भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथाः भाग दो

भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथाः भाग दो

भगवान जगन्नाथ रथयात्रा कथाः दूसरा भाग

भगवान जगन्नाथ की कथा के पहले भाग में आपने पढ़ा कि श्रीकृष्ण के मुख से सोते समय राधा नाम निकलने के बाद रुक्मिणी आदि पटरानियों को भगवान की ब्रज की लीला जानने को उत्सकुता हुई। वे इसके लिए माता रोहिणी जी के पास पहुँची लेकिन उन्होंने ब्रज की लीला सुनाने के लिए रानियों के सामने एक कठिन शर्त रख दी।

रुक्मिणी और सभी रानियों को कहा गया कि पहले एक ऐसे सुरक्षित स्थान का प्रबंध करो जहां श्रीकृष्ण और बलराम को भी प्रवेश की अनुमति न हो। एक गुप्त स्थान पर रोहिणी जी ने कथा सुनानी शुरू की। श्रीकृष्ण और बलराम को आने से रोकने के लिए बहन सुभद्रा जी को पहरेदारी पर तैनात किया गया लेकिन कथा ऐसी शुरू हुई कि किसी को होश ही न रहा। श्रीकृष्ण और बलराम ने वह कथा सुन ली।

उनकी दशा विचित्र हो गई। नारद वहां पहुँचे और भगवान के जिस रूप के उन्हें उस दिन दर्शन हुए वैसा उन्होंने कभी न देखा था। उन्होंने श्रीकृष्ण से वरदान मांगा कि पृथ्वीवासियों को भी भगवान के इस रूप के दर्शन का सौभाग्य मिले। भगवान ने कलिकाल में जिस रूप के दर्शन का वरदान दिया था, वह समय अब आ गया था। राजा इंद्रद्युम्न इसके हेतु बन रहे थे। अब आगे… जगन्नाथ जी की कथा का पहला भाग नीचे लिंक से पढ़ सकते हैं।

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राजा इंद्रद्युम्न का स्वप्न और विद्यापति की खोज 

राजा इंद्रद्युमन को सपने में उन्हें एक देववाणी सुनाई पड़ी- तुम्हें विशेष कार्य के लिए चुना गया है. तुम निराशा का भाव त्याग दो. भगवान नीलमाधव के जिस विग्रह दर्शन के लिए तुम इतने व्यग्र हो, उसकी खोज करो. तुम अपनी ओर से प्रयास करो, तुम्हें देवों की सहायता प्राप्त होती रहेगी.

तुम एक भव्य मंदिर का निर्माण कराओ. उसके लिए उपयुक्त विग्रह की प्राप्ति भी तुम्हें समय आने पर हो जाएगी.

राजा अचानक हड़बड़ाकर उठ बैठा. वह भागकर अपनी राजसभा में गया. अपने मंत्रियों, पुरोहितों को सारा स्वप्न कह सुनाया. राजपुरोहित के सुझाव पर शुभ मुहूर्त में पूर्वी समुद्र तट पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का निश्चय हुआ. वैदिक-मंत्रोचार के साथ मंदिर निर्माण का श्रीगणेश हुआ.

राजा इंद्रद्युम्न के मंदिर बनवाने की सूचना शिल्पियों और कारीगरों को हुई. सभी इसमें योगदान देने पहुंचे. दिन रात मंदिर के निर्माण में जुट गए. कुछ ही वर्षों में मंदिर बनकर तैयार हुआ.

सागरतट पर विशाल मंदिर का निर्माण तो हो गया परंतु भगवान की मूर्ति की समस्या जस की तस थी. राजा फिर से चिंतित होने लगे. एक दिन मंदिर के गर्भगृह में बैठकर इसी चिंतन में बैठे राजा की आंखों से आंसू निकल आए.

राजा ने भगवान से विनती की- प्रभु आपके किस स्वरूप को इस मंदिर में स्थापित करूं इसकी चिंता से व्यग्र हूं. मार्ग दिखाइए. आपने स्वप्न में जो संकेत दिया था उसे पूरा होने का समय कब आएगा? देवविग्रह विहीन मंदिर देख सभी मुझ पर हँसेंगे.

राजा की आंखों से आंसू झर रहे थे। वह प्रभु से प्रार्थना करते जा रहे थे- प्रभु आपके आशीर्वाद से मेरा बड़ा सम्मान है. प्रजा समझेगी कि मैंने झूठ-मूठ में स्वप्न में आपके आदेश की बात कहकर इतना बड़ा श्रम कराया. हे प्रभु मार्ग दिखाइए.

राजा दुखी मन से अपने महल में चले गए. उस रात को राजा ने फिर एक सपना देखा.

सपने में उसे देववाणी सुनाई दी- राजन! यहां निकट में ही भगवान श्रीकृष्ण का विग्रहरूप है. उस विग्रह के तुम्हारे द्वारा बनाए मंदिर में स्थापना ही विधि का विधान है. वह होकर रहेगा. उस दिव्य विग्रह को खोजने का प्रयास करो, तुम्हें दर्शन मिलेंगे.

इंद्रद्य़ुम्न ने स्वप्न की बात पुनः पुरोहित और मंत्रियों को बताई. सभी यह निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रभु की कृपा सहज प्राप्त नहीं होगी. उसके लिए हमें निर्मल मन से परिश्रम आरंभ करना होगा.

भगवान का विग्रह कहां है, इसका पता लगाने की जिम्मेदारी इंद्रद्युमन ने चार विद्वान पंडितों को सौंप दी. प्रभु इच्छा से प्रेरित चारों विद्वान चार दिशाओं में निकले. उन चारों में एक थे विद्यापति. विद्यापति चारों में से सबसे कम उम्र के थे.

सभी प्रभु के विग्रह की खोज को चल पड़े. पंडित विद्यापति पूर्व दिशा की ओर चले. कुछ आगे चलने के बाद विद्यापति उत्तर की ओर मुडे़ तो उन्हें एक जंगल दिखाई दिया. वन भयावह था.

कौन थी ललिता जिसके एक आदेश पर हिंसक बाघ भी जड़ हो जाता था?

विद्यापति श्रीकृष्ण के उपासक थे. उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया और राह दिखाने की प्रार्थना की. भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन्हें राह दिखने लगी. प्रभु का नाम लेते वह वन में चले जा रहे थे. जंगल के मध्य उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया. पर्वत के वृक्षों से संगीत की ध्वनि सा सुरम्य गीत सुनाई पड़ रहा था.

विद्यापति संगीत के जानकार थे. उन्हें वहां मृदंग, बंसी और करताल की मिश्रित ध्वनि सुनाई दे रही थी. यह संगीत उन्हें दिव्य लगा. यह संगीत तो सामान्य मानवों द्वारा हो ही नहीं सकता. ये वाद्य या तो गंधर्व बजा रहे हैं या स्वयं देवता. संभवतः मैं सही जगह आ पहुँचा हूँ. ऋषि ने राजा इंद्रद्युमन को बताया था कि भगवान के विग्रह की पूजा करने से पहले देवता गीत-संगीत से उन्हें प्रसन्न करते हैं.

इस बात को याद करके विद्यापति को तो जैसे पंख लग गए. संगीत की लहरियों को खोजते विद्यापति आगे बढ़ चले. वे जल्दी ही पहाड़ी की चोटी पर पहुंच गए. पहाड़ के दूसरी ओर उन्हें एक सुंदर घाटी दिखी जहां भील नृत्य कर रहे थे.

विद्यापति उस दृश्य को देखकर मंत्रमुग्ध थे. सफर के कारण थके थे पर संगीत से थकान मिट गयी. उन्हें नींद आने लगी. तभी वहां एक बड़ी विचित्र बात हो गई.

अचानक एक बाघ की गर्जना सुनकर विद्यापति उठे तो देखा कि एक बाघ उनकी ओर दौड़ा आ रहा था. बाघ को देखकर विद्यापति घबरा गए और बेहोश होकर वहीं गिर पडे.

बाघ विद्यापति पर आक्रमण करने ही वाला था कि तभी एक स्त्री ने बाघ को पुकारा. “बाघा! ओ बाघा! रूक जा!”

उस आवाज को सुनकर बाघ मौन खड़ा हो गया. स्त्री ने उसे लौटने का आदेश दिया तो बाघ लौट पड़ा. बाघ स्त्री के पैरों के पास ऐसे लोटने लगा जैसे कोई बिल्ली पुचकार सुनकर खेलने लगती है. युवती बाघ की पीठ को प्यार से थपथपाने लगी, बाघ स्नेह से लोटता रहा.

वह स्त्री वहां मौजूद स्त्रियों में सर्वाधिक सुंदर थी. वह भीलों के राजा विश्वावसु की इकलौती पुत्री थी- ललिता. ललिता ने अपनी सेविकाओं को अचेत विद्यापति की देखभाल के लिए भेजा. सेविकाओं ने झरने से जल लेकर विद्यापति पर छिड़का.

कुछ देर बाद विद्यापति की चेतना लौटी. उन्हें जल पिलाया गया. विद्यापति यह सब देखकर कुछ आश्चर्य में थे.

ललिता विद्यापति के पास आई और पूछा- आप कौन हैं? भयानक जानवरों से भरे इस वन में आप कैसे पहुंचे? आपके आने का प्रयोजन बताइए ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं.

विद्यापति के मन से बाघ का भय पूरी तरह गया नहीं था. ललिता ने यह बात भांप ली. सांत्वना देते हुए बोली- विप्रवर आप मेरे साथ चलें. जब आप स्वस्थ हों तब अपने लक्ष्य की ओर प्रस्थान करें.

विद्यापति ललिता के पीछे-पीछे उनकी बस्ती की तरफ चल दिए. विद्यापति भीलों के राजा विश्वावसु से मिले. विश्वावसु को उन्होंने अपना पूरा परिचय नहीं दिया. बस यह कहा कि वह श्रीकृष्ण के भक्त हैं. वह भ्रमण करके लोगों को भगवान के विषय में ज्ञान देते हैं. उनकी शंका का समाधान करते हैं.

विद्यापति ने अपना वास्तविक परिचय तब तक छुपाना उचित समझा जब तक कि वह अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाए. विश्वावसु भी विद्यापति जैसे विद्वान से मिलकर बड़े प्रसन्न हुए.

विश्वावसु के अनुरोध पर विद्यापति कुछ दिन उनके यहां अतिथि बनकर रूके. वह भीलों को धर्म और ज्ञान का उपदेश देने लगे. उनके उपदेशों को विश्वावसु तथा ललिता बड़ी रूचि के साथ सुनते थे. ललिता के मन में विद्यापति के लिए प्रेम उपजने लगा.

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विद्यापति ने भी भांप लिया कि ललिता को उनसे प्रेम हो गया है. किंतु विद्यापति एक बड़े कार्य के लिए निकले थे. वह जिस कार्य के लिए निकले थे उसका बस एक संकेत मिला था- संगीत के रूप में. परंतु उससे आगे अभी तक कुछ नहीं हुआ, वह प्रेम कर ही नहीं सकते.

ईश्वर को तो अपनी लीला पूरी करनी थी. अचानक एक दिन विद्यापति बीमार हो गए. बीमार क्या मरणासन्न हो गए. ऐसा लगा कि अब गए कि तब गए. ललिता ने उनकी सेवा-सुश्रुषा की. उसका लाभ हुआ और विद्यापति स्वस्थ भी हो गए. इससे विद्यापति के मन में भी ललिता के प्रति प्रेमभाव पैदा हो गया.

भील राजकुमारी को बाहर से आए ब्राह्मण से प्रेम हुआ तो यह पिता से छुप न सका. उन्हें अपनी प्रतिष्ठा की चिंता हुई. फिर सोचा यदि यह विद्वान विवाह करके यहीं बस जाए तो सारे भीलों को लाभ होगा. विश्वावसु ने विद्यापति के सामने ललिता से विवाह का प्रस्ताव रखा.

विद्यापति ने इसे स्वीकार कर लिया. दोनों का विवाह हुआ. कुछ दिन दोनों के सुखमय बीते. दांपत्य जीवन से विद्यापति प्रसन्न तो थे पर एक चिंता उन्हें सताती रहती. मुझे राजा ने जिस कार्य के लिए भेजा है वह अधूरा है. पर सूझता ही न था कि आगे क्या करें.

विश्वावसु अपने देवता की छुपकर पूजा क्यों करता था?

इस बीच विद्यापति को एक विशेष बात पता चली. विश्वावसु एक पहर रात बाकी रहती, तभी उठता है और कहीं चला जाता है. सूर्योदय के बाद ही लौटता था. कितनी भी विकट स्थिति आए, उसका यह नियम कभी नहीं टूटता था. ऐसा वह न जाने कब से करता आया था.

भीलराजा विश्वावसु के इस व्रत पर विद्यापति को आश्चर्य हुआ. उनके मन में इस रहस्य को जानने की इच्छा हुई, आखिर विश्वावसु जाता कहां है. कहीं इसका संबंध उस अभियान से तो न, जिसके लिए मैं यहां आ पहुंचा हूँ. कहीं ईश्वर मुझे संकेत तो नहीं दे रहे. यह सोचकर विद्यापति परेशान थे.

ललिता ने परेशान देखा तो कारण पूछ लिया. विद्यापति ने ललिता से पूछा- विश्वावसु प्रतिदिन कहां जाते हैं? विकट से विकट परिस्थिति में भी उनका नियम नहीं टूटता ऐसा क्यों? मुझे यह जानने की बड़ी तीव्र इच्छा है. यही सोचकर मैं परेशान हूं.

ललिता के सामने धर्मसंकट आ गया. वह पति की बात को ठुकरा नहीं सकती थी लेकिन पति जो पूछ रहा था उसे बता नहीं सकती थी. यह उसके वंश की गोपनीय परंपरा से जुड़ी बात थी जिसे खोलना संभव नहीं था.

ललिता ने कहा- स्वामी! यह हमारे कुल का रहस्य है जिसे किसी के सामने खोला नहीं जा सकता. आप मेरे पति हैं। मैं आपको कुल का पुरुष मानते हुए, जितना संभव है, बताऊंगी।

यहां से कुछ दूरी पर एक गुफा है जिसके अन्दर हमारे कुलदेवता हैं. उनकी पूजा हमारे सभी पूर्वज करते आए हैं. यह पूजा निर्बाध चलनी चाहिए. उसी पूजा के लिए पिताजी रोज सुबह नियमित रूप से जाते हैं.

विद्यापति ने ललिता से कहा— तुमने मुझे कुल का पुरुष माना तो क्या मैं कुलदेवता का दर्शन नहीं कर सकता? मेरी बड़ी इच्छा है दर्शन की. तुम इसे पूरी करो.

ललिता बोली—यह संभव ही नहीं। हमारे कुलदेवता के बारे में किसी को जानने की इच्छा है, यह सुनकर मेरे पिता क्रोधित हो जाएंगे.

विद्यापति ने कहा- देवता के दर्शन से किसी को रोकना तो घोर पाप है. तुम्हारे पिता ऐसा पाप कैसे करेंगे? मैं धर्मनिहूँ. धर्म का पालन करता हूं. इसलिए देवता के दर्शन का तो मेरा अधिकार है. मुझे इस अधिकार से न वंचित करो, प्रिय।

ललिता तर्क से सहमत थी पर एक बात ऐसी थी जिससे वह विवश थी. वह विद्यापति को यह बात स्वयं नहीं बताना चाहती थी. उसने एक निर्णय किया.

विद्यापति की उत्सुकता बढ़ रही थी. वह तरह-तरह से ललिता के अपने प्रेम की शपथ देकर उसे मनाने लगे. उसने पतिव्रत धर्म निभाने की शपथ दिलाई. ललिता से कहा कि जो स्त्री पति की इच्छा नहीं पूरी करती वह मोक्ष नहीं पाती. उसका पति भी प्रेत बनकर भटकता रहता है. उसके कुल का उद्धार नहीं होता.

ललिता ने हारकर कहा कि अपने पिताजी से विनती करेगी कि वह आपको दर्शन करा दें. ललिता ने पिता को सारी बात बताई तो वह क्रोधित हो गए.

ललिता ने विश्वावसु से कहा- मैं आपकी अकेली संतान हूं. आपके बाद देवता के पूजा का दायित्व मेरा होगा. इसलिए मेरे पति का यह अधिकार बनता है क्योंकि आगे उसे ही पूजना होगा. आप पुत्र और पुत्री में भेद नहीं कर सकते. जामाता को पुत्र समझें और उसे उसका अधिकार दें.

विश्वावसु इस तर्क के आगे झुक गए.

वह बोले- गुफा के दर्शन किसी को तभी कराए जा सकते हैं जब वह भगवान की पूजा का दायित्व अपने हाथ में ले ले. तुम भली-भांति जानती हो कि मैं विद्यापति को वहां क्यों नहीं जाने देना चाहता.

ललिता बोली- मैं जानती हूं पर विद्यापति अब कोई यात्री नहीं. वह हमारे परिवार का सदस्य हैं. वह यहीं के वासी हो चुके हैं. इसलिए उनके दर्शन करने से देवता का संकट नहीं आएगा. हमारे कुलदेवता लुप्त नहीं होंगे.

विद्यापति छुपकर पिता-पुत्री के बीच की बात सुन रहे थे. भीलों के अतिरिक्त किसी के दर्शन से देवता लुप्त हो जाएंगे, यह सुनकर वह अपना कौतूहल रोक न सके. वे पिता-पुत्री के सामने आकर खड़े हो गए और पूछा- देवता के लुप्त होने का क्या रहस्य है?

विश्वावसु ने जब जाना कि विद्यापति ने उसके देवता का रहस्य सुन लिया है तो उनका हृदय धक कर गया.

ऐसा क्या रहस्य था जो विश्वावसु अपने दामाद विद्यापति तक से छुपाना चाहते थे? और क्यों? किसी के दर्शन से देवता लुप्त क्यों हो जाते थे?

यह सब हम भगवान जगन्नाथ के प्रकट होने की कहानी के तीसरे हिस्से में जानेंगे।

।।बोलिए भगवान श्री जगन्नाथ की जय।।