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क्यों मोदक अर्पित किए बिना अधूरी रहती है गणपति की पूजाः दिव्य मोदक की कथा

क्यों मोदक अर्पित किए बिना अधूरी रहती है गणपति की पूजाः दिव्य मोदक की कथा

lord ganesha modaka
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Android मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करें
iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंएक बार की बात है. देवतागण शिव-पार्वती के दोनों पुत्रों गजानन और षडानन(कार्तिकेय) के दर्शन को आए. दोनों माता पार्वती के साथ खेल रहे थे और जगतजननी उन्हें एक आम माता की तरह स्नेह कर रही थीं.

यह देखकर देवताओं के मन में बालकों के प्रति बड़ा स्नेह और माता के चरणों में अगाध श्रद्धा उत्पन्न हुई. देवों ने अपने पुण्यफल से एक मोदक यानी लडडू बनाया और उसे अमृत से सींचकर माता के चरणों में अर्पित किया

गजानन और षडानन दोनों मोदक के लिए जिद करने लगे. दोनों में से कोई बंटवारे को तैयार न था. जिसे चाहिए था पूरा. माता के सामने बड़ी उलझन हुई कि क्या किया जाए. देवों को भी उत्सुकता हुई कि आखिर माता क्या हल निकालती हैं.माता ने कहा- पहले इस लड्ड़ू के गुण सुनो. इस मोदक के गंध से अमरत्व की प्राप्ति होती है. इसमें देवताओं के शुभकर्म संचित हैं इसलिए इसे खाने वाला निःसंदेह संपूर्ण शास्त्रों का मर्मज्ञ, लेखक, विद्वान, ज्ञान-विज्ञान में निपुण हो जाता है.

इसे ग्रहण करने वाले में धर्माचरण का संकल्प होना चाहिए. तुम दोनों में से जो भी धर्म के आचरण से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर देगा वही इस मोदक का अधिकारी बनेगा. शिवजी ने भी इसकी सहमति दे दी.

कार्तिकेय माता की बात समाप्त होते ही अपने वाहन मयूर पर सवार हुए और समस्त तीर्थों के दर्शन और स्नान को निकल गए. एक मुहूर्तभर में ही उन्होंने समस्त तीर्थों में स्नान कर लिया.गणेशजी का वाहन चूहा तो तीव्र था नहीं. इसलिए उन्होंने माता-पिता की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े हो गए. कुछ पलों में कार्तिकेय भी पहुंचे और मोदक मांगने लगे.

शिवजी ने कहा- समस्त तीर्थों का स्नान, संपूर्ण देवों को नमस्कार, सब यज्ञों का अनुष्ठान, सभी प्रकार के व्रत, मंत्र, योग और संयम का पालन मिलकर भी माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं होते. निर्णय तुम्हारी माता करेंगे.

माता पार्वती ने कहा- गजानन सैकड़ों पुत्रों और सैकड़ों गणों से बुद्धि और धर्माचरण में श्रेष्ठ है. इस कारण यह देवनिर्मित मोदक मैं इसे देती हूं. माता-पिता की भक्ति के कारण यह यज्ञादि में अग्रपूज्य होगा.देवताओं ने माता के निर्णय की बड़ी प्रशंसा की. शिवजी ने कहा- गणेश की अग्रपूजा से सभी देवगण प्रसन्न होंगे. देवों ने उच्च स्वर में सहमति दी. इस तरह गणेशजी की पूजा से सभी देवों की पूजा मानी जाने लगी.

गणों के अधिपति बनने पर भगवान गणपति ने कहा कि मुझे यह मोदक सर्वाधिक प्रिय होगा क्योंकि मोदक के वितरण के निर्णय में ही मुझे माता-पिता का इतना प्रेम-स्नेह प्राप्त हुआ है. इसे चढ़ाए बिना मेरी पूजा अपूर्ण है. (गणेश पुराण)

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