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जानकीकृतं पार्वती स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित

जानकीकृतं पार्वती स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित

माता जानकी द्वारा रचित पार्वती स्तोत्रम्

ब्रह्मवैवर्त पुराण में आता है कि माता सीता भगवान श्रीराम को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए माँ गौरी की विधि-विधान से आराधना करती थीं. उन्होंने माँ गौरी जिनका ही नाम पार्वती भी है की स्तुति के लिए एक स्तोत्र की रचना की थी जिसे जानकीकृत पार्वती स्तोत्रम् भी कहा जाता है.
वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस में यह प्रमुखता से आता है कि जानकी माता गौरी की आराधना करती थीं. उनको श्रीराम के पहले दर्शन तभी हुए थे जब वे माँ गौरी की पूजा के लिए जा रही थीं. जनकपुर के मंदिर में जानकी प्रतिदिन पार्वती स्तोत्रम् से आराधना करके श्रीराम को पति के रूप में प्राप्त करने की कामना करती थीं.
शिव को प्राप्त करने के लिए माँ पार्वती के संकल्प और तपस्या की बराबरी की दूसरी कथा हिंदू धर्मशास्त्रों में नहीं मिलती. पार्वती जी ने 107 जन्मों तक शिव जी की तपस्या की. प्रसन्न होकर 108 वें जन्म में उन्होंने पार्वती को अपनी अर्धांगिनी बनाया. जिस दिन पार्वती जी को यह वरदान मिला था उसे ही हरितालिका या हरतालिका तीज के रूप में मनाया जाता है.
इसलिए शीघ्र विवाह की इच्छा रखने वाली कन्याओं के लिए पार्वती जी आराधना का विशेष महत्व कहा गया है. मान्यता है कि  जानकीकृत पार्वती स्तोत्रम् के विधि-विधान से पाठ से शीघ्र ही योग्य वर की प्राप्ति होती है.
विवाह में विलंब से जो कन्याएं चिंतित हैं या विवाह बार-बार तय होते-होते रह जाता है उन्हें पार्वती स्तोत्रम् का पाठ करना चाहिए.
ऐसे माता-पिता जिनकी संतान विवाह के लिए राजी नहीं हो रही वे भी अपने संतान के शीघ्र विवाह की कामना के संकल्प के साथ पार्वती स्तोत्रम का नियम से पाठ करें तो उनकी मनोकामना पूर्ण होती है. ऐसी मान्यता है.
आपकी सुविधा के लिए हम जानकीकृत पार्वती स्तोत्रम का संस्कृत और हिंदी पाठ दोनों उपलब्ध करा रहे हैं. आपको जिसमें सुविधा हो वह पाठ करें. भाषा और विधि-विधान से अधिक महत्व भाव का है.
भाव और भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है. उसी से मनोकामना फलीभूत होती है.
जानकीकृत पार्वती स्तोत्रम् | Janaki Krit Parvati Stotram हिंदी अर्थ सहित
जानकीकृत पार्वती स्तोत्रम्

जानकीकृत पार्वती स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित

॥ जानकीकृतं पार्वती स्तोत्रम् ॥
जानकी उवाच:
शक्तिस्वरूपे सर्वेषां सर्वाधारे गुणाश्रये ।
सदा शंकरयुक्ते च पतिं देहि नमोsस्तु ते ॥1॥

(जानकी बोलीं– सबकी शक्तिस्वरूपे! शिवे! आप सम्पूर्ण जगत की आधारभूता हैं। समस्त सद्गुणों की निधि हैं तथा सदा भगवान शंकर के संयोग-सुख का अनुभव करने वाली हैं; आपको नमस्कार है। आप मुझे सर्वश्रेष्ठ पति दीजिये।)

सृष्टिस्थित्यन्त रूपेण सृष्टिस्थित्यन्त रूपिणी ।
सृष्टिस्थियन्त बीजानां बीजरूपे नमोsस्तु ते ॥2॥

(सृष्टि, पालन और संहार आपका रूप है। आप सृष्टि पालन और संहाररूपिणी हैं। सृष्टि, पालन और संहार के जो बीज हैं, उनकी भी बीजरूपिणी हैं; आपको नमस्कार हैं।)

हे गौरि पतिमर्मज्ञे पतिव्रतपरायणे ।
पतिव्रते पतिरते पतिं देहि नमोsस्तु ते ॥3॥

(पति के मर्म को जानने वाली पतिव्रतपरायणे गौरि! पतिव्रते! पत्यनुरागिणि! मुझे पति दीजिये; आपको नमस्कार है।)
सर्वमंगल मंगल्ये सर्वमंगल संयुते ।
सर्वमंगल बीजे च नमस्ते सर्वमंगले ॥4॥

(आप समस्त मंगलों के लिये भी मंगलकारिणी हैं। सम्पूर्ण मंगलों से सम्पन्न हैं, सब प्रकार के मंगलों की बीजरूपा हैं; सर्वमंगले! आपको नमस्कार है।)

सर्वप्रिये सर्वबीजे सर्व अशुभ विनाशिनी ।
सर्वेशे सर्वजनके नमस्ते शंकरप्रिये ॥5॥

(आप सबको प्रिय हैं, सबकी बीजरूपिणी हैं, समस्त अशुभों का विनाश करने वाली हैं, सबकी ईश्वरी तथा सर्वजननी हैं; शंकरप्रिये! आपको नमस्कार है।)

परमात्मस्वरूपे च नित्यरूपे सनातनि ।
साकारे च निराकारे सर्वरूपे नमोsस्तु ते ॥6॥

(परमात्मस्वरूपे! नित्यरूपिणि! सनातनि! आप साकार और निराकार भी हैं; सर्वरूपे! आपको नमस्कार हैं।)

क्षुत् तृष्णेच्छा दया श्रद्धा निद्रा तन्द्रा स्मृति: क्षमा ।
एतास्तव कला: सर्वा: नारायणि नमोsस्तु ते ॥7॥

(क्षुधा, तृष्णा, इच्छा, दया, श्रद्धा, निद्रा, तन्द्रा, स्मृति और क्षमा– ये सब आपकी कलाएँ हैं; नारायणि! आपको नमस्कार है।)

लज्जा मेधा तुष्टि पुष्टि शान्ति संपत्ति वृद्धय: ।
एतास्त्व कला: सर्वा: सर्वरूपे नमोsस्तु ते ॥8॥

(लज्जा, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, सम्पत्ति और वृद्धि– ये सब भी आपकी ही कलाएँ हैं; सर्वरूपिणि! आपको नमस्कार है।)

दृष्टादृष्ट स्वरूपे च तयोर्बीज फलप्रदे ।
सर्वानिर्वचनीये च महामाये नमोsस्तु ते ॥9॥

(दृष्ट और अदृष्ट दोनों आपके ही स्वरूप हैं, आप उन्हें बीज और फल दोनों प्रदान करती हैं, कोई भी आपका निर्वचन (निरूपण) नहीं कर सकता है, महामाये! आपको नमस्कार है।)

शिवे शंकर सौभाग्ययुक्ते सौभाग्यदायिनि ।
हरिं कान्तं च सौभाग्यं देहि देवी नमोsस्तु ते ॥10॥

( हे शिवे! आप शंकरसम्बन्धी सौभाग्य से सम्पन्न हैं तथा सबको सौभाग्य देने वाली हैं। देवि! श्रीहरि ही मेरे प्राणवल्लभ और सौभाग्य हैं; उन्हें मुझे दीजिये। आपको नमस्कार है।)

स्तोत्रणानेन या: स्तुत्वा समाप्ति दिवसे शिवाम् ।
नमन्ति परया भक्त्या ता लभन्ति हरिं पतिम् ॥11॥

(जो स्त्रियाँ व्रत (गौरीव्रत) की समाप्ति के दिन इस स्तोत्र से शिवादेवी की स्तुति करके बड़ी भक्ति से उन्हें मस्तक झुकाती हैं; वे साक्षात श्रीहरि को पतिरूप में प्राप्त करती हैं।)

इह कान्तसुखं भुक्त्वा पतिं प्राप्य परात्परम् ।
दिव्यं स्यन्दनमारुह्य यान्त्यन्ते कृष्णसंनिधिम् ॥12॥

(इस लोक में परात्पर परमेश्वर को पति रूप में पाकर कान्त-सुख का उपभोग करके अन्त में दिव्य विमान पर आरूढ़ हो भगवान श्रीकृष्ण के समीप चली जाती है।)

।।श्री ब्रह्मवैवर्त पुराणे जानकीकृतं पार्वती स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

पार्वती स्तोत्रम् का महत्वः

माता पार्वती की दिव्य शक्ति और करुणा का स्मरण कराने वाला स्तोत्र है। विवाह में विलंब, मन में योग्य जीवनसाथी को लेकर चिंता हो या वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य की कामना के साथ माता गौरी का ध्यान करते हुए पार्वती स्तोत्रम् का पाठ मन को विशेष सहारा देती है.
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( डिस्कलेमरः यह पोस्ट ज्योतिर्विदों और धर्मशास्त्र के जानकारों के साथ परामर्श के बाद तैयार की गई है। इस पोस्ट का उद्देश्य सिर्फ एक प्रचलित ज्योतिषीय अनुमान देना है। इसका उद्देश्य कोई गलत जानकारी देना या अंधविश्वास फैलाना नहीं हैं। पोस्ट में बताएं किसी भी परामर्श पर अमल करने से पहले विषय के विशेषज्ञ से परामर्श लें।)

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