गणेश चतुर्थी 2026ः गणपति स्थापना, पूजन की विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)

गणेश चतुर्थी 2026ः गणपति स्थापना, पूजन की विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)

गणेश चतुर्थी 206 पर गणपति स्थापना, षोडशोपचार पूजन की संपूर्ण विधि एवं व्रत कथा

गणेश चतुर्थी 2026 का वह शुभ समय आ गया है जिसकी साल भर प्रतीक्षा रहती है। गणेश जी के प्राकट्य या जन्म का उत्सव मनाने के लिए उनकी तरह-तरह से पूजा होती है।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होकर दस दिनों तक यह पर्व चलेगा और अनंत चतुदर्शी के दिन विसर्जन के साथ समापन हो जाएगा। गणेश चतुर्थी 2026 पर गणपति भक्तों के लिए हम ऐसी पोस्ट लेकर आए हैं जिसको पढ़ने के बाद उन्हें कुछ और पढ़ने की जरूरत ही नहीं होगी।

गणेश चतुर्थी 2026 के इस विशेष पोस्ट में हम गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त, गणपति स्थापना की पूरी पूजा विधि स्टेप-बाय-स्टेप बहुत सरल रूप में जानेंगे। इसके साथ ही गणपति स्थापना के सरल मंत्र, गणेश चतुर्थी की कथा और गणपति स्थापना की सावधानियों के बारे में जानेंगे बहुत सरल भाषा में।

गणेश चतुर्थी 2026 पर प्रभु शरणं में आपको बहुत सी और सुंदर-सुंदर कथाएं पढ़ने को मिलेंगी। गणेश पुराण और गणेश जी की बहुत सुंदर लीला कथाएं भी आप पढ़ेंगे। लेकिन सबसे पहले अपना एक भ्रम दूर करें।

परमदेव भगवान गणेश कौन हैं?

गणेश जी का नाम सुनने से हम सामान्य रूप से यही समझ लेते हैं कि शिव-पार्वती के पुत्र ही गणेश जी हैं। लेकिन वास्तव में यह गणेश जी का अधूरा परिचय है।

श्रीगणेश तो आदिदेव हैं, जैसे देवाधिदेव शिव, श्रीहरि नारायण, आदिशक्ति भगवती, भुवनभास्कर सूर्य और परमपिता ब्रह्मा हैं। निःसंदेह वे माता-पार्वती और शिवजी के पुत्र भी बने लेकिन वह उनका अवतार रूप था।

माता पार्वती ने गणपति को प्रसन्न करके अपने पुत्र रूप में आने की प्रार्थना की थी, इसलिए वे गौरीपुत्र कहलाए। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के पावन दिवस पर ही महागणपति भगवती पार्वती की मनोरथ पूर्ति हेतु अवतरित हुए थे। इसका एक और प्रमाण आप यह मानें कि शिव-पार्वती के विवाह में गणेश जी की पूजा हुई थी। यह पूजा स्वयं ब्रह्मा ने कराई थी।

तो यदि गणेश जी शिव-पार्वती के संतान मात्र होते तो वे विवाह में कैसे उपस्थित होते? अब आपको समझ आ रहा होगा कि गौरीपुत्र रूप में वह श्री गणेश जी का एक अवतरण था। यह बात ठीक वैसी ही है जैसे देवकी-वासुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण का एक लीला स्वरूप है, जबकि श्रीकृष्ण के समस्त स्वरूप और नारायण स्वयं परब्रह्म हैं।

गजानन, एकदंत, लंबोदर आदि महागणपति के वे दिव्य स्वरूप हैं जो उन्होंने विभिन्न लीलाओं और लोकमंगल के प्रयोजन से धारण किए हैं। और ऐसे ही अनेक स्वरूप उन्होंने विभिन्न कालों में धारण किए हैं।

तो है न आपके लिए यह एक बड़ी रोचक और काम की जानकारी? प्रभु शरणं का उद्देश्य ही है इसके पाठकों को धर्म की गूढ़ बातों से परिचित कराना।

आइए गणेश चतुर्थी 2026 की पोस्ट को आगे बढ़ाते हैं अन्य जरूरी जानकारियों के साथ।

गणेश चतुर्थी 2026: गणपति स्थापना मुहूर्त, षोडशोपचार पूजन विधि व कथा
गणेश चतुर्थी 2026 विशेषः गणपति पूजन का महत्व

शास्त्र के ऐसे ही गूढ़ और कम प्रचलित रहस्यों से परिचित कराने का दायित्व प्रभु शरणम् निरंतर निभाता आ रहा है। गणेश चतुर्थी 2026 की पोस्ट को आगे बढ़ाने से पहले आपके लिए एक विनम्र निवेदन है-

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भगवान को आडंबर और लंबे कर्मकांड से अधिक भक्त का सच्चा प्रेम और भाव प्रिय होता है। यदि आप कार्यव्यस्तता, स्वास्थ्य या अन्य किसी कारणवश दस दिनों तक प्रतिदिन विस्तृत विधि-विधान से पूजन-अर्चन करने में असमर्थ हैं, तो इन दस दिनों में भगवान गणेश के ध्यान में लीन रहने का सबसे सरल, प्रामाणिक और कल्याणकारी मार्ग है—श्री गणेश पुराण का पाठ।

यदि आप दिनभर में मात्र 5 से 10 मिनट का समय भी निकालते हैं, तो इन दस दिनों में संपूर्ण गणेश पुराण का रसपान सहजता से कर सकते हैं। आप सफर में हों, मेट्रो में हों, दफ्तर में हों या घर पर विश्राम कर रहे हों—प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप में गणेश पुराण को छोटे-छोटे और अत्यंत सरल प्रसंगों में संकलित किया गया है। यह दस दिन आपके संकल्प और निष्ठा की सुंदर परीक्षा भी बन सकते हैं।

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गणेश चतुर्थी 2026: पूजन एवं गणपति स्थापना मुहूर्त

गणेश पूजन के लिए मध्याह्न काल को ही शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ और फलदायी माना गया है। गणेश चतुर्थी 2026 पर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापना और पूजन का संपूर्ण समय-विवरण इस प्रकार है:

  • गणेश स्थापना एवं मध्याह्न पूजा मुहूर्त: 14 सितंबर 2026, सोमवार को दोपहर 11:01 AM से 01:29 PM तक

  • मध्याह्न पूजा मुहूर्त की कुल अवधि: 2 घंटे 28 मिनट

  • भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 14 सितंबर 2026 को प्रातः 07:06 बजे से

  • भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तिथि समाप्त: 15 सितंबर 2026 को प्रातः 07:44 बजे तक

नोटः यदि गणेश चतुर्थी 2026 के लिए ऊपर बताए गए मुहूर्त में  पूजन संभव हो तो अवश्य करेंष फिर भी गणेश जी तो मंगल के देवता हैं। उनकी पूजा-आराधना किसी भी समय की जा सकती है। कर्मकांड से अधिक महत्व भाव का है।


गणपति स्थापना मंत्र और विधिः षोडशोपचार पूजन विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)

गणेश चतुर्थी: गणपति स्थापना मुहूर्त, षोडशोपचार पूजन विधि व कथा
गणेश चतुर्थी: गणपति स्थापना मुहूर्त, षोडशोपचार पूजन विधि व कथा

शास्त्रों में भगवान गणेश के स्थापना पूजन विधि को 16 भागों में कहा गया है जिसे षोडशोपचार पूजन विधि कहते हैं। हम आपको पूरी विधि सरल तरीके से समझाएंगे। पढ़ते जाएं और पूजा करते जाएं।

गणपति स्थापना से पूर्व की तैयारीः 

प्रातःकाल नित्यकर्म व स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र कर लें। घर के उत्तर या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में लकड़ी की चौकी रखें और उस पर नया लाल वस्त्र बिछाएं। नए तांबे अथवा मिट्टी के कलश में शुद्ध जल भरकर कोरे कपड़े या नारियल से सुसज्जित करें। इसके पश्चात मिट्टी या धातु से निर्मित गणेशजी की नवीन प्रतिमा को विराजमान करें।

(विशेष ध्यान दें: यदि आपके घर के मंदिर में श्रीगणेश की प्रतिमा पहले से ही प्राण-प्रतिष्ठित है, तो उन्हें हिलाने अथवा विसर्जित करने की आवश्यकता नहीं होती। उनके लिए केवल आसन, स्नान और आगे के उपचार किए जाते हैं। नवीन मूर्ति का ही आवाहन व प्राण-प्रतिष्ठापन होता है।)

गणपति स्थापना पूजन संकल्प:

हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर मन में दृढ़ भाव से संकल्प लें:

“मैं (अपना नाम बोलें), विक्रम संवत् 2083, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, सोमवार कोभारत देश के …..  अपने शहर/गांव/स्थान (नाम बोलें) में अपने समस्त विघ्नों के निवारण एवं मनोकामना सिद्धि हेतु श्रीगणेश पूजन एवं व्रत का संकल्प करता/करती हूँ। हे विघ्नहर्ता, मेरी पूजा स्वीकार करें।”

इसके बाद हाथ का जल भूमि पर छोड़ दें।

गणपति स्थापना विधि और मंत्रः षोडशोपचार पूजा के 16 चरण 

षोडशोपचार यानी 16 प्रकार से पूजन की संक्षिप्त और सरलतम विधि इस प्रकार है-

1. आवाहन एवं प्राण प्रतिष्ठापन-

आवाहन विधिः
आवाहन के लिए सर्वप्रथम, नीचे दिए मन्त्र को पढ़ते हुए भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा के सम्मुख आवाहन-मुद्रा अर्थात जोड़ने और हथेलियों को खोलकर विनीत भाव में हो जाएं और भगवान का आह्वान करें.
ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः आवाहयामि-स्थापयामि।
( यदि संस्कृत पढ़ने में दिक्कत है तो हिंदी मे इसे कैसे कह सकते हैं-
मैं सिद्धि-बुद्धि जी के संग श्रीमहागणपति भगवान का आह्वान-स्थापना करता हूं/ करती हूं.
आगे के मंत्रों में शुरू के पद समान रहेंगे सिर्फ उपचार का पद अलग रहेगा. कहने का अर्थ की आगे के हर स्टेप पर कहें- मैं सिद्धि-बुद्धि जी के संग श्रीमहागणपति भगवान  को ….. प्रदान करता/करती हूँ )

इसके बाद प्राण प्रतिष्ठा हेतु कहेंः

आह्वान के बाद मूर्ति में भगवान की प्रतिष्ठा करनी होती है. इसके लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः सुप्रतिष्ठो वरदो भव।।

2. आसन प्रदान करनाः

प्रतिष्ठा के बाद भगवान को आसन समर्पित किया जाता है. आसन के लिए पांच पुष्प अंजुली में लेकर भगवान की प्रतिमा के समक्ष छोड़े और निम्न मंत्र का उच्चारण करें.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः आसनम् समर्पयामि।।

3. पाद्य समर्पण यानी पैर धुलानाः

आसन देने के बाद निम्न मंत्र पढ़ते हुए भगवान को पांव धोने के लिए जल प्रदान करें.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः पाद्यं समर्पयामि।।

4. अर्ध्य समर्पणः

इसके बाद भगवान को अर्घ्य समर्पित किया जाता है. अर्घ्य समर्पित करने का अर्थ हुआ जहा भगवान को प्रतिष्ठापित किया है वह वातावारण पवित्र और सुगंधित है.

गंध मिश्रित जल समर्पित करें और निम्न मंत्र का उच्चारण करें.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः  अर्घ्यं समर्पयामि।।

5. आचमन समर्पणः

इसके बाद भगवान को आचमन के लिए जल समर्पित करना चाहिए.  निम्न मंत्र पढ़ते हुए भगवान को आचमन के लिए जल समर्पित करें-

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः मुखे आचमनीयं जलं समर्पयामि।।

6.स्नानः

इसके पश्चात भगवान को स्नान कराना चाहिए. भगवान का स्नान भी कई प्रकार से किया जाता है. जल से स्नान, पंचामृत स्नान, दूध, दही, घी, मधु, शर्करा, सुवासित शुद्धोदक स्नान कराया जाता है.  जैसे हम स्नान करते हैं तो जल डालते हैं, साबुन लगाते हैं, शैंपू लगाते हैं, कंडीशनर लगाते हैं. फिर तेल, क्रीम स्प्रे आदि करते हैं. उसी प्रकार का भाव है इन स्नान में.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः सर्वांग स्नानं समर्पयामि।।

7. वस्त्र एवं उप-वस्त्र समर्पणः

इसके बाद भगवान को वस्त्र समर्पित किया जाता है. वस्त्र में एक तो पूरा वस्त्र और फिर उत्तरीय जिसे आप गमछा या रूमाल समझ लें.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः वस्त्रं च उत्तरीयं च समर्पयामि।।

इस मंत्र के साथ गणेश प्रतिमा पर नए वस्त्र एवं उपवस्त्र चढ़ाने चाहिए.

8. यज्ञोवपीत यानी जनेऊ समर्पणः

भगवान को निम्न मंत्र पढ़ते हए जनेऊ समर्पण करें-

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि।।

9. गंध समर्पणः

इसके बाद भगवान को सुंगधित द्रव्य समर्पण करना चाहिए और निम्नमंत्र का उच्चारण करना चाहिए.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः  गंधम् समर्पयामि।।

10. अक्षत समर्पणः

इसके बाद अक्षत चावल भगवान को निम्न मंत्र पढ़ते हुए समर्पित करना चाहिए-

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः अक्षतं समर्पयामि।।

11. पुष्प, शमी, दूर्वा घास, सिंदूर आदि शृंगार समर्पणः 

इनमें से जो भी पदार्थ समर्पित कर रहे हों बारी-बारी से उसका नाम लेते जाएं. मंत्र रहेगा- ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः पुष्पं समर्पयामि… इसमें ही जोड़ते जाएं.

12. धूप समर्पणः

इसके बाद धूप जलाकर भगवान को निम्न मंत्र कहते हुए दिखाएं

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः धूपं समर्पयामि।

13. दीप समर्पणः

घी के दीपक जलाकर भगवान को सर्वांग दिखाएं और निम्न मंत्र का पाठ करें-

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः दीपं समर्पयामि।।

14. नैवेद्य या मिष्ठान्न आदि समर्पणः

भगवान को शुद्ध पात्र में मिष्ठान्न जिसमें मोदक या लड्डू सबसे उचित है समर्पित करें. 21 लड्डु का भोग लगाएं. पांच प्रतिमा के पास छोड़कर शेष पूजन के बाद भक्तों में बांट दें.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः नैवेद्यम् समर्पयामि।।

15. तांबूल या पान समर्पणः

भगवान को पान अर्पित करें एवं निम्न मंत्र का पाठ करें. इस पान में तंबाकू युक्त कुछ भी न हो.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः पूंगीफलादि सहितम् तांबूलम् समर्पयामि।।

16. द्रव्य दक्षिणा समर्पण

हाथ में कुछ धन लेकर श्रद्धाभाव से भगवान के चरणों में इस भाव से अर्पित करें कि हे भगवान मेरा क्या है, सब आपका ही दिया है. समस्त आपका आपको समर्पित है. आप जो प्रसाद स्वरूप देंगे वही मेरे लिए पर्याप्त है. भावरूप में कुछ दक्षिणा समर्पित कर रहा हूं.

ऊँ सिद्धि-बुद्धि सहिताय श्रीमहागणाधिपत्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि।।

इसके बाद आरती की जाती है.

आरती एवं प्रदक्षिणाः

  • इसके पश्चात कपूर अथवा घी के दीपक से भगवान की आरती उतारें और अपने ही स्थान पर दाहिनी ओर घूमते हुए चार बार प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करें।

श्रीगणेश जी की आरती


गणपति अंग-पूजन का विशेष माहात्म्य

गणेश चतुर्थी: गणपति के अंग पूजन की विधि

गणेश चतुर्थी की पूजा में कई श्रद्धालु अनजाने में एक महत्वपूर्ण चरण छोड़ देते हैं—वह है गणपति के दिव्य अंगों की विधिवत पूजा। प्रथमपूज्य के प्रत्येक अंग में ब्रह्मांडीय ऊर्जा और कल्याणकारी संदेश समाहित हैं। पुष्प और अक्षत हाथ में लेकर क्रमशः इन 15 पावन मंत्रों से उनके अंगों की अर्चना करें:

  • ॐ गणेश्वराय नमः पादौ पूजयामि। (चरणों का पूजन)

  • ॐ विघ्नराजाय नमः जानूनी पूजयामि। (घुटनों का पूजन)

  • ॐ आखूवाहनाय नमः ऊरू पूजयामि। (जंघाओं का पूजन)

  • ॐ हेरम्बाय नमः कटिं पूजयामि। (कमर का पूजन)

  • ॐ कामारीसूनवे नमः नाभिं पूजयामि। (नाभि का पूजन)

  • ॐ लंबोदराय नमः उदरं पूजयामि। (उदर का पूजन)

  • ॐ गौरीसुताय नमः स्तनौ पूजयामि। (वक्षस्थल का पूजन)

  • ॐ गणनाथाय नमः हृदयं पूजयामि। (हृदय का पूजन)

  • ॐ स्थूलकण्ठाय नमः कण्ठं पूजयामि। (कंठ का पूजन)

  • ॐ पाशहस्ताय नमः स्कन्धौ पूजयामि। (कंधों का पूजन)

  • ॐ गजवक्त्राय नमः हस्तान् पूजयामि। (हाथों का पूजन)

  • ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः वक्त्रं पूजयामि। (मुख का पूजन)

  • ॐ विघ्नहर्त्रे नमः ललाटं पूजयामि। (ललाट का पूजन)

  • ॐ सर्वेश्वराय नमः शिरः पूजयामि। (मस्तक का पूजन)

  • ॐ गणाधिपतये नमः सर्वाङ्गं पूजयामि। (समस्त अंगों का सर्वांगीण पूजन)

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गणेश पूजा में ध्यान में रखने वाली आवश्यक बातेंः

गणेश जी की पूजा में कुछ चीजें ध्यान रखनी चाहिए. ये ऐसी चीजें हैं जो बहुत सरल हैं. जब सरल हैं तो करने में क्या दिक्कत है?

  • आसन समर्पण करते समय आसन पर पांच फूल रखें.
  • पाद्य में- चार बार जल, दूब, कमल अर्पित करें
  • अर्घ्य में- चार बार जल, जायफल, लौंग आदि
  • मधुपर्क में- कांस्य पात्र में घी, मधु और दही दें.
  • मधुपर्क के आचमन में सिर्फ एक बार जल दें.
  • स्नान में- पचास बार जल छिड़कें
  • वस्त्र- बारह अंगुल से बड़ा और नया वस्त्र होना चाहिए
  • धूप- गूगल का हो और कांसे के पात्र में हो तो अच्छा
  • नैवेद्य- एक व्यक्ति के भोजन के लिए पर्याप्त होना चाहिए
  • दीप- कपास की बाती कम से कम चार अंगुल की. घी के दीपक से भगवान की सात बार आरती की जाती है.
  • दूर्बा व अक्षत- मोटे अंदाजे से संख्या सौ के ऊपर ही रखें.

(ऊपर कही गई जो सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाती उसके लिए भगवान गणपति का ध्यान करके उनसे क्षमा प्रार्थना कर लें और विनती करें कि हे गणेशजी आप हमें सामर्थ्य दें कि अगले वर्ष आपकी पूजा में समस्त सामग्री से पूर्ण होकर आपकी पूजा करें.)

इसके बाद चतुर्थी की कथा कहनी चाहिए. कथा के बाद गणेश जी की विधिवत आरती करें और प्रसाद वितरण करें.

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गणेश चतुर्थी की कथा

गणेश चतुर्थी की कथाएं तो अनेक कथाएं हैं। इनमें से तीन कथाएं बहुत लोकप्रिय हैं। तीनों कथाओं में से सर्वाधिक प्रचलित कथा यहां प्रस्तुत की जा रही है। गणेश चतुर्थी 2026 के पूजन पर आप यह कथा अवश्य कहें।

शेष दोनों कथाएं प्रभु शरणम् ऐप में दी जाएंगी। आप उनका भी पाठ कर सकते हैं।वह बाद में भी कर सकते हैं।

गणेश चतुर्थी की सबसे लोकप्रिय कथा इस प्रकार हैः

एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे. देवी पार्वती ने समय व्यतीत करने के लिए भोलेनाथ से चौपड़ खेलने को कहा. महादेव तैयार हो गए. परन्तु वहां कोई और था नहीं. इसलिए इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा?

भोलेनाथ ने कुछ तिनकों से पुतला बनाया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर दी. पुतला बालक के रूप में जीवित हो गया. महादेव ने बालक से कहा- पुत्र हम चौपड़ खेलना चाहते हैं. तुम इस खेल का निर्णायक बनो. तुम फैसला करना कि चौपड़ में कौन हारा और कौन जीता?

चौपड का खेल तीन बार खेला गया. संयोग से तीनों बार पार्वतीजी जीत गईं. खेल समाप्त होने पर बालक से देवी ने उसका निर्णय पूछा. उसने महादेव को विजयी घोषित कर दिया. पार्वतीजी क्रोधित हो गईं.उन्होंने कहा- तुममें निर्णायक बनने की क्षमता नहीं है. हार-जीत प्रत्यक्ष देखते हुए भी तुमने कुटिलता से गलत निर्णय सुनाया. इसलिए तुम लंगड़े होकर कीचड में पड़े रहो. बालक ने पैर पकड़ लिए और कहा- आप मेरी माता समान हैं. मैंने द्वेष में ऐसा नहीं किया अज्ञानतावश से हुआ. क्षमा कर दें.

पार्वतीजी पसीज गईं. उन्होंने कहा- यहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी. उनसे पूजा की विधि समझकर तुम गणेश व्रत करो. ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे. यह कहकर शिव-पार्वती कैलाश चले गए. सालभर बाद नाग कन्याएं गणेश पूजन के लिए आईं.

उनसे पूजन विधि ठीक से समझकर बालक ने श्रीगणेश का 21 दिन लगातार व्रत किया. गणेशजी प्रसन्न हो गए और वर मांगने को कहा.

गणेश चतुर्थी की कथाः शिव-पार्वती चौपड़ खेलते हुए
गणेश चतुर्थी 2026 कथाः शिव-पार्वती चौपड़ खेलते हुए

बालक ने मांगा- हे विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वे यह देख प्रसन्न हों.

श्रीगणेश से वरदान प्राप्त कर वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. किसी बात पर पार्वतीजी, भोलेनाथ से रुष्ट हो गईं. बातचीत तक बंद हो गई. कैलाश पर रह रहे उस बालक को भी बात पता चली.

उसने शिवजी से कहा- जैसे माता ने कहा था कि गणेश पूजा करके तुम मेरा स्नेह प्राप्त करोगे. नाराज देवी को मनाने के लिए आप भी वही पूजन करिए. भक्त की बात पर भोलेनाथ मुस्कुराए.वह देवी को प्रसन्न करने के लिए बालक के मन में बसे गणेश आराधना के भाव को बनाए रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने बालक से गणेश पूजा की विधि समझी और व्रत किया.

पुत्र के प्रति इस स्नेह के भाव से पार्वती खुश हो गईं. माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी वह समाप्त हो गई.

गणेश को प्रथम पूजनीय बनाने से नाराज शिवपुत्र कार्तिकेय दक्षिण में निवास कर रहे थे. देवी को पुत्र से मिलने की बड़ी इच्छा हुई. वह पुत्र से मिलने को बेचैन हो गईं. शिवजी ने युक्ति लगाई. उन्होंने पार्वती से कहा- पुत्र को प्राप्त करने के लिए तुम भी गणेश पूजन करो.

एक पुत्र से मिलन को व्याकुल माता ने दूसरे पुत्र की आराधना करनी शुरू कर दी. कार्तिकेय को खबर लगी. वह भागे-भागे कैलाश आए. माता की पुत्र से भेंट की मनोकामना पूरी हुई. उस दिन से श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरे करने वाला व्रत माना जाता है.

मनोकामना पूर्ति के लिए शिव-पार्वती ने भी की है गणेश पूजा.


गणेश चतुर्थी 2026 पर जानने योग्य कुछ अन्य मुख्य बातें (FAQ)

1. गणेश चतुर्थी का पर्व क्यों मनाया जाता है?

पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विघ्नविनाशक, बुद्धि-विवेक के अधिष्ठाता भगवान श्रीगणेश का प्राकट्य हुआ था। समस्त ब्रह्मांड में विघ्नों के शमन और धर्म की स्थापना हेतु उनका यह अवतार हुआ, जिसे भक्त अत्यंत उल्लास और जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं।

2. गणेश चतुर्थी व्रत और पूजन का क्या आध्यात्मिक महत्व है?

सनातन परंपरा में श्रीगणेश को ‘प्रथमपूज्य’ का स्थान प्राप्त है। किसी भी मांगलिक कार्य से पूर्व उनकी आराधना अनिवार्य मानी गई है। गणेश चतुर्थी पर विधिपूर्वक व्रत, षोडशोपचार पूजन और अंग-पूजन करने से साधक के जीवन के समस्त संचित संकट कट जाते हैं, घर में रिद्धि-सिद्धि का वास होता है और व्यापार, विद्या व गृहस्थ जीवन में अटके कार्य निर्विघ्न पूरे होते हैं।

3. गणेश चतुर्थी वाले दिन किन बातों से बचना चाहिए (क्या न करें)?

  • चतुर्थी का चंद्रमा न देखें: इस पावन तिथि की रात्रि को चंद्र-दर्शन वर्जित माना गया है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा को देखने से मनुष्य पर झूठे कलंक या लांछन लगते हैं। यदि भूलवश चंद्र दर्शन हो जाए, तो स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण या पाठ अवश्य करना चाहिए।

  • तुलसी दल कभी न चढ़ाएं: पौराणिक आख्यानों के अनुसार श्रीगणेश को तुलसी अर्पित करना पूर्णतः निषेध है। उनके पूजन में दूर्वा और शमी पत्र का ही विशेष प्रयोग करें।

  • तामसिक आहार व आचरण से दूर रहें: घर में पूर्ण सात्विकता बनाए रखें। क्रोध, कटु वचन, मांस, मदिरा और प्याज-लहसुन का त्याग करें।

  • खंडित सामग्री न लें: पूजन में टूटे हुए चावल (अक्षत) अथवा खंडित दीपक/प्रतिमा का उपयोग न करें।

4. गणेश उत्सव के दस दिनों का क्या विशेष महत्व है?

चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक चलने वाले ये दस दिन साधना और आत्मशुद्धि के माने गए हैं। मान्यता है कि इन दस दिनों में भगवान गणेश साक्षात अपने भक्तों के घर में अतिथि स्वरूप विराजते हैं। इन दस दिनों में नित्य संकीर्तन, गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ अथवा गणेश पुराण का अध्ययन करने से सहस्त्र गुना पुण्यफल मिलता है। दसवें दिन विसर्जन के साथ ही प्रभु भक्तों की समस्त विपदाएं और विघ्न अपने साथ ले जाते हैं।

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संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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धार्मिक अभियान प्रभु शरणम् के बारे में दो शब्दः 

सनातन धर्म के गूढ़ रहस्य, हिंदूग्रथों की महिमा कथाओं ,उन कथाओं के पीछे के ज्ञान-विज्ञान से हर हिंदू को परिचित कराने के लिए प्रभु शरणम् मिशन कृतसंकल्प है. देव डराते नहीं. धर्म डरने की चीज नहीं हृदय से ग्रहण करने के लिए है. तकनीक से सहारे सनातन धर्म के ज्ञान के देश-विदेश के हर कोने में प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से प्रभु शरणम् मिशन की शुरुआत की गई थी. इससे देश-दुनिया के कई लाख लोग जुड़े और लाभ उठा रहे हैं. आप स्वयं परखकर देखें. आइए साथ-साथ चलें; प्रभु शरणम्!

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