श्री दुर्गा सप्तशती आठवां अध्याय: रक्तबीज वध
श्री दुर्गा सप्तशती आठवां अध्याय: रक्तबीज वध
श्री दुर्गा सप्तशती आठवां अध्याय (Shri Durga Saptashati Adhyay 8) भगवती जगदम्बा, सप्तमातृकाओं और मां काली (चामुण्डा) के अलौकिक पराक्रम का सबसे रोमांचक प्रसंग है। जब सातवें अध्याय में चण्ड और मुण्ड का संहार हुआ, तब असुरराज शुम्भ ने अपनी समस्त सेना झोंक दी। इस आठवें अध्याय में देव शक्तियों (मातृकाओं) का प्राकट्य, शिवदूती का संदेश, और रक्तबीज के प्रत्येक रक्त-बिंदु से नए दैत्यों की उत्पत्ति तथा अंततः मां चामुण्डा द्वारा रक्तपान कर रक्तबीज के वध का विस्तार से वर्णन है।
श्री दुर्गा सप्तशती सातवां अध्याय
आइए, श्रद्धापूर्वक श्री दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय का हिंदी में पाठ करें:
।। ॐ नमश्चण्डिकायै ।।
शुम्भ की विशाल सेना का कूच और रणभेरी
महर्षि मेधा ने कहा— हे राजन! चण्ड और मुण्ड नामक महादैत्यों के मारे जाने और बहुत बड़ी सेना के नष्ट हो जाने पर असुरों के अधिपति प्रतापी शुम्भ के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने अपनी संपूर्ण सेना को युद्ध के लिए सुसज्जित होने की आज्ञा दी।
शुम्भ ने आदेश दिया— “अब उदायुध नामक छियासी सेनापति अपनी सेनाओं सहित प्रस्थान करें, कम्बू नाम के चौरासी सेनापति युद्ध के लिए बढ़ें, कोटिवीर्य वंश के पचास सेनापति और धौम्रकुल के सौ सेनापति कूच करें। कालक, दौहृद, मौर्य और कालकेय दैत्य भी युद्ध के लिए निकलें।”
भयानक शासन करने वाला असुरराज शुम्भ स्वयं एक महाविशाल चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धभूमि की ओर बढ़ा। उसकी विशाल सेना को अपनी ओर आते देख भगवती चण्डिका ने अपने धनुष की ऐसी भीषण टंकार की, जिससे पृथ्वी और आकाश का मध्य भाग गूँज उठा।
इसके पश्चात देवी के वाहन सिंह ने प्रचंड गर्जना की और अम्बिका के घंटे के नाद ने उस ध्वनि को और अधिक भयानक बना दिया। धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और घंटे की गूंज से दिशाएं दहल उठीं और देवी ने अपना मुख और भी विकराल कर लिया। इस भयंकर नाद को सुनकर असुर सेना ने देवी और उनके सिंह को चारों ओर से घेर लिया।

मातृकाओं (ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी आदि) का प्राकट्य
महर्षि मेधा बोले— हे राजन्! उसी समय दैत्यों के विनाश और देवताओं के कल्याण के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवताओं के शरीरों से उनकी परम पराक्रमी शक्तियां निकलकर उसी दिव्य रूप में चण्डिका देवी के पास आईं। जिस देवता का जैसा रूप, आभूषण और वाहन था, वैसी ही शक्ति उनके शरीर से प्रकट होकर रणभूमि में उपस्थित हुई:
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ब्रह्माणी: हंसयुक्त विमान पर बैठकर, रुद्राक्ष की माला और कमण्डलु धारण किए ब्रह्माजी की शक्ति आईं।
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माहेश्वरी: वृषभ (बैल) पर सवार होकर, हाथ में त्रिशूल लिए, महानाग का कंकण पहने और मस्तक पर चन्द्रकला धारण किए भगवान शिव की शक्ति आईं।
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कौमारी: मोर पर आरूढ़ होकर, हाथ में शक्ति (भाला) लिए स्वामी कार्तिकेय का रूप धरकर उनकी शक्ति आईं।
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वैष्णवी: गरुड़ पर विराजमान होकर शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष तथा खड्ग लिए भगवान विष्णु की शक्ति आईं।
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वाराही: भगवान श्रीहरि के यज्ञ-वराह का रूप धारण करके वाराही शक्ति प्रकट हुईं।
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नारसिंही: नृसिंह भगवान के समान रूप धारण करके नारसिंही शक्ति आईं, जिनकी गर्दन के झटकों से आकाश के तारे बिखर रहे थे।
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ऐन्द्री: देवराज इन्द्र की शक्ति ऐन्द्री ऐरावत हाथी पर सवार होकर वज्र हाथ में लिए उपस्थित हुईं।
इन समस्त देव-शक्तियों से घिरे भगवान शंकर ने चण्डिका से कहा— “हे देवी! मेरी प्रसन्नता के लिए तुम शीघ्र ही इन असुरों का संहार करो।”
शिवदूती का प्राकट्य और भगवान शिव को दूत बनाकर भेजना
इसके पश्चात देवी के शरीर से अत्यंत उग्र रूप वाली और सैकड़ों गीदड़ियों के समान चीत्कार करने वाली प्रचंड ‘चण्डिका शक्ति’ प्रकट हुई। उस अपराजिता देवी ने जटाधारी भगवान शिव से कहा— “हे प्रभो! आप मेरी ओर से दूत बनकर शुम्भ और निशुम्भ के पास जाइए। उन गर्वीले दैत्यों से कहिए कि यदि जीवित रहना चाहते हो तो त्रिलोकी का राज्य इन्द्र को सौंप दो, देवताओं को उनका यज्ञभाग मिलना आरंभ हो जाए और तुम पाताल लौट जाओ। यदि बल के अभिमान से युद्ध ही चाहते हो, तो रणभूमि में आओ; तुम्हारे मांस से मेरी योगिनियां तृप्त होंगी।”
क्योंकि भगवती ने स्वयं भगवान शिव को दूत बनाकर भेजा था, इसलिए वे संसार में ‘शिवदूती’ के नाम से विख्यात हुईं।
रणभूमि में मातृकाओं का भयंकर पराक्रम
भगवान शिव के मुख से देवी का यह संदेश सुनकर दैत्यों का क्रोध भड़क उठा। वे तुरंत उस स्थान पर पहुंचे जहाँ देवी विराजमान थीं और पहुँचते ही बाणों, शक्तियों और फरसों की वर्षा करने लगे। देवी ने अपने बाणों से उनके समस्त अस्त्र-शस्त्र काट डाले।
मां काली आगे खड़ी होकर शत्रुओं को त्रिशूल से विदीर्ण करने और खट्वांग से कुचलने लगीं। ब्रह्माणी जिस ओर दौड़तीं, कमण्डलु का अभिमंत्रित जल छिड़ककर असुरों के तेज और बल को नष्ट कर देतीं। माहेश्वरी त्रिशूल से, वैष्णवी सुदर्शन चक्र से और कौमारी अपनी शक्ति से असुरों का संहार करने लगीं। ऐन्द्री के वज्र प्रहार से सैकड़ों दैत्य रक्त की नदियां बहाते हुए भूमि पर गिर पड़े।
वाराही ने अपने थूथन और दाढ़ों से अनगिनत राक्षसों की छाती चीर डाली और चक्र से कितनों को काट गिराया। नारसिंही अपने नखों से बड़े-बड़े दैत्यों को विदीर्ण कर भक्षण करने लगीं और उनकी गर्जना से रणभूमि कांप उठी। शिवदूती के प्रचंड अट्टहास से दैत्य भयभीत होकर पृथ्वी पर गिरते और वे उन्हें तत्काल भक्षण कर जातीं।
रक्तबीज का प्रवेश और नए दैत्यों की उत्पत्ति
मातृकाओं द्वारा अपनी सेना का ऐसा भीषण संहार देखकर रक्तबीज नामक महाबली असुर अत्यंत क्रोधित होकर आगे बढ़ा। रक्तबीज को यह वरदान था कि उसके शरीर से रक्त की एक भी बूंद जैसे ही पृथ्वी पर गिरेगी, तुरंत उसी के समान बलवान और विशाल दैत्य उत्पन्न हो जाएगा।
रक्तबीज गदा लेकर ऐन्द्री शक्ति की ओर दौड़ा। जब ऐन्द्री ने अपने वज्र से उस पर वार किया, तो वह बुरी तरह घायल हो गया और उसके घाव से रक्त बहने लगा। रक्त की बूंदें धरती पर गिरते ही उसी के समान हजारों पराक्रमी दैत्य प्रकट हो गए और अस्त्र-शस्त्र लेकर देवियों से युद्ध करने लगे।
वैष्णवी ने अपने चक्र से और ऐन्द्री ने गदा से जब-जब रक्तबीज को घायल किया, तब-तब उसके रुधिर से हजारों-लाखों महा असुर उत्पन्न होने लगे। कौमारी, वाराही और माहेश्वरी के प्रहारों से भी रक्तबीज का जितना रक्त बहा, उससे पैदा हुए असुरों से संपूर्ण जगत व्याप्त हो गया। यह दृश्य देखकर देवता अत्यंत भयभीत हो उठे।
मां चामुण्डा द्वारा रक्तपान और रक्तबीज का वध
देवताओं को भयभीत देखकर भगवती चण्डिका ने काली से कहा—
“हे चामुण्डे! तुम अपने मुख को अति विशाल विस्तार दो। मेरे अस्त्रों के प्रहार से रक्तबीज के शरीर से जो रक्त-बिंदु गिरें और उनसे जो नए असुर उत्पन्न हों, उन सभी को तुम अपने मुख में भक्षण करती जाओ। इस प्रकार रणभूमि में विचरते हुए तुम समस्त रक्त का पान कर लो। जब इसका सारा रक्त समाप्त हो जाएगा, तब यह दैत्य अपने-आप नष्ट हो जाएगा और नया कोई दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेगा।”
यह कहकर चण्डिका देवी ने रक्तबीज पर त्रिशूल से प्रचंड प्रहार किया। रक्तबीज के घाव से छूटने वाले रक्त को मां काली ने तुरंत अपने विशाल मुख में ले लिया। रक्तबीज ने क्रोध में आकर गदा से चण्डिका पर वार किया, जिससे देवी को तनिक भी पीड़ा न हुई, किंतु देवी के बाणों, खड्ग और वज्र के निरंतर प्रहारों से रक्तबीज छलनी हो गया।
उसके शरीर से गिरती रक्त की हर बूंद को और उस बूंद से निकलने वाले दैत्यों को मां काली अपने मुख में चबाती गईं और रक्त पीती गईं। अंततः जब रक्तबीज का संपूर्ण रक्त समाप्त हो गया, तब भगवती चण्डिका ने खड्ग, बाण और वज्र से प्रहार करके उस रक्तहीन महादैत्य को धरती पर गिरा दिया।
हे राजन्! रक्तबीज के गिरते ही देवता परम आनंदित होकर जयजयकार करने लगे और समस्त मातृकाएं असुरों का संहार कर विजय के उल्लास में नृत्य करने लगीं।
।। इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णि मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवी माहात्म्य में ‘रक्तबीज-वध’ नामक आठवां अध्याय संपूर्ण हुआ ।।
आठवें अध्याय का आध्यात्मिक महत्व
दुर्गा सप्तशती का आठवां अध्याय मन की असीम वासनाओं, कुविचारों और विकारों पर विजय का प्रतीक है। रक्तबीज की तरह हमारी नकारात्मक इच्छाएं भी एक से अनेक होती जाती हैं। जब तक ज्ञान और विवेक रूपी शक्ति (मां काली/चामुण्डा) चेतना के स्तर पर उन विकारों के मूल बीज (रक्त) को ही समाप्त नहीं कर देती, तब तक मन की वासनाएं नष्ट नहीं होतीं।
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