भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा अंतिम भागः कुरर, बालक, कुमारी कन्या, सर्प, मकड़ी, भृंगी और देह
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु कौन थे? कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, सर्प, मकड़ी, भृंगी और देह से मिली सीखः कथा का तीसरा और अंतिम भाग
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा शृंखला के पहले भाग में पृथ्वी से कबूतर तक उनके आठ गुरुओं के बारे में जाना. भगवान ने उनसे क्या सीखा और आज के युग में हमें उससे क्या सीख लेनी चाहिए- यह सब जाना।
पहला भाग इस लिंक से पढ़ेंः
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु: प्रकृति से मिली जीवन बदलने वाली 24 अमूल्य शिक्षाएँ
दत्तप्रभु को अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, मधु निकालने वाला, हिरन और मछली से ऐसी क्या शिक्षा मिली कि उन्हें अपना गुरु मान लिया –
पढ़िए भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु (भाग 2) में।
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुः अजगर से पिंगला वेश्या तक से मिली जीवन की शिक्षाएँ
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की इस कथा श्रृंखला के पहले दो भागों में 16 गुरुओं– पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, मधु निकालने वाला, हिरन, मछली और फिर पिंगला वेश्या की मार्मिक कहानी सुन चुके हैं। भगवान ने उनसे क्या सीखा और क्यों गुरु माना- यह भी जाना।
तीसरा और आखिरी भाग अंतिम 8 गुरुओं की कथा है, जिनसे भगवान दत्तात्रेय जी ने अकिंचनभाव, निश्छलता, एकांत, एकाग्रता, सृष्टि–लय और अनित्यता के अंतिम मंत्र सीखे।

17वाँ गुरु – कुरर पक्षी: त्याग में ही सच्ची शांति है
भगवान दत्तात्रेय ने यदु को बताया कि एक बार उन्होंने एक कुरर पक्षी को देखा। उसकी चोंच में मांस का छोटा-सा टुकड़ा था। मांस के कारण अनेक बलवान पक्षी उसके पीछे पड़ गए। कोई उसकी चोंच पर प्रहार करता, कोई पंख नोचने का प्रयास करता, तो कोई उसे नीचे गिराने की कोशिश करता। बेचारा कुरर कभी इधर उड़ता, कभी उधर, पर उसे कहीं शांति नहीं मिली।
कुछ देर तक संघर्ष करने के बाद उसने समझ लिया कि संकट का कारण दूसरे पक्षी नहीं, बल्कि उसकी चोंच में दबा हुआ मांस है। जैसे ही उसने मांस का टुकड़ा छोड़ दिया। सभी पक्षी उसे छोड़कर उस मांस के पीछे लड़ने लगे। अब कुरर निश्चिंत था। उसकी चोंच खाली थी, लेकिन मन हल्का था। वह बिना किसी भय के खुले आकाश में उड़ गया।
इस छोटी-सी घटना से भगवान दत्तात्रेय ने एक बहुत बड़ा जीवन-सत्य सीखा। मनुष्य जिस वस्तु पर ‘मेरा’ का अधिकार जमा लेता है, उसी से उसके दुःखों की शुरुआत होती है। धन मेरा, पद मेरा, परिवार मेरा, प्रतिष्ठा मेरी—यही ‘मेरा’ का भाव मनुष्य को दिन-रात भय, चिंता और संघर्ष में उलझाए रखता है।
साधक का मार्ग अकिंचनभाव का मार्ग है। उसका विश्वास होता है कि जो कुछ मिला है, वह भगवान की कृपा है और जब तक उनकी इच्छा होगी, तब तक रहेगा। इसलिए उसके भीतर खोने का भय नहीं होता।
आज यदि हम अपने जीवन को देखें तो पाएँगे कि हमारी अधिकांश चिंताएँ उन्हीं चीज़ों के कारण हैं जिन्हें हम किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते। कभी-कभी त्याग हार नहीं होता, बल्कि सबसे बड़ी जीत होती है। जो छोड़ना सीख गया, वही वास्तव में मुक्त हो गया।
18वाँ गुरु बालक: निष्कपट मन में ही भगवान का निवास होता है
भगवान दत्तात्रेय ने अपने गुरुओं में एक छोटे बालक को भी स्थान दिया। कारण यह था कि बालक छल-कपट से दूर होता है। वह न मान-अपमान का हिसाब रखता है, न भविष्य की अनावश्यक चिंता करता है। उसका क्रोध भी क्षणिक होता है और उसका प्रेम भी पूर्ण होता है। वह रोता है तो पूरे मन से और हँसता है तो भी पूरे मन से।
उसके भीतर किसी के प्रति बैर नहीं होता। वह वर्तमान में जीना जानता है। यही सरलता भगवान दत्तात्रेय को सबसे अधिक प्रिय लगी।
उन्होंने समझा कि भगवान को पाने के लिए विद्वान होना आवश्यक नहीं, बल्कि निर्मल हृदय होना आवश्यक है। जिस प्रकार एक छोटा बच्चा अपने पिता पर पूर्ण विश्वास करता है, उसी प्रकार भक्त को भी अपने आराध्य पर विश्वास रखना चाहिए। जहाँ तर्क समाप्त होता है, वहीं से सच्ची भक्ति प्रारम्भ होती है।
आज मनुष्य का मन जटिल होता जा रहा है। हर संबंध में संदेह, हर व्यवहार में स्वार्थ और हर निर्णय में भय दिखाई देता है। ऐसे में बालक हमें सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति सरलता है। जिस दिन हमारा मन निष्कपट हो जाएगा, उसी दिन प्रभु का मार्ग भी सरल हो जाएगा।
19वाँ गुरु कुमारी कन्या: साधना के लिए एकांत भी आवश्यक है
एक दिन भगवान दत्तात्रेय ने एक कुमारी कन्या को देखा। उसके घर कुछ अतिथि आए थे और घर के बड़े सदस्य बाहर गए हुए थे। अतिथियों के स्वागत की पूरी जिम्मेदारी उसी पर थी।
वह भोजन की तैयारी के लिए धान कूटने लगी। उसके हाथों में अनेक शंख की चूड़ियाँ थीं। जैसे-जैसे वह धान कूटती, चूड़ियाँ आपस में टकराकर तेज आवाज करने लगतीं। उसे लगा कि यह शोर अतिथियों के सामने उचित नहीं है। उसने एक-एक करके सारी चूड़ियाँ उतार दीं और प्रत्येक हाथ में केवल एक चूड़ी रहने दी। अब कोई आवाज नहीं हो रही थी।
इस साधारण घटना में भी भगवान दत्तात्रेय ने गहन आध्यात्मिक शिक्षा देखी।
जहाँ अधिक लोग होते हैं, वहाँ मतभेद, विवाद और अनावश्यक चर्चाएँ भी बढ़ जाती हैं। साधक यदि हर समय बाहरी शोर में घिरा रहेगा तो वह अपने भीतर उठने वाली ईश्वर की आवाज़ कैसे सुन पाएगा?
इसका अर्थ यह नहीं कि संसार छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि प्रतिदिन कुछ समय ऐसा अवश्य हो जब मनुष्य अकेला हो—केवल अपने मन और अपने भगवान के साथ।
आज का जीवन निरंतर शोर से भरा हुआ है। मोबाइल, समाचार, सोशल मीडिया और अनगिनत बातचीत के बीच मन स्वयं को सुनना ही भूल गया है। यदि प्रतिदिन कुछ समय मौन में प्रभु का स्मरण किया जाए, तो वही समय आत्मा की सबसे बड़ी साधना बन सकता है।
20वाँ गुरु बाण बनाने वाला: एकाग्र मन ही भगवान तक पहुँचता है

भगवान दत्तात्रेय ने एक बाण बनाने वाले कारीगर को देखा। वह अपने कार्य में इतना तल्लीन था कि उसी समय वहाँ से राजा की भव्य सवारी निकल गई। घोड़ों की टापें गूँजीं, सैनिक चले, बाजे बजे, लोगों की भीड़ उमड़ी, लेकिन उस कारीगर का ध्यान तनिक भी नहीं टूटा। उसका पूरा मन केवल अपने कार्य पर लगा हुआ था।
यह दृश्य देखकर भगवान दत्तात्रेय ने समझा कि साधना भी ऐसी ही होनी चाहिए।
जब जप करें तो केवल जप करें। जब ध्यान करें तो केवल भगवान का ध्यान करें। यदि मन बार-बार संसार की ओर भागता रहेगा, तो साधना केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
जिस प्रकार बाण बनाने वाले का लक्ष्य केवल एक था, उसी प्रकार साधक का लक्ष्य भी केवल भगवान होना चाहिए। एकाग्र मन में ही भक्ति गहराती है और उसी मन में भगवान का अनुभव होता है।
आज हमारा मन एक साथ अनेक दिशाओं में भागता है। पूजा करते समय भी मोबाइल याद आता है, जप करते समय भी काम की चिंता बनी रहती है। इसलिए शांति नहीं मिलती। भगवान दत्तात्रेय की यह शिक्षा बताती है कि भगवान तक पहुँचने का मार्ग एकाग्रता से होकर जाता है। जिस दिन मन एक दिशा में स्थिर हो जाएगा, उसी दिन साधना का वास्तविक आनंद मिलने लगेगा।
21वाँ गुरु सर्प: साधक का बल एकांत में बढ़ता है, भीड़ में नहीं
भगवान दत्तात्रेय ने देखा कि सर्प अपना स्थायी घर नहीं बनाता। वह किसी दूसरे के बनाए बिल में कुछ समय रहता है और फिर चुपचाप आगे बढ़ जाता है। उसे न अपने घर का अहंकार होता है, न संग्रह का मोह। वह अनावश्यक भीड़ से दूर रहता है और अपने मार्ग पर चलता रहता है।
दत्तात्रेय जी ने समझा कि साधक का जीवन भी ऐसा ही होना चाहिए। संसार में रहना आवश्यक है, लेकिन संसार में उलझ जाना आवश्यक नहीं। जो व्यक्ति हर समय लोगों की प्रशंसा, आलोचना, विवाद और प्रदर्शन में उलझा रहता है, उसका मन कभी प्रभु में स्थिर नहीं हो सकता।
इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य घर-परिवार छोड़ दे। इसका अर्थ केवल इतना है कि प्रतिदिन कुछ समय ऐसा अवश्य हो, जब वह संसार से नहीं, अपने प्रभु से संवाद करे। जिस प्रकार शरीर को विश्राम चाहिए, उसी प्रकार आत्मा को भी एकांत चाहिए।
आज का मनुष्य हर समय लोगों से जुड़ा हुआ है, लेकिन स्वयं से दूर होता जा रहा है। यदि प्रतिदिन कुछ क्षण भी मौन में बैठकर भगवान का नाम लिया जाए, तो वही समय पूरे दिन की सबसे बड़ी साधना बन सकता है।
22वाँ गुरु मकड़ी: सृष्टि का रहस्य समझाने वाली छोटी-सी गुरु
एक दिन भगवान दत्तात्रेय ने मकड़ी को बड़े ध्यान से देखा। वह अपने शरीर से ही महीन धागा निकालती है, उसी से जाला बुनती है, उसी जाले में रहती है और समय आने पर उसी जाले को फिर अपने भीतर समेट लेती है।
दूसरे लोगों के लिए यह एक साधारण दृश्य था, लेकिन दत्तात्रेय जी को उसमें सृष्टि का रहस्य दिखाई दिया।
उन्होंने समझा कि जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाला निकालती है और अंत में उसे अपने भीतर समेट लेती है, उसी प्रकार परमात्मा अपनी माया से इस जगत की रचना करते हैं। उन्हीं की शक्ति से सृष्टि चलती है और समय आने पर सब कुछ फिर उन्हीं में विलीन हो जाता है।
इस सत्य को भूल जाने पर मनुष्य संसार को ही अंतिम सत्य मान बैठता है। वह घर, धन, पद और संबंधों में ही स्थायी सुख खोजने लगता है। लेकिन यह संसार भी उसी जाले की तरह है जो एक दिन समेट लिया जाएगा।
इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि संसार में रहते हुए भी अपने वास्तविक घर को न भूलें। हमारा अंतिम आश्रय न धन है, न शरीर, न परिवार। हमारा शाश्वत आश्रय केवल भगवान हैं।
23वाँ गुरु भृंगी कीट: जैसा चिंतन, वैसा जीवन

भगवान दत्तात्रेय ने भृंगी कीट से भी एक अद्भुत शिक्षा प्राप्त की।
भृंगी किसी छोटे कीड़े को पकड़कर अपने बिल में बंद कर देता है। भय के कारण वह कीड़ा हर समय भृंगी का ही चिंतन करता रहता है। धीरे-धीरे उसका स्वरूप भी भृंगी के समान हो जाता है।
दत्तात्रेय जी ने इस घटना में मन की सबसे बड़ी शक्ति को पहचाना।
मनुष्य दिन-रात जिसका चिंतन करता है, धीरे-धीरे उसका स्वभाव भी वैसा ही बनने लगता है।
यदि मन हर समय धन, ईर्ष्या, क्रोध, भय और दूसरों के दोषों में लगा रहेगा, तो जीवन भी वैसा ही अशांत हो जाएगा। लेकिन यदि वही मन भगवान के नाम, उनकी लीलाओं, उनकी करुणा और उनके चरणों का स्मरण करेगा, तो उसका स्वभाव भी धीरे-धीरे दिव्य होने लगेगा।
यही कारण है कि हमारे शास्त्रों ने नाम-जप, सत्संग और भगवान की कथा सुनने पर इतना बल दिया है। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं, बल्कि मन को भगवान के रंग में रंगने का माध्यम हैं।
मन जिस दिशा में बार-बार जाता है, जीवन भी अंततः उसी दिशा में चल पड़ता है।
24वाँ गुरु है स्वयं का शरीर: सबसे निकट का गुरु
भगवान दत्तात्रेय ने अंत में अपने ही शरीर को भी गुरु माना।
पहली दृष्टि में यह बात आश्चर्यजनक लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है।
यह शरीर प्रतिदिन हमें याद दिलाता है कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था—सब धीरे-धीरे बदलते रहते हैं। जो शरीर आज शक्तिशाली दिखाई देता है, वह भी एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा।
दत्तात्रेय जी ने समझ लिया था कि यदि मनुष्य इस दुर्लभ शरीर को केवल भोग, विवाद, संग्रह और अहंकार में ही नष्ट कर दे, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा?
भगवान ने असंख्य योनियों के बाद मनुष्य जन्म दिया है। यही वह शरीर है जिसके द्वारा ईश्वर का स्मरण किया जा सकता है, सेवा की जा सकती है, साधना की जा सकती है और मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
इसीलिए शरीर से प्रेम करना चाहिए, लेकिन उसके मोह में नहीं पड़ना चाहिए। उसका उपयोग भगवान तक पहुँचने के साधन के रूप में करना चाहिए।
जो मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है, उसके लिए जीवन का प्रत्येक दिन अमूल्य बन जाता है।
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु हमें क्या सिखाते हैं?

राजा यदु ने जब भगवान दत्तात्रेय से उनके चौबीस गुरुओं की कथा सुनी, तब उन्हें समझ में आया कि ज्ञान केवल आश्रमों और पुस्तकों में ही नहीं मिलता। यदि सीखने की इच्छा हो तो पृथ्वी भी गुरु है, आकाश भी गुरु है, एक बालक भी गुरु है और एक छोटी-सी मकड़ी भी गुरु बन सकती है।
भगवान दत्तात्रेय का जीवन हमें यह सिखाता है कि संसार में कोई भी घटना व्यर्थ नहीं होती। हर अनुभव अपने साथ कोई न कोई शिक्षा लेकर आता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हमारी दृष्टि जागृत हो।
आज हम ज्ञान तो बहुत एकत्र कर रहे हैं, लेकिन जीवन से सीखना भूलते जा रहे हैं। भगवान दत्तात्रेय हमें फिर से उसी सरल मार्ग पर लौटने का निमंत्रण देते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर सीखने को तैयार रहता है, उसके लिए पूरी सृष्टि गुरु बन जाती है।
यदि पृथ्वी जैसा धैर्य, वायु जैसी निर्लिप्तता, जल जैसी पवित्रता, सूर्य जैसी उदारता और बालक जैसी सरलता हमारे जीवन में आ जाए, तो भगवान तक पहुँचने का मार्ग कठिन नहीं रह जाता।
इसलिए आज से एक छोटा-सा संकल्प कीजिए। हर दिन अपने जीवन में घटने वाली किसी एक घटना से एक शिक्षा अवश्य ग्रहण करें। धीरे-धीरे आप अनुभव करेंगे कि भगवान केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि अपनी बनाई हुई इस पूरी सृष्टि के माध्यम से भी हमें निरंतर शिक्षा दे रहे हैं।
यही भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं का सबसे बड़ा संदेश है।
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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