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भगवान जगन्नाथ बीमार क्यों पड़े? जगन्नाथधाम के विचित्र पौराणिक रहस्य

भगवान जगन्नाथ बीमार क्यों पड़े? जगन्नाथधाम के विचित्र पौराणिक रहस्य

जिनके दर्शन मात्र से बड़े से बड़े असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं, वे जगत के स्वामी भगवान जगन्नाथ बीमार क्यों पड़े? जब भगवान मानव स्वरूप धारण करते हैं, तो वे अपनी लीलाओं को भी सामान्य मनुष्यों की तरह ही प्रकट करते हैं। यह भक्तों का भगवान के प्रति अनन्य भाव है, जहाँ भक्त और भगवान एकाकार हो जाते हैं।

श्री जगन्नाथ जी पुरी में बालरूप (शिशु रूप) में विराजमान हैं, इसलिए भक्त उनकी सेवा भी एक छोटे बालक की तरह ही करते हैं। आइए जानते हैं कि इस अनूठी परंपरा की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथा छिपी है।

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राजा इंद्रद्युम्न और ज्येष्ठ पूर्णिमा का ऐतिहासिक स्नान

इस पावन परंपरा की पृष्ठभूमि राजा इंद्रद्युम्न द्वारा भगवान के अभिषेक से जुड़ी है। स्कंद पुराण आधारित पौराणिक कथा के अनुसार, जब राजा इंद्रद्युम्न ने देखा कि भगवान की प्रतिमा अधूरी रह गई और दिव्य शिल्पकार (विश्वकर्मा जी) अंतर्ध्यान हो गए, तो वे विलाप करने लगे। तब प्रभु ने उन्हें अंतःप्रेरणा दी कि विलाप न करो, यही होनी को स्वीकार था। भगवान ने नारद जी को दिए वचन के अनुसार बालरूप में इसी आकार में पृथ्वी लोक पर विराजना तय किया था।

भगवान जगन्नाथ जी का जो स्वरूप जगन्नाथ पुरी के मंदिर में है उसमें आपने देखा होगा कि भगवान के हाथ पांव ही नहीं हैं. यह बात ध्यान से देखने पर समझ में आती है. आखिर बिना-हाथ पांव वाले भगवान की प्रतिमा क्यों बनाई गई? उनकी प्रतिमा अपूर्ण क्यों रह गई? एकमात्र अपूर्ण प्रतिमा है जिसकी पूजा की महिमा स्वयं श्रीकृष्ण ने बताई है. यह कथा बहुत भाव-विभोर कर देने वाली है.
विस्तार से कथा को इस लिंक से पढ़ सकते हैं- भगवान जगन्नाथ रथयात्रा की पौराणिक कथा जो आपने न सुनी होगी

इसके बाद भगवान ने राजा इंद्रद्युम्न को आदेश दिया कि ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि को 108 घड़े के शीतल जल से मेरा महाअभिषेक करो। इसी दिन से भगवान के बीमार होने की यह अनुपम लीला शुरू हुई।

आखिर भगवान जगन्नाथ बीमार क्यों हो जाते हैं?

ज्येष्ठ मास के भीषण तपते महीने में यदि कोई गहरे कुएं के ठंडे जल से स्नान कर ले, तो उसे लू लगना, सर्दी-जुकाम और बुखार होना स्वाभाविक है। चूंकि भगवान जगन्नाथ यहाँ बाल रूप में हैं, इसलिए 108 घड़ों से स्नान करने के बाद उन्हें भी मनुष्यों की तरह ही शीत लग जाती है और वे बीमार पड़ जाते हैं। इसी समय को ‘अनासर काल’ या ‘अनावसर’ कहा जाता है।

जगन्नाथ जी का काढ़ा और 15 दिनों की गुप्त सेवा

भगवान जगन्नाथ को ठीक होने में कितने दिन लगते हैं? ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक यानी पूरे 15 दिनों के लिए भगवान बीमार रहते हैं। इस दौरान मंदिर के पट पूरी तरह से बंद रहते हैं और भक्तों को दर्शन नहीं मिलते। इन 15 दिनों में बाल भगवान का विशेष उपचार किया जाता है:

  • परहेज का भोग: इस दौरान भगवान को छप्पन भोग नहीं लगाया जाता। उन्हें केवल मौसमी फल, परवल का जूस और विशेष जड़ी-बूटियों का काढ़ा अर्पित किया जाता है।

  • जगन्नाथ जी का विशेष काढ़ा: भगवान को दिया जाने वाला यह पवित्र काढ़ा काली मिर्च, जायफल, इलायची, लौंग, चंदन और तुलसी दल को मिलाकर विशेष रूप से तैयार किया जाता है। उपचार के बाद इस काढ़े को भक्तों में प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।

ठीक होने के बाद मौसी के घर प्रस्थान: जगन्नाथ रथयात्रा

15 दिनों के एकांतवास और उपचार के बाद जब आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान पूरी तरह स्वस्थ होते हैं, तब वे भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रोहिणी जी के घर (गुंडीचा मंदिर) जाने के लिए निकलते हैं। इसी भव्य उत्सव को विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा कहा जाता है।

स्कन्द पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति रथयात्रा में जगन्नाथ जी का नाम संकीर्तन करते हुए गुंडीचा नगर तक जाता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। गुंडीचा मंडप में रथ पर विराजमान श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा जी के दक्षिण दिशा की ओर आते हुए दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

लक्ष्मी जी का क्रोध और रथ का पहिया टूटना

मौसी के घर (जनकपुर) में भगवान जगन्नाथ अपने सभी दस अवतार धारण करते हैं। रथयात्रा के तीसरे दिन (आषाढ़ शुक्ल पंचमी) को माता लक्ष्मी भगवान को ढूंढते हुए गुंडीचा मंदिर पहुंचती हैं। लेकिन वहाँ मंदिर के मुख्य सेवादार (द्वैतापति या दैत्यपति) दरवाजा बंद कर देते हैं।

इससे रुष्ट होकर माता लक्ष्मी क्रोध में आकर भगवान के रथ का एक पहिया तोड़ देती हैं और ‘हेरा गोहिरी साही पुरी’ स्थित अपने लक्ष्मी मंदिर लौट जाती हैं। बाद में, भगवान जगन्नाथ स्वयं लक्ष्मी जी को मनाने जाते हैं और एक सामान्य पति की भांति मनुहार करके, उपहार देकर उनसे क्षमा मांगते हैं। पुरी में आयोजित होने वाली इस लीला में द्वैतापति और देवदासियों के बीच होने वाले संवाद को देखने के लिए आकाश से देवता भी उत्सुक रहते हैं।

बहुड़ा यात्रा और मुख्य मंदिर में वापसी

मौसी के घर 7 दिन आनंद मनाने और मालपुए का आनंद लेने के बाद आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुनः मुख्य मंदिर की ओर वापस चलते हैं। जगन्नाथ जी की इस वापसी यात्रा को ‘बहुड़ा यात्रा’ कहा जाता है। एकादशी के दिन विधि-विधान से स्नान और मंत्रोच्चार के बाद मूर्तियों को पुनः गर्भगृह में प्रतिष्ठित किया जाता है।

जगन्नाथ पुरी मंदिर के 10 विचित्र और अविश्वसनीय रहस्य

भगवान जगन्नाथ का यह मंदिर केवल अपनी लीलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि विज्ञान को चुनौती देने वाले चमत्कारों के लिए भी जाना जाता है। आइए जानते हैं जगन्नाथ मंदिर के 10 चमत्कार जो दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलते:

  1. विपरीत दिशा में लहराता ध्वज: मंदिर के शिखर पर लगा लाल ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है। यदि हवा पूर्व की ओर चल रही हो, तो झंडा पश्चिम की ओर लहराएगा।

  2. सदा सम्मुख दिखने वाला सुदर्शन चक्र: मंदिर के शिखर पर स्थित अष्टधातु के सुदर्शन चक्र को आप पुरी में किसी भी दिशा से खड़े होकर देखें, उसका मुख हमेशा आपकी तरफ ही दिखाई देगा।

  3. प्रसाद पकने की अनूठी मिट्टी के बर्तनों की विधि: यहाँ प्रसाद पकाने के लिए सात मिट्टी के बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। अचरज की बात यह है कि जो बर्तन आग के सबसे दूर यानी सबसे ऊपर होता है, उसका प्रसाद सबसे पहले पकता है।

  4. सिंहद्वार पर समुद्र की आवाज गायब होना: मंदिर समुद्र तट पर है, लेकिन जैसे ही आप सिंहद्वार से मंदिर के भीतर पहला कदम रखते हैं, समुद्र की लहरों की आवाज़ पूरी तरह गायब हो जाती है। बाहर आते ही आवाज़ फिर सुनाई देने लगती है।

  5. पक्षियों और विमानों का न उड़ना: मंदिर के शिखर के ऊपर से आज तक न तो कोई पक्षी उड़ता हुआ देखा गया है और न ही कोई हवाई जहाज इसके ऊपर से गुजरता है।

  6. अन्न का कभी कम न पड़ना: मंदिर में चाहे जितने भी लाख भक्त आ जाएं, प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता। और जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं, बचा हुआ प्रसाद अपने आप समाप्त हो जाता है।

  7. शिखर की परछाई का गायब होना: दिन के किसी भी समय—सुबह, दोपहर या शाम—जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई ज़मीन पर कभी नहीं बनती।

  8. 18 वर्षों का कठोर नियम: मंदिर का शिखर 45 मंजिला ऊंचा है। एक पुजारी रोज़ जान जोखिम में डालकर शिखर पर जाकर ध्वज बदलता है। मान्यता है कि यदि एक दिन भी ध्वज नहीं बदला गया, तो मंदिर अगले 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।

  9. उल्टी हवा का चलना: दुनिया भर में दिन में हवा समुद्र से धरती की ओर और शाम को धरती से समुद्र की ओर चलती है, लेकिन पुरी में यह प्राकृतिक नियम बिल्कुल उल्टा काम करता है।

  10. बेदी हनुमान जी की कथा: समुद्र ने जब तीन बार मंदिर को क्षति पहुंचाने की कोशिश की, तो भगवान ने हनुमान जी को समुद्र नियंत्रित करने के लिए नियुक्त किया। हनुमान जी जब प्रभु के दर्शन के लिए मंदिर आने लगे, तो पीछे-पीछे समुद्र भी आने लगा। इस समस्या के समाधान के लिए जगन्नाथ जी ने हनुमान जी को यहाँ स्वर्ण बेड़ी (जंजीर) से बांध दिया। पुरी के सागर तट पर आज भी ‘बेदी हनुमान’ का प्रसिद्ध मंदिर स्थापित है।

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भगत के वश में हैं भगवान-सदना जी की विभोर करने वाली कथा

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