श्री दुर्गा सप्तशती ग्यारहवाँ अध्याय: देवताओं द्वारा देवी स्तुति एवं वरदान

श्री दुर्गा सप्तशती ग्यारहवाँ अध्याय: देवताओं द्वारा देवी स्तुति एवं वरदान

श्री दुर्गा सप्तशती ग्यारहवाँ अध्याय: नारायणी स्तुति

श्री दुर्गा सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण ग्रंथ का सर्वाधिक कल्याणकारी और सिद्ध अध्याय माना जाता है। इसे शास्त्रों में ‘नारायणी स्तुति’ के नाम से भी जाना जाता है।

दैत्यराज शुम्भ और निशुम्भ के संहार के उपरांत देवराज इन्द्र सहित समस्त देवताओं ने अग्निदेव को आगे कर मां कात्यायनी की दिव्य वंदना की थी।

श्री दुर्गा सप्तशती दसवाँ अध्याय: शुम्भ वध

आइए पढ़ते हैं दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय का सम्पूर्ण, विशद और प्रामाणिक हिन्दी पाठ।

देवताओं द्वारा माँ कात्यायनी की स्तुति

महर्षि मेधा कहते हैं— हे राजन्! महादैत्य शुम्भ के मारे जाने पर इन्द्रादि समस्त देवता अग्निदेव को आगे करके भगवती कात्यायनी देवी की भावपूर्ण स्तुति करने लगे। उस समय मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाने के कारण सभी देवताओं के मुखकमल अत्यंत प्रफुल्लित और खिले हुए थे।

देवताओं ने करबद्ध होकर प्रार्थना की:

“हे शरणागतों के समस्त दुःखों को दूर करने वाली देवी! आप हम पर प्रसन्न होइए। हे सम्पूर्ण चराचर जगत की जननी! आप प्रसन्न होइए। हे विन्ध्येश्वरी! आप इस विश्व की रक्षा करें, क्योंकि आप ही इस समस्त चर और अचर जगत की अधीश्वरी हैं।”

  • जगत का आधार: हे देवी! आप ही इस सम्पूर्ण जगत की आधाररूपा हैं, क्योंकि आप पृथ्वी रूप में भी सर्वत्र स्थित हैं और असीम पराक्रम से युक्त हैं।

  • परममाया स्वरूप: आप ही भगवान विष्णु की मूल पराशक्ति हैं और सम्पूर्ण विश्व की कारणभूता ‘परममाया’ हैं। आपने ही अपनी माया से इस सम्पूर्ण जगत को मोहित कर रखा है। आपके प्रसन्न होने पर ही यह पृथ्वी और समस्त प्राणी भवबंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

  • सर्वविद्या एवं नारी स्वरूप: हे माँ! संसार की सम्पूर्ण विद्याएँ आपके ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। इस जगत में जितनी भी नारियाँ हैं, वे सब आपकी ही दिव्य मूर्तियाँ हैं। एकमात्र आपने ही इस चराचर जगत को चारों ओर से व्याप्त कर रखा है।

  • स्तुति की सीमा: हे देवी! आपकी स्तुति किस प्रकार सम्भव है? क्योंकि आप तो परम बुद्धि स्वरूपा हैं और सम्पूर्ण जीवों को स्वर्ग तथा मुक्ति प्रदान करने वाली हैं। अतः इन्हीं दिव्य रूपों में आपकी वंदना की गई है। सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में बुद्धिरूप से निवास करने वाली, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हे नारायणी देवी! आपको हमारा बारंबार नमस्कार है।

  • काल स्वरूपा: कला, काष्ठा, मुहूर्त आदि रूपों से समय की अवस्थाओं को परिवर्तन की ओर ले जाने वाली तथा प्रलयकाल में सम्पूर्ण प्राणियों का अंत करने वाली हे नारायणी! आपको नमस्कार है।

परम पावन ‘नारायणी स्तुति’

दुर्गा सप्तशती ग्यारहवाँ अध्याय देवताओं द्वारा माँ दुर्गा की नारायणी स्तुति
श्री दुर्गा सप्तशती ग्यारहवाँ अध्याय: देवताओं द्वारा देवी स्तुति एवं वरदान

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

  • हे नारायणी! आप सम्पूर्ण मंगलों के मंगल रूप वाली, परम कल्याणमयी, शिवस्वरूपा और भक्तों के समस्त धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष रूप प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली हैं। हे शरणागतवत्सला, त्रिनेत्रधारिणी गौरी! आपको बारंबार नमस्कार है।

  • सृष्टि, स्थिति और संहार की शक्तिभूता, सनातनी देवी, त्रिगुणों का आधार तथा सर्वसुखमयी हे नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • शरणागत-रक्षिका: अपनी शरण में आए हुए शरणागतों, दीनों और दुखियों की रक्षा में सदैव तत्पर रहने वाली तथा सम्पूर्ण पीड़ाओं का हरण करने वाली हे नारायणी! आपको कोटि-कोटि नमस्कार है।

मातृका शक्तियों के रूपों की वंदना:

  • ब्राह्मणी रूप: हे नारायणी! आप ब्रह्माणी का रूप धारण करके हंसों से जुते हुए दिव्य विमान पर विराजती हैं तथा कुश द्वारा अभिमंत्रित जल का सिंचन करती रहती हैं, आपको नमस्कार है।

  • माहेश्वरी रूप: माहेश्वरी रूप से त्रिशूल, चन्द्रमा और महासर्पों को धारण करने वाली तथा महावृषभ (नंदी) की सवारी करने वाली हे नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • कौमारी रूप: मोरों तथा मुकुटों से घिरी रहने वाली, महाशक्ति (दिव्य भाला) को धारण करने वाली हे कौमारी रूपधारिणी, निष्पाप नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • वैष्णवी रूप: शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष रूप आयुधों को धारण करने वाली हे वैष्णवी शक्तिरूपा नारायणी! आप हम पर प्रसन्न होइए, आपको नमस्कार है।

  • वाराही रूप: अपनी दाढ़ों पर सम्पूर्ण पृथ्वी को धारण करने वाली कल्याणमयी वाराह रूपिणी नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • नृसिंही रूप: उग्र नृसिंह रूप से दैत्यों का संहार करने वाली तथा त्रिभुवन की रक्षा में सदैव संलग्न रहने वाली हे नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • ऐन्द्री रूप: मस्तक पर दिव्य किरीट और हाथों में महावज्र धारण करने वाली, सहस्र नेत्रों के कारण परम उज्ज्वल तथा वृत्रासुर के प्राण हरने वाली ऐन्द्री शक्ति स्वरूपा हे नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • शिवदूती रूप: हे शिवदूती स्वरूप से असुरों के महामद और अहंकार को समूल नष्ट करने वाली, घोर रूपा और महाशब्द करने वाली हे नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • चामुण्डा रूप: दाढ़ों के कारण विकराल मुख वाली, मुण्डमाला से सुशोभित और चण्ड-मुण्ड का मर्दन करने वाली हे चामुण्डारूपा नारायणी! आपको नमस्कार है।

माँ के विविध स्वरूपों की स्तुति एवं रक्षा-प्रार्थना

देवताओं ने पुनः हाथ जोड़कर कहा:

  • हे लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि तथा महामाया रूपा नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • हे मेधा, सरस्वती, सर्वोत्कृष्ट, ऐश्वर्यरूपिणी, पार्वती, महाकाली, नियंता तथा ईशरूपिणी नारायणी! आपको नमस्कार है।

  • हे सर्वस्वरूपे, सर्वेश्वरि, सर्वशक्तियुक्त देवी! सब प्रकार के डरों और भयों से हमारी रक्षा कीजिए, आपको नमस्कार है।

  • हे कात्यायनी! तीनों नेत्रों से विभूषित आपका यह सौम्य और शांत मुख समस्त प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करे, आपको नमस्कार है।

  • हे भद्रकाली! प्रज्वलित ज्वालाओं के समान भयंकर, अति उग्र एवं सम्पूर्ण असुरों का विनाश करने वाला आपका यह दिव्य त्रिशूल हमें भयों से बचाए, आपको नमस्कार है।

  • हे देवी! जो अपनी गूंजती हुई ध्वनि से इस सम्पूर्ण जगत को आपूरित करके दैत्यों के तेज को विनष्ट कर देता है, वह आपका दिव्य घंटा उसी प्रकार हमारी रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है।

  • हे चण्डिके! असुरों के रक्त और चर्बी से चर्चित आपकी जो खड्ग (तलवार) है, वह हमारा परम मंगल करे, हम आपको बारंबार नमस्कार करते हैं।

शरणागत-कृपा एवं सर्वव्यापकता

देवताओं ने स्तुति को आगे बढ़ाते हुए कहा:

  • हे देवी! जब आप प्रसन्न होती हैं, तो सम्पूर्ण रोगों और व्याधियों को नष्ट कर देती हैं, और जब रुष्ट हो जाती हैं, तो सम्पूर्ण अभीष्ट कामनाओं को नष्ट कर देती हैं।

  • जो मनुष्य आपकी शरण में आते हैं, उन पर कभी कोई विपत्ति नहीं आती। बल्कि आपकी शरण में गए हुए मनुष्य इतने समर्थ हो जाते हैं कि वे संसार के अन्य दीन-दुखियों को आश्रय देने योग्य बन जाते हैं।

  • अनेक रूपों से बहुत प्रकार की मूर्तियों को धारण करके इन धर्मद्रोही असुरों का जो आपने संहार किया है, वह आपके सिवा दूसरा कौन कर सकता था?

  • चौदह विद्याएँ, षट्शास्त्र (छहों दर्शन) और चारों वेद आपके ही ज्ञान-प्रकाश से प्रकाशित हैं, और उन सबमें आपका ही गुणगान है।

  • जहाँ भयंकर राक्षस, विषैले सर्प, लुटेरे और शत्रु हों, अथवा अथाह समुद्र के बीच घोर संकट हो, वहाँ भी आप साथ रहकर इस विश्व की रक्षा करती हैं।

  • हे विश्वेश्वरि! आप विश्व का पालन करने वाली विश्वरूपा हैं, इसलिए आप सम्पूर्ण जगत को धारण करती हैं। इसी कारण आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा भी पूजनीय और वंदनीया हैं।

  • जो जीव भक्तिपूर्वक आपको नमस्कार करते हैं, वे स्वयं सम्पूर्ण विश्व को आश्रय देने वाले बन जाते हैं।

  • हे देवी! आप प्रसन्न होइए और असुरों को मारकर जिस प्रकार आपने हमारी रक्षा की है, ऐसे ही भविष्य में भी हमारे शत्रुओं से सदा हमारी रक्षा करती रहिए। सम्पूर्ण जगत के पापों को नष्ट कर दीजिए और उन पापों के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली महामारी, अकाल आदि बड़े-बड़े उपद्रवों को शीघ्र ही दूर कर दीजिए।

  • विश्व की समस्त पीड़ाओं को हरने वाली देवी! शरण में पड़े हुओं पर प्रसन्न होइए। तीनों लोकों के निवासियों द्वारा पूजनीय हे परमेश्वरी! हम सबको अभय का वरदान दीजिए।

माँ भगवती का देवताओं को अभय वरदान

देवताओं की इस अनन्य और निष्कपट स्तुति को सुनकर माँ भगवती अत्यंत प्रसन्न हुईं।

देवी ने कहा:

“हे देवगण! मैं तुम सबको मनवांछित वर देने के लिए प्रस्तुत हूँ। तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा वर माँग लो, मैं तुम्हें अवश्य प्रदान करूँगी।”

देवताओं ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक कहा:

“हे सर्वेश्वरी! तीनों लोकों के समस्त निवासियों की सभी पीड़ाओं और संकटों को आप इसी प्रकार सदैव हरती रहें, और हमारे शत्रुओं का इसी प्रकार सदा संहार करती रहें।”

माँ भगवती द्वारा भावी अवतारों की दिव्य घोषणा

भगवती जगदम्बिका ने कहा— हे देवताओं! सुनो, मैं किस-किस समय कौन-कौन सा अवतार लेकर इस जगत के कष्टों का निवारण करूँगी:

  1. विन्ध्यवासिनी अवतार: वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें युग में दो अन्य महाअसुर ‘शुम्भ’ और ‘निशुम्भ’ पुनः उत्पन्न होंगे। उस समय मैं नन्दगोप के घर यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होकर विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करूँगी और शुम्भ तथा निशुम्भ का संहार करूँगी।

  2. रक्तदन्तिका अवतार: उसके पश्चात अत्यंत भयानक रूप से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर मैं ‘वैप्रचित्ति’ नामक दानवों का समूल नाश करूँगी। उन भयंकर महाअसुरों का भक्षण करते समय मेरे दाँत अनार के पुष्प के समान गहरे लाल वर्ण के हो जाएँगे। इसके पश्चात स्वर्ग में देवता और पृथ्वी पर मनुष्य मेरी स्तुति करते हुए मुझे ‘रक्तदन्तिका’ के नाम से पुकारेंगे।

  3. शताक्षी अवतार: जब पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी और भयंकर अकाल पड़ेगा, तब ऋषियों और मुनियों द्वारा स्तुति किए जाने पर मैं अयोनिजा (बिना गर्भ के) रूप में प्रकट होऊँगी और अपने सौ दिव्य नेत्रों से उन ऋषियों की ओर कृपापूर्वक देखूँगी। अतः समस्त मानव और देवता ‘शताक्षी’ नाम से मेरा कीर्तन करेंगे।

  4. शाकम्भरी अवतार: उसी अकाल के समय मैं अपने ही शरीर से उत्पन्न हुए प्राणों की रक्षा करने वाले शाकों (कंद, मूल, फल, सब्जियों) द्वारा समस्त प्राणियों का पोषण करूँगी। तब इस धरा पर मैं ‘शाकम्भरी’ के नाम से विख्यात होऊँगी।

  5. दुर्गा अवतार: इसी अवतार में मैं ‘दुर्ग’ नामक महाभयंकर असुर का वध करूँगी, जिससे मेरा नाम संसार में ‘दुर्गा देवी’ के रूप में प्रसिद्ध होगा।

  6. भीमा अवतार: इसके पश्चात जब मैं अत्यंत भयानक और उग्र रूप धारण करके हिमालय पर निवास करने वाले ऋषि-मुनियों की असुरों से रक्षा करूँगी और मुनियों का भक्षण करने वाले दैत्यों को मार गिराऊँगी, तब मेरी ख्याति ‘भीमा देवी’ के नाम से होगी।

  7. भ्रामरी अवतार: और जब ‘अरुण’ नामक महाअसुर तीनों लोकों को अत्यंत पीड़ित करेगा, तब मैं असंख्य भंवरों (भ्रमरों) का रूप धारण करके उस दुष्ट महादैत्य का वध करूँगी। तब स्वर्ग में देवता और मृत्युलोक में मनुष्य मेरी स्तुति करते हुए मुझे ‘भ्रामरी’ नाम से संबोधित करेंगे।

देवी ने अंत में समस्त देवताओं को परम आश्वासन देते हुए वचन दिया:

इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति।

तदा तदावतीर्याहं करिष्यामि संक्षक्यम्॥

“इस प्रकार जब-जब पृथ्वी पर दैत्यों और दुष्टों द्वारा धर्म और प्रजा को बाधा पहुँचाई जाएगी, तब-तब मैं इस धराधाम पर अवतार लेकर अपने भक्तों के समस्त शत्रुओं और कष्टों का संहार करूँगी।”

॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देवीस्तुतिर्नाम एकादशोऽध्यायः संपूर्णम् ॥

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