चतुर्मास क्या है? जानें चतुर्मास के 4 महीनों की 8 जरूरी बातें
चतुर्मास क्या है? चतुर्मास के चार महीनों में क्या करें, क्या न करें, चतुर्मास का महत्त्व, पौराणिक कथा, चतुर्मास और चातुर्मास में अंतर- चतुर्मास के 4 महीनों की 8 जरूरी बातें
भविष्य पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण में हरिशयन को योगनिद्रा कहा गया है. आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं, जिसे चतुर्मास कहा जाता है.
यह चार महीने की अवधि आध्यात्मिक साधना, संयम, मानसिक शांति, स्वास्थ्य रक्षा और विशेष अनुष्ठानों के लिए हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है.

इस पोस्ट में आप जानेंगे:
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चतुर्मास क्या है और यह कब से कब तक होता है?
- 2026 के चतुर्मास की अवधि
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चतुर्मास में कौन-कौन से महीने आते हैं?
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भगवान विष्णु चार महीने सोते (योगनिद्रा में) क्यों हैं? (पौराणिक कथाएं)
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चतुर्मास के नियम, वर्जित कार्य और क्या करें-क्या न करें?
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चतुर्मास में स्वास्थ्य रक्षा और खान-पान के आयुर्वेदिक नियम
1. चतुर्मास क्या है और यह कब से कब तक होता है?
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी (जिसे देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं) से लेकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी/प्रबोधिनी एकादशी) तक की चार महीने की समयावधि को चतुर्मास कहा जाता है. इन चार महीनों में सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं के पास होता है, जबकि श्रीहरि योगनिद्रा में विश्राम करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन चार महीनों में ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह और साधना का स्तर बहुत उच्च होता है.
2. चतुर्मास में कौन-कौन से महीने आते हैं?
चतुर्मास की कुल अवधि चार महीनों की होती है, जिसमें मुख्य रूप से ये मास शामिल होते हैं:
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श्रावण मास (सावन): भगवान शिव की आराधना, हरियाली और व्रत का महीना.
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भाद्रपद मास (भादों): श्री कृष्ण जन्मोत्सव और व्रत-उपवास का मास.
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आश्विन मास (कुआर): पितृ पक्ष और शारदीय नवरात्रि का मास.
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कार्तिक मास: दीपों का पर्व दीपावली, देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह का मास.
3. चतुर्मास 2026 कब से कब तक है?
जैसा कि ऊपर बताया गया कि चतुर्मास का आरंभ देवशयनी या हरिशयनी एकादशी से होता है और देवोत्थान एकादशी या देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी पर समापन हो जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार साल 2026 की देवशयनी एकादशी 25 जुलाई से चतुर्मास का आरंभ हुआ है. इसका समापन देवोत्थान या देवउठनी एकादशी पर 20 नवंबर 2026 को हो जाएगा.
यानी इस साल 119 दिन का चतुर्मास रहेगा।
4. भगवान विष्णु चार महीने शयन (योगनिद्रा) क्यों करते हैं?
चतुर्मास और हरिशयन से जुड़ी दो प्रमुख और बेहद प्रसिद्ध कथाएं मिलती हैं:
नारायण के वामन अवतार की कथा
पहली कथा राजा बलि और वामन अवतार से जुड़ी है जिसमें भगवान अपने वचन में फंस गए थे.
भागवत पुराण और वामन अवतार की कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी थी. दो पग भूमि का दान चुकाने में बलि का सर्वस्व चला गया. तीसरे पग के लिए बलि ने अपना मस्तक आगे कर दिया.

भगवान वामन इससे अत्यंत प्रसन्न हुए और बलि को सुतल लोक का आधिपत्य दिया. बलि ने वरदान मांगा कि भगवान सदैव उनके सामने रहें. तब श्रीहरि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने पाताल में बलि के द्वार पर निवास करते हैं.
भगवान के वामन अवतार की यह तो बड़ी संक्षिप्त कथा है लेकिन इसे विस्तार से पढ़ना चाहिए. श्रीहरि क्यों उपेंद्र बने? आपने बहुत से लोगों के उपेंद्र नाम सुने होंगे लेकिन उसका अर्थ क्या है? भगवान नारायण उपेंद्र क्यों बने? बलि की पहरेदारी में भगवान की क्या ड्यूटी रहती है और क्यों? यह प्रसंग बड़ा रोचक है. नीचे के लिंक से एक मिनट में आप पूरी कथा पढ़ सकते हैं.
चतुर्मास की माता लक्ष्मी की दुविधा कथाः
चतुर्मास की दूसरी कथा माता लक्ष्मी के कौतूहल और दुविधा से जुड़ी एक दंत कथा है.
क्षीरसागर के शांत और दिव्य वातावरण में एक दिन माता लक्ष्मी कुछ विक्षुब्ध सी बैठी थीं. जगत के पालनहार भगवान विष्णु उनके समीप ही आसन पर विराजमान थे.
देवी लक्ष्मी की झिझक और उनके चेहरे के भावों को देखकर श्रीहरि मंद-मंद मुस्कुराए और बड़े प्रेम से बोले— “देवी! आज तुम्हारे मन में कोई गहरी चिंता स्पष्ट झलक रही है, जो तुम्हारी मधुर मुस्कान को छुपाए हुए है. निःसंकोच कहो, तुम्हारे हृदय में क्या चल रहा है?”
प्रभु के इस अपनेपन भरे स्नेहिल स्वर को पाकर माता लक्ष्मी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से अपनी बात रखी— “हे नाथ! क्षमा करें, यदि मेरा यह प्रश्न आपको अनुचित लगे, किंतु सृष्टि की व्यवस्था और स्वयं की विवशता को देखकर मेरा मन व्याकुल हो जाता है. आप सृष्टि के पालनहार हैं, और आपकी इस निरंतरता का कोई विराम नहीं है. आप करोड़ों-करोड़ों वर्षों तक बिना एक पल रुके, दिन-रात जागते रहते हैं. और जब आपकी योगनिद्रा का समय आता है, तो आप एक साथ लाखों-करोड़ों वर्षों के लिए अगाध नींद में लीन हो जाते हैं.”
माता लक्ष्मी ने थोड़ा रुककर अपनी व्यथा और आगे बढ़ाई— “आपके इस प्रकार अचानक और लंबे समय तक सोने या जागने से समस्त संसार की व्यवस्था डगमगाने लगती है, और त्रैलोक्य में संकट के बादल मंडराने लगते हैं. इसके अलावा, आपके निरंतर जागने के कारण मुझे और समस्त देवी-देवताओं को आपकी सेवा में चौबीसों घंटे तत्पर रहना पड़ता है. मुझे अपनी इस सेवा से कभी ज़रा भी अवकाश नहीं मिलता. क्या आपके विश्राम का कोई निश्चित क्रम नहीं बन सकता? यदि आप एक नियम बना लें, तो इससे संसार को भी स्थिरता मिलेगी और हम सबको भी कुछ विश्राम का अवसर प्राप्त होगा.”
माता लक्ष्मी की इन तार्किक और सहज चिंताओं को सुनकर जगत के पालनहार ने किसी प्रकार का क्रोध करने के बजाय बड़े स्नेह और आत्मीयता से उनकी बात को स्वीकार किया.
लक्ष्मी जी की समस्या भगवान ने तुरंत भांप ली, क्योंकि वे तो अपने भक्तों और अर्धांगिनी के मन की हर बात बिना कहे ही जान लेते थे. उनकी परेशानी और उनका तर्क वैसे भी पूरी तरह उचित था.
कुछ क्षण विचार करने के बाद नारायण मंद-मंद मुस्कुराए और अपने असीम स्नेह से बोले— “देवी! आपकी यह चिंता शत-प्रतिशत सत्य और न्यायसंगत है. मेरे अनवरत जागने से न केवल समस्त देवगणों को, बल्कि विशेष रूप से तुम्हें मेरी सेवा में लगातार लगे रहने के कारण अत्यधिक कष्ट और थकान का सामना करना पड़ता है. तुम्हें मेरी सेवा से कभी भी दो पल का अवकाश नहीं मिल पाता.”
प्रभु ने आगे आश्वासन देते हुए कहा— “इस कठिनाई का समाधान अब मैं स्वयं करता हूँ. आज से मैं हर वर्ष नियमित रूप से चार मास (चार महीने) के लिए योगनिद्रा में विश्राम किया करूंगा. मेरी इस अल्पनिद्रा की अवधि से न केवल तुम्हें, बल्कि समस्त देवगणों को भी चार महीने का पूर्ण अवकाश और विश्राम मिल जाएगा.”
भगवान विष्णु के इस वचन से माता लक्ष्मी का हृदय प्रसन्नता से भर गया. श्रीहरि का यही चार महीने का शयनकाल आगे चलकर चतुर्मास के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जो भक्तों के लिए परम पुण्यवर्धक और कल्याणकारी माना गया है.
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5. चतुर्मास के नियम
चतुर्मास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या परंपरा मात्र नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, अनुशासन और आयुर्वेद की दृष्टि से भी बेहद वैज्ञानिक और कल्याणकारी है. हमारे दूरदर्शी ऋषि-मुनियों ने इस काल के दौरान मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को संतुलित रखने के लिए बड़े ही सोच-समझकर विशेष नियमों और संयम की रूपरेखा तैयार की है, जिनका पालन करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है.
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6. चतुर्मास में क्या न करें?
वर्जित कार्य और मांगलिक प्रतिबंध: चतुर्मास के इन चार पवित्र महीनों के दौरान विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार (उपनीत), दीक्षाग्रहण, नया गृह प्रवेश, गोदान, मूर्ति प्रतिष्ठा और सभी प्रकार के बड़े मांगलिक कार्य पूरी तरह वर्जित या त्याज्य माने गए हैं. सनातन परंपरा के अनुसार, इस काल में सृष्टि के संचालनकर्ता भगवान विष्णु योगनिद्रा में विश्राम कर रहे होते हैं और देवगण भी शयन में होते हैं, जिसके कारण मांगलिक कार्यों का पूर्ण फल और देवताओं का प्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो पाता. इसलिए इन महीनों में संयम और साधना पर विशेष जोर दिया जाता है.
7. चतुर्मास में क्या करें?
साधना, संयम और आत्मशुद्धि

इन चार महीनों में भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर उच्च कोटि की साधना और अनुशासन अपनाना उत्तम फलदायी माना गया है. इस दौरान बिस्तर का त्याग कर जमीन पर शयन करना, मन और इंद्रियों पर संयम रखकर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना, हमेशा सत्य के मार्ग पर चलना और अपने स्वभाव से क्रोध का सर्वथा त्याग करना मनुष्य के आंतरिक विकास और मानसिक शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कहा गया है.
- सबसे आवश्यक चीजः चाहे गृहस्थ हों या संन्यासी चतुर्मास के चार महीनों में जितना संभव हो सके ईश्वर का ध्यान करना चाहिए. ईश्वर की कथाएं सुननी पढ़नी चाहिए. जितना संभव हो व्रत-पूजा आदि करें. आपने सुना होगा साधु-संन्यासी इन चारों महीनों में यात्रा नहीं करते. वे एक जगह जहां स्थिर रहते हैं वहीं पर ईश्वर की कथा सुनते सुनाते हैं. आप यह चाहें तो प्रभु शरणं पर कर सकते हैं.
- कैसे?
हम प्रभु शरणं में एक-एक करके सभी अठारह पुराओं के सार संक्षेप कथाएं अगले चार महीनों में पोस्ट कर देंगे. यानी आप अगले चार महीनों में पुराण कथाओं के जानकार हो जाएंगे. इसके अलावा चतुर्मास में नाप जप का बड़ा विधान है. तो हम आपके लिए भगवान का नाम लिखने का प्रबंध कर रहे हैं. आप अपने इष्ट देवता के नाम लेखन का संकल्प ले सकते हैं. सावन के पहले सोमवार से इसकी शुरुआत होने जा रही है.
प्रभु शरणं का ऐप डाउनलोड कर लें. वहां आपको लगातार पोस्ट मिलती रहेगी. प्रतिदिन तीन नए पोस्ट और मंत्र लेखन का स्थान भी. फ्री ऐप है.
8. चतुर्मास में स्वास्थ्य रक्षा और खान-पान के नियम (क्या खाएं, क्या छोड़ें)
चातुर्मास वर्षा ऋतु के आगमन पर शुरू होता है. इस मौसम में पित्त स्वरूप अग्नि की गति शांत होने से पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, इसलिए आयुर्वेद और धर्म दोनों दृष्टियों से खान-पान के विशेष नियम बताए गए हैं:
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विभिन्न महीनों में त्याग की परंपरा: चतुर्मास के चारों महीनों में अलग-अलग वस्तुओं के त्याग का विधान है:
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सावन में हरी सब्जियां (शाक) का त्याग.
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भादों में दही का त्याग.
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आश्विन में दूध का त्याग.
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कार्तिक में गन्ने के रस या द्विदल (दालें) का त्याग.
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विशेष त्याग व लाभ:
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मधुर स्वर और वाणी की शुद्धि के लिए गुड़ का त्याग करना चाहिए.
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दीर्घायु और संतान प्राप्ति के लिए तेल का त्याग उत्तम है.
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देह शुद्धि के लिए पंचगव्य (गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घृत) का सेवन करें.
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इसके अलावा मूली, परवल, बैंगन, शहद और मांस-मदिरा का पूरी तरह से त्याग करना चाहिए.
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अक्सर पूछा जाने वाला या कौतुहल का प्रश्न
चतुर्मास सही है या चातुर्मास? चतुर्मास और चातुर्मास में क्या अंतर है?
दोनों में कोई अंतर नहीं है. चार महीनों के काल को चातुर्मास कहा जाता है. लेकिन बोलचाल की भाषा में चातुर्मास चतुर्मास हो गया. अब यह इतना लोकप्रिय हो गया है कि मूल शब्द चातुर्मास ही अब अटपटा लगता है. देखिए न इसीलिए हमने भी चातुर्मास को चतुर्मास ही लिखा जबकि सही शब्द चातुर्मास है.
खैर भाषा और वर्तनी की चर्चा फिलहाल रोककर हरिनाम चर्चा पर आगे बढ़ते हैं. आप जितना हो सके चतुर्मास में हरिनाम करें. प्रभु शरणं इसकी मदद के लिए प्रस्तुत है.
(संकलन व संपादन: राजन प्रकाश)
( डिस्कलेमरः यह पोस्ट पुराणों में वर्णित कथाओं के आधार पर तैयार की गई है। इस पोस्ट का उद्देश्य सिर्फ एक जानकारी देना है। इसका उद्देश्य कोई गलत जानकारी देना या अंधविश्वास फैलाना नहीं हैं। पोस्ट में बताएं किसी भी परामर्श पर अमल करने से पहले विषय के विशेषज्ञ से परामर्श लें।)
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प्रभु शरणम् के बारे में दो शब्दः
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