भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं? जगन्नाथ कथा का आखिरी भाग.

भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं? जगन्नाथ कथा का आखिरी भाग.

भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं? जगन्नाथ जी की अधूरी प्रतिमा का रहस्य. जगन्नाथ कथा का आखिरी भाग

जानिए भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं, उनकी प्रतिमा अधूरी क्यों है, और प्राण प्रतिष्ठा का रहस्य क्या है। भगवान जगन्नाथ की अधूरी मूर्ति की कथाजगन्नाथ कथा शृंखला का आखिरी भाग

भगवान जगन्नाथ के प्रकट होने की इस पौराणिक कथा शृंखवा के पिछले तीन अंशों में से पहले में आपने पढ़ा कि कैसे नारद को संयोगवश भगवान श्रीकृष्ण के ऐसे स्वरूप के दर्शन हो गए जो उनसे पहले किसी ने नहीं देखा था. नारद जी ने भगवान से वरदान मांग लिया कि वे इस स्वरूप में पृथ्वी पर विराजें और फिर भगवान ने कुछ वचन दिया. नीचे लिंक से पढ़ें-

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दूसरे अंश में आपने पढ़ा कि कलियुग में भगवान ने राजा इंद्रद्युम्न को इसका माध्यम बनाया. उन्हें विचित्र स्वप्न आने लगे. राजा ने विद्वानों को रहस्य तलाशने के काम में भेजा. एक विद्वान विद्यापति को देवकृपा से भगवान नीलमाधव तक पहुँचने का रहस्य हाथ लग गया. भगवान नीलमाधव भीलों के कुलदेवता के रूप में विराजे थे. देवताओं ने भीलों को बताया था कि नीलमाधव का प्रतिमा की एक दिन चोरी होगी. इसलिए उनका राजा विश्वावसु नीलमाधव की प्रतिमा को वन में एक स्थान पर छुपाकर रखता था. पढ़ें दूसरा भाग-

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विद्यापति ने नीलमाधव की प्रतिमा प्राप्त करने के लिए के लिए विश्वावसु की पुत्री ललिता से शादी कर ली. और एक दिन मौका पाकर प्रतिमा प्रतिमा चुरा ली. राजा इंद्रद्मुम्न को उसने प्रतिमा सौंप तो दी लेकिन वह मंदिर में स्थापित न हो सकी. फिर क्या हुआ यह सब रहस्य आपने तीसरे भाग में पढ़ा. लिंक नीचे है-

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कथा के चौथे और आखिरी भाग में जानिए भगवान जगन्नाथ के हाथ पांव क्यों नहीं हैं, उनकी अधूरी प्रतिमा का रहस्य क्या है और जगन्नाथ विग्रह की स्थापना कैसे हुई.

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की पारंपरिक और अलौकिक मूर्तियां गर्भगृह में स्थापित
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कथा आगे बढ़ाने से पहले प्रेम से बोलिए भगवान जगन्नाथ जी की जय

एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए. राजा पुनः भगवान का स्मरण करने लगे. भगवान ने प्रेरणा दी कि तुम इसकी चिंता छोड़ो. तुम्हारे पास एक योग्य शिल्पी पधारेंगे. वही इस विग्रह का निर्माण कर सकते हैं. वे नियम के बड़े पक्के हैं. तुम उन्हें मान लेना और अपना वचन मत भंग करना.

अगले दिन एक वृद्ध व्यक्ति राजसभा में आया और बोला- मैं जानता हूं कि कौन सी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए. मैं वह प्रतिमा भी बनाउंगा. आप भगवान श्रीकृष्ण को उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ यहां विराजमान करें. इस दैवयोग का यही संकेत है.

राजा को उस बूढ़े व्यक्ति की बात से सांत्वना मिली. उसे भगवान का स्वप्न याद आया. परखने के लिए राजा ने पूछा कि आखिर मूर्ति बनेगी कैसे?

उस वृद्ध ने कहा- मैं इस कला में कुशल हूं. मैं इस पवित्र कार्य को पूरा करूंगा और मूर्तियां बनाउंगा. पर मेरी एक शर्त है. मैं भगवान की मूर्ति निर्माण का काम एकांत में करूंगा. मैं यह काम बंद कमरे में करुंगा. कार्य पूरा करने के बाद मैं स्वयं दरवाजा खोलकर बाहर आऊंगा.

इस बीच कोई मुझे न बुलाए, न मेरे पास आए. यदि किसी ने बीच में बाधा की तो मैं काम अधूरा छोड़कर लुप्त हो जाऊंगा. जब तक निर्माणकार्य चले बाहर संगीत बजना चाहिए ताकि मेरे कार्य की सूचना किसी को न लगे. मेरे औजारों के चलने की आवाज महल के बाहर न जाए इसकी व्यवस्था कर दें.

राजा सहमत तो थे लेकिन उन्हें एक चिंता हुई. राजा बोले- यदि कोई आपके पास नहीं आएगा तो ऐसी हालत में आपके खाने पीने की व्यवस्था कैसे होगी?

शिल्पी ने कहा- जब तक मेरा काम पूर्ण नहीं होता मैं कुछ खाता-पीता नहीं हूं.

राजमंदिर के एक विशाल कक्ष में उस बूढ़े शिल्पी ने स्वयं को 21 दिनों के लिए बंद कर लिया. बाहर वादक वाद्ययंत्र बजाने लगे तो मूर्ति निर्माण कार्य आरंभ हुआ. भीतर से औजारों के चलने की आवाजें आती थीं.

 

रानी गुंडीचा की अधीरता से भगवान जगन्नाथ बिना हाथ पांव के रह गए

महारानी गुंडीचा देवी दरवाजे से कान लगाकर अक्सर छेनी-हथौड़े के चलने की आवाजें सुना करती थीं.  महारानी रोज की तरह कमरे के दरवाजे से कान लगाए खड़ी थीं.

पंद्रह दिन बाद उन्हें कमरे से आवाज सुनायी पड़नी बंद हो गई. जब मूर्तिकार के काम करने की कोई आवाज न मिली तो रानी चिंतित हो गईं.

उन्हें लगा कि वृद्ध आदमी है, खाता-पीता भी नहीं कहीं उसके साथ कुछ अनिष्ट न हो गया हो. व्याकुल होकर रानी ने दरवाजे को धक्का देकर खोला और भीतर झांककर देखा.

महारानी गुंडीचा देवी ने इस तरह मूर्तिकार को दिया हुआ वचन भंग कर दिया था. मूर्तिकार अभी मूर्तियां बना रहा था परंतु रानी को देखते ही अदृश्य हो गए. मूर्ति निर्माण का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ था. भगवान के हाथ-पैर अभी नहीं बन सके थे.

राजा और रानी दोनों विलाप करने लगे. उन्होंने अपना वचन भंग कर दिया था. बिना हाथ पांव की भगवान की प्रतिमाएँ मंदिर में कैसे स्थापित होंगी. राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडीचा यह सोचकर विलाप करते रहे. उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया. वे दिन-रात भगवान से क्षमा प्रार्थना करते.

अपने भक्तों की यह स्थिति देखकर भगवान को दया आई. उन्होंने दोनों के हृदय में प्रेरणा दी तुम व्यर्थ चिंतित हो रहे हो. जो शिल्पी आए थे वे स्वयं भगवान विश्वकर्मा थे. उन्हें यह कार्य सौंपा गया था.

जिन प्रतिमाओं को तुम अपूर्ण समझ रहे हो वास्तव में वैसी ही प्रतिमा स्थापित होनी थी. मैंने नारद को ऐसा वरदान दिया था. नारद भी इतने समय से तुम्हारे बीच ही गोपनीय रूप में उपस्थित हैं. नारद तुम्हें दर्शन देकर सारा रहस्य बताएंगे.

यह सुनकर राजा और रानी बड़े प्रसन्न हुए. उनकी खुशी की कोई सीमा न रही. वे भगवान की तरह-तरह से स्तुति करने लगे. दोनों ने भगवान से इन मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा का विधान पूछा.

भगवान जगन्नाथ ने स्वयं बताई मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की विधि 

भगवान ने प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा का रहस्य बताना शुरू किया.

नीलांचल पर सौ कुएं बनवाओ. सौ यज्ञों का आयोजन करो. कुओं के जल से मेरा अभिषेक होगा. उसके बाद इसकी स्थापना स्वयं ब्रह्मदेव सेकरेंगे. वहां तुम्हें लेकर नारद जाएंगे.

राजा ने भगवान के आदेशानुसार नीलांचल पर्वत पर विशाल मंदिर का निर्माण कराया. ऐसा विशाल मंदिर उस समय भूलोक पर दूसरा न था. भगवान के बताए अनुसार नारदजी प्रकट हुए. भगवान की इच्छानुसार वह राजा इंद्रद्युम्न को लेकर ब्रह्मलोक की ओर चले.

राजा इंद्रद्यु्मन समय की गति से चलकर ब्रह्मलोक पहुंचे. ब्रह्माजी की स्तुति के बाद उन्हें भगवान की कही बातें बताई. ब्रह्माजी यह जानकर बड़े प्रसन्न हुए. सौभाग्य मानकर वह इसके लिए सहर्ष तैयार हो गए.

ब्रह्माजी ने कहा- तुम आगे चलो मैं पीछे से आऊंगा. एक बात का ध्यान रखना. जब तुम वापस जाओगे तब तक धरती पर बहुत कुछ बदल चुका होगा. तुम्हारी कई पीढियां बीत गईं हैं. हजारों वर्ष बीत चुके होंगे. अब तक 71 कल्प निकल गए. मनु भी बदल चुके हैं. इसलिए पृथ्वी पर पहुँचकर विस्मय में मत पड़ना. ब्रह्मलोक का कालखंड धरती के कालखंड के बहुत अलग है.

ब्रह्माजी से विदा लेकर इंद्रद्युम्न नारद के साथ पृथ्वी पर आए. अब वहां राजा गाला का राज्य स्थापित हो चुका था. जो मंदिर विश्वावसु ने बनाया था उसका अधिकांश अंश लुप्त चुका था. इंद्रद्युम्न को दुख तो हुआ लेकिन उन्हें नारद जी ने ब्रह्माजी की बात याद कराई. राजा ने पूजा की तैयारी शुरू की.

ईश्वर की प्रेरणा और कृपा से इंद्रद्युम्न जो तैयारियां कर रहे थे वह कई मायनों में अलौकिक थीं. उस समय के राजा को उसके गुप्तचरों ने सूचना दी कि नीलांचल पर कुछ विस्मयकारी घटनाएँ हो रही हैं.

राजा को लगा कि कोई उसके राज्य में अतिक्रमण करने आया है. वह अपनी सेना लेकर चढ़ आया. लेकिन जब उसने वहां का दृश्य देखा तो वह भाव-विभोर हो गया और इस पुण्य कार्य में शामिल हो गया.

कुओं से निकालकर 108 कलशों में जलभरकर  भगवान के शिशुरूप का अभिषेक आरंभ हुआ.

भगवान ने नारदजी को वचन दिया था कि वह एक साधारण बालक की तरह अपनी लीलाएं करके उन्हें आनंदित करेंगे. इसलिए भगवान ने लीला आरंभ की. इतने स्नान से भगवान को सर्दी लग गई. भगवान का पंद्रह दिनों तक विशेष उपचार किया गया. तब वे जाकर बलरामजी और सुभद्रा के साथ स्वस्थ  हुए.

भगवान श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजी की बिना-हाथ पांव वाली मूर्तियां इसी कारण ऐसी हैं. उन प्रतिमाओं को ही मंदिर में स्थापित कराया गया. कहते हैं विश्वावसु संभवतः उस जरा बहेलिए का वंशज था जिसने अंजाने में भगवान कृष्ण की हत्या कर दी थी. विश्वावसु शायद कृष्ण के पवित्र अवशेषों की पूजा करता था. ये अवशेष मूर्तियों में छिपाकर रखे गए हैं.

विद्यापति और ललिता के वंशज जिन्हें दैत्यपति कहते हैं उनका परिवार ही यहां अब तक पूजा करता है.

भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्ति के निर्माण की प्रक्रिया भी अनोखी है. जिस वर्ष में आषाढ़ मास में अधिकमास होता है उस वर्ष भगवान की नई प्रतिमा बनाई जाती है. पुरानी प्रतिमा को मंदिर के प्रांगण में ही समाधि दे जाती है. इस प्रक्रिया को नवकलेवरम कहते हैं. मंदिर के पुजारी आंख बंद करके प्रतिमा का निर्माण करते हैं. फिर एक विशेष प्रक्रिया से प्राण प्रतिष्ठा की जाती है.

संकलनः

राजन प्रकाश

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