वृकासुर को वरदानः इस शिवकथा में हैं जीवन के 10 अनमोल संदेश
वृकासुर की कथा: जब वरदान ही विनाश का कारण बन गया
आपने वृकासुर की कथा पहले कभी न कभी अवश्य पढ़ी होगी। लेकिन धार्मिक कथाएं केवल मनोरंजन के लिए नहीं होतीं। इनके भीतर जीवन को दिशा देने वाला ज्ञान छिपा रहता है।
वृकासुर की कथा हमें बताती है कि तपस्या से शक्ति तो प्राप्त की जा सकती है, लेकिन यदि बुद्धि शुद्ध न हो तो वही शक्ति विनाश का कारण बन जाती है। भगवान शिव की सरलता, भगवान विष्णु की सूझबूझ और वृकासुर के अहंकार से जुड़ी यह कथा आज के जीवन में भी बहुत उपयोगी संदेश देती है।
आइए जानते हैं कि कैसे एक वरदान पाने के बाद वृकासुर इतना अहंकारी हो गया कि वह अपने ही आराध्य भगवान शिव के विनाश पर उतारू हो गया।
नारदजी से वृकासुर का प्रश्न
एक बार देवर्षि नारद तीनों लोकों में भ्रमण कर रहे थे। इसी दौरान उनकी भेंट वृकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर से हुई।
वृकासुर ने नारदजी से पूछा:
“देवर्षि! ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनों में कौन-से देवता थोड़ी-सी तपस्या से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं?”
नारदजी ने कहा:
“वृकासुर, तुम त्रिदेवों में से किसी की भी आराधना करके अपना मनोरथ पूरा कर सकते हो। लेकिन भगवान शिव थोड़ी-सी साधना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। वे औघड़दानी हैं और अपने भक्त को शीघ्र वरदान दे देते हैं।”
नारदजी ने उसे यह भी बताया कि रावण और बाणासुर जैसे असुरों ने भगवान शिव की आराधना करके शक्तियां और वरदान प्राप्त किए थे।
वृकासुर ने यह सुना तो उसके मन में एक विचार आया—यदि भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं, तो क्यों न उनकी तपस्या करके कोई महान शक्ति प्राप्त की जाए?
लेकिन उसके मन में लोककल्याण या आध्यात्मिक उन्नति का विचार नहीं था। वह ऐसी शक्ति चाहता था, जिससे संसार उसके भय से कांप उठे।
वृकासुर की कठोर तपस्या
वृकासुर भगवान शिव की आराधना करने के लिए हिमालय के केदार क्षेत्र में चला गया। वहां उसने कठोर तपस्या शुरू की।
वह कई दिनों तक उपवास करता रहा और भगवान शिव का ध्यान करता रहा। जब उसकी तपस्या से भी भगवान शिव प्रकट नहीं हुए, तो उसने अपने शरीर का मांस काट-काटकर यज्ञाग्नि में अर्पित करना शुरू कर दिया।
वृकासुर का शरीर कमजोर होता गया, लेकिन उसकी जिद कम नहीं हुई। वह तपस्या को भक्ति नहीं, बल्कि भगवान से वरदान लेने का साधन मान रहा था।
अंततः एक दिन उसने अपना सिर काटकर भगवान शिव को अर्पित करने का निश्चय किया। जैसे ही उसने तलवार उठाई और अपने सिर पर प्रहार करने वाला था, भगवान शिव उसके सामने प्रकट हो गए।
भगवान शिव ने दिया वरदान
भगवान शिव ने वृकासुर से कहा:
“वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। तुम कोई भी वरदान मांग सकते हो।”
वृकासुर ने कहा:
“नारदजी ने कहा था कि आप शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन मैं इतने वर्षों से तपस्या कर रहा था, तब भी आप प्रकट नहीं हुए। जब मैं अपना जीवन समाप्त करने जा रहा था, तभी आप सामने आए।”
वह कुछ क्षण रुका और फिर बोला:
“इसका अर्थ है कि नारदजी ने मेरे साथ छल किया है। उन्हें दंड मिलना चाहिए। मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं जिस प्राणी के सिर पर हाथ रखूं, वह तुरंत भस्म हो जाए।”
वृकासुर की बात सुनकर भगवान शिव ने उसे समझाया:
“तुमने इतनी कठिन तपस्या की है। फिर अपने लिए किसी के अहित का वरदान क्यों मांगते हो? तुम अपने कल्याण, ज्ञान या शक्ति का वर मांग सकते हो। दूसरे का अनिष्ट चाहने से अच्छा है कि तुम अपने जीवन के लिए मंगलकारी वरदान मांगो।”
भगवान शिव ने उसे दोबारा सोचने का अवसर दिया।
वृकासुर ने शिवजी की बात क्यों नहीं मानी?
वृकासुर को लगा कि भगवान शिव उसे वरदान देना नहीं चाहते। उसे लगा कि महादेव किसी न किसी बहाने से उसे टाल रहे हैं।
वह क्रोधित होकर बोला:
“पहले नारदजी ने मुझे भ्रमित किया और अब आप भी मेरी इच्छा पूरी करने में आनाकानी कर रहे हैं। मुझे वही वरदान चाहिए जो मैंने मांगा है।”
भगवान शिव ने फिर उसे समझाया:
“वृक, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। जिस पर मैं प्रसन्न होता हूं, उसे अपने पुत्र के समान मानता हूं। इसलिए पिता की तरह तुम्हारे कल्याण की चिंता करना मेरा दायित्व है।”
शिवजी ने आगे कहा:
“मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छा का वरदान दे सकता हूं, लेकिन तुम्हारा तप नष्ट होता दिखाई दे रहा है। तुम किसी के अहित का विचार छोड़कर अपने लिए कल्याणकारी वरदान मांगो।”
लेकिन वृकासुर प्रतिशोध और अहंकार में डूबा हुआ था। उसने शिवजी की कोई बात नहीं मानी।
अंततः भगवान शिव ने कहा:
“तुम यही चाहते हो तो यही सही। तुम जिसके सिर पर हाथ रखोगे, वह भस्म हो जाएगा।”
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वरदान मिलते ही जागा अहंकार
वरदान मिलते ही वृकासुर के भीतर की आसुरी प्रवृत्ति और प्रबल हो गई। वह सोचने लगा कि कहीं भगवान शिव ने उसे झूठा वरदान तो नहीं दिया?
उसने भगवान शिव से कहा:
“प्रभु, आपने जो वरदान दिया है, वह सचमुच प्रभावी है या नहीं—इसे जांचना आवश्यक है। पहले मैं आपके सिर पर हाथ रखकर इसकी परीक्षा करूंगा।”
वृकासुर की बात सुनकर भगवान शिव समझ गए कि वह वरदान का दुरुपयोग करने वाला है। यदि वृकासुर ने उनके सिर पर हाथ रख दिया, तो वरदान के प्रभाव से स्वयं शिवजी के शरीर को संकट हो सकता था।
भगवान शिव वहां से तुरंत भागे और वृकासुर उनका पीछा करने लगा।
शिवजी के पीछे दौड़ा वृकासुर
वृकासुर को लग रहा था कि भगवान शिव वरदान की परीक्षा से डरकर भाग रहे हैं। वह और अधिक उत्साहित होकर उनके पीछे दौड़ने लगा।
शिवजी पृथ्वी से देवलोक तक गए। देवता, ऋषि और मुनि इस घटना को देखकर चिंतित हो उठे, लेकिन वृकासुर के हाथ में ऐसा वरदान था कि कोई भी उसके सामने जाने का साहस नहीं कर पा रहा था।
अंततः भगवान शिव भगवान विष्णु के लोक में पहुंचे और उन्हें पूरी घटना सुनाई।

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