नरक चतुर्दशी को क्यों कहते हैं रूप चतुर्दशी? आज विशेष स्नान से बढ़ता है रूप सौंदर्य

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कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को रूप चतुर्दशी या नरक चतुर्दशी कहा जाता है। 

रूप चतुर्दशी को बहुत ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। दीपावली से ठीक एक दिन पहले आने वाले इस पर्व का सनातन संस्कृति में विशेष आध्यात्मिक और आयुर्वेदिक महत्व है।

आइए, इस पावन अवसर पर जानते हैं उस पौराणिक कथा को, जिसके कारण इस तिथि का नाम ‘नरक चतुर्दशी’ और ‘रूप चतुर्दशी’ पड़ा। साथ ही जानते हैं रूप चतुर्दशी के स्नान और पूजा का सही विधान।

रूप चतुर्दशी की कथा
रूप चतुर्दशी की कथा

प्रागज्योतिषपुर के राजा नरकासुर का अत्याचार और आतंक

रूप चतुर्दशी की सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में प्रागज्योतिषपुर में नरकासुर नामक एक बलशाली और क्रूर राजा राज करता था, जिसे ‘भौमासुर’ भी कहा जाता था। यह भौमासुर वास्तव में पृथ्वी और भगवान नृसिंह की संतान था।

कथा मिलती है कि जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को अपने पाश में बांधकर रसातल में पहुँचा दिया था, तब पृथ्वी का उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण किया था। वराह भगवान से पृथ्वी ने अनुरोध किया था कि वे उनके साथ कुछ समय व्यतीत करें, जिसे भगवान ने स्वीकार किया।

उसी योग से पृथ्वी के गर्भ से वराह भगवान का अंश उत्पन्न हुआ, जिसका नाम नरकासुर रखा गया। जब लंका के राजा रावण का वध हुआ, उसके कुछ समय पश्चात उसी स्थान पर नरकासुर का प्रादुर्भाव हुआ जहाँ कभी माता सीता प्रकट हुई थीं। अपनी बाल्यावस्था में लगभग सोलह वर्ष की आयु तक मिथिला नरेश राजा जनक ने ही भौमासुर का लालन-पालन किया था।

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जब बाणासुर की संगति ने बदल दी नरकासुर की बुद्धि

कुछ समय बीतने के बाद पृथ्वी अपने पुत्र को अपने साथ ले गईं और भगवान श्रीविष्णु ने इसे प्रागज्योतिषपुर का राज्य सौंप दिया। नरकासुर आगे चलकर मथुरा के अत्याचारी राजा कंस का मित्र बन गया। विदर्भ की राजकुमारी माया से इसका विवाह हुआ और विवाह के अवसर पर भगवान विष्णु ने इसे एक अभेद रथ प्रदान किया था।

प्रारंभिक कुछ दिनों तक तो नरकासुर ने अपनी प्रजा का पालन ठीक प्रकार से किया, किंतु महादैत्य बाणासुर की संगति में पड़कर उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई और वह अत्यंत क्रूर व दुष्ट आचरण करने लगा। उसके पापी स्वभाव को देखकर महर्षि वसिष्ठ ने उसे शाप दे दिया कि उसका अंत स्वयं भगवान विष्णु के हाथों होगा।

नरकासुर ने अपने भारी तपोबल से जगत के रचयिता ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और ऐसा वरदान पा लिया कि देवता, असुर, गंधर्व या कोई भी राक्षस उसका वध नहीं कर सकेगा। उसने वरदान मांगते हुए यह शर्त रखी कि उसका वध केवल किसी स्त्री के हाथों ही संभव हो सके। इस वर के मद में चूर होकर नरकासुर ने हयग्रीव और सुंद जैसे कुख्यात असुरों की सहायता से देवराज इंद्र को भी पराजित कर दिया।

देवमाता अदिति के आभूषणों का अपहरण और अत्याचार की पराकाष्ठा

रूप चतुर्दशीः नरकासुर का अंत
रूप चतुर्दशीः नरकासुर का अंत

देवराज को हराने के बाद नरकासुर ने वरुणदेव का छत्र और देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल बलपूर्वक छीन लिए। वह तीनों लोकों पर अत्याचार करने लगा। अपनी शक्ति के अहंकार में उसने 16,100 देवपुत्रियों और मुनिपुत्रियों को बंदी बनाकर अपने रनिवास में कैद कर लिया।

जब इन सारे अत्याचारों की सूचना देवमाता अदिति—जो कि भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी सत्यभामा की संबंधी थीं—तक पहुँची, तो सत्यभामा अत्यधिक क्रोधित हो उठीं। उन्होंने भगवान श्रीहरि कृष्ण के समीप जाकर नरकासुर के इस पापी साम्राज्य को समाप्त करने की अनुमति मांगी।

भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा का प्रागज्योतिषपुर प्रस्थान

चूंकि नरकासुर को यह वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल किसी स्त्री के हाथों ही हो सकता है, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं सारथी बनने का निर्णय लिया और सत्यभामा को नरकासुर के विरुद्ध युद्ध करने का अवसर प्रदान किया।

सत्यभामा को अपने साथ लेकर भगवान श्रीकृष्ण गरुड़ पर सवार होकर प्रागज्योतिषपुर जा पहुँचे। नरकासुर का वह किला अत्यंत सुरक्षित और अभेद था, जिसे स्वयं मायावी मूर दैत्य ने तैयार किया था। उस नगर की रचना इस प्रकार की गई थी कि उसके चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पर्वत उसे दुर्ग की तरह घेरे हुए थे। पर्वतों के चारों तरफ अगाध जल की गहरी खाइयां थीं और उनके उपरांत आग की बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी की गई थीं।

उन दीवारों के भीतर मूर दैत्य ने दस हजार सुदृढ़ और घातक जाल बिछा रखे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रचंड गदा के प्रहार से उन विशाल पर्वतों को पलभर में चूर-चूर कर दिया और अपनी तलवार से मूर दैत्य द्वारा बिछाए गए सभी जालों को काटकर हवा में उड़ा दिया।

मूर दैत्य का वध और असुर सेना का संहार

अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ‘पांचजन्य शंख’ से एक ऐसा भयंकर और गूंजता हुआ नाद किया, जिसकी ध्वनि से असुर सेना के योद्धाओं के मस्तक फट गए। उस समय मूर दैत्य जल में विश्राम कर रहा था, शंखनाद की गूंज से उसकी नींद खुली।

मूर दैत्य के पांच मुख थे। उसने क्रोधित होकर गरुड़ जी पर अपना घातक त्रिशूल चला दिया, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाणों से हवा में ही नष्ट कर दिया। इसके पश्चात मूर बौखलाकर विशाल गदा लेकर भगवान की तरफ दौड़ा, किंतु भगवान ने अपनी गदा के एक ही वार से उसके प्राण पखेरू उड़ा दिए।

मूर दैत्य के मारे जाने के बाद उसके सातों पराक्रमी पुत्र युद्ध के मैदान में कूद पड़े। भगवान श्रीकृष्ण और उनके वाहन गरुड़ ने मिलकर कुछ ही पलों में उन सभी पुत्रों का उनकी संपूर्ण सेना समेत भीषण संहार कर दिया।

सत्यभामा के हाथों नरकासुर का अंत और उद्धार

अब रणभूमि में केवल भौमासुर यानी नरकासुर ही अकेला बचा था। उसने क्रुद्ध होकर भगवान श्रीकृष्ण पर वही अचूक शक्ति प्रयुक्त की, जिसके वार से कभी उसने देवराज इंद्र को भी अचेत कर दिया था।

वह महाशक्ति सीधे गरुड़ जी को जाकर लगी, जिससे गरुड़ जी मात्र थोड़े से विचलित हुए। इसके तुरंत बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उस पर प्रहार कर उसके समस्त अस्त्र-शस्त्र और माया को सदा के लिए समाप्त कर दिया। अंततः, ब्रह्माजी के वर और उनके वचनों का मान रखने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिया सत्यभामा के हाथों से उस पापी भौमासुर का वध करवा दिया।

नरकासुर के मारे जाने के बाद भयभीत पृथ्वी वहां प्रकट हुईं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से करबद्ध प्रार्थना की कि वे भौमासुर के पुत्र को अभयदान दें ताकि उसका वंश नष्ट न हो। भगवान ने पृथ्वी की इस प्रार्थना को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

देवपुत्रियों की मुक्ति और सम्मान की पुनर्वापसी

रूप चतुर्दशीः देवपुत्रियों का श्री कृष्ण ने किया उद्धार
रूप चतुर्दशी कथाः देवपुत्रियों का श्री कृष्ण ने किया उद्धार

भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर की कैद से वरुणदेव का छत्र, देवमाता अदिति के दिव्य कुंडल और उन 16,100 देवपुत्रियों तथा मुनिपुत्रियों को मुक्त कराया, जिन्हें नरकासुर ने बंदी बनाया था। उन सभी ने भगवान के चरणों में गिरकर विनती की कि वे उन्हें अपनी शरण में लें, क्योंकि इस समाज में उनका कोई अन्य आश्रय नहीं बचा है।

कारुणिक भगवान ने उन सभी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया और उनका खोया हुआ सम्मान उन्हें वापस लौटाया। साथ ही, उन्होंने देवमाता अदिति के वे बहुमूल्य कर्णफूल भी उन्हें आदरपूर्वक पुनः अर्पित किए, जिन्हें नरकासुर छीनकर ले गया था।

क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी? (स्नान और रूप-सौंदर्य की परंपरा)

विजय के प्रतीक स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण ने असुर नरकासुर के रक्त का तिलक अपने मस्तक पर लगाया था। इस भीषण युद्ध और रक्तपात के कारण भगवान के शरीर में असुर के शरीर की दुर्गन्ध समा गई थी।

जब भगवान चतुर्दशी की प्रातः बेला में अपने द्वार पर लौटे, तब उनकी पटरानियों ने उन्हें सुगंधित जल से स्नान करवाया और इत्र का छिड़काव किया, ताकि वह असहज गंध उनके शरीर से पूरी तरह दूर हो सके।

ऐसी सनातन मान्यता है कि इसी पौराणिक प्रसंग के स्मरणस्वरूप नरक चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल या सायंकाल में सुगंधित जल से स्नान करने की परंपरा का आरंभ हुआ। यही कारण है कि नरक चतुर्दशी के इस पवित्र दिन को रूप चतुर्दशी (Roop Chaturdashi) भी कहा जाता है।

रूप चतुर्दशी स्नान का महत्व और नियम

  • ब्रह्ममुहूर्त स्नान: रूप चतुर्दशी की प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व स्नान करने का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है。

  • दिव्य ऊर्जा का संचार: रूप चतुर्दशी को ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने से शरीर में दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा कई प्रकार के मौसमी रोगों से मुक्ति मिलती है。

  • उबटन का प्रयोग:  रूप चतुर्दशी के स्नान से पूर्व वरुण देवता का स्मरण करते हुए जल में हल्दी, चंदन या उबटन मिलाकर स्नान करना चाहिए।

  • रूप में निखार: मान्यता है कि रूप चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से स्नान कर भगवान श्रीकृष्ण का पूजन करने से समस्त पापों का नाश होता है और व्यक्ति के रूप-सौंदर्य में अद्भुत निखार आता है।


संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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