राधा कृष्ण कथा: प्रेम और विरह की अनूठी गाथा

राधा कृष्ण कथा: प्रेम और विरह की अनूठी गाथा

राधा कृष्ण कथाः एक अलौकिक आख्यान

राधा कृष्ण कथा को एक सामान्य कथा या प्रेम कथा कह देना अपनी दृष्टि और बुद्धि को छोटा करके दिखाना ही हो सकता है। यह केवल दो हृदयों का मिलन नहीं, अपितु आत्मा और परमात्मा के एकाकार होने की वह दिव्य धारा है जिसे सांसारिक दृष्टि से कभी नहीं समझा जा सकता। राधा कृष्ण कथा (Radha Krishna love story) को समझने के लिए तर्क नहीं, बल्कि अंतःकरण में अगाध प्रेम और समर्पण का भाव होना आवश्यक है।

किसी ने क्या सुंदर कहा है-

बंसी सब सुर त्यागे है एक ही सुर में बाजे है,
हाल न पूछो मोहन का सबकुछ राधे राधे है।

जब तक हृदय में राधा रानी सा समर्पण और माधव सी विरह-वेदना न हो, तब तक इस पावन राधा कृष्ण कथा के मर्म को स्पर्श भी नहीं किया जा सकता।

राधा कृष्ण कथा: राधाजी का वह अनूठा घाव, जिसके बहाने रोज सपने में आते थे कन्हैया। द्वारका में छलके प्रभु के आँसू और उद्धव का टूटा गर्व। एक पावन प्रेम गाथा।
राधा कृष्ण कथाः प्रेम व विरह की अनूठी कथा

राधा कृष्ण कथाः ब्रज बसे मेरे मन में

श्रीकृष्ण का भौतिक शरीर चाहे द्वारका की राजसभा में सुशोभित था, परंतु उनका पावन हृदय तो आज भी ब्रज की उन्हीं कुंज-गलियों और यमुना के शीतल कछारों में भटकता था।

द्वारका के वैभवशाली सिंहासन पर बैठकर भी जब कभी मुरलीधर अपनी आँखें मूँदते, उन्हें केवल ब्रज की धूल और राधाजी की विरह-व्याकुल छवियाँ ही दिखाई देतीं। वे गए तो यह कहकर थे कि कुछ ही दिनों में लौट आएँगे, किंतु विधि का विधान और राजकाज का ऐसा बंधन पड़ा कि कन्हैया कभी लौट न सके।

गोपाल अब द्वारकाधीश बन चुके थे। भक्त और प्रजा दिन-रात उनके दर्शन पाकर धन्य होते, किंतु जो जगत को तृप्त करता था, वह स्वयं प्रेम के एक घूँट के लिए भीतर ही भीतर रीता जा रहा था। श्रीकृष्ण से विरह में सबसे अधिक दग्ध यदि कोई थीं, तो वे थीं स्वयं वृषभानु-दुलारी श्रीराधा।

राधा कृष्ण कथाः ब्रज से दूर प्रभु की पीड़ा

द्वारकाधीश श्रीकृष्ण हमेशा अकेलापन महसूस करते. उन्हें गोकुल और व्रज हमेशा याद आता. जिस भी व्रजवासी के मन में अपने लल्ला से मिलने की तीव्र इच्छा होती श्रीकृष्ण उसे स्वप्न में दर्शन दे देते. स्वप्न में आते तो उलाहना मिलती, इतने दिनों से क्यों नहीं आए. यही सिलसिला था.

भक्त और भगवान वैसे तो दूर-दूर थे. फिर भी स्वप्न में ही दर्शन हों जाएं, तो ऐसे भाग्य को कोई कैसे न सराहे.

श्रीकृष्ण से विरह से सबसे ज्यादा व्याकुल तो राधाजी थीं. राधा और कृष्ण मिलकर राधेकृष्ण होते थे पर दोनों भौतिक रूप से दूर थे.

राधा रानी के चरण का घाव और श्रीकृष्ण का विरह

एक दिन की बात है. राधाजी सखियों संग कहीं बैठी थीं. अचानक एक सखी की नजर राधा जी के पैर पर चली गई. पैर में एक घाव से खून बह रहा था.

राधा जी कै पैर में चोट लगी है, घाव से खून बह रहा है. सभी चिंतित हो गए कि उन्हें यह चोट लगी कैसे. लगी भी तो किसी को पता क्यों न चला.

सबने राधा जी से पूछा कि यह चोट कैसे लगी? राधा जी ने बात टालनी चाहा. अब यह तो इंसानी प्रवृति है आप जिस बात को जितना टालेंगे, लोग उसे उतना ही पूछेंगे.

राधा जी ने कहा- एक पुराना घाव है. वैसे कोई खास बात है नहीं. चिंता न करो सूख जाएगा.

राधा कृष्ण कथा: जब राधाजी के पैर के घाव को देख द्वारका में रो पड़े कन्हैया और उद्धव का ज्ञान स्तब्ध रह गया! जानिए Radha Krishna love story की यह मार्मिक गाथा।
राधा कृष्ण कथाः प्रेम और विरह की अनूठी कथा

सखी ने पलटकर पूछ दिया- पुराना कैसे मानूं? इससे तो खून बह रहा है. यदि पुराना है, तो अब तक सूखा क्यों नहीं? यह घाव कैसे लगा, कब लगा? क्या उपचार कर रही हो? जख्म नहीं भर रहा कहीं कोई दूसरा रोग न हो जाए!

एक के बाद एक राधाजी से सखियों ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी. उन्हें क्या पता, जिन राधाजी की कृपा से सबके घाव भरते हैं, उन्हें भयंकर रोग भला क्या होगा!

राधाजी समझ गईं कि अगर उत्तर नहीं दिया तो यह प्रश्न प्रतिदिन होगा. इसलिए कुछ न कुछ कहके पीछा छुड़ा लिया जाए, उसी में भला है.

राधा जी बोलीं- एक दिन मैंने खेल-खेल में कन्हैया की बांसुरी छीन ली. वह अपनी बांसुरी लेने मेरे पीछे दौड़े. बांसुरी की छीना-झपटी में अचानक उनके पैर का नाखून मेरे पांव में लग गया. यह घाव उसी चोट से बना है.

राधा जी ने गोपियों को बहलाने का प्रयास तो किया पर सफल नहीं रहीं. किसी ने भी उनकी इस बात का विश्वास न किया. प्रश्नों से भाग रही थीं, अब पलटकर फिर से प्रश्न शुरू हो गए.

सखियों ने पूछा- यदि यह घाव कान्हा के पैरों के नाखून से हुआ तो अबतक सूखा क्यों नहीं? कान्हा को गए तो कई बरस हो गए हैं. इतने में तो कोई भी घाव सूख जाए. देखो कुछ छुपाओ मत. हमसे छुपा न सकोगी. आज नहीं तो कल पता तो चल ही जाएगा. सो अच्छा है कि आज ही बता दो.

राधा कृष्ण कथा: राधाजी का वह अनूठा घाव, जिसके बहाने रोज सपने में आते थे कन्हैया। द्वारका में छलके प्रभु के आँसू और उद्धव का टूटा गर्व। एक पावन प्रेम गाथा।
राधा कृष्ण कथा: एक पावन प्रेम कथा

घाव को कुरेदने का अलौकिक रहस्य

तब राधाजी के मुख से जो सत्य निकला, उसने प्रेम की परिभाषा ही बदल दी। राधा कृष्ण के प्रेम और विरह का यह शिखर बिंदु था। यह प्रेम अलौकिक था।

सिसकते हुए राधा रानी कहने लगीं:

“सखियों! यह घाव सूखता तो तब, जब मैं इसे सूखने देती… मैं तो नित्य प्रभात अपने ही हाथों से इसे कुरेदकर फिर से हरा कर देती हूँ!”

यह सुनकर सखियों की आँखें फटी की फटी रह गईं। सब अवाक् होकर राधाजी का मुख देखने लगीं। राधाजी ने अपने आँसुओं को पल्लू से पोंछते हुए कहा:

“जब यह घाव हरा रहता है और इसमें से पीड़ा उठती है, तो मेरे कन्हैया द्वारका में चैन से नहीं बैठ पाते। वे व्याकुल होकर नित्य रात्रि मेरे सपनों में आते हैं और अपने पीतांबर के छोर से मेरे इस घाव को सहलाते हैं, उस पर मरहम लगाते हैं। सखियों, घाव के बहाने ही सही… मेरा सांवरा मुझसे मिलने तो आता है! यदि यह घाव सूख गया, तो भय है कि कहीं मेरे श्यामसुंदर का मेरे सपनों में आना भी न छूट जाए! मैं अपने इस नश्वर देह के सुख के लिए कन्हैया का दर्शन कैसे खो दूँ? इस घाव का दर्द ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सुख है!”

प्रेम की यह पराकाष्ठा सुनकर ब्रज की सखियाँ राधा जी के चरणों में गिरकर बिलख पड़ीं।

द्वारका में श्रीकृष्ण के अश्रु और उद्धव का स्तब्ध होना

उधर सैकड़ों कोस दूर द्वारका के भव्य महल में बैठे त्रिभुवनपति श्रीकृष्ण इस पूरे संवाद को अपने अंतःकरण में सुन रहे थे। अचानक द्वारकाधीश के नयनों से मोतियों जैसे आँसू अविरल बहने लगे। उनका कंठ रुंध गया और वे व्याकुल होकर भूमि पर बैठ गए।

पास ही परम ज्ञानी उद्धव जी खड़े थे। जिन्होंने कभी श्रीकृष्ण को विचलित नहीं देखा था, वे जगत के पालनहार को इस प्रकार बालकों की तरह फूट-फूटकर रोते देख घबरा गए।

उद्धव जी ने हाथ जोड़कर काँपते स्वर में पूछा, “प्रभु! यह क्या लीला है? तीनों लोकों के दुखों को हरने वाले परमब्रह्म की आँखों में यह अश्रुधारा क्यों? कौन सा ऐसा संकट आ पड़ा है?”

श्रीकृष्ण ने अपने सखा उद्धव का हाथ थामा और बोले, “उद्धव! ब्रज में मेरी राधा अपने पाँव के घाव को केवल इसलिए भरने नहीं दे रही कि मैं उसके सपने में आता रहूँ। उसके प्रेम का ऋण मैं चौदह भुवनों का ऐश्वर्य देकर भी नहीं चुका सकता। मेरा ज्ञान, मेरा वैकुंठ, मेरी द्वारका… सब उस प्रेम की एक बूँद के आगे शून्य हैं।”

उद्धव जी को विश्वास न हुआ। वे ज्ञानी थे, वे प्रेम को केवल मन का एक भ्रम मानते थे। श्रीकृष्ण ने उनका संशय ताड़ लिया और कहा, “उद्धव! तुम्हें अपने ब्रह्मज्ञान पर बहुत मान है। तुम एक बार ब्रज जाओ और अपने ज्ञान से मेरे विरह में तड़पते ब्रजवासियों और गोपियों को सांत्वना दो।”

राधा कृष्ण कथा में उद्धव-गोपी संवाद: ज्ञान पर प्रेम की विजय

राधा कृष्ण कथा: राधाजी का वह अनूठा घाव, जिसके बहाने रोज सपने में आते थे कन्हैया। द्वारका में छलके प्रभु के आँसू और उद्धव का टूटा गर्व। एक पावन प्रेम गाथा।
राधा कृष्ण कथाः प्रेम व विरह की मार्मिक कथा

उद्धव बड़े गर्व से ज्ञान का उपदेश देने रथ लेकर ब्रज पहुँचे। उन्होंने गोपियों को निराकार ब्रह्म की उपासना और योग-साधना का उपदेश देना शुरू किया। किंतु गोपियों ने जो उत्तर दिया, उसने उद्धव के ज्ञान के सिंहासन को हिलाकर रख दिया।

गोपियों ने अश्रु बहाते हुए कहा, “हे उद्धव! योग और ज्ञान की बातें उन्हें सिखाओ जिनके पास मन हो। हमारे पास तो एक ही मन था, जो रथ के पहियों के साथ कन्हैया के पीछे-पीछे उसी दिन मथुरा चला गया! अब किस मन से तुम्हारे निराकार ईश्वर का ध्यान करें? हमारे रोम-रोम में तो केवल और केवल श्याम बसे हैं।”

जब उद्धव ने देखा कि गोपियों के हर अश्रु में श्रीकृष्ण का नाम गूँज रहा है, जब उन्होंने राधा रानी की दशा देखी कि वे मिट्टी में श्रीकृष्ण का नाम लिखकर उसी को छाती से लगाकर मूर्छित पड़ी हैं, तो उद्धव का सारा अहंकार गलकर बह गया।

राधा कृष्ण की अलौकिक कथा सुनकर परम ज्ञानी उद्धव जी की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। वे समझ गए कि जिसे वे साधारण विरह समझ रहे थे, वह तो साक्षात् ईश्वरत्व का सर्वोच्च रूप है।

उद्धव जी ने अपने सारे ग्रंथ यमुना में प्रवाहित करने का संकल्प कर लिया और ब्रज की रज को अपने माथे पर लपेटते हुए रो पड़े—“धन्य हैं ब्रज की गोपियाँ, धन्य हैं श्रीराधा, जिनका प्रेम स्वयं भगवान को बाँधकर रुला देता है।”

यह पावन राधा कृष्ण कथा हमें सिखाती है कि प्रभु पद, प्रतिष्ठा या ज्ञान से नहीं, केवल निष्कपट और समर्पित अश्रुओं से प्राप्त होते हैं।

गोपी-उद्धव संवाद के प्रसंग बड़े सुंदर हैं. भावपूर्वक सुन लिया जाए तो किसी की आंख भर आएगी. आंखों का जल नियंत्रण में न रहेगा. वह छलक ही आएगा. गोपी-उद्धव संवाद प्रसंग दिव्य है. मैं इस विषय पर आगे कभी लिखूंगा.

यदि कोई प्रेमीजन इस विषय पर लिखने के इच्छुक हैं तो उनका स्वागत है. मुझे मेल करें.


संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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