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भगवान कृष्ण जिनके लिए चलाते थे चक्कीः जनाबाई

भगवान कृष्ण जिनके लिए चलाते थे चक्कीः जनाबाई

 

भगवान कृष्ण (विट्ठल) जिनके लिए चलाते थे चक्की: भक्त शिरोमणि संत जनाबाई की कथा

जब-जब भगवान के परम भक्तों का नाम लिया जाएगा, तब-तब भक्त शिरोमणि माता जनाबाई (Sant Janabai) का नाम बड़े सम्मान से लिया जाएगा। जनाबाई की भक्ति में ऐसी अलौकिक शक्ति थी कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण (प्रभु विट्ठल) उनके लिए चक्की चलाते थे।

विशेष बात यह है कि माता जनाबाई ने कभी भगवान से मदद की गुहार नहीं लगाई, न ही उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण चक्की चलाने आते थे। बल्कि, अपनी अनन्य भक्त से मिलने के लिए स्वयं ठाकुर जी स्वेच्छा से दौड़े चले आते थे। आइए रस लेते हैं भक्त शिरोमणि माता जनाबाई की उस पावन कथा का, जिनके घर भगवान स्वयं चाकरी करने आते थे।


कौन थीं माता जनाबाई?

जनाबाई एक साधारण सेविका थीं। उनका यह परम सौभाग्य था कि वह प्रसिद्ध संत नामदेव जी के घर में परिचारिका (दासी) का काम करती थीं। पानी भरना, झाड़ू लगाना, बर्तन मांजना, कपड़े धोना और चक्की पीसना उनका नित्य का कार्य था।

संत नामदेव के घर में हमेशा भगवान विट्ठल का भजन-कीर्तन होता रहता था और भक्ति की अविरल सरिता बहती थी। धीरे-धीरे जनाबाई भी इस भक्ति-सरिता में स्नान करने की अभ्यस्त हो गईं। उनके मन और प्राणों के द्वार खुल गए। अब तो जनाबाई के मुख से ही नहीं, बल्कि उनके रोम-रोम से पवित्र भगवन्नाम का निरंतर उच्चारण होने लगा था।


जब जनाबाई के लिए स्वयं महामाया ने धोए कपड़े

एक बार एकादशी के दिन संत नामदेव जी के यहाँ भारी भक्तमंडली जमा हुई थी। पूरी रात भगवान विट्ठल का नाम-कीर्तन चलता रहा। दिनभर व्रत के चलते जनाबाई ने अन्न ग्रहण नहीं किया था। भक्त जन कीर्तन करते रहे और एक कोने में बैठकर जनाबाई प्रेमाश्रु बहाती रहीं।

आखिरकार सुबह भजन खत्म हुआ और जनाबाई अपने घर लौटीं। पूरी रात की थकान के कारण अगले दिन उन्हें उठने में देर हो गई। जब आँख खुली तो वह हड़बड़ाकर उठीं और शीघ्र ही नित्यकर्म से निवृत्त होकर संत नामदेव के घर पहुँचीं।

उन्होंने झाड़ू दिया, बर्तन मांजे और कपड़े धोने के लिए पास की चंद्रभागा नदी के किनारे पहुँचीं। कपड़े धोते-धोते उन्हें ध्यान आया कि जिस कमरे में कीर्तन होता है, उसे व्यवस्थित करना तो वह भूल ही गईं। कपड़े पानी में डुबाए जा चुके थे, इसलिए उन्हें छोड़कर तुरंत जाना भी संभव नहीं था। जनाबाई का हृदय अपने आराध्य के कमरे की व्यवस्था न कर पाने के बोझ से भर आया।

“भक्त के मन की पीड़ा भगवान तक तुरंत पहुँच जाती है और वह अपने भक्त की व्याकुलता दूर करने के लिए तत्काल कोई न कोई उपाय करते हैं।”

जनाबाई चिंता में बैठी थीं कि तभी एक वृद्ध महिला वहाँ आ पहुँची। उन्होंने पूछा, “बेटी! किस चिंता में डूबी हो?” जनाबाई ने अपनी सारी परेशानी बता दी। वृद्धा ने मुस्कुराकर कहा, “तुम जाओ और कीर्तन का कमरा ठीक कर आओ, तब तक तुम्हारे कपड़े मैं धो देती हूँ।”

जनाबाई को तो जैसे संजीवनी मिल गई। उन्होंने कहा, “माता! तुम कपड़े धोना मत, बस इनकी देखभाल करना, मैं तुरंत कमरा ठीक करके आती हूँ।” जनाबाई इतनी जल्दी में थीं कि वे यह सोच भी नहीं पाईं कि आखिर यह वृद्धा कौन है और उसने उनके मन की व्यथा इतनी आसानी से कैसे जान ली।

वह तुरंत भागीं और कमरे की व्यवस्था करके उल्टे पाँव लौटीं। तभी उन्होंने दूर से देखा कि वह वृद्धा जा रही थीं और सारे कपड़े धुल कर सूख रहे थे। कपड़े इतनी जल्दी धुल भी गए और सूख भी गए! यह चमत्कार देख जनाबाई हैरान रह गईं।

वह तुरंत उस वृद्धा के पीछे दौड़ीं और उन्हें रोकने की कोशिश की। तभी रास्ते में उन्हें ठोकर लगी और वह गिर पड़ीं। थोड़ी देर के लिए उनकी दृष्टि ओझल हुई और वह वृद्धा नजरों के आगे से विलुप्त हो गई। लेकिन वहाँ गीली मिट्टी पर उनके दिव्य पैरों के निशान बने हुए थे।

जब जनाबाई ने यह अद्भुत घटना संत नामदेव जी और अन्य संतों को सुनाई, तो सबने आकर उन चरण-चिह्नों के दर्शन किए। मंडली के बड़े-बड़े संत और महात्मा तुरंत पहचान गए कि ये तो साक्षात महामाया (माता लक्ष्मी) के पाँव के निशान हैं। नामदेव जी ने भावुक होकर कहा, “जनाबाई तुम धन्य हो, जिसके लिए स्वयं महामाया ने आकर दासी की तरह कपड़े धोए।”


“जनी संग दलिले” – जब भगवान विट्ठल पीसने लगे चक्की

इस घटना के बाद से जनाबाई की दशा पूरी तरह बदल गई। वह भक्ति में इतनी लीन हो गईं कि उनके रोम-रोम से हर समय पवित्र भगवन्नाम निकलने लगा। अब तो यह रोज की कहानी हो गई थी।

घर के काम-काज करते-करते जनाबाई विह्वल हो जाया करती थीं और अपनी सुध-बुध खो देती थीं। नटखट नागर प्रभु विट्ठल तो जैसे इसी समय की प्रतीक्षा में बैठे रहते थे। जैसे ही जनाबाई प्रेम-समाधि में खोतीं, भगवान विट्ठल प्रकट होकर उनकी जगह झाड़ू लगाने और चक्की पीसने लगते थे।

इन्हीं दिव्य घटनाओं का वर्णन करते हुए मराठी संतों और कवियों ने लिखा है— “जनी संग दलिले” (यानी करुणामय प्रभु स्वयं जनाबाई के साथ चक्की पीसते थे)।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी अवस्था के लिए कहा है:

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

(अर्थात: जो अनन्यभाव से मेरा चिंतन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य युक्त पुरुषों का योगक्षेम (आवश्यकताओं की पूर्ति और रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।)

भक्त शिरोमणि संत नामदेव ने विट्ठल भगवान के लिए जो अभंग लिखे, उनमें जनाबाई का नाम हमेशा के लिए अमर हो गया।

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कई ग्रंथों में जनाबाई को संत नामदेव की छोटी बहन भी बताया गया है। सत्य तो यही है कि जनाबाई के निश्छल प्रेम के वश में होकर भगवान विट्ठल ने उनके घर चाकरी तक की, जिसका प्रमाण संतों के अभंग आज भी देते हैं।

संकलन: पं. अंशुमान आनंद


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