कार्तिक महात्म्य अध्याय 1: अक्षय पुण्यदायी है कार्तिक स्नान और कथा

कार्तिक महात्म्य अध्याय 1: अक्षय पुण्यदायी है कार्तिक स्नान और कथा

कार्तिक महात्म्य अध्याय 1ः कार्तिक स्नान का क्या महात्म्य है?

कार्तिक का पावन मास चल रहा है। सनातन संस्कृति में इस मास को अत्यंत पवित्र और मोक्षदायिनी माना गया है। कार्तिक मास में सुबह सूर्योदय से पूर्व स्नान, दान, तप और व्रत का बड़ा महत्व है। कार्तिक मास में स्नान-दान की विधियों के बारे में हम पहले ही विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। किंतु, कार्तिक व्रत और स्नान का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब इसके साथ प्रतिदिन नियमित रूप से ‘कार्तिक महात्म्य’ की कथा का श्रवण या पाठ किया जाए।

कार्तिक महात्म्य कुल पैंतीस (35) अध्यायों की एक अत्यंत पवित्र कथा है। आज हम इसी दिव्य श्रृंखला का आरंभ कर रहे हैं और इसे अगले कुछ दिनों में पूर्ण करेंगे। आइए, कार्तिक महात्म्य अध्याय 1 के साथ कथा का रसपान आरंभ करते हैं।

कार्तिक महात्म्य अध्याय 1ः कार्तिक महात्म्य का पहला अध्याय
कार्तिक महात्म्य अध्याय 1 कथा

कार्तिक महात्म्य अध्याय 1 के साथ इस शृंखला की शुरुआत से पहले एक जरूरी अपील है. कृपया इसे ध्यान से समझें और अपनाने के प्रयास करें.

एक छोटी-सी अपील

हमारी दादियां, नानियां कार्तिक स्नान किया करती थीं। आज उम्र और अशक्तता के कारण संभव है कि वे कार्तिक स्नान न कर पाती हों। ऐसे में आप उन्हें प्रतिदिन कार्तिक महात्म्य का कम से कम एक अध्याय पढ़कर सुनाएं। उन्हें बहुत प्रसन्नता होगी।

इससे उन्हें यह महसूस नहीं होगा कि वे शारीरिक रूप से कमजोर हो रही हैं, बल्कि उन्हें यह भरोसा मिलेगा कि उनकी संतानें आज भी उनके संस्कारों और अपनी परंपरा से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं।

आप स्वयं उन्हें पढ़कर सुनाएं या इससे भी अच्छा हो कि बच्चों की ड्यूटी लगा दें—रोज दादी-नानी को कथा सुनाने की। कहानियां सुनाने वाली दादी-नानी को बच्चे सुना रहे हों कहानी। कितना अद्भुत दृश्य होगा! आप भाग्यशाली हैं कि आपके पास यह अवसर है। इससे बच्चों में धार्मिक संस्कार बढ़ेंगे और बुजुर्गों के प्रति उनका लगाव भी गहरा होगा।

अगर साथ नहीं हैं तो फोन पर ही सही, उन्हें कथा सुनाएं। वीडियो कॉल करें। और यदि संभव हो तो बच्चों के कथा सुनाने का छोटा-सा वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करें और हमें भी भेजें। हम उसे आगे साझा करेंगे।

आइए, इस कार्तिक में हम सब मिलकर सनातन के इन सुंदर संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।

कार्तिक महात्म्य अध्याय 1

नैमिषारण्य तीर्थ में एकत्रित शौनक आदि अठ्ठारह हजार ऋषियों को संबोधित करते हुए श्रीसूतजी महाराज बोले— “हे मुनिगण! अब मैं आपसे कार्तिक मास के महात्म्य की अत्यंत श्रेष्ठ और पावन कथा कहता हूँ। इस कथा को जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा और नियम के साथ सुनता है, वह समस्त पापों व दुखों से मुक्त होकर अंत में बैकुंठ लोक को प्राप्त होता है।”

सूतजी आगे कहते हैं— एक बार देवर्षि नारदजी भगवान श्रीकृष्ण से आज्ञा लेकर स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान कर चुके थे। उनके जाने के बाद महारानी सत्यभामा अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में भगवान श्रीकृष्ण के पास आईं और बोलीं— “हे नाथ! मेरा आज का जीवन सफल हो गया। मेरे माता-पिता भी धन्य हो गए हैं, जिन्हें आपकी समस्त रानियों में यह सौभाग्य प्राप्त हुआ कि मैं आपको सबसे अधिक प्रिय हूँ।”

सत्यभामा ने आगे कहा— “मैंने पूर्व में वह कल्पवृक्ष आपके साथ देवर्षि नारदजी को विधिपूर्वक दान में दे दिया था, किंतु आपकी कृपा से वही कल्पवृक्ष आज भी मेरे प्रांगण और भवन में सदा लहराया करता है। हे स्वामी! अब आप मुझे वह परम विधि बतलाइए, जिसके प्रभाव से इस कल्प के समाप्त होने पर भी या भविष्य के जन्मों में भी मैं कभी आपसे विमुख न होऊँ और आपका अद्भुत प्रेम मुझे सदा प्राप्त होता रहे।”

भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा का संवाद

कार्तिक महात्म्य अध्याय 1
कार्तिक महात्म्य अध्याय 1

सत्यभामा के इस प्रेमपूर्ण और भक्तिभरे वचनों को सुनकर जगत के पालनहार भगवान श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराए। वे सत्यभामा की बांह पकड़कर उन्हें आदर सहित उसी कल्पवृक्ष के नीचे ले गए और बोले— “प्रिये! अपनी समस्त रानियों में तुम मुझे प्राणों के समान प्रिय हो। इस कल्पवृक्ष को सुरक्षित रखने और तुम्हारी इच्छा की पूर्ति के लिए तो मैं देवराज इंद्र से भी भीषण युद्ध करने को तैयार हो गया था, फिर क्या मैं तुम्हारे इन पवित्र प्रश्नों का उत्तर नहीं दूँगा?”

सूतजी ऋषियों से कहते हैं— “हे मुनियों! यह वही प्रसंग है जब भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामाजी को अपने वाहन गरुड़ पर बैठाकर स्वर्गलोक से पारिजात (कल्पवृक्ष) मांगने गए थे और जब इंद्र ने उसे देने से मना कर दिया, तब गरुड़ और देवताओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ था।”

सत्यभामा ने हाथ जोड़कर भगवान से फिर पूछा— “हे प्रभु! कृपया मेरे पूर्वजन्म के बारे में भी प्रकाश डालिए। पूर्वजन्म में मेरा स्वभाव कैसा था? मैं किसकी पुत्री थी? मैंने जीवन में कौन से ऐसे दान, व्रत या तप नहीं किए थे, जिसके कारण मुझे मृत्युलोक (पृथ्वी) पर साधारण मनुष्य के रूप में जन्म लेना पड़ा? और फिर मैंने कौन से ऐसे पुण्यकर्म किए, जिससे मैं आपकी पटरानी (अर्द्धांगिनी) बनी और आप गरुड़ पर सवार होकर मेरे साथ इस संसार में विचरते हैं?”

पूर्वजन्म की कथा: देवशर्मा और गुणवती

सत्यभामा के बार-बार आग्रह करने पर अंततः भगवान श्रीकृष्ण बोले— “हे कांते! यदि तुम्हें अपना पूर्वजन्म जानने की तीव्र इच्छा है, तो मैं तुम्हारी यह मनोकामना अवश्य पूरी करता हूँ। यह सत्ययुग के अंत की बात है।”

“मायापुरी नामक पवित्र नगरी में अत्रि गोत्र में उत्पन्न होने वाले, वेदों और यज्ञ-कर्मों के मर्मज्ञ ‘देवशर्मा’ नामक एक अत्यंत धर्मात्मा ब्राह्मण निवास करते थे। वे प्रतिदिन नियमित रूप से अतिथि सेवा, अग्निहोत्र (हवन) और भगवान सूर्य की उपासना किया करते थे। अपनी इस नित्यचर्या के कारण वे सूर्य के समान तेजस्वी हो गया थे।”

“वृद्धावस्था में उस ब्राह्मण को एक गुणवती कन्या रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम ‘गुणवती’ रखा गया। समय आने पर देवशर्मा ने अपनी उसी कन्या का विवाह ‘चंद्र’ नामक अपने ही एक योग्य शिष्य के साथ कर दिया और उसे अपने पुत्र की भाँति ही अपने पास आश्रय दिया।”

ब्राह्मण दम्पति का लोकान्तर गमन

भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं— “एक दिन वे दोनों (पति-पत्नी) पवित्र कुशा घास और यज्ञ के लिए समिधा (लकड़ियाँ) एकत्र करने के उद्देश्य से हिमालय की तलहटी में गए। दुर्भाग्यवश, मार्ग में उन्हें एक भयंकर राक्षस अपनी ओर आता हुआ दिखाई दिया।”

“उस भयानक राक्षस को सामने देखकर दोनों का शरीर भय से कांप उठा, उनके प्राण सूख गए और वे अपनी रक्षा के लिए कोई भी उपाय करने में असमर्थ हो गए। अंततः उस क्रूर राक्षस ने उन दोनों की वहीं हत्या कर दी।”

“यद्यपि उनकी मृत्यु इस प्रकार हुई, किंतु वे दोनों जीवनभर अत्यंत धर्मात्मा और सात्विक रहे थे। उन्होंने आजीवन भगवान सूर्य की नियमित पूजा की थी, जिससे मैं उन पर अत्यंत प्रसन्न था। यही कारण है कि उनकी मृत्यु के पश्चात उन्हें साधारण यमलोक नहीं ले जाया गया, बल्कि मेरे अपने विशेष पार्षद उन्हें लेने आए और उन्हें अपने साथ बैकुंठ लोक ले गए।”

“वे दोनों दिव्य विमान पर आसीन होकर बैकुंठ पधारे और वहाँ मेरी सन्निधि में दिव्य भोगों का आनंद प्राप्त करने लगे।”

(कार्तिक महात्म्य अध्याय 1 संपन्न)

(कथा जारी रहेगी… अगले अंक में पढ़ें दूसरा अध्याय)


संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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