श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्यायः धूम्रलोचन वध

श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्यायः धूम्रलोचन वध

श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्याय: धूम्रलोचन वध

श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्याय (Shri Durga Saptashati Adhyay 6) भगवती जगदंबा के अलौकिक पराक्रम और तेज का अनुपम वर्णन करता है। पांचवें अध्याय में जब सुग्रीव नामक दूत देवी भगवती से अपमानित होकर लौटा, तब असुरराज शुम्भ अत्यंत कुपित हुआ। इस छठे अध्याय में दैत्य धूम्रलोचन के अहंकार, देवी की हुंकार मात्र से उसके भस्म होने और भगवती के पराक्रमी सिंह द्वारा साठ हजार राक्षसों की सेना के संहार का सजीव चित्रण मिलता है।

आप दुर्गा सप्तशती के सभी 13 अध्यायों का पाठ प्रभु शरणं पर कर सकते हैं। 13 अध्यायों का लिंक पोस्ट के अंत में दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात जिसका आपको ध्यान रखना है कि इंटरनेट पर दिए गए दुर्गा सप्तशती के अध्यायों को प्रयोग मां दुर्गा की साधना के दौरान न करें.

नवरात्रि में मां दुर्गा की साधना से पहले पुस्तक रूप में विराजने वाली जगदंबा का आह्वान करना पड़ता है. उसकी एक छोटी सी और बहुत सरल विधि है. सारी विधि आपको इस लाइन के नीचे दिए गए पोस्ट से मिल जाएगी. आप दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व वह पोस्ट जरूर पढ़ लें.

इंटरनेट की पोस्ट का प्रयोग जानकारियों के लिए करें और यह उनके लिए है जिनके पास पुस्तक उपलब्ध नहीं है. जिनके पास पुस्तक उपलब्ध नहीं है लेकिन वे मां दुर्गा की उपासना में दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहते हैं वे भी इसका प्रिंट ले लें लेकिन पूजन पुस्तक से ही होना चाहिए. मोबाइल या लैपटॉप से नहीं.

दुर्गा सप्तशती के पाठ की विधि का- नीचे इस लिंक से पहले पढ़ें

दुर्गा सप्तशती की पोस्ट आप पढ़ रहे हैं तो आपको इसके पाठ की विधि भी जरूर पता होनी चाहिए. इसे अवश्य पढ़ें

आइए, श्रद्धापूर्वक श्री दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय का हिंदी में पाठ करें।


।। श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्याय ।।

असुरराज शुम्भ का क्रोध और धूम्रलोचन को आदेश

महर्षि मेधा ने कहा— हे राजन! देवी के वचनों को सुनकर सुग्रीव नामक दूत अत्यंत क्रोध में भरकर असुरराज शुम्भ के पास पहुँचा और उसने वहाँ का सारा वृतांत विस्तार से कह सुनाया।

दूत की बात सुनते ही दैत्यराज शुम्भ के क्रोध का कोई पारावार न रहा। उसने तुरंत अपने महाबली सेनापति धूम्रलोचन को बुलाकर आज्ञा दी— “धूम्रलोचन! तुम तुरंत अपनी विशाल सेना साथ लो और उस उद्दंड स्त्री के केश पकड़कर उसे घसीटते हुए मेरे समक्ष उपस्थित करो। यदि उसकी रक्षा के लिए कोई भी सामने आए—चाहे वह देवता हो, यक्ष हो या गंधर्व, तो उसे अविलंब यमलोक पहुँचा देना।”

धूम्रलोचन का देवी पर आक्रमण और हुंकार से वध

श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्याय - धूम्रलोचन वध और असुर सेना संहार
श्री दुर्गा सप्तशती छठा अध्याय – धूम्रलोचन वध और असुर सेना संहार

महर्षि मेधा आगे बोले— शुम्भ की ऐसी आज्ञा पाकर दैत्य सेनापति धूम्रलोचन साठ हजार भयानक राक्षसों की चतुरंगिणी सेना लेकर तुरंत उस पर्वत पर जा पहुँचा। वहाँ जगदंबा को शांत और तेजोमय रूप में विराजमान देखकर वह अहंकार से भरकर ललकारा—

“अरी नारी! तू अभी चुपचाप मेरे साथ महाप्रतापी शुम्भ और निशुम्भ के पास चल! यदि तू स्वेच्छा से प्रसन्न होकर नहीं चलेगी, तो मैं बलपूर्वक तेरे केश पकड़कर तुझे घसीटता हुआ ले जाऊँगा।”

भगवती अम्बिका ने मंद मुस्कान के साथ कहा— “दैत्यराज का भेजा हुआ तेरे जैसा महाबलवान सेनापति यदि मुझे बलपूर्वक पकड़कर ले जाएगा, तो ऐसी दशा में मैं दुर्बल नारी तेरा क्या कर सकती हूँ?”

देवी के ऐसा कहते ही घमंडी धूम्रलोचन अत्यंत वेग से उनकी ओर झपटा। किंतु जैसे ही वह निकट आया, जगदंबा ने केवल एक प्रचंड ‘हुंकार’ भरी। उस दिव्य हुंकार के प्रचंड तेज और अग्नि से वह महादैत्य धूम्रलोचन क्षणमात्र में जलकर भस्म का ढेर हो गया।

देवी के वाहन सिंह का पराक्रम और असुर सेना का संहार

अपने सेनापति को भस्म होते देख बची हुई साठ हजार असुर सेना क्रोध से उन्मत्त होकर अस्त्र-शस्त्र लहराते हुए देवी की ओर दौड़ी। तब भगवती अम्बिका ने अपने धनुष की टंकार करते हुए उन पर तीखे बाणों, शूलों और फरसों की भयंकर वर्षा आरंभ कर दी।

उसी क्षण देवी का वाहन महापराक्रमी सिंह अपनी गर्दन के अयालों (बालों) को झटकता हुआ और दिशाओं को कंपित करने वाली भीषण गर्जना करता हुआ असुरों के दल में कूद पड़ा। उस दिव्य सिंह का पराक्रम देखते ही बनता था—

  • उसने अनगिनत असुरों को अपने तीक्ष्ण पंजों के एक ही वार से चीर डाला।

  • कई राक्षसों को अपने विशाल जबड़ों में दबाकर चबा डाला और कई को भूमि पर पटककर अपनी दाढ़ों से समाप्त कर दिया।

  • सिंह ने अपने नखों से कितनों के पेट फाड़ डाले और केवल अपने थप्पड़ के प्रचंड आघात से अनेकों के सिर धड़ से अलग कर दिए।

  • उसने राक्षसों की भुजाएं और मस्तक तोड़ डाले तथा असुरों का संहार करते हुए उनका रक्त पान कर डाला।

भगवती अम्बिका के उस महाबली सिंह ने पलक झपकते ही साठ हजार की पूरी असुर सेना को यमपुरी पहुँचा दिया।

शुम्भ का भय, क्रोध और चण्ड-मुण्ड को प्रस्थान की आज्ञा

जब असुरेन्द्र शुम्भ ने यह समाचार सुना कि अकेली देवी ने उसके सेनापति धूम्रलोचन को हुंकार मात्र से भस्म कर दिया है और उनके अकेले सिंह ने पूरी सेना को धूल चटा दी है, तो वह भय और भयंकर क्रोध से कांप उठा। क्रोध के मारे उसके ओंठ फड़कने लगे।

उसने तत्काल अपने दो प्रमुख महारथियों—चण्ड और मुण्ड को पुकारा और आदेश दिया—

“हे चण्ड! हे मुण्ड! तुम दोनों एक महाविशाल चतुरंगिणी सेना लेकर तुरंत उस पर्वत पर जाओ। उस दुष्टा के बाल पकड़कर उसे बाँधो और यहाँ खींच लाओ। यदि वह युद्ध करे और उसे जीवित लाने में संदेह हो, तो अपनी पूरी शक्ति से प्रहार करके उसे वहीं मार डालना। जब वह स्त्री और उसका सिंह दोनों मारे जाएं, तब भी उनके शवों को बाँधकर मेरे सम्मुख प्रस्तुत करना।”

।। इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णि मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में ‘धूम्रलोचन-वध’ नामक छठा अध्याय संपूर्ण हुआ ।।


छठे अध्याय का आध्यात्मिक महत्व

दुर्गा सप्तशती का छठा अध्याय हमें यह संदेश देता है कि अहंकार, कुविचार और तामसिक प्रवृत्तियाँ (धूम्रलोचन) जब ईश्वरीय सत्य के सामने आती हैं, तो वे एक क्षण भी नहीं टिक सकतीं। भगवती की हुंकार का अर्थ है आंतरिक आत्मबल और चैतन्य शक्ति, जिसके जागृत होते ही समस्त नकारात्मक शक्तियां स्वतः भस्म हो जाती हैं।

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