कृष्ण जन्माष्टमी की यह आवश्यक रीति है।
कृष्ण जन्माष्टमी पूजन पर श्रीकृष्ण आरती और पुष्पांजलि

कपूर अथवा गाय के शुद्ध घी का पंचमुखी दीपक जलाकर संपूर्ण परिवार सहित भावपूर्वक आरती करें:
श्री बांके बिहारी जी की आरती:
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुंडल झलकाता, नंद के आनंद नंदलाला॥
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक, ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की…आरती कृष्ण मुरारी की.
आरती पूर्ण होने के बाद अपने स्थान पर ही तीन बार प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करें और अंत में उपस्थित सभी परिजनों व भक्तों में माखन-मिश्री, चरणामृत और पंजीरी का प्रसाद वितरित करें।
कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के नियम और पारण की सही विधि
शास्त्रों में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के दो प्रमुख स्वरूप बताए गए हैं—निर्जला (बिना जल के) और फलाहारी (दूध, फल, कुट्टू या सिंघाड़े का सेवन)। इस व्रत का पालन करते समय निम्नलिखित नियमों का ध्यान रखें:
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तामसिक पदार्थों का त्याग: सप्तमी तिथि की संध्या से ही लहसुन, प्याज, मसूर की दाल और तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग कर देना चाहिए। व्रत के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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फलाहार का नियम: यदि निर्जला व्रत रखना संभव न हो, तो दिन में एक बार गाय का दूध अथवा ताजे मौसमी फल ग्रहण किए जा सकते हैं। व्रत में सेंधा नमक का उपयोग केवल तभी करें यदि शारीरिक रूप से अस्वस्थ हों, अन्यथा केवल मीठा फलाहार सर्वोत्तम माना गया है।
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पारण का सटीक समय: जन्माष्टमी व्रत का पारण मध्यरात्रि 12 बजे जन्मोत्सव, आरती और भोग के पश्चात चरणामृत, माखन और पंजीरी लेकर किया जा सकता है। परंतु स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के कई मतों के अनुसार व्रत का पूर्ण पारण अगले दिन सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर सात्त्विक अन्न बनाकर किया जाता है।
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गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और अस्वस्थ व्यक्तियों को शास्त्रों में केवल मानसिक पूजन और फलाहार की छूट दी गई है।
कृष्ण जन्माष्टमी पर राशि अनुसार श्रीकृष्ण पूजन और उपाय
कृष्ण जन्माष्टमी के दिन अपनी राशि के अनुसार कान्हा का पूजन करने से विशेष ग्रह दोष शांत होते हैं और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है:
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मेष व वृश्चिक राशि: भगवान को लाल वस्त्र अर्पित करें और माखन में गुड़ मिलाकर भोग लगाएं। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें।
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वृषभ व तुला राशि: कान्हा को श्वेत या चमकीले रेशमी वस्त्र पहनाएं। गाय के ताजे माखन और मिश्री का भोग लगाएं।
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मिथुन व कन्या राशि: बाल-गोपाल को हरे वस्त्र धारण कराएं, तुलसी की मंजरी अर्पित करें और धनिए की पंजीरी का नैवेद्य चढ़ाएं।
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कर्क राशि: भगवान का दूध व शंख से अभिषेक करें, श्वेत पुष्प चढ़ाएं और रबड़ी या दूध की खीर का भोग लगाएं।
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सिंह राशि: कान्हा को पीतांबर वस्त्र अर्पित करें, केसर युक्त चंदन का तिलक लगाएं और ऋतुफल का भोग दें।
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धनु व मीन राशि: भगवान को पीले कनेर के पुष्प, पीतांबर और बेसन के लड्डू अथवा केसर पेड़ा अर्पित करें।
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मकर व कुंभ राशि: बाल-गोपाल को नीले या गहरे रंग के वस्त्र पहनाएं और पंजीरी में काले तिल व पंचमेवा मिलाकर भोग लगाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: जन्माष्टमी पूजा में खीरे का डंठल क्यों काटा जाता है?
उत्तर: खीरे को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना जाता है। मध्यरात्रि 12 बजे सिक्के या चम्मच से डंठल को अलग करना नवजात शिशु की गर्भनाल काटने (नाल छेदन) का वैदिक व पारंपरिक प्रतीक है, जो जन्म प्रक्रिया के पूर्ण होने को दर्शाता है।
प्रश्न 2: क्या बिना संस्कृत मंत्रों के भी जन्माष्टमी की पूजा फलदायी होती है?
उत्तर: बिल्कुल। भगवान श्रीकृष्ण केवल अनन्य भाव और प्रेम को देखते हैं। यदि आपको वैदिक या संस्कृत मंत्र कंठस्थ न हों, तो आप केवल “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” अथवा “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे” महामंत्र का निरंतर जप करते हुए भी संपूर्ण पूजा पूर्ण कर सकते हैं।
प्रश्न 3: जन्माष्टमी के भोग में क्या अवश्य रखना चाहिए?
उत्तर: घर का निकाला ताजा माखन, मिश्री, धनिए की पंजीरी और तुलसी दल अनिवार्य हैं। बिना तुलसी दल के कान्हा नैवेद्य स्वीकार नहीं करते।
प्रश्न 4: एकादशी और जन्माष्टमी के व्रत में क्या अंतर है?
उत्तर: एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित पाक्षिक व्रत है, जबकि जन्माष्टमी साक्षात भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का वार्षिक महापर्व है। स्कंद पुराण के अनुसार जन्माष्टमी व्रत करने से सहस्र एकादशी व्रतों का पुण्य एक साथ प्राप्त हो जाता है।
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संकलनः राजन प्रकाश
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