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माँ जगदंबा का नाम दुर्गा क्यों पड़ा?दुर्गा माता की कहानी

माँ जगदंबा का नाम दुर्गा क्यों पड़ा?दुर्गा माता की कहानी

माँ जगदंबा का नाम दुर्गा क्यों पड़ा?दुर्गा माता की कहानी। जानिए दुर्गमासुर वध की पौराणिक कथा

आदिशक्ति माता भगवती के सहस्त्रों नाम हैं, लेकिन संसार में उनका सबसे ज्यादा प्रचलित नाम दुर्गा ही है। इसी नाम से भक्त सबसे ज्यादा मां भगवती को पुकारते हैं। क्या आप जानते हैं कि मां जगदंबा का नाम दुर्गा क्यों पड़ा? इस पोस्ट में दुर्गा माता की कहानी जानेंगे।

दरअसल, दुर्गम नाम के एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य का वध करने की वजह से ही माता को ‘दुर्गा’ नाम से पुकारा गया।

माता को भक्तजन दुर्गा नाम से इसलिए भी याद करते हैं, क्योंकि इसी स्वरूप में माता ने अपने पुत्रों पर अपार करुणा बरसाई थी। उनके कष्ट दूर करने के लिए अपने नेत्रों से अश्रु जल बरसाया और अपने पवित्र हाथों से फल, मूल और शाक का भोजन कराया। आइए, आज हम विस्तार से जानते हैं दुर्गमासुर वध और माता शाकम्भरी के इस पावन प्रसंग की कथा।


दुर्गमासुर को मिला वेदों का वरदान

दुर्गमासुर की वध कथा. मां दुर्गा का शताक्षी और शाकम्भरी अवतार कैसे हुआ.
दुर्गमासुर की वध कथा. मां दुर्गा का शताक्षी और शाकम्भरी अवतार कैसे हुआ.

पौराणिक कथा के अनुसार, असुरराज हिरण्याक्ष के वंश में एक महा शक्तिशाली दैत्य उत्पन्न हुआ। रुरु नाम के असुर के इस पुत्र का नाम दुर्गमासुर रखा गया। वह देवताओं से प्रतिशोध लेना चाहता था, इसलिए उसने ब्रह्माजी की अत्यंत कठिन तपस्या की। उसकी घोर तपस्या के ताप से त्रिलोक में सभी लोग संतप्त हो उठे। अंततः, दुर्गमासुर की तपस्या के वशीभूत होकर ब्रह्मा जी को उसके सामने प्रकट होना पड़ा।

दुर्गमासुर ने वरदान स्वरूप ब्रह्माजी से समस्त मंत्र और चारों वेदों को मांग लिया। ब्रह्मा जी को सृष्टि के नियम और उसकी तपस्या के कारण उसकी यह इच्छा पूरी करनी पड़ी।

वेदों के लुप्त होने से संसार में मची त्राहि-त्राहि

ब्रह्माजी के इस वरदान का नतीजा पूरे ब्रह्मांड के लिए बेहद बुरा रहा। ऋषियों, मुनियों और देवताओं के पास से समस्त वेद तथा मंत्र लुप्त हो गए। इसके कारण पृथ्वी पर स्नान, होम, पूजा, संध्या और जप इत्यादि का पूरी तरह लोप हो गया। जगत में घोर अनर्थ उत्पन्न हो गया तथा यज्ञ (हविष्य) का भाग न मिलने के परिणामस्वरूप देवता जरा और व्याधि ग्रस्त होकर निर्बल होने लगे।

यही दुर्गमासुर का मुख्य उद्देश्य भी था। देवताओं को निर्बल और असहाय देखकर दुर्गमासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ देवराज इंद्र की अमरावती पुरी (स्वर्ग) को घेर लिया। चूंकि देवता अपनी शक्ति खो चुके थे, फलस्वरूप उन्होंने स्वर्ग से भाग जाना ही श्रेष्ठ समझा। वे स्वर्ग छोड़कर पर्वतों की कंदराओं और गुफाओं में जाकर छिप गए और वहां सहायता हेतु आदि शक्ति अम्बिका की आराधना करने लगे।

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जब धरती पर पड़ा सौ वर्षों का भयानक अकाल

हवन-यज्ञ और धार्मिक कार्य बंद होने के कारण जगत में वर्षा का पूरी तरह अभाव हो गया। वर्षा न होने से संपूर्ण भूमि शुष्क तथा जल विहीन हो गई और ऐसी विकट स्थिति लगातार सौ वर्षों तक बनी रही। पृथ्वी के बहुत से जीव जल और अन्न के बिना तड़प-तड़प कर मारे गए और घर-घर में शवों के ढेर लगने लगे।

इस प्रलयकारी स्थिति को देखकर जीवित मनुष्य, ऋषि-मुनि और देवता हिमालय पर्वत पर एकत्रित हुए। वहां उन्होंने ध्यान, पूजा तथा समाधि के द्वारा आदि शक्ति जगदम्बा की कठिन आराधना शुरू की और उनसे ब्रह्मांड की रक्षा की गुहार लगाई।


माता शताक्षी और शाकम्भरी देवी का अवतार

देवता, मनुष्य, यक्ष और गंधर्वों की बारंबार स्तुति करने पर, समस्त भुवन पर शासन करने वाली माँ भुवनेश्वरी, नील कमल के समान अनंत नेत्रों से युक्त स्वरूप में प्रकट हुईं। काजल के समान देह और नील कमल के समान विशाल नेत्रों से युक्त देवी ने अपने हाथों में मुट्ठी भर बाण, विशाल धनुष, कमल पुष्प, पुष्प-पल्लव, जड़, फल तथा बुढ़ापे व रोगों को दूर करने वाली शाक (सब्जियां) धारण की हुई थीं।

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माता भवानी के दिव्य तथा प्रकाशमान नेत्रों में अपने पुत्रों के लिए अपार करुणा भरी थी। जगद्धात्री भुवनेश्वरी समस्त लोकों पर अपने सहस्त्रों नेत्रों से जलधाराएं गिराने लगीं और लगातार नौ रातों तक घोर वर्षा होती रही। फलस्वरूप समस्त प्राणी तथा वनस्पतियां तृप्त हुईं और नदियां व समुद्र पुनः जल से भर गए।

  • शताक्षी नाम क्यों पड़ा: सहस्त्रों नेत्रों से करुणा का जल बरसाने वाली देवी को भक्तों ने कृतज्ञ होकर ‘माता शताक्षी’ के नाम से पुकारा।

  • शाकम्भरी नाम क्यों पड़ा: उन्होंने भूख-प्यास से तड़प रहे अपने पुत्रों को खाने के लिए अपने शरीर से उत्पन्न शाक तथा फल-मूल प्रदान किए। साथ ही नाना प्रकार के अन्न तथा पशुओं के खाने योग्य पदार्थ भी दिए, जिससे उनका एक नाम ‘शाकम्भरी’ हुआ।


जगदंबा और दैत्यराज दुर्गमासुर का महायुद्ध

इस पूरे घटनाक्रम पर दुर्गमासुर के गुप्तचरों की नजरें लगी हुई थीं। उन्होंने तुरंत जाकर दैत्यराज दुर्गमासुर को यह सारी गाथा बताई और देवताओं की रक्षा के लिए जगदंबा के अवतार लेने की बात कही। यह सुनते ही दुर्गमासुर क्रोध से आगबबूला हो गया और अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र और महाबली सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए चल पड़ा।

दैत्यराज दुर्गमासुर ने आते ही देवता और मनुष्यों को अपनी आसुरी शक्ति से पीड़ित करना शुरू कर दिया। उनकी रक्षा के लिए देवी ने चारों ओर एक अभेद्य तेजोमय चक्र (सुरक्षा कवच) बना दिया तथा स्वयं युद्ध के मैदान में बाहर आ खड़ी हुईं।

दुर्गा माता की कहानी. जगदंबा को दुर्गा क्यों कहते हैं. दुर्गमासुर का वध कैसे हुआ
दुर्गा माता की कहानी. जगदंबा को दुर्गा क्यों कहते हैं. दुर्गमासुर का वध कैसे हुआ

उग्र शक्तियों और दस महाविद्याओं का प्राकट्य

दुर्गम दैत्य तथा देवी के मध्य घोर युद्ध छिड़ गया। तदनंतर, महादेवी के शरीर से उनकी अत्यंत उग्र शक्तियां प्रकट हुईं। देवी के विग्रह से:

  • माता काली, तारिणी (तारा), बाला, त्रिपुरा, भैरवी, रमा, बगला, मातंगी, कामाक्षी, तुलजादेवी, जम्भिनी, मोहिनी, छिन्नमस्ता, गुह्यकाली और त्रिपुरसुन्दरी प्रकट हुईं।

  • इसके साथ ही स्वयं दस हजार हाथों वाली महाअम्बिका प्रकट हुईं। पहले ये सोलह, फिर बत्तीस, पुनः चौंसठ और फिर अनंत देवियाँ हाथों में प्रलयंकारी अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए युद्ध भूमि में उतर आईं।


दुर्गमासुर का वध और माँ जगदंबा का दुर्गा नाम

जगदंबा के महाकोप से दस दिनों के भीतर ही दैत्यराज की विशाल सेना पूरी तरह नष्ट हो गई। ग्यारहवें दिन महादेवी ने अपने तीक्ष्ण बाणों से दुर्गमासुर पर प्रहार किया। बाणों से आहत होकर, रक्त की उल्टी करता हुआ दुर्गमासुर देवी के सम्मुख मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसके मरते ही उसके शरीर से एक दिव्य तेज निकला और महादेवी के विग्रह में विलीन हो गया।

दुर्गमासुर के आतंक का अंत होने के पश्चात् ब्रह्मा आदि सभी देवता, भगवान शिव तथा भगवान विष्णु को आगे करके परम भक्ति भाव से देवी की स्तुति करने लगे।

दुर्गम नामक महान दैत्य का अंत करने और देवताओं को उसके भय से मुक्त कराने के कारण ही आदिशक्ति संतुष्ट होकर पूरे ब्रह्मांड में “दुर्गा” नाम से विख्यात हुईं। इस तरह माँ जगदंबा का नाम दुर्गा पड़ा।

देवताओं द्वारा किए गए इस स्तवन में देवी दुर्गा को तीनों लोकों की रक्षा करने वाली, मोक्ष प्रदान करने वाली तथा सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करने वाली सनातनी शक्ति कहा गया है। वास्तव में, दुर्गा भवानी ही आदिपराम्बा की परम कल्याणकारी शक्ति हैं।

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जगदंबा का नाम दुर्गा क्यों पड़ा? दुर्गा माता की कहानी आपको पसंद आई तो कृपया इसे अपने मित्रों के साथ साझा करें। जल्द ही हम दुर्गा माता की कहानी की शृंखला लेकर आएँगे। इसमें दुर्गा माता की पूरी कहानी होगी, उनके विभिन्न स्वरूपों के प्रकट होने की कहानियां भी होंगी।

संकलन व संपादनः
राजन प्रकाश

(माँ जगदंबा का नाम दुर्गा क्यों पड़ा?दुर्गा माता की कहानी देवी पुराण एवं अन्य स्रोतों पर आधारित है. इसका उद्देश्य सिर्फ भक्तों को कथाओं से परिचित कराना है. विशेष जानकारी के लिए पुराणों एवं अन्य ग्रंथों को देखें.)

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