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शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा: शास्त्रों के अनुसार कौन-सी पूजा श्रेष्ठ है?

शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा: शास्त्रों के अनुसार कौन-सी पूजा श्रेष्ठ है?

शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा: शास्त्रों के अनुसार कौन-सी पूजा श्रेष्ठ है?

परिचयः शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा में अंतर

शिवभक्तों के मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है — क्या भगवान शिव की पूजा शिवलिंग रूप में करनी चाहिए या मूर्ति रूप में? क्या शिवलिंग पूजा अधिक श्रेष्ठ है, या शिव की मूर्ति और तस्वीर की पूजा भी उतनी ही फलदायी है? यह प्रश्न केवल जिज्ञासा का नहीं, बल्कि श्रद्धा का भी है। हर भक्त चाहता है कि वह अपने आराध्य की पूजा उसी रूप में करे जो शिवजी को सबसे अधिक प्रिय हो।

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा को लेकर शिवभक्तों के मन का संदेह दूर हो जाएगा।

शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा में से कौन श्रेष्ठ है?
शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा में कौन-सी पूजा श्रेष्ठ है?

शिवजी भोलेभंडारी हैं। वे अत्यंत करुणामय, शीघ्र प्रसन्न होने वाले और भक्तवत्सल हैं। इसलिए यह मानना उचित है कि शिवलिंग हो या मूर्ति, यदि पूजा सच्चे मन, श्रद्धा और भक्ति से की जाए, तो शिव कृपा अवश्य करते हैं। फिर भी शास्त्रों में शिवलिंग और मूर्ति — दोनों की पूजा के अपने-अपने विशेष फल बताए गए हैं।

शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा में क्या अंतर है? शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा में से क्या बेहतर है? इसी विषय को हम आज शास्त्रों, पुराणों और भक्तिपरंपरा के आधार पर समझेंगे।

 

शिवलिंग क्या है

शिवलिंग भगवान शिव का निराकार, अनादि और अनंत प्रतीक माना जाता है। “लिंग” शब्द का अर्थ केवल शरीर नहीं, बल्कि चिह्न या प्रतीक भी है। शिवलिंग उस परम तत्त्व का संकेत है जो रूप, सीमा और भेद से परे है।

पुराणों में कहा गया है कि एक कल्प में ब्रह्माजी और विष्णुजी के बीच हुए विवाद को समाप्त करने के लिए भगवान शिव अग्निपुंज के रूप में प्रकट हुए। उस ज्योतिर्मय स्तंभ का न तो आदि दिख रहा था, न अंत। इसी स्वरूप को बाद में शिवलिंग कहा गया। ब्रह्मा और विष्णु, दोनों उसके आदि-अंत को नहीं जान सके। तब शिवजी ने अपने ब्रह्मस्वरूप का परिचय दिया और मोह का नाश किया।

इसीलिए शिवलिंग को शिव के अनंत, निराकार और ब्रह्मरूप का प्रतीक माना जाता है।

शिवलिंग पूजा क्यों श्रेष्ठ मानी गई

शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजाः दोनों में से श्रेष्ठ कौन? घर में क्या रखें- शिवलिंग या शिवजी की मूर्ति
शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजाः घर में क्या रखें- शिवलिंग या शिवजी की मूर्ति

शिवपुराण में शिवलिंग की पूजा को अत्यंत श्रेष्ठ बताया गया है। इसका कारण यह है कि शिवलिंग शिव के उस रूप का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो केवल आकार में सीमित है, न किसी एक व्यक्तित्व तक बंधा है। वह परमात्मा का व्यापक और अखंड रूप है।

शिवलिंग पूजा में भाव यह है कि भक्त शिव के मूल तत्त्व से जुड़ता है। यहाँ रूप गौण और तत्त्व प्रधान हो जाता है। यही कारण है कि अनेक परंपराओं में शिवलिंग को सबसे प्राचीन और सर्वमान्य शिवोपासना का रूप माना गया है।

इसके साथ यह भी समझना चाहिए कि श्रेष्ठता का अर्थ “अन्य पूजा का निषेध” नहीं है। इसका अर्थ है कि शिवलिंग पूजा में शिवतत्त्व का गहन और व्यापक अनुभव मिलता है।

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शिव मूर्ति पूजा का महत्व

पुराणों में शिवजी की मूर्ति पूजा भी अत्यंत फलदायी मानी गई है।

घरों में लोग शिवलिंग के स्थान पर शिवजी की मूर्ति या शिव परिवार की मूर्ति रखते हैं। ऐसे गृहस्थ जो प्रतिदिन विधिवत शिवलिंग की पूजा में समर्थ नहीं हैं उन्हें शिवलिंग रखने से बचना ही चाहिए। वे इसके स्थान पर शिव परिवार की मूर्ति घर में रख लें। ध्यान रहे मूर्ति बहुत बड़ी नहीं होनी चाहिए। चार से छह इंच की मूर्ति श्रेष्ठ है।

लिंग पुराण और अन्य परंपराओं में भगवान शिव के विभिन्न मूर्ति रूपों का वर्णन मिलता है, जिनकी पूजा अलग-अलग मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है।

मूर्ति रूप में शिव भक्त के लिए अधिक सुलभ होते हैं। जब भक्त किसी विशेष भाव, कार्य या इच्छापूर्ति के लिए शिवजी के किसी विशेष विग्रह का ध्यान करता है, तो उसका मन केंद्रित होता है। मूर्ति रूप ध्यान, भावना और उपासना को सरल बनाता है।

इसलिए शिवलिंग पूजा के साथ-साथ मूर्ति पूजा भी शिवभक्ति की एक पूर्ण और मान्य विधा है।

कुल मिलाकर निचोड़ यह है कि शिवजी की पूजा करें- लिंग स्वरूप हो या विग्रह स्वरूप। भाव पूरा है तो विधि-विधान में कमी-बेसी के लिए क्षमा मांगी जा सकती है। भक्तिभाव में कमी न हो।

शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजा: क्या कहते हैं पुराण?

शिवपुराण की दृष्टि से शिवलिंग पूजा को विशेष श्रेष्ठता प्राप्त है. कारण यह है कि शिवलिंग शिव के निराकार, अनंत और ब्रह्मस्वरूप का प्रतीक है. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मूर्ति पूजा कमतर है. मूर्ति पूजा भी शिवतत्त्व की ही आराधना है और अनेक मनोकामनाओं में विशेष फलदायी बताई गई है.

अतः निष्कर्ष यह है कि शिवलिंग पूजा हो या शिव मूर्ति पूजा:

  • तत्त्व की दृष्टि से दोनों शिव की ही पूजा हैं।

  • शास्त्रीय महत्व की दृष्टि से शिवलिंग पूजा को सर्वोच्च स्थान मिला है।

  • फल की दृष्टि से मूर्ति पूजा भी विशिष्ट मनोकामनाओं में उपयोगी है।

असली बात रूप में नहीं, भाव में है। शिवजी तो भक्त के श्रद्धाभाव पर प्रसन्न होते हैं।

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किस मनोकामना के लिए पूजें कौन-सा शिव विग्रह

लिंग पुराण में मूर्ति विग्रह के रूप में भी शिवजी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है. आइए जानते हैं शिवजी के किस विग्रह की पूजा से पूरी हो सकती हैं कौन सी मनोकामना.

श्री लिंग महापुराण में भगवान शिवजी की विभिन्न मूर्तियों के पूजन के बारे में इस प्रकार बताया गया है-

सुखी वैवाहिक जीवन के लिएः

भगवान शिव की अर्द्धनारीश्वर विग्रह की पूजा करने से अच्छी पत्नी और सुखी वैवाहिक जीवन की प्राप्ति होती है. अर्धनारीश्वर रूप में आधा शिवजी का रूप, आधे में माता पार्वती की छवि दिखती है.

 

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संतान सुख के लिएः 

माता पार्वती अखंड सौभाग्य का वरदान देती हैं. जगदंबा ही संसार में संतति के जन्म और उसके पालन-पोषण की देवी हैं. संतान सुख के लिए  माता पार्वती और भगवान शिव की बैल पर बैठी हुई मूर्ति की पूजा करनी चाहिए. संतान की लालसा लंबे समय से पूरी नहीं हो पा रही उन्हें इससे लाभ होता है.

उत्तम विद्या और ज्ञान प्राप्ति के लिएः

उपदेश देने वाली मुद्रा में बैठे भगवान शिव की मूर्ति या छवि की पूजा करने से विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है. इसमें शिवजी शांतभाव से पालथी लगाए बैठे होते हैं. उनके सामने देवता, ऋषि, शिवगण आदि विनीत भाव में बैठे हों.

पारिवारिक कलह से मुक्ति के लिएः

जटा में गंगा और सिर पर चंद्रमा को धारण किए हुए, बाएं ओर गोद में माता पार्वती को बैठाए हुए और पुत्र कार्तिकेय और गणेश के साथ स्थित भगवान शिव की मूर्ति की पूजा करने से घर-परिवार के झगड़े खत्म होते हैं. घर में सुख-शांति का वातावरण बनता है.

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शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजाः पारिवारिक सुखों के लिए पूजें शिव परिवार की मूर्ति

अज्ञात पापों से मुक्ति के लिएः

हाथ में धनुष-बाण लिए हुए, रथ पर बैठे हुए भगवान शिव की पूजा करने से मनुष्य को जाने-अनजाने किए गए पापों से मुक्ति मिलती है.

शत्रुओं पर विजय के लिएः

जिस मूर्ति में भगवान शिव दैत्य निकुंभ की पीठ पर बैठे हुए, दाएं पैर को उसकी पीठ पर रखे हों. बाईं ओर मां पार्वती हों. ऐसी मूर्ति की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलती है.

प्रचुर धन-संपदा के लिएः

चार हाथ, तीन नेत्र, गले में सांप और हाथ में कपाल धारण किए हुए, भगवान शिव की सफेद रंग की मूर्ति की पूजा धनवान बनाती है. जिन्हें व्यवसायिक कर्म से प्रचुर धन-संपत्ति की कामना हो उन्हें ऐसी मूर्ति की नियमपूर्वक पूजा करनी चाहिए.

बाधा निवारण के लिएः

काले रंग की, लाल रंग के तीन नेत्रों वाली, चंद्रमा को गले में आभूषण की तरह धारण किए हुए, हाथ में गदा और कपाल लिए हुए शिवजी की मूर्ति की पूजा करें. यह शिवजी का बाधाहारी स्वरूप है. इससे मनुष्य की सभी परेशानियों खत्म हो जाती है. रुके हुए काम पूरे होने लगते है.

मान-सम्मान की प्राप्ति के लिएः

नन्दी और माता पार्वती के साथ गणों से घिरे हुए भगवान शिव की मूर्ति की पूजा करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है.

सांसारिक सुखों के लिएः

माता पार्वती सहित नृत्य करते हुए, हजारों भुजाओं वाली भगवान शिव की मूर्ति की पूजा करने से मनुष्य जीवन के सभी सुखों का लाभ लेता है. इसमें शिवजी माता पार्वती के साथ आनंद की मुद्रा में होते हैं.

सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिएः

भगवान कार्तिकेय जिन्हें स्कंद भी कहते हैं, शिव-पार्वती के बड़े पुत्र हैं. शिव-पार्वती के साथ कार्तिकेय की मूर्ति या तस्वीर की पूजा समस्त मनोकामनाएं पूरी करने वाली मानी जाती हैं. यह विग्रह मनुष्य को सभी सुख-सुविधाएं, ऐश्वर्य एवं सुखप्रदायक माना जाता है.

अज्ञात भय से मुक्ति के लिएः

यदि कोई अज्ञात भय बहुत सताता है. डर हो कि कोई पुरानी बात उजागर हो जाएगी. शत्रुओं से मुक्ति पा लेते हैं पर बार-बार वे फिर से उठ खड़े होते हैं. ऐसे भय से मुक्ति दिलाता है शिवजी का क्रोध स्वरूप. दैत्य जलंधर का विनाश करते हुए, सुदर्शन चक्र धारण किए भगवान शिव की पूजा से शत्रुओं का भय खत्म होता है.

शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजाः कौन सी श्रेष्ठ
शिवलिंग पूजा या शिव मूर्ति पूजाः सर्वदोष नाश कराने वाला शिवजी का योगी रूप

सर्वदोष नाश के लिएः

कुछ अनुचित किया है, किसी बात के लिए यदि शिवजी के समक्ष प्रायश्चित करना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे अच्छी मूर्ति है ध्यान की. ऐसी मूर्ति या छवि की पूजा करें जिसमें शिवजी ध्यान की मुद्रा में बैठे हों. शरीर पर भस्म लगा हो, नेत्र बंद हों. मुख पर शांति का भाव हो. भगवान शिव की मूर्ति की पूजा करने से मनुष्य के सभी दोषों का नाश होता है.

भरपूर अन्न के लिएः 

शिवजी के तीन पैर, सात हाथ और दो सिर वाली मूर्ति या ऐसी तस्वीर जिसमें शिवजी अग्निस्वरूप में हों. ऐसी मूर्ति की पूजा से भरपूर अन्न की प्राप्ति होती है. अन्न की कोई कमी नहीं रहती.

सुंदर शरीर और सेहत के लिएः

जिस मूर्ति या तस्वीर में भगवान शिव एक पैर, चार हाथ और तीन नेत्रों वाले, हाथ में त्रिशूल लिए हुए हों. उनके उत्तर दिशा में भगवान श्रीविष्णु और दक्षिण दिशा में श्रीब्रह्मा हों. ऐसी प्रतिमा की पूजा सभी बीमारियों से मुक्ति देने वाली बताई जाती है. सुंदर शरीर और अच्छी सेहत मिलती है.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. शिवजी और शिवलिंग में क्या अंतर है?

उत्तर: शिवजी निराकार परमब्रह्म महादेव का सगुण रूप हैं, जिन्हें हम देवता के रूप में पूजते हैं। वहीं, ‘शिवलिंग’ ब्रह्मांड की ऊर्जा, सृजन और प्रलय के प्रतीक का निराकार रूप है। आसान शब्दों में कहें तो शिवजी साकार रूप हैं और शिवलिंग उनका ऊर्जावान निराकार स्वरूप है।

Q2. क्या शिव और शिवलिंग एक ही हैं?

उत्तर: आध्यात्मिक रूप से शिव और शिवलिंग दोनों एक ही ऊर्जा के दो रूप हैं। भगवान शिव ही निराकार रूप में ‘लिंग’ कहलाते हैं और साकार रूप में ‘शिव’ या ‘महादेव’ कहे जाते हैं। जिस प्रकार अग्नि और उसकी उष्णता (गर्मी) अलग नहीं हैं, उसी प्रकार शिव और शिवलिंग में कोई भेद नहीं है।

Q3. क्या हम शिव मूर्ति और शिवलिंग को एकसाथ रख सकते हैं?

उत्तर: हाँ, आप अपने पूजा घर में शिव मूर्ति और शिवलिंग दोनों को एक साथ रख सकते हैं। इसमें कोई दोष नहीं है। हालांकि, ध्यान रखें कि शिवलिंग की स्थापना और पूजा के कुछ विशेष नियम होते हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है।

Q4. वेदों के अनुसार शिवलिंग क्या है?

उत्तर: वेदों और पुराणों के अनुसार, शिवलिंग संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। ‘लिंग’ शब्द का अर्थ संस्कृत में ‘प्रतीक’ या ‘चिह्न’ होता है। लिंग पुराण और शिवमहापुराण के अनुसार, शिवलिंग इस बात का प्रतीक है कि इस पूरी सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार उसी असीम, आदि-अंतहीन परम ऊर्जा (शिव) से होता है।

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