Advertisement728 × 90

भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं? श्री जगन्नाथ जी कथा भाग 4

भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं? श्री जगन्नाथ जी कथा भाग 4

भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं? जगन्नाथ जी की अधूरी प्रतिमा का रहस्य. श्री जगन्नाथ जी कथा का चौथा और आखिरी भाग

जानिए भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं, उनकी प्रतिमा अधूरी क्यों है, और प्राण प्रतिष्ठा का रहस्य क्या है. भगवान जगन्नाथ जी की महिमा, जगन्नाथ जी की अधूरी मूर्ति की कथा और जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा की कहानी हिंदी मेंजगन्नाथ कथा शृंखला का आखिरी भाग

आपने भगवान जगन्नाथ जी, बलभद्र जी और सुभद्रा जी की प्रतिमाएं देखी होंगी. गौर किया है कि प्रतिमाओं में केवल धड़ है, हाथ पांव नहीं. कभी सोचा कि भगवान जगन्नाथ जी के हाथ पांव क्यों नहीं हैं?

इस रहस्य को जानने से पहले यह जानना होगा कि आखिर भगवान जगन्नाथ ने बिना हाथ पांव वाला रूप धरा ही क्यों? यह एक बड़ी लंबी लेकिन भाव-विभोर करने वाली कथा है. पूरी कथा पढ़ने के बाद भाव में आँखों से आँसू निकल आते हैं. हम वही कथा आपके लिए लेकर आए हैं. लंबी है इसलिए धैर्य से पढ़ें, भक्तिभाव में भरकर पढ़ें.

भगवान जगन्नाथ के प्रकट होने की इस पौराणिक कथा शृंखला के पिछले तीन अंशों में आपने पढ़ा कि भगवान ने वह स्वरूप क्यों धरा जिसे हम जगन्नाथ जी के रूप में पूजते हैं.

जगन्नाथ जी ने इसके लिए राजा इंद्रद्युम्न को हेतु के रूप में क्यों चुना? भगवान नीलमाधव  को एक भील राजा विश्वावसु ने क्यों वन में छुपाकर रखा था?जगन्नाथ जी के नीलमाधव स्वरूप किसने और क्यों चुराया? चोरी की प्रतिमा स्थापित न हो पाई तो फिर क्या रास्ता निकला ? भगवान की प्रतिमा एक विशेष लकड़ी से बनती है जिसे दारू कहते हैं. दारू की प्राप्ति दैत्यपति को कैसे हुई?

यह इंटरनेट पर भगवान जगन्नाथ जी की सबसे सटीक और सबसे विस्तृत कथा है. भगवान जगन्नाथ की कथा के अब तक के तीनों भाग का लिंक नीचे दिया जा रहा है. पढ़ने के लिए क्लिक करें.

भगवान जगन्नाथ रथयात्रा की पौराणिक कथा जो आपने न सुनी होगी

जगन्नाथ जी की कथा का दूसरा भाग इस लिंक से पढ़ें-

भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथाः भाग 2

श्री जगन्नाथ स्वामी की कथा का तीसरा भाग इस लिंक से पढ़ें.

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति कैसे बनती है? जगन्नाथ रथयात्रा कथा भाग तीन

भगवान जगन्नाथ जी की कथा का चौथा और अंतिम भाग

इस अंश में हम जानेंगे कि आखिर भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं? उनकी अधूरी प्रतिमा का रहस्य क्या है और जगन्नाथ विग्रह की स्थापना कैसे हुई.

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की पारंपरिक और अलौकिक मूर्तियां गर्भगृह में स्थापित
bhagwan-jagannath-balabhadra-subhadra-murti

कथा आगे बढ़ाने से पहले प्रेम से बोलिए भगवान जगन्नाथ जी की जय

एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए. राजा पुनः भगवान का स्मरण करने लगे. भगवान ने प्रेरणा दी कि तुम इसकी चिंता छोड़ो. तुम्हारे पास एक योग्य शिल्पी पधारेंगे. वही इस विग्रह का निर्माण कर सकते हैं. वे नियम के बड़े पक्के हैं. तुम उन्हें मान लेना और अपना वचन मत भंग करना.

अगले दिन एक वृद्ध व्यक्ति राजसभा में आया और बोला- मैं जानता हूं कि कौन सी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए. मैं वह प्रतिमा भी बनाउंगा. आप भगवान श्रीकृष्ण को उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ यहां विराजमान करें. इस दैवयोग का यही संकेत है.

राजा को उस बूढ़े व्यक्ति की बात से सांत्वना मिली. उसे भगवान का स्वप्न याद आया. परखने के लिए राजा ने पूछा कि आखिर मूर्ति बनेगी कैसे?

उस वृद्ध ने कहा- मैं इस कला में कुशल हूं. मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूंगा और मूर्तियां बनाउंगा. पर मेरी एक शर्त है. मैं भगवान की मूर्ति निर्माण का काम एकांत में करूंगा. मैं यह काम बंद कमरे में करुंगा. कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोलकर बाहर आऊंगा.

इस बीच कोई मुझे न बुलाए, न मेरे पास आए. यदि किसी ने बीच में बाधा की तो मैं काम अधूरा छोड़कर लुप्त हो जाऊंगा. जब तक निर्माणकार्य चले बाहर संगीत बजना चाहिए ताकि मेरे कार्य की सूचना किसी को न लगे. मेरे औजारों के चलने की आवाज महल के बाहर न जाए इसकी व्यवस्था कर दें.

राजा सहमत तो थे लेकिन उन्हें एक चिंता हुई. राजा बोले- यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसी हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी?

शिल्पी ने कहा- जब तक मेरा काम पूर्ण नहीं होता मैं कुछ खाता-पीता नहीं हूं.

राजमंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बूढ़े शिल्पी ने स्वयं को 21 दिनों के लिए बंद कर लिया. बाहर वादक वाद्ययंत्र बजाने लगे तो मूर्ति निर्माण कार्य आरंभ हुआ. भीतर से औजारों के चलने की आवाजें आती थीं.

 

मूर्तियों में भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं?

महारानी गुंडीचा देवी दरवाजे से कान लगाकर अक्सर छेनी-हथौड़े के चलने की आवाजें सुना करती थीं.  महारानी रोज की तरह कमरे के दरवाजे से कान लगाए खड़ी थीं.

पंद्रह दिन बाद उन्हें कमरे से आवाज सुनायी पड़नी बंद हो गई. जब मूर्तिकार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गईं.

उन्हें लगा कि वृद्ध आदमी है, खाता-पीता भी नहीं कहीं उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो. व्याकुल होकर रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खोला और भीतर झांककर देखा.

महारानी गुंडीचा देवी ने इस तरह मूर्तिकार को दिया हुआ वचन भंग कर दिया था. मूर्तिकार अभी मूर्तियां बना रहा था परंतु रानी को देखते ही अदृश्य हो गए. मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था. भगवान के हाथ-पैर अभी नहीं बन सके थे.

भगवान जगन्नाथ के हाथ-पाँव क्यों नहीं हैं- अधूरी मूर्तियों को प्रणाम करते राजा-रानी
अधूरी मूर्तियों का रहस्य और राजा का पश्चाताप.

राजा और रानी दोनों विलाप करने लगे. उन्होंने अपना वचन भंग कर दिया था. बिना हाथ पांव की भगवान की प्रतिमाएँ मंदिर में कैसे स्थापित होंगी. राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडीचा यह सोचकर विलाप करते रहे. उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया. वे दिन-रात भगवान से क्षमा प्रार्थना करते.

अपने भक्तों की यह स्थिति देखकर भगवान को दया आई. उन्होंने दोनों के हृदय में प्रेरणा दी तुम व्यर्थ चिंतित हो रहे हो. जो शिल्पी आए थे वे स्वयं भगवान विश्वकर्मा थे. उन्हें यह कार्य सौंपा गया था.

जिन प्रतिमाओं को तुम अपूर्ण समझ रहे हो वास्तव में वैसी ही प्रतिमा स्थापित होनी थी. मैंने नारद को ऐसा वरदान दिया था. नारद भी इतने समय से तुम्हारे बीच ही गोपनीय रूप में उपस्थित हैं. नारद तुम्हें दर्शन देकर सारा रहस्य बताएंगे.

यह सुनकर राजा और रानी बड़े प्रसन्न हुए. उनकी खुशी की कोई सीमा न रही. वे भगवान की तरह-तरह से स्तुति करने लगे. दोनों ने भगवान से इन मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा का विधान पूछा.

भगवान जगन्नाथ ने स्वयं बताई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की विधि 

भगवान जगन्नाथ ने बिना हाथ पांव वाली मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा का रहस्य बताना शुरू किया.

नीलांचल पर सौ कुएं बनवाओ. सौ यज्ञों का आयोजन करो. कुँओं के जल से मेरा अभिषेक होगा. उसके बाद इसकी स्थापना स्वयं ब्रह्मदेव सेकरेंगे. वहां तुम्हें लेकर नारद जाएंगे.

राजा ने भगवान के आदेशानुसार नीलांचल पर्वत पर विशाल मंदिर का निर्माण कराया. ऐसा विशाल मंदिर उस समय भूलोक पर दूसरा न था. भगवान के बताए अनुसार नारदजी प्रकट हुए. भगवान की इच्छानुसार वह राजा इंद्रद्युम्न को लेकर ब्रह्मलोक की ओर चले.

राजा इंद्रद्यु्मन समय की गति से चलकर ब्रह्मलोक पहुंचे. ब्रह्माजी की स्तुति के बाद उन्हें भगवान की कही बातें बताई. ब्रह्माजी यह जानकर बड़े प्रसन्न हुए. सौभाग्य मानकर वह इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए.

ब्रह्माजी ने कहा- तुम आगे चलो मैं पीछे से आऊंगा. एक बात का ध्यान रखना. जब तुम वापस जाओगे तब तक धरती पर बहुत कुछ बदल चुका होगा. तुम्हारी कई पीढियां बीत गईं हैं. हजारों वर्ष बीत चुके होंगे. अब तक 71 कल्प निकल गए. मनु भी बदल चुके हैं. इसलिए पृथ्वी पर पहुँचकर विस्मय में मत पड़ना. ब्रह्मलोक का कालखंड धरती के कालखंड के बहुत अलग है.

ब्रह्माजी से विदा लेकर इंद्रद्युम्न नारद के साथ पृथ्वी पर आए. अब वहां राजा गाला का राज्य स्थापित हो चुका था. जो मंदिर विश्वावसु ने बनाया था उसका अधिकांश अंश लुप्त चुका था. इंद्रद्युम्न को दुख तो हुआ लेकिन उन्हें नारद जी ने ब्रह्माजी की बात याद कराई. राजा ने पूजा की तैयारी शुरू की.

ईश्वर की प्रेरणा और कृपा से इंद्रद्युम्न जो तैयारियां कर रहे थे वह कई मायनों में अलौकिक थीं. उस समय के राजा को उसके गुप्तचरों ने सूचना दी कि नीलांचल पर कुछ विस्मयकारी घटनाएँ हो रही हैं.

भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं है? जगन्नाथ पुरी के मंदिर में स्थापित अधूरी मूर्तियों का रहस्य
राजा इंद्रद्युम्न द्वारा निर्मित नीलांचल का ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर।

राजा को लगा कि कोई उसके राज्य में अतिक्रमण करने आया है. वह अपनी सेना लेकर चढ़ आया. लेकिन जब उसने वहां का दृश्य देखा तो वह भाव-विभोर हो गया और इस पुण्य कार्य में शामिल हो गया.

कुओं से निकालकर 108 कलशों में जलभरकर  भगवान के शिशुरूप का अभिषेक आरंभ हुआ.

भगवान ने नारदजी को वचन दिया था कि वह एक साधारण बालक की तरह अपनी लीलाएं करके उन्हें आनंदित करेंगे. इसलिए भगवान ने लीला आरंभ की. इतने स्नान से भगवान को सर्दी लग गई. भगवान का पंद्रह दिनों तक विशेष उपचार किया गया. तब वे जाकर बलरामजी और सुभद्रा के साथ स्वस्थ  हुए.

भगवान श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजी की बिना-हाथ पांव वाली मूर्तियां इसी कारण ऐसी हैं. उन प्रतिमाओं को ही मंदिर में स्थापित कराया गया.

कहते हैं विश्वावसु संभवतः उस जरा बहेलिए का वंशज था जिसने अंजाने में भगवान कृष्ण की हत्या कर दी थी. विश्वावसु शायद कृष्ण के पवित्र अवशेषों की पूजा करता था. ये अवशेष मूर्तियों में छिपाकर रखे गए हैं.

विद्यापति और ललिता के वंशज जिन्हें दैत्यपति कहते हैं उनका परिवार ही यहां अब तक पूजा करता है.

भगवान जगन्नाथ को खिचड़ी का प्रसाद क्यों चढ़ता है?

भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्ति के निर्माण की प्रक्रिया भी अनोखी है. जिस वर्ष में आषाढ़ मास में अधिकमास होता है उस वर्ष भगवान की नई प्रतिमा बनाई जाती है. पुरानी प्रतिमा को मंदिर के प्रांगण में ही समाधि दे जाती है. इस प्रक्रिया को नवकलेवरम कहते हैं. मंदिर के पुजारी आंख बंद करके प्रतिमा का निर्माण करते हैं. फिर एक विशेष प्रक्रिया से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है.

संकलनः

राजन प्रकाश

आपने इतने विस्तार से यह कथा शायद ही पहले पढ़ी हो. यह कथा स्कंद पुराण और कई अन्य प्रचलित जगन्नाथ जी की कथाओं का सार स्वरूप है. मैंने अपनी तरफ से इसे त्रुटिहीन रखने की पूरी कोशिश की है. फिर भी कुछ भूल हो गई हो तो ध्यान दिलाएं, तुरंत सुधार किया जाएगा.

आशा है आपको यह कथा पसंद आई होगी. यदि पसंद आई हो तो कृपया इसका लिंक अपने सभी परिवारजनों, मित्रजनों और उन सभी के साथ शेयर करें जो भगवान जगन्नाथ जी के भक्त हैं और दर्शन के अभिलाषी. इसे भगवान जगन्नाथ की प्रेरणा मानकर आगे बढ़ाएं.

वेद-पुराण-ज्योतिष-रामायण-हिंदू व्रत कैलेंडेर-सभी व्रतों की कथाएं-व्रतों की विधियां-रामशलाका प्रश्नावली-राशिफल-कुंडली-मंत्रों का संसार. क्या नहीं है यहां! सब फ्री भी है. एक बार देखें जरूर… प्ले स्टोर में टाइप करें Prabhu Sharnam और डाउनलोड कर लें.

प्रभु शरणं के पोस्ट की सूचना WhatsApp से चाहते हैं तो अपने मोबाइल में हमारा नंबर 9871507036 Prabhu Sharnam के नाम से SAVE कर लें। फिर SEND लिखकर हमें उस नंबर पर whatsapp कर दें. जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी. यदि नंबर सेव नहीं करेंगे तो तकनीकि कारणों से पोस्ट नहीं पहुँच सकेंगे.

इस लाइऩ के नीचे फेसबुक पेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे. लिंक-
https://www.facebook.com/share/1CJXhLfxzt/

धार्मिक चर्चा में भाग लेने के लिए हमारा फेसबुक ग्रुप ज्वाइ करें. प्रभु शरणं फेसबुक ग्रुप का लिंक

https://www.facebook.com/groups/prabhusharnam

 

error: Content is protected !!