श्री दुर्गा सप्तशती दसवाँ अध्याय: शुम्भ वध
श्री दुर्गा सप्तशती दसवाँ अध्याय: शुम्भ वध कथा एवं सम्पूर्ण पाठ हिन्दी में (Durga Saptashati Adhyay 10)
श्री दुर्गा सप्तशती का दसवाँ अध्याय (Durga Saptashati 10th Adhyay) माँ भगवती की असीम शक्ति और अद्वैत स्वरूप का दर्शन कराता है। जब निशुम्भ और दैत्य सेना का अंत हो गया, तब अहंकार में डूबा हुआ शुम्भ देवी से युद्ध करने आया और पराजित होकर मोक्ष को प्राप्त हुआ। वह कथा नवम् अध्याय में आपने पढ़ी.
श्री दुर्गा सप्तशती नवम् अध्यायः निशुम्भ वध
आइए पढ़ते हैं दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय का सरल और प्रामाणिक हिन्दी पाठ।
शुम्भ का अहंकार और माँ का अद्वैत स्वरूप
महर्षि मेधा बोले—हे राजन्! अपने प्रिय भाई निशुम्भ को मरा हुआ और संपूर्ण सेना को नष्ट देखकर दैत्यराज शुम्भ प्रचंड क्रोध में भर गया। उसने अहंकार में भरकर देवी से कहा:
“रे दुष्ट दुर्गे! तू व्यर्थ ही अभिमान मत कर, क्योंकि तू दूसरों के बल पर युद्ध कर रही है।”
यह सुनकर भगवती जगदम्बिका ने मुस्कुराते हुए कहा:
“रे दुष्ट! देख, इस संसार में मैं अकेली ही हूँ। मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन है? ये समस्त देवियाँ और शक्तियाँ मेरी ही विभूतियाँ हैं। देख, ये सब की सब मुझ में ही समा रही हैं।”
इसके बाद ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी आदि समस्त मातृ-शक्तियाँ माँ भगवती के दिव्य शरीर में लीन हो गईं। अब केवल माँ अम्बिका अकेली ही रणभूमि में स्थित रह गईं। माँ ने शुम्भ से कहा:
“मैं अपनी ऐश्वर्य शक्ति से यहाँ अनेक रूपों में उपस्थित हुई थी। अब मैंने अपने उन समस्त रूपों को समेट लिया है। अब मैं अकेली खड़ी हूँ, तू भी अपने बल का प्रदर्शन कर और यहीं ठहर।”
देवी और शुम्भ का भयंकर महायुद्ध
महर्षि मेधा ने कहा—इसके उपरांत देवताओं और असुरों के देखते ही देखते माँ दुर्गा और शुम्भ के मध्य रोंगटे खड़े कर देने वाला भयंकर युद्ध प्रारंभ हो गया।
माँ अम्बिका ने सैकड़ों दिव्य अस्त्र-शस्त्र छोड़े, प्रत्युत्तर में शुम्भ ने भी भयानक बाणों और अस्त्रों की वर्षा शुरू कर दी।
शुम्भ ने जो-जो अस्त्र चलाए, माँ ने उन्हें अपनी एक तीव्र हुंकार मात्र से भस्म कर डाला।
जब दैत्य ने सैकड़ों तीक्ष्ण बाणों से माँ को आच्छादित करने का प्रयास किया, तो भगवती ने दिव्य बाण चलाकर शुम्भ का धनुष काट दिया।
धनुष कटने पर उसने शक्ति (सांग) चलाई, देवी ने उसे भी बीच में ही काट गिराया।
इसके बाद शुम्भ चमचमाती ढाल और तलवार लेकर माँ की ओर दौड़ा, किंतु माँ ने अपने बाणों से उसकी ढाल और तलवार के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
युद्ध में शुम्भ का रथ नष्ट हो गया, घोड़े और सारथी मारे गए। तब वह विशाल मुद्गर लेकर माँ पर झपटा। भगवती ने बाणों से उसके मुद्गर को भी काट डाला।
मल्लयुद्ध और आकाश में संग्राम
अस्त्र-शस्त्रहीन होने पर क्रोधोन्मत्त शुम्भ ने माँ की वक्षःस्थल पर बड़े वेग से मुष्टि-प्रहार (घूंसा) किया। देवी ने भी पलटकर उसकी छाती पर एक जोरदार थप्पड़ मारा। माँ के थप्पड़ के आघात से दैत्य पहले तो मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिरा, किंतु तुरंत संभलकर उठ खड़ा हुआ।
वह देवी को पकड़कर आकाश की ओर उछला और दोनों में आकाश में ही अद्भुत मल्लयुद्ध होने लगा। यह दिव्य संग्राम समस्त देवताओं और ऋषियों को विस्मय में डालने वाला था। माँ भगवती ने शुम्भ को आकाश में तेजी से घुमाकर पूरी शक्ति के साथ पृथ्वी पर पटक दिया।
त्रिशूल प्रहार से शुम्भ का वध और जगत का उद्धार
पृथ्वी पर गिरते ही वह दुष्ट दैत्य पुनः संभलकर माँ पर आक्रमण करने दौड़ा। माँ ने उसे अपनी ओर आते देख अपने तीक्ष्ण त्रिशूल से उसकी छाती विदीर्ण कर दी और उसे भूमि पर पटक दिया।
माँ के त्रिशूल के प्रहार से शुम्भ के प्राण-पखेरू उड़ गए। उसके गिरते ही समस्त पर्वत, द्वीप और सागर कांप उठे। दुष्ट शुम्भ के मारे जाने पर:
संपूर्ण त्रिलोकी भयमुक्त, स्वस्थ और प्रसन्न हो गई।
आकाश पूर्णतः निर्मल और स्वच्छ हो गया।
पूर्व में होने वाले उत्पातकारी मेघ, वज्रपात और उल्कापात शांत हो गए।
नदियाँ पुनः अपने स्वाभाविक और पवित्र मार्ग से बहने लगीं।
गंधर्व मधुर गान गाने लगे, अप्सराएं आनंद से नृत्य करने लगीं और दिशाओं में पवित्र सुगंधित वायु बहने लगी।
सूर्य की कांति स्वच्छ हो गई, यज्ञशालाओं में बुझी हुई अग्नि स्वतः प्रज्वलित हो उठी और चराचर जगत में शांति स्थापित हो गई।
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः संपूर्णम् ॥
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