गणेश जी का वाहन चूहा क्यों है? किस शाप से गंधर्व मूषक बनकर गणपति की सेवा में आया

गणेश जी का वाहन चूहा क्यों है? किस शाप से गंधर्व मूषक बनकर गणपति की सेवा में आया

गणेश जी का वाहन चूहा क्यों बना? पूर्वजन्म में वह चूहा कौन था? क्या चूहे के अतिरिक्त भी गणेश जी के कुछ वाहन हैं? किस अवतार में गणेश जी का वाहन चूहा बना है?

गणेश जी का वाहन चूहा क्यों बना यह एक रहस्य है जो अक्सर मन में आता है. गणेश जी तो लंबोदर हैं, भारी-भरकम शरीर वाले. एक छोटा सा चूहा उनका वाहन क्यों बना. उन्हें तो हाथी या शेर की सवारी करनी चाहिए थी.

गणेश जी का वाहन चूहा के बनने की एक सुंदर कथा गणेश पुराण में आती है.

गणेश जी का वाहन चूहा क्यों है? गंधर्व क्रौंच को सौभरि ऋषि ने मूषक बनने का शाप क्यों दिया? भगवान गणेश जी की सवारी की गणेश पुराण और मुद्गल पुराण की कथा
गणेश जी का वाहन चूहा कैसे बना

सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि आश्रम बनाकर तप करते थे. उनकी पतिव्रता पत्नी मनोमयी इतनी रूपवती थीं कि उनके रूप पर यक्ष गंधर्व आदि सभी मोहित थे. यक्षों और गंधर्वों ने मनोमयी या मृणमयी का हरण करने का विचार तो किया लेकिन मनोमयी के पतिव्रता और सौभरि की पत्नी होने के कारण वे  साहस नहीं कर पाते थे.

क्रौंच नाम एक बलशाली और दुष्ट गंधर्व स्वयं को रोक न सका.

क्रौंच ऋषि पत्नी के हरण का अवसर देखने लगा. एक बार ऋषि लकड़ियां लाने वन गए. कौंच को मनोमयी के हरण का यह उचित समय लगा. वह आश्रम में आया.

वह मनोमयी का हाथ पकड़कर खींचकर अपने साथ ले जाने लगा. ऋषि पत्नी उससे दया की भीख मांग रही थीं.  उसका भाग्य खराब था. उसी समय सौभरि ऋषि  वहां आ पहुंचे.  के इस दुस्साहस से उनके क्रोध की सीमा न रही.

उन्होंने कौंच को शाप दिया- क्रौंच गंधर्व! काम से वशीभूत होकर तूने चोर की तरह मेरी पत्नी का हरण करना चाहा है. तेरा यह आचरण तुझे गंधर्व योनि में रहने लायक नहीं है. जा मैं तुझे शाप देता हूँ कि तू चूहा बन जा.

जैसे मूषक दूसरों की वस्तुओं की चोरी पर आश्रित रहता है और प्रताड़ित होता है वैसे ही तेरा जीवन अब कटेगा. तू तत्काल मूषक बन जा. तुझे धरती के भीतर छुपकर रहना पड़े. अब से तू चोरी करके अपना पेट भरेगा.

सौभरि ऋषि के क्रोध को देखकर गंधर्व क्रौंच भय से कांपने लगा. शापित होने से उसकी योनि में परिवर्तन होना ही था. वह ऋषि के चरणों में गिरकर माफी मांगने लगा.

क्रौंच से ऋषिपत्नी मनोमयी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी. फिर वह सौभरि के चरणों में गिरकर याचना करने लगा- हे भगवन्! कामदेव के प्रभाव से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई इसलिए मैंने ऐसा अपराध किया. मैं जानता हूँ मैंने जो अपराध किया है वह घृणा के योग्य है. मैं तो मूर्ख हूँ. आप ऋषि हैं, दयालु हैं. इसलिए इस अपराध के लिए मुझे क्षमा कर दें.

बार-बार माफी मांगने से ऋषि पसीज गए.

ऋषि ने कहा- क्रौंच तुम्हें पश्चाताप हो रहा है यह अच्छी बात है. मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ लेकिन मेरा दिया शाप व्यर्थ नहीं जा सकता. इस शाप से मुक्त तो नहीं कर सकता लेकिन तुम पर दया करके मैं इसमें सुधार कर देता हूं. मैंने क्रोधवश जो तुम्हें शाप दिया वहीं शाप तुम्हारे लिए वरदान जैसा हो जाएगा. इस शाप के कारण तुम्हें बहुत सम्मान मिलेगा.

ऋषि ने कहा- द्वापर में महर्षि पराशर के यहां गणपति गजमुख रूप में प्रकट होंगे. तब तुम उनके वाहन बनोगे, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे.

गणेश जी का वाहन चूहा क्यों है? जानें मूषक बनने की पौराणिक कथा
गणेश जी का वाहन चूहा बनने की पौराणिक कथा

शापित गंधर्व को मिला प्रसिद्ध होने का वरदानः क्रोंच बना गणेश जी का वाहन चूहा

शापग्रस्त क्रौंच चूहा बन गया. उसका शरीर विशालकाय था. उद्दंडता तो उसमें पहले से ही थी. ताकत के कारण वह रास्ते में आने वाली सारी चीज़ें नष्ट कर देता.

एक बार वह महर्षि पराशर के आश्रम में पहुँच गया. वहाँ उसने आदत के अनुसार मिट्टी के सारे पात्र तोड़ दिए, आश्रम की वाटिका उजाड़ डाली. सारे वस्त्रों और ग्रंथों को कुतर दिया.

भगवान गणेश भी उसी आश्रम में थे. महर्षि पराशर ने चूहे की सारी करतूत गणेश जी को बताई. भगवान गणेश ने उस दुष्ट मूषक को सबक सिखाने की सोची.

उन्होंने मूषक को पकड़ने के लिए अपना पाश फेंका. पाश को अपनी ओर आता देख मूषक बना क्रौंच अपनी पूरी क्षमता से भागा और पाताल लोक में छुप गया. पाश मूषक का पीछा करता हुआ पाताल लोक तक पहुंचा. पाश मूषक के गले में पड़ा तो वह बेहोश हो गया.

पाश में घिसटता हुआ मूषक गणेश जी के सम्मुख उपस्थित हुआ. जैसे ही होश आया उसने बिना पल गंवाए गणेश जी की आराधना शुरू कर दी और अपने प्राणों की भीख मांगने लगा.

गणेश जी को उस मूषक पर दया आ गई. उसने तरह-तरह से गणेश जी की आराधना की थी जिससे गणपति उस पर प्रसन्न भी हो गए.

गणपति ने कहा- मूषक तुमने लोगों को बहुत कष्ट दिए है. मैंने दुष्टों के नाश एवं साधुओं के कल्याण के लिए ही यह अवतार लिया है. तुम शरणागत हो इसलिए क्षमा करता हूं. मैं तुमसे प्रसन्न हूं कोई वरदान मांग लो.

क्रौंच तो आदत से मजबूर था. गणेश जी से प्राणदान मिलते ही फिर से उसमें अहंकार जाग गया.

वह गणेश जी से बोल पड़ा. मैं तो स्वयं समर्थ हूँ. मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन यदि आप मुझसे कोई इच्छा रखते हों तो बताइए. मैं आपकी एक इच्छा पूरी कर दूंगा.

मूषक की गर्वभरी वाणी सुनकर गणेश जी मुस्कुराए. उन्होंने समझ लिया कि यह अहंकार से भरा हुआ है. अहंकार के कारण ही यह इतना उद्दंड है और लोगों को सताता है. इसलिए इसके अहंकार का दमन करना होगा.

गजमुख ने कहा- चूहे यदि तुम्हारा वचन सत्य है तो तुम मेरे वाहन बन जाओ.

मूषक ने का इसमें क्या समस्या है. यह तो मेरे लिए बहुत ही सरल कार्य है. उसने बिना देरी किए ‘तथास्तु’ कह दिया.

चूहे ने गणेश जी का वाहन बनने की हामी भर दी. अब गणेश जी को उसके अभिमान का दमन करना था. सो गणेश जी अपने वाहन पर सवार हुए.

गजानन के भार से दबकर उसके प्राण संकट में आ गए. उसने गणेश जी से विनती कि हे गजमुख अपना भार कम करें. आपका इतना भार मेरे वहन के सामर्थ्य से बाहर है. गजपति को तो उसका अहंकार तोड़ना था.

वे आनाकानी करते रहे. वे कहते रहे कि तुमने सोच-विचारकर ही कुछ वरदान दिया होगा. अब उससे पीछे नहीं हट सकते. मेरा तो जो भार है वह है ही. यह तो वरदान देने से पहले विचार करना था.

चूहे का अभिमान चूर हो चुका था. वह गजपति से अपना वजन कम करने को गिड़गिड़ाने लगा. अपने शरणागत पर तो गणेश जी पूरी कृपा करते ही हैं. उन्होंने उसका गिड़गिड़ाना स्वीकार लिया और अपना आकार बहुत छोटा कर लिया.

क्रौंच ने अपने स्वामी से वरदान मांगा कि वे उसका कभी त्याग न करें. उनके सवार होते ही उसकी बुद्धि खुल गई. गणेश जी ने उसकी यह इच्छा स्वीकार ली.

इस तरह मूषक का गर्व चूरकर गणेश जी ने उसे अपना वाहन बना लिया. यही कारण है कि आज भी लोग अपने घरों में चूहों के उत्पात मचाने पर भगवान गणेश को याद करते हैं.

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गणेश जी का वाहन चूहा बना इसके पीछे का आध्यात्मिक या दार्शनिक रहस्य

गणेश जी का वाहन चूहा क्यों है - क्रौंच गंधर्व के मूषक बनने की पौराणिक कथा
भगवान गणेश जी का वाहन चूहा (मूषक) की कथा

चूहे की प्रकृति विनाशकारी है. यह ऐसा जीव है जो किसी प्रकार का सृजन नहीं करता. सिर्फ विनाश करता है. चूहा मुख्य रूप से अँधेरे में सक्रिय रहता है, एक स्थान पर नहीं टिकता और पुस्तकों ग्रंथों को कुतरकर नष्ट कर देता. चूहे को अज्ञान और चंचल वासनाओं का प्रतीक माना गया है.

गणेश जी बुद्धि के अधिपति या स्वामी के. उनका शरीर विशाल और बेडौल है. चूहे पर सवार होना इस बात का प्रतीक है कि बुद्धि विवेक से यदि व्यक्ति अज्ञान को दूर कर सके और चंचल वासनाओं की गति मंद कर सके तो जैसे गणेश जी प्रथमपूज्य हैं, वैसे ही बेडौल शरीर वाला व्यक्ति भी समाज में सबसे अधिक सम्मानित हो सकता है.

अनियंत्रित इच्छाओं और चंचल मन पर नियंत्रण करने के बाद ही ज्ञान के द्वार खुलते हैं. जब हमारा बुद्धि और विवेक जाग्रत होता है तब जाकर ही मन की चंचलता हमारे नियंत्रण में आती है. बिना इस नियंत्रण के हमारे कार्य विघ्न-बाधाओं से भरे होंगे.

कार्यों को निर्विघ्न पूरा करने के लिए बुद्धि रूपी गणेश द्वारा अज्ञान और चंचल वासना रूपी चूहे को नियंत्रण में करना आवश्यक है, गणेश जी का वाहन चूहा होने के पीछे का यह सबसे बड़ा मर्म है.

गणेश जी का वाहन चूहा कैसे बना उसकी जो कथा आपने पढ़ी वह गणेश पुराण में आती है.

जैसा कि प्रभु शरणं के आप सभी पाठक जानते हैं कि महागणपति के अवतारों की कथाएं मुख्य रूप से दो पुराणों- गणेश पुराण और मुद्गल पुराण- में आती हैं. मुद्गल पुराण में गणेश जी के वाहन के संदर्भ में थोड़ा और विशेष वर्णन आता है.

गणेश जी के वाहन के संदर्भ में क्या कहता है गणेश पुराण

मुद्गल पुराण के अनुसार सतयुग में जब गणेश जी ने महोत्कट अवतार धारण किया था तब उनका वाहन सिंह बना था. महोत्कट अवतार की कथा भी आपको शीघ्र ही प्रभु शरणं ऐप में पढ़ने को मिलेगी.

क्यों मोदक अर्पित किए बिना अधूरी रहती है गणपति की पूजाः दिव्य मोदक की कथा

त्रेता युग में  महागणपति ने मयूरेश्वर अवतार धारण किया था. तब उनका वाहन था मयूर यानी मोर. मोर कार्तिकेय जी की भी सवारी है.

द्वापर में महागणपति ने गजानन अवतार धारण किया है. गजानन अवतार में श्री महागणपति ने मूषक की सवारी की. इस तरह द्वापर में गणेश जी का वाहन चूहा बना.

मुद्गल पुराण के अनुसार महागणपति कलयुग में धूम्रकेतु अवतार होगा. धूम्रकेतु अवतार में उनका वाहन होगा अश्व यानी घोड़ा.


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न 

Q1. गणेश जी का वाहन चूहा का नाम क्या है?

उत्तर: कई ग्रंथों और पौराणिक संदर्भों में भगवान गणेश का वाहन चूहा  ‘अनंगतुंड’ नाम से कहा गया है. मूषक बनने से पूर्व वह गंधर्व ‘क्रौंच’ था.

Q2. पूजा में चूहे के कान में मनोकामना क्यों कही जाती है?

उत्तर: मान्यता है कि मूषक श्री गणेश का सबसे प्रिय और निरंतर साथ रहने वाला सेवक है. जब भक्त चूहे के कान में अपनी इच्छा बोलते हैं, तो वह विघ्नहर्ता तक बिना किसी विघ्न के पहुँचती है और शीघ्र पूरी होती है. इसी तरह नंदी के कान में अपनी वह कामना रखी जाती है जो शिवजी के समक्ष रखी जाती है.

Q3. गणेश चतुर्थी पर चूहा देखना शुभ होता है या अशुभ?

उत्तर: गणेश उत्सव और विशेषकर गणेश चतुर्थी के दिन घर में चूहा (मूषक) दिखना शुभ माना जाता है. इसे विघ्नहर्ता श्री गणेश के आगमन और घर में ऋद्धि-सिद्धि व संपन्नता आने का संकेत माना जाता है.

Q4. गणेश जी का वाहन चूहा, भगवान का इतना विशाल भार कैसे उठा लेता है?

उत्तर: जब क्रौंच मूषक का अहंकार बढ़ा, तो गणेश जी ने अपना दिव्य भार बढ़ाकर उसे झुकने पर विवश कर दिया. शरणागत होने पर दयालु गजानन ने अपने योगबल और ‘लघिमा’ सिद्धि से अपना भार एकदम हल्का कर लिया ताकि चूहा सहजता से उनकी सवारी बन सके. गणेश जी का वाहन चूहा बनने के पीछे यह भी एक रहस्य है.


संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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