भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु: प्रकृति से मिली जीवन बदलने वाली 24 अमूल्य शिक्षाएँ
गुरु पूर्णिमा एक विशेष अवसर है अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की उन्होंने हमें हर प्रकार से योग्य बनाने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी. तो गुरु कौन है? हमारे वे शिक्षक जिन्होंने हमें पढ़ाया-लिखाया, या जिनसे हमने दीक्षा ली? निःसंदेह इनमें से एक ने हमें अक्षर ज्ञान दिया तो दूसरे ने आध्यात्मिक जागरण कराया. लेकिन ये सारी शिक्षाएं तो हमें सबसे पहले अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य परिवारजनों से मिली होगी. तो क्या वे गुरू नहीं हुए? क्या गुरु केवल कोई महात्मा, ऋषि या विद्वान ही हो सकता है? भगवान दत्तात्रेय की यह कहानी इस उलझन का निवारण कर देती है.

दत्तात्रेय जी ने समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, एक छोटा बच्चा, कीट-पतंगे, यहाँ तक कि एक वेश्या और एक मकड़ी को अपना गुरु माना है. यह रहस्य श्रीमद्भागवत महापुराण में आता है जिसमें आभगवान श्रीकृष्ण स्वयं उद्धव को यह बता रहे हैं. श्रीकृष्ण अगर कुछ कह रहे हैं तो वह अवश्य ही एक दिव्य ज्ञान होगा. प्रभु शरणं के पाठक उस दिव्य ज्ञान को न समझें यह ठीक नहीं है.
दत्त भगवान के 24 गुरुओं की कथा जीवन को देखने का एक नया दृष्टिकोण हैं। कथा आरंभ करते हैं।
राजा यदु की दत्तात्रेय जी से भेंट
एक दिन धर्मज्ञ राजा यदु वन में भ्रमण कर रहे थे। अचानक उनकी दृष्टि एक ऐसे युवक पर पड़ी जो अत्यंत तेजस्वी था। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी। न उसमें किसी वस्तु की कामना दिखती थी, न भविष्य की चिंता। न धन का मोह, न मान-सम्मान की लालसा। वह किसी बालक की तरह निश्चिंत होकर विचर रहा था। इतना आनंद, इतनी शांति और इतना वैराग्य आखिर आया कहाँ से?
राजा यदु उसके पास पहुँचे। विनम्रता से प्रणाम किया और पूछा– “हे ब्राह्मण! हम तो आयु, यश, धन, परिवार और राज्य की चिंता में भटकते रहते हैं। आप न कुछ करते दिखते हैं, न कुछ माँगते, फिर भी इतने प्रसन्न और बेफिक्र कैसे हैं? आपका गुरु कौन है, आपको यह अद्भुत जीवन–दृष्टि कहाँ से मिली? आपकी आभा मुझे मोहित कर रही है। आप इतने तेजस्वी हैं तो आपके गुरु कैसे होंगे, यह जानने की बड़ी लालसा हो रही है। कृपया अपने गुरु का परिचय दें। मैं उनके दर्शन करना चाहता हूँ।”
तब उस ब्राह्मण ने मुस्कुराते हुए कहा – “राजन, मैं अवधूत दत्तात्रेय हूँ। और मेरा जीवन किसी एक–दो गुरु की गोद में नहीं, बल्कि चौबीस गुरुओं के सान्निध्य में गढ़ा गया है। मैंने जहाँ–जहाँ सत्य की छनछनाहट सुनी, वहाँ–वहाँ स्वयं को शिष्य बना दिया।”
भगवान दत्तात्रेय को श्रीहरि का अवतार माना जाता है। यह रहस्य उन्होंने प्रकट नहीं होने दिया था। इसलिए ब्रह्मनिष्ठ ऋषियों के अतिरिक्त कोई यह रहस्य समझ नहीं पाता था। कहते हैं जिसने समझ लिया बाद में देवमाया से उसे इसका ज्ञान न रहता। इसलिए लोग उन्हें एक ऋषिकुमार या महर्षि मात्र ही समझते थे।
पुराणों में आता है कि दुर्वासा और चंद्रमा दत्तात्रेय के सहोदर भाई थे. दुर्वासा शिव के अंशावतार, चंद्रमा ब्रह्मा के और दत्तात्रेय को नारायण अंशावतार माना जाता है। महान पतिव्रता माता अनुसूया की परीक्षा लेने आए त्रिदेव अपनी ही माया में फंस गए थे। इसलिए उन्हें अनुसूया के गर्भ में स्थापित होना पड़ा और पुत्र रूप में जन्म लेना पड़ा। यह एक बड़ी रोचक और सीखने योग्य कथा है।
चूंकि यह पोस्ट दत्त भगवान और उनके 24 गुरुओं की कहानी पर है। इसलिए देवी अनुसूया के गर्भ में त्रिदेवों को क्यों आना पड़ा, उनसे क्या भूल हुई थी जिसका वह पश्चाताप था- वह कथा यहां देने से मुख्य विषय से ध्यान भटक जाएगा।
आपको वह कथा जाननी हो तो इस लिंक से पढ़ सकते हैंः
देवियों का तोड़ने को अभिमान, छह माह के शिशु बन गए भगवान
दत्त प्रभु के 24 गुरुओं वाली कथा आगे बढ़ाते हैं।
ऋषि कुमार ने मुस्कुराते हुए यदु को उत्तर दिया— “राजन्! मेरे अनेक गुरु हैं। आपको किस-किस गुरु के दर्शन करने हैं?”
राजा चकित रह गए। इतने युवा व्यक्ति के अनेक गुरु?
दत्तात्रेय उनकी उलझन समझ गए और बोले— ” राजन! मैंने गुरु को स्वीकारने में कभी वर्ण, लिंग, प्रजाति या जितने प्रकार के भेद आप सोच सकते हैं वह कभी नहीं रखा। जहाँ भी कोई श्रेष्ठ गुण देखा, उसे अपना गुरु बना लिया।”
उनकी वाणी में ऐसा आकर्षण था कि यदु मंत्रमुग्ध होकर सब सुनते जा रहे थे।

यहीं से प्रारंभ होती है भारतीय अध्यात्म की सबसे अद्भुत शिक्षाओं में से एक—भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा। यह कोई सामान्य शिक्षा नहीं, जीवन को बदलने वाली शिक्षा है। हमें गर्व होना चाहिए कि सिर्फ सनातन ही एक ऐसा धर्म है जिसमें इतनी उदारता है। यह सनातन पर गर्व की कथा है।
भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरु क्यों बनाए?
दत्तात्रेय जी ने यदु को कहा- आप विद्वान और न्यायप्रिय राजा हैं इसलिए आप मेरे गुरुओं का रहस्य समझने के योग्य हैं। मैं आपको अपने 24 गुरुओं के बारे में बताउंगा। महाराज यदु! सामान्य मनुष्य व्यक्ति को देखता है। ज्ञानी व्यक्ति गुण को देखता है। हम यह सोचते हैं कि ज्ञान केवल किसी विद्वान से ही मिल सकता है। यह एक भ्रम भी हो सकता है।
मैंने एक पर्वत, नदी, पक्षी, वालक, समाज से बहिष्कृत वेश्या तक से शिक्षाएं ली हैं। पहले मैं आपको अपने 24 गुरुओं के नाम बताता हूँ। इसके बाद आपको एक-एक करके य बताउंगा कि मैंने उन्हें गुरु क्यों माना और उनसे क्या सीखा।
पहले मेरे 24 गुरुओं का नाम सुनो। इसके बाद मैं सबका प्रभाव बताऊँगा।
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु की सूची
दत्तात्रेय जी कहते हैं कि उनके ये 24 गुरु हैं:
- पृथ्वी
- वायु
- आकाश
- जल
- अग्नि
- चन्द्रमा
- सूर्य
- कबूतर
- अजगर
- समुद्र
- पतंग
- मधुमक्खी / भौंरा
- हाथी
- मधु निकालने वाला (शहद लेने वाला)
- हिरन
- मछली
- पिंगला वेश्या
- कुरर पक्षी
- बालक
- कुमारी कन्या
- बाण बनाने वाला कारीगर
- सर्प
- मकड़ी
- भृंगी कीट
अब आइए कथा को आगे बढ़ाते हुए एक–एक गुरु से ली गई अद्भुत जीवन शिक्षा को कथा रूप में समझते हैं।यदु मंत्रमुग्ध सुन रहे थे। भगवान दत्तात्रेय ने अपने पहले गुरु का परिचय शुरू किया।
1. पृथ्वी – धैर्य, क्षमा और परोपकार की गुरु
यदि कोई पूछे कि संसार का सबसे सहनशील जीव कौन है, तो उत्तर होगा— पृथ्वी। हम प्रतिदिन उस पर चलते हैं।उसे खोदते हैं, उसके चीरकर खनिज निकालते हैं। उस पर भवन बनाते हैं। उस पर युद्ध करते हैं। वह सब कुछ सहती रहती है। कभी शिकायत नहीं करती। कभी प्रतिशोध नहीं लेती। हे राजन! मैंने पृथ्वी को देखकर समझा कि एक साधक का हृदय भी ऐसा ही होना चाहिए।जीवन में अपमान आएँगे। आलोचना होगी। लोग अकारण आपको दोष देंगे। कभी अपने भी साथ छोड़ देंगे। यदि प्रत्येक बात का उत्तर क्रोध से दिया जाएगा तो मन कभी शांत नहीं रह सकेगा। पृथ्वी हमें सिखाती है हमारी असली शक्ति हमारा धैर्य है।जो व्यक्ति हर परिस्थिति में संतुलित रहता है, वही वास्तव में शक्तिशाली होता है। इसकी शिक्षा पृथ्वी से अधिक कौन दे सकता है। इसलिए मैंने पृथ्वी को अपना प्रथम गुरु माना है।पर्वत और वृक्ष पृथ्वी के ही अंश हैं, जो अपने जीवन को दूसरों के लिए समर्पित कर देते हैं। मैंने उनके सीखा है कि उत्तम पुरुष का जीवन भी परोपकार के लिए ही होना चाहिए। जैसे वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाता, दूसरों को दे देता है। किसी के दुख में काम आना, किसी को आसरा देना – यही सच्चा धर्म है।
आज के जीवन की सीखः
आज समाज में सबसे बड़ी समस्या है कि लोग छोटी-सी बात पर टूट जाते हैं। सोशल मीडिया पर किसी ने कुछ कह दिया तो मन अशांत। दफ्तर में आलोचना हो गई तो क्रोध। परिवार में मतभेद हो गया तो संबंध समाप्त। यदि पृथ्वी की तरह धैर्य आ जाए तो जीवन के आधे संघर्ष समाप्त हो सकते हैं। भगवान दत्तात्रेय के इस गुरु से हमें यह सीखना चाहिए।
2. वायु – आसक्तिरहित होना और शुद्धता
दत्तात्रेय जी ने यदु को बताया- शरीर के भीतर रहने वाली प्राणवायु हो या शरीर के बाहर विचरने वाली वायु दोनों ने मुझे आसक्ति से मुक्त होना सिखाया। प्राणवायु का काम केवल जीवित रखना है; वह जितना भोजन मिले उससे ही संतुष्ट रहती है।
उसी तरह साधक को केवल जीवन–निर्वाह भर भोजन लेना चाहिए। सुख–सुविधा के लिए अधिक भोजन या संग्रह नहीं करना चाहिए।अब बाहरी वायु से मिला ज्ञान सुनो- मैंने देखा कि वायु पूरे संसार में घूमती है। राजमहल में भी जाती है, झोपड़ी में भी। सुगंधित पुष्पों के बीच भी बहती है। दुर्गंध वाले स्थानों से भी गुजरती है। लेकिन वह किसी से चिपकती नहीं। न सुगंध उसकी अपनी बनती है, न दुर्गंध। वह केवल अपना कार्य करती हुई आगे बढ़ जाती है। यही एक साधक का भी स्वभाव होना चाहिए।संसार में रहो, सबके बीच रहो, कर्तव्य निभाओ। लेकिन किसी के दोषों को अपने भीतर मत बसाओ। मैंने वायु से यह रहस्य सीखा है इसलिए वायु मेरे दूसरे गुरु हैं।
आज के जीवन की सीखः
आज अधिकांश तनाव वस्तुओं की कमी से नहीं, इच्छाओं की अधिकता से है। वायु कहती है—”हल्के बनो।” जो जितना कम आसक्त होगा, वह उतना अधिक स्वतंत्र होगा।

3. आकाश – असंग और सर्वव्यापक आत्मा की शिक्षा
आकाश सभी घटों, घरों, महलों, पर्वतों के बीच व्याप्त है, पर किसी से जुड़ता नहीं। घट टूट जाए तो आकाश नहीं टूटता, घर गिर जाए तो आकाश नहीं गिरता। हम सब आकाश को देखते हैं। लेकिन शायद ही कभी उसके इन गुणों पर विचार करते हैं।आकाश किसी से प्रभावित नहीं होता। वह सबको स्थान देता है, पर किसी का बोझ अपने ऊपर नहीं लेता। आत्मा भी ऐसी ही है।यदु ने आत्मा और आकाश का संबंध जानना चाहा। भगवान ने समझाया- जैसे धागे में पिरोए हुए मनके धागे से जुड़े होते हैं, वैसे ही सब शरीरों में एक ही आत्मा व्याप्त है। शरीर के जन्म–मरण, बाल्यावस्था, युवा, वृद्धावस्था – ये सब परिवर्तन शरीर के हैं, आत्मा इनसे परे और असंग है।शरीर बदलते रहते हैं। भावनाएँ बदलती रहती हैं। सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं। लेकिन आत्मा इन सबसे परे है। जैसे घट अलग-अलग हो सकते हैं, पर उनके भीतर का आकाश एक ही होता है। वैसे ही हम सबके भीतर विराजमान परमात्मा भी एक ही है।
आज के जीवन की सीख
आज मनुष्य अपनी पहचान शरीर, पद और संपत्ति से करता है। यही दुःख का कारण है। आकाश सिखाता है—
अपनी वास्तविक पहचान आत्मा में खोजो। जब पहचान बदल जाएगी, तब जीवन भी बदल जाएगा। यदि मनुष्य इस सत्य को समझ ले तो जाति, भाषा, रंग और पद के अहंकार स्वतः समाप्त होने लगते हैं।
4. जल – शुद्धता, मधुरता और लोक को निर्मल करने की क्षमता
जल मनुष्य को शारीरिक रूप से शुद्ध करता है, प्यास बुझाता है, शीतलता देता है। गंगा, यमुना जैसे पवित्र नदियों के दर्शन, स्पर्श और नाम स्मरण से मनुष्य अपने को पावन महसूस करता है।
दत्तात्रेय जी ने आगे कहा- मैंने जल से सीखा कि साधक का स्वभाव भी जल की तरह शुद्ध, स्निग्ध (कोमल), मधुर और लोक–पावन होना चाहिए। उसके दर्शन, स्पर्श, वचन और नाम–स्मरण से लोगों को शान्ति, आश्वासन और प्रेरणा मिले। जिसकी उपस्थिति से वातावरण शुद्ध हो जाए, वही वास्तव में धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्ति है।
झरने, नदियाँ, वर्षा – सबके रूप में जल संसार को जीवन देता है; उसी तरह साधक का जीवन भी दूसरों के लिए जीवनदायी होना चाहिए।
5. अग्नि – तपस्या से उत्पन्न तेज और संयम
अग्नि को जो भी दिया जाए, वह उसे अपने भीतर रख लेती है – इसको अलग, उसको अलग नहीं करती।
उसे गीला लकड़ी मिले या सूखी, बुढ़े का भोजन मिले या बच्चे का, वह बस कर्म करती है – जलाती है, पकाती है, शुद्ध करती है।
दत्तात्रेय जी ने अग्नि से तीन बातें सीखी हैं:
- तप से तेज पैदा होता है – तपस्या केवल उपवास नहीं, बल्कि अपने स्वभाव की अशुद्धियों को पकाना है।
- जितना आवश्यक है उतना ही संग्रह – अग्नि के पास कोई “गोडाउन” नहीं, उसका संग्रह उसका पेट है।
- विविध परिस्थितियों में रहकर भी भीतर की आग को दिशा देना – न क्रोध में जला देना, न आलस्य से बुझा देना।
जीवन का संदेश:
“अपने भीतर ऐसी ज्योति जगाओ कि तुम जहाँ भी जाओ, अँधेरे को कम करो, पर किसी को झुलसाओ नहीं।”
6. चन्द्रमा – देह बदलती रहे भी, भीतर की रोशनी बनी रहे

चन्द्रमा की कलाएँ हमें रोज़ भ्रमित करती हैं – आज कम, कल ज़्यादा, कभी पूरा, कभी कुछ भी नहीं।
हम कहते हैं – “चाँद घट गया, बढ़ गया”, पर वास्तव में घटती–बढ़ती हैं केवल उसकी दिखाई देने वाली कलाएँ।
दत्तात्रेय जी यहाँ से शरीर–भाव और आत्म–भाव का भेद समझाते हैं:
- देह की अवस्था – बालक, युवा, वृद्ध – चन्द्र की कलाओं की तरह हैं।
- आत्मा की अवस्था – साक्षी, शांत, नित्य – पूर्ण चन्द्र की तरह है, जो वास्तव में कहीं घटता–बढ़ता नहीं।
जब हम अपने जीवन को केवल देह के फ्रेम में देखते हैं, तो हर झुर्री, हर रोग हमें भीतर तक हिला देता है।
पर जब हम इसे चन्द्र–कला की तरह देखना सीखते हैं, तो दु:ख कम हो जाता है।
प्रभु शरणं के पाठक के लिए यहाँ एक सौम्य स्मरण:
“आपका वास्तविक परिचय आपकी आत्म–प्रभा है, देह–रूप नहीं।
चाँद की कलाओं की तरह उम्र बदलेगी, पर भीतर का चाँद वैसा ही रह सकता है – यदि हम उसे याद रखना सीख जाएँ।”
7. सूर्य – लोभ रहित ग्रहण और उदार त्याग
सूर्य दिन भर जल उठाते हैं – नदियों, समुद्रों, झीलों से।फिर वही जल बादल बनकर बरसात के रूप में वापस पृथ्वी को लौटा दिया जाता है। दत्तप्रभु ने सूर्य सीखाः
- इन्द्रियाँ जो कुछ ग्रहण करें, हृदय उसे लोक–हित और ईश्वर–सेवा में परिवर्तित करे।
- जितना मिले, उसे “सिर्फ़ मेरा” मानकर पकड़ने की बजाय, समय पर आगे प्रवाहित कर दिया जाए।
सूर्य का प्रतिबिंब अनेक जलाशयों में दिखता है, पर सूर्य एक ही है। इसे दत्तात्रेय जी आत्मा–तत्त्व से जोड़ते हैं –आत्मा एक, देह अनेक।
8. कबूतर – जब प्रेम, प्रेम नहीं, आसक्ति बन जाए
दत्तात्रेयजी ने एक बार एक कबूतर–कबूतरी के जोड़े को देखा। उनका छोटा सा संसार था– घोंसला, बच्चे, परस्पर प्रेम। एकदिन बहेलिए ने जाल बिछाया। पहले उसने बच्चों को पकड़ा। माँ बच्चों के शोक में उसी जाल में फँस गई; फिर पिता पत्नी–बच्चों के दुख से व्याकुल होकर उसी जाल के भीतर चला गया।
दत्तप्रभु ने की कबूतर से सीखा:
- प्रेम सुंदर है, पर जब वह ईश्वर–स्मरण को पीछे छोड़कर मात्र आसक्ति बन जाए, तो वही प्रेम बन्धन हो जाता है।
- गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी यदि मनुष्य केवल कुटुम्ब–बंधन में खो जाए और आत्म–उद्धार का मार्ग भूल जाए, तो वह अवसर होते हुए भी मुक्त नहीं हो पाता।
प्रभु शरणं के पाठक के लिए एक संदेशः
“हम अपने परिवार से प्रेम करते हुए क्या उसे प्रभु की ओर पुल बना रहे हैं, या प्रभु को भूलकर केवल जाल को मज़बूत कर रहे हैं?”
यहां तक हमने भगवान दत्तात्रेय के 24 में से 8 गुरुओं के बारे में जाना जिनसे उन्होंने जीवन का संदेश लिया। यह पोस्ट लंबी हो रही है। बहुत संक्षेप करने के लिए काट-छांट सही नहीं लगा। लेकिन रोचकता भी बनाए रखनी थी। इसलिए इस पोस्ट को तीन खंड में बांट रहे हैं।
अगले भाग में पढ़ें:
दत्तप्रभु को अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, मधु निकालने वाला, हिरन और मछली से ऐसी क्या शिक्षा मिली कि उन्हें अपना गुरु मान लिया –
पढ़िए भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु (भाग 2) में।
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुः अजगर से पिंगला वेश्या तक से मिली जीवन की शिक्षाएँ
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
धार्मिक अभियान प्रभु शरणम् के बारे में दो शब्दः
सनातन धर्म के गूढ़ रहस्य, हिंदूग्रथों की महिमा कथाओं ,उन कथाओं के पीछे के ज्ञान-विज्ञान से हर हिंदू को परिचित कराने के लिए प्रभु शरणम् मिशन कृतसंकल्प है. देव डराते नहीं. धर्म डरने की चीज नहीं हृदय से ग्रहण करने के लिए है. तकनीक से सहारे सनातन धर्म के ज्ञान के देश-विदेश के हर कोने में प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से प्रभु शरणम् मिशन की शुरुआत की गई थी. इससे देश-दुनिया के कई लाख लोग जुड़े और लाभ उठा रहे हैं. आप स्वयं परखकर देखें. आइए साथ-साथ चलें; प्रभु शरणम्!
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