श्री दुर्गा सप्तशती नौवां अध्याय: निशुम्भ वध

श्री दुर्गा सप्तशती नौवां अध्याय: निशुम्भ वध

श्री दुर्गा सप्तशती नौवां अध्याय: निशुम्भ वध

श्री दुर्गा सप्तशती नौवां अध्याय (Shri Durga Saptashati Adhyay 9) भगवती जगदम्बा और दैत्यराज शुम्भ-निशुम्भ के मध्य हुए महासंग्राम का अत्यंत रोमांचक प्रसंग है। आठवें अध्याय में रक्तबीज के संहार के पश्चात दोनों असुर बंधु प्रतिशोध की अग्नि में जल उठे।

श्री दुर्गा सप्तशती आठवां अध्याय

इस नौवें अध्याय में दैत्य निशुम्भ के भीषण आक्रमण, शुम्भ के साथ घोर अस्त्र-युद्ध और अंततः भगवती चण्डिका द्वारा निशुम्भ के वक्षस्थल को विदीर्ण कर उसका वध करने की पावन कथा वर्णित है।

आइए, श्रद्धापूर्वक श्री दुर्गा सप्तशती के नौवें अध्याय का हिंदी में पाठ करें:

।।ऊँ नमश्चण्डकायै ।।

राजा सुरथ की जिज्ञासा और असुरों का महाआक्रमण

राजा सुरथ ने कहा— हे मुनिश्रेष्ठ! आपने रक्तबीज के संहार की अत्यंत अद्भुत कथा सुनाई। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि रक्तबीज की मृत्यु के पश्चात क्रोध में भरे हुए शुम्भ और निशुम्भ ने रणभूमि में क्या किया?

महर्षि मेधा ने कहा— हे राजन्! रक्तबीज के मारे जाने और अपनी विशाल सेना का सर्वनाश देखकर शुम्भ और निशुम्भ के क्रोध की सीमा न रही। प्रतिशोध से जलता हुआ निशुम्भ अपनी बची हुई प्रधान सेना और बड़े-बड़े असुर सेनापतियों को साथ लेकर देवी पर आक्रमण करने दौड़ा। उसके पीछे-पीछे महापराक्रमी शुम्भ भी भारी सेना सहित चण्डिका को मारने के लिए आगे बढ़ा।

दोनों दैत्य बंधुओं ने मेघों की तरह मूसलाधार बाणों की वर्षा आरंभ कर दी। भगवती चण्डिका ने लीलापूर्वक अपने बाणों से उनके समस्त तीरों को काट डाला और दिव्य अस्त्रों की बौछार कर दोनों को गहरी चोट पहुँचाई।

निशुम्भ के अस्त्रों का खंडन

श्री दुर्गा सप्तशती नौवां अध्यायः निशुम्भ वध
श्री दुर्गा सप्तशती नौवां अध्यायः निशुम्भ वध

निशुम्भ ने क्रोध में आकर तीक्ष्ण खड्ग और चमकती ढाल उठाई और देवी के वाहन सिंह पर आक्रमण किया। अपने वाहन को आहत देख देवी ने तुरंत ‘क्षुरप्र’ नामक बाण चलाकर निशुम्भ की तलवार और ढाल दोनों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।

शस्त्रहीन होते ही निशुम्भ ने प्रचंड शक्ति (बरछी) का प्रहार किया, जिसे देवी ने सुदर्शन चक्र से दो फाड़ कर दिया। दैत्य ने क्रोध से जलते हुए त्रिशूल फेंका, तो भगवती ने एक मुक्के के प्रहार से उसे चूर-चूर कर डाला। इसके बाद जब वह गदा लेकर झपटा, तो देवी ने अपने त्रिशूल से उसकी गदा को भस्म कर दिया। अंत में जब निशुम्भ फरसा लेकर दौड़ा, तो देवी ने अपने तीखे बाणों की वर्षा से उसे धराशायी कर अचेत कर दिया।

शुम्भ का रण में प्रवेश और देवी का प्रचंड शंखनाद

अपने भाई निशुम्भ को भूमि पर अचेत पड़ा देख शुम्भ क्रोध से पागल हो उठा। वह रथ पर सवार होकर आकाश को अपनी आठ विशाल भुजाओं और आयुधों से आच्छादित करता हुआ देवी की ओर बढ़ा।

शुम्भ को आता देख भगवती ने अपना दिव्य शंख बजाया और धनुष की ऐसी भयानक टंकार की जिससे दिशाएं कांप उठीं। साथ ही देवी के घंटे की गूंज ने दैत्यों के तेज को क्षीण कर दिया।

देवी के सिंह ने ऐसी भीषण दहाड़ लगाई जिससे बड़े-बड़े वीरों का मानमर्दन हो गया।

मां काली ने आकाश में उछलकर अपने हाथों और दाढ़ों को धरती पर पटका, जिससे गगनभेदी ध्वनि उत्पन्न हुई।

शिवदूती ने असुरों का कलेजा दहला देने वाला भयानक अट्टहास किया, जिससे दैत्य भय से कांप उठे।

तब भगवती अम्बिका ने ललकारते हुए कहा— “अरे दुष्ट! खड़ा रह! खड़ा रह!” देवी के इन शब्दों को सुनकर आकाश से देवता ‘जय हो! जय हो!’ का उद्घोष करने लगे।

शुम्भ और मां दुर्गा में घोर संग्राम

शुम्भ ने ज्वालाओं से युक्त एक भयंकर शक्ति देवी पर छोड़ी, जिसे भगवती ने ‘महोल्का’ नामक शक्ति से मार्ग में ही नष्ट कर दिया। इसके पश्चात शुम्भ ने भयानक सिंहनाद किया और देवी पर सहस्रों बाण बरसाए। भगवती चण्डिका ने अपने बाणों से उसके सभी बाणों को काट डाला।

देवी ने क्रोध में भरकर शुम्भ पर त्रिशूल से प्रहार किया, जिससे वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। कुछ देर बाद होश में आने पर उसने दस हजार भुजाएं धारण कर लीं और चक्र आदि अस्त्रों से देवी को घेरने का प्रयास किया, किंतु जगदम्बा ने अपने अचूक बाणों से उसके सभी चक्रों को छिन्न-भिन्न कर दिया।

निशुम्भ का वध और असुरों का संहार

उसी समय निशुम्भ की मूर्छा टूटी और वह पुनः गदा लेकर चण्डिका की ओर लपका। देवी ने तीक्ष्ण खड्ग से उसकी गदा काट डाली। तब निशुम्भ ने हाथ में त्रिशूल ले लिया। उसे त्रिशूल ताने आते देख भगवती चण्डिका ने अपने शूल से उसकी छाती पर ऐसा भीषण प्रहार किया कि उसका वक्षस्थल विदीर्ण हो गया।

छाती के विदीर्ण होते ही उसके शरीर से उसी के समान एक और महापराक्रमी दैत्य “ठहर जा! ठहर जा!” चिल्लाता हुआ बाहर निकला। उस निकलते हुए दैत्य को देखकर देवी ने भीषण अट्टहास किया और उसके निकलने से पहले ही खड्ग के एक ही वार से उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। सिर कटते ही वह भूमि पर निष्प्राण होकर गिर पड़ा।

निशुम्भ के गिरते ही—

देवी का सिंह दहाड़-दहाड़ कर असुरों का भक्षण करने लगा।

मां काली और शिवदूती राक्षसों का रक्त पान करने लगीं।

कौमारी की शक्ति से अनगिनत दैत्य नष्ट हुए और ब्रह्माणी के कमण्डलु-जल से कितनों के प्राण पखेरू उड़ गए।

माहेश्वरी के त्रिशूल, वाराही की थूथन, वैष्णवी के सुदर्शन चक्र और ऐन्द्री के वज्र प्रहार से दैत्य सेना पूरी तरह नष्ट हो गई।

बचे हुए असुर भयभीत होकर रणभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए।

।। इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णि मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में ‘निशुम्भ-वध’ नामक नौवां अध्याय संपूर्ण हुआ ।।

नौवें अध्याय का आध्यात्मिक महत्व

दुर्गा सप्तशती का नौवां अध्याय आंतरिक विकारों में ‘ममता’ और ‘अहंकार’ के नाश का प्रतीक है। निशुम्भ की छाती से दूसरे दैत्य का निकलना यह दर्शाता है कि वासनाएं ऊपर से समाप्त दिखने पर भी भीतर सूक्ष्म रूप में छिपी रहती हैं। भगवती का ज्ञानरूपी खड्ग ही उन सूक्ष्म विकारों का समूल नाश करने में सक्षम है।

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