श्री दुर्गा सप्तशती बारहवाँ अध्याय: देवी चरित्रों के पाठ का माहात्म्य
श्री दुर्गा सप्तशती बारहवाँ अध्याय: देवी चरित्रों के पाठ का फल एवं माहात्म्य (Durga Saptashati Adhyay 12)
श्री दुर्गा सप्तशती का बारहवाँ अध्याय (Durga Saptashati 12th Adhyay) माँ जगदम्बिका के तीनों पावन चरित्रों के पाठ एवं श्रवण के दिव्य फलों का वर्णन करता है। स्वयं भगवती चण्डिका ने देवताओं के समक्ष यह उद्घोष किया है कि जो भक्त एकाग्रचित्त होकर उनके इन स्तोत्रों और कथाओं का पठन या श्रवण करता है, उसके समस्त त्रिताप, दरिद्रता, भय और ग्रह-बाधाएं नष्ट हो जाती हैं।
आइए पढ़ते हैं दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय का सम्पूर्ण, विशद और प्रामाणिक हिन्दी पाठ। लेकिन उससे पहले जरूरी बात जिसका ध्यान आपको अवश्य रखना है. दुर्गा सप्तशती के पाठ की विधि का- नीचे इस लिंक से पहले पढ़ें
माँ भगवती द्वारा फलश्रुति एवं माहात्म्य का उद्घोष
माँ भगवती प्रसन्नचित्त होकर बोलीं—हे देवगण! जो पुरुष इन स्तोत्रों द्वारा एकाग्रचित्त होकर नित्य मेरी स्तुति करेगा, उसके सम्पूर्ण कष्टों, बाधाओं और संतापों को मैं निःसंदेह हर लूँगी।
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तीनों चरित्रों के श्रवण का फल: मधुकैटभ के संहार (प्रथम चरित्र), महिषासुर के वध (मध्यम चरित्र) तथा शुम्भ-निशुम्भ के मर्दन (उत्तर चरित्र) की जो मनुष्य भक्तिपूर्वक कथा कहेंगे अथवा सुनेंगे, उनके जीवन में कभी कोई पाप शेष नहीं रहेगा।
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विशेष तिथियों का महत्व: जो मनुष्य मेरे इस पावन माहात्म्य को अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी के पावन दिन एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक सुनेंगे:
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उन्हें पापों से उत्पन्न हुई कोई भी विपत्ति कभी पीड़ित नहीं कर सकेगी।
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उनके घर में कभी दरिद्रता का वास नहीं होगा।
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उन्हें अपने स्वजनों और प्रियजनों के वियोग (बिछोह) का दुःख नहीं सहना पड़ेगा।
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उन्हें शत्रु, अग्नि, चोर अथवा किसी भी प्रकार के हिंसक जीवों का भय नहीं रहेगा।
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इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को परम कल्याण की कामना से मेरे इस माहात्म्य को सदा स्वयं पढ़ना चाहिए और दूसरों को भी सुनाना चाहिए।
उपद्रव शान्ति, गृह-कल्याण एवं बाल-रक्षा
माँ भगवती आगे कहती हैं—मेरा यह माहात्म्य महामारी से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण उपद्रवों तथा आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—इन तीनों प्रकार के उत्पातों को शांत कर देता है।
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नित्य निवास: जिस घर, मंदिर अथवा पवित्र स्थान पर मेरा यह स्तोत्र विधिपूर्वक और नियम से पढ़ा जाता है, उस स्थान का मैं कभी भी त्याग नहीं करती। वहाँ मेरा सदा ही प्रत्यक्ष निवास रहता है।
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हवन-पूजन में फल: बलिदान, दैनिक पूजा, होम तथा बड़े-बड़े धार्मिक महोत्सवों में मेरे इस चरित्र का पाठ और श्रवण अनिवार्य रूप से करना चाहिए। ऐसा पूजन अथवा हवन मनुष्य चाहे विधि-विधान जानकर करे अथवा अज्ञानतावश बिना जाने करे, मैं उसे अत्यंत प्रेमपूर्वक तुरंत स्वीकार कर लेती हूँ।
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शारदीय नवरात्र महापूजा: शरद काल (आश्विन मास) में प्रतिवर्ष जो महापूजा (नवरात्र) की जाती है, उसमें जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्य का श्रवण करता है, वह सब विपत्तियों से सहज ही छूट जाता है तथा धन, धान्य, यश और पुत्रादि सुखों से सम्पन्न हो जाता है।
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शत्रु-नाश व दुःस्वप्न निवारण: मेरे इस माहात्म्य और कथाओं को सुनने से मनुष्य पूर्णतः निर्भय हो जाता है। श्रवण करने वाले के समस्त शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं, परम कल्याण की प्राप्ति होती है और उसका कुल आनंदित रहता है। भयानक दुःस्वप्न (बुरे सपने) तथा पारिवारिक व घरेलू कलह-क्लेश सब शांत हो जाते हैं।
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बालग्रह शान्ति व सौहार्द: बालग्रहों (नकारात्मक ऊर्जा व बुरी नजर) से ग्रसित बालकों के लिए मेरा यह माहात्म्य परम शांतिदायक सिद्ध होता है। जब कभी पारिवारिक जनों अथवा मित्रों में फूट पड़ जाए, तो यह माहात्म्य उनके बीच पुनः परस्पर प्रेम और प्रगाढ़ मित्रता स्थापित करवा देता है।
बाह्य पूजन की तुलना में माहात्म्य श्रवण का महत्व

माँ चण्डिका कहती हैं—मेरा यह माहात्म्य मनुष्यों को मेरी जैसी अलौकिक आत्मिक सामर्थ्य प्रदान करने वाला है।
कोई भक्त पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, दीप, गंध आदि नानाविध सामग्रियों द्वारा प्रतिदिन मेरा विधिपूर्वक पूजन करे;मविद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराए, नित्य हवन करे, प्रतिदिन जल-दुग्ध से अभिषेक करे, विविध प्रकार के नैवेद्यों का भोग लगाए और प्रतिवर्ष बड़े-बड़े दान करे; इन सब बाह्य क्रियाओं से मैं जितनी प्रसन्न होती हूँ, उतनी ही प्रसन्नता मुझे अपने भक्तों द्वारा इस पावन चरित्र के एकाग्रचित्त होकर श्रवण करने मात्र से हो जाती है।
यह माहात्म्य कानों से सुनते ही समस्त पापों को हर लेता है और जीव को आरोग्य (दीर्घायु व निरोगी काया) प्रदान करता है। मेरे प्राकट्य की कथाओं का कीर्तन दुष्ट निशाचरों और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है तथा संग्राम में दुष्ट शत्रुओं का दमन करता है। इसके निरंतर श्रवण से साधक को शत्रुओं का रंचमात्र भी भय नहीं रहता।
घोर संकटों और प्राणघातक परिस्थितियों से मुक्ति
माँ भगवती ने देवताओं से कहा—हे देवगण! तुमने जो मेरी स्तुति की है अथवा ब्रह्माजी ने जो मेरी स्तुति की है, वह मनुष्यों को परम कल्याणमयी और निर्मल बुद्धि प्रदान करने वाली है।
यदि कोई मनुष्य:
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निर्जन वन के सूने मार्ग में भटक गया हो, अथवा भीषण दावानल (जंगल की आग) से घिर गया हो;
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वन में डाकुओं-चोरों से घिर गया हो या क्रूर शत्रुओं द्वारा बंदी बना लिया गया हो;
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घने जंगलों में हिंसक सिंहों, व्याघ्रों अथवा मतवाले जंगली हाथियों द्वारा खदेड़ा जा रहा हो;
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किसी कुपित राजा के कोपभाजन बनकर मृत्युदंड के भय से त्रस्त हो;
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अथाह गहरे समुद्र में भयंकर तूफान के बीच डगमगाती नाव पर सवार हो;
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अथवा रणभूमि में तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों के बीच भयंकर युद्ध में फंसा हो;
वह किसी भी प्रकार की असह्य पीड़ा से पीड़ित हो अथवा घोर बाधाओं से व्याकुल हो रहा हो—मेरे इस चरित्र का केवल एक बार स्मरण करने मात्र से ही वह तत्काल समस्त संकटों से मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से हिंसक सिंह, व्याघ्र, सर्प, डाकू और शत्रु दूर ही भाग जाते हैं और उस मनुष्य के समीप फटकने का भी साहस नहीं करते।
भगवती का अंतर्धान और देवताओं का पुनः वैभव-प्राप्ति
महर्षि मेधा कहते हैं—प्रचंड पराक्रम और अमोघ शक्ति वाली भगवती चण्डिका इतना कहने के उपरांत समस्त देवताओं के देखते ही देखते वहीं अंतर्धान हो गईं।
उसके बाद सम्पूर्ण देवता अपने भयंकर शत्रुओं के मारे जाने पर भयमुक्त हो गए। वे पहले की तरह निर्विघ्न रूप से अपने-अपने यज्ञ-भागों का उपभोग करने लगे और उन्हें अपने खोए हुए स्वर्गीय अधिकार पुनः प्राप्त हो गए। युद्ध में देवी के हाथों शुम्भ और निशुम्भ के मारे जाने पर, जो शेष दैत्य बच गए थे, वे अपनी जान बचाकर पाताल लोक में भाग गए।
जगदम्बा के नित्य व विराट स्वरूप का रहस्य
महर्षि मेधा ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य को उपदेश देते हुए कहा—हे राजन्! इस प्रकार भगवती अम्बिका नित्य और अविनाशी होते हुए भी समय-समय पर पुनः प्रकट होकर इस जगत का पालन करती हैं। वे ही अपनी योगमाया से इस सृष्टि को मोहित करती हैं, वे ही इसे उत्पन्न करती हैं और भक्तों की प्रार्थना पर परम समृद्धि, रिद्धि-सिद्धि प्रदान करती हैं।
हे राजन्! महाप्रलय के समय वे ही भगवती संहारक ‘महामारी’ और ‘महाकाली’ का रूप धारण करती हैं। वे ही संपूर्ण ब्रह्मांड में चेतन और अचेतन रूप में ओतप्रोत होकर व्याप्त हैं।
स्वयं अजन्मा होती हुई भी वे संपूर्ण ब्रह्मांडीय सृष्टि के रूप में प्रकट होती हैं और जगत के समस्त जीवों का माता की भांति पालन-पोषण करती हैं।
मनुष्य के पुण्योदय और अभ्युदय के समय वही माँ भगवती घर में ‘महालक्ष्मी’ का रूप धारण करके सुख, वैभव और समृद्धि के रूप में स्थित हो जाती हैं; और जब मनुष्य के पाप बढ़ जाते हैं अथवा अभाव का समय आता है, तब वही ‘दरिद्रता’ (अलक्ष्मी) बनकर विनाश और पतन का कारण बन जाती हैं।
अतः हे राजन्! जो मनुष्य पुष्प, धूप, गंध, दीप और नैवेद्य आदि से श्रद्धापूर्वक उन जगज्जननी का पूजन करते हैं और उनकी स्तुति करते हैं, वे उन्हें विपुल धन-धान्य, उत्तम संतान, आरोग्य और धर्म-कर्म के पालन के लिए शुद्ध और कल्याणकारी बुद्धि प्रदान करती हैं।
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये फलस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः संपूर्णम् ॥
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