भगवान जगन्नाथ रथयात्रा कथाः तीसरा भाग
पढ़िए भगवान जगन्नाथ रथयात्रा कथा का तीसरा भाग, जिसमें विद्यापति, विश्वावसु, नीलमाधव और राजा इंद्रद्युम्न की अद्भुत कथा आगे बढ़ती है। इस हिस्से में हम जानेंगे कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति सबसे पहले किसने देखी? भगवान जगन्नाथ की मूर्ति कैसे बनती है इसका रहस्य भी इसी अंश में खुलेगा.
पिछले दो भागों में आपने पढ़ा कि कैसे संयोगवश नारद जी ने भगवान श्रीकृष्ण का एक ऐसा स्वरूप देख लिया जो उनसे पहले किसी ने देखा था. उन्होंने भगवान से वरदान मांग लिया कि वे इस रूप में धरती पर भी दर्शन दें. भगवान ने उन्हें वचन दिया कि वे कलिकाल में अपना यह रूप प्रकट करेंगे. लेकिन कहाँ करेंगे, और किसके माध्यम से करेंगे, इसके लिए प्रतीक्षा करो.
कलिकाल में भगवान श्रीकृष्ण ने अपना वचन निभाने के लिए राजा इंद्रद्युम्न को माध्यम के रूप में चुना. राजा को सपने में बार-बार भगवान के दर्शन होते. वह सपना ऐसा विचित्र होता कि सारे विद्वान हार गए उसका रहस्य समझने में.
इंद्रद्युम्न ने रोते-बिलखते भगवान से प्रार्थना की तो उन्होंने कुछ संकेत दिए. उन्हीं संकेतों पर चलता हुआ एक विद्वान विद्यापति भीलों के एक राज्य में जा पहुँचा. उसे वहां एक के बाद एक कई चमत्कार होते दिखे.
भगवत कार्य में निकले विद्यापति को भगवान तो न मिले लेकिन पत्नी मिल गई. वह दुखी रहने लगा तो भगवान ने फिर माया दिखाई. और उसे अपनी पत्नी ललिता के माध्यम से कुल का एक ऐसा रहस्य हाथ लग गया जो आगे चलकर नारद को दिए भगवान के वचन को पूरा करने वाला था.
अब आगे भगवान जगन्नाथ प्राकट्य कथा का तीसरा भाग पढ़ें. कथा आगे बढ़ाने से पहले प्रेम से बोलिए भगवान जगन्नाथ की जय.
नीलमाधव का रहस्य कौन खोल रहा था?
विद्यापति ने अपने ससुर को विश्वास दिलाया कि वह दायित्व को पूरा करेगा. इसके लिए वह ईश्वर की सौगंध लेने को तैयार है तो विश्वावसु ने वह रहस्य बताना शुरू किया.
विश्वावसु बोले- यहां देवताओं का प्रतिदिन आगमन होता है. वे अपने साथ विविध प्रकार के नैवेद्य, फल-फूल आदि लेकर आते हैं. वे हमारे कुलदेवता की पूजा करने आते हैं. उनके पूजन में किसी तरह का विघ्न न हो इसके लिए उन्होंने चारों तरफ पहाड़ और वन बना दिए हैं.
कोई विघ्न न डाले इसके लिए वन में हिंसक जंतु हैं. इसी कारण तुम्हें इस क्षेत्र में अनुपम सुगंध, अनुपम फल-पुष्प प्राप्त होते हैं जो कहीं और नहीं होते. यक्ष आदि देवता के लिए गीत गाते हैं. उनके पूजन करने के जाने के उपरांत मैं पृथ्वीवासियों की ओर से उनकी पूजा करता हूं. उनकी कृपा से ही हम सभी प्रकार के संकटों से मुक्त हैं.
हमारे देवता की प्रतिमा ऐसी मनोहर है कि जो उसे देखता है देखता ही रह जाता है. एक रहस्यमयी प्रतिमा है जिसमें बहुत आकर्षण है. सबके लिए उसे देखना भी संभव नहीं. जो देख ले वही उसे अपने साथ लिए जाना चाहेगा.
एक बार हमारे पूर्वजों को शंका हुई कि कहीं कोई हमारे देवता की प्रतिमा लेकर तो नहीं चला जाएगा. उ्न्होंने यह शंका स्वर्गलोक से आने वाले देवताओं के सामने रखी. देवताओं ने बताया कि कलिकाल में एक राजा इसे यहां से ले जाकर कहीं और प्रतिष्ठित कर देगा. कहीं देवता के प्रस्थान के साथ ही हमारा दुर्भाग्य न आ जाए इसीलिए किसी को भी दर्शन नहीं करने दिया जाता.
तुम बाहर से आए हो. इसलिए तुम्हें दर्शन से रोक रहा था. पर तुमने शपथ ली है तो मुझे थोड़ा भरोसा हुआ है. मैं तुम्हें दर्शन को लेकर तो जाउंगा पर अभी वह मार्ग नहीं बताउंगा. मेरे जीवनकाल तक पूजा का दायित्व मेरा है. मेरे उपरांत तुम पूजन करोगे. पुत्री की जिद के कारण मैं तुम्हें कल आँखों पर पट्टी बांधकर ले चलने को तैयार हूं.
विद्यापति के मन में अब कोई संदेह ही न रहा कि यह वही प्रतिमा है जिसे खोजने वह निकले हैं. उनका लक्ष्य पूरा होने को था. विद्यापति केवल दर्शन करने तो आए नहीं थे. उन्हें मूर्ति लेकर जानी थी. इसलिए उन्होंने एक चाल चली.
दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व विद्यापति की आंखों पर पट्टी बांधकर विश्वावसु उनका दायां हाथ पकड़कर चले. विद्यापति ने बाईं मुट्ठी में सरसों रख लिया था. रास्ते में वह सरसों छोड़ते हुए गए. काफी देर चलने के बाद विश्वावसु रूके.
विश्वावसु ने विद्यापति के आँखों की काली पट्टी खोल दी. वे एक गुफा के सामने थे. उस गुफा में नीले रंग का प्रकाश चमक उठा. हाथों में मुरली लिए भगवान श्रीकृष्ण का रूप विद्यापति को दिखाई दिया. विद्यापति आनंदमग्न हो गए. उन्होंने भगवान के दर्शन किए, स्तुति की.
दर्शन के बाद तो जैसे विद्यापति जाना ही नहीं चाहते थे. विश्वावसु ने लौटने का आदेश दिया तो विवश होकर उठे. फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधी और दोनों लौट पड़े.
लौटने पर ललिता ने विद्यापति से पूछा- क्या आपके प्रदेश में भी हमारे कुलदेवता जैसी प्रतिमा है? क्या आपने ऐसा विग्रह कहीं और देखा है? आप उन्हें किस नाम से जानते हैं, कैसे पूजते हैंं?
ललिता ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी पर विद्यापति चुप रहे.
गुफा में दिखे अलौकिक दृश्य के बारे में पत्नी को बताना उचित नहीं समझा. विश्वावसु के कुलदेवता ही नीलमाधव भगवान हैं, अब यह पक्का हो चुका था.
महाराज ने स्वप्न में जिस प्रभु विग्रह के बारे में देववाणी सुनी थी, वह यही भगवान नीलमाधव हैं. किसी तरह इसी विग्रह को लेकर राजधानी पहुंचना होगा.
नीलमाधव की चोरी और इंद्रद्युम्न का विचित्र स्वप्न
विद्यापति गुफा से मूर्ति लेकर जाने की सोच तो रहे थे, पर भीलराज से विश्वासघात के विचार से मन व्यथित भी था. विद्यापति धर्म-अधर्म के बारे में सोचते रहे. फिर विचार आया, यदि विश्वावसु ने सचमुच विश्वास किया होता तो आंखों पर पट्टी बांधकर गुफा तक नहीं ले जाते. इसलिए उनके साथ विश्वासघात का प्रश्न नहीं उठता.
विद्यापति ने गुफा से मूर्ति चुराने का निश्चय कर ही लिया.
विद्यापति ने ललिता से कहा कि वह अपने माता-पिता के दर्शन के लिए जाना चाहता है. वे उसे लेकर परेशान होंगे. ललिता भी साथ चलने को तैयार हुई. विद्यापति ने यह कहकर समझा लिया कि वह शीघ्र ही लौटेगा तो उसे लेकर जाएगा.
ललिता मान गई. विश्वावसु ने उसके लिए घोड़े का प्रबंध किया. अब तक सरसों के दाने से पौधे निकल आए थे. उनको देखता विद्यापति गुफा तक पहुंच गए. भगवान की स्तुति की और क्षमा प्रार्थना के बाद मूर्ति उठाकर झोले में रख ली.
लंबे सफर के बाद वह राजधानी पहुंच गए और सीधे राजा के पास गए. दिव्य प्रतिमा राजा को सौंप दी और पूरी कहानी सुनायी. राजा ने बताया कि उसने कल एक सपना देखा कि सुबह सागर में एक लकड़ी का कुन्दा बहकर आएगा.
उस कुंदे की नक्काशी करवाकर भगवान की मूर्ति बनवा लेना जिसका अंश तुम्हें प्राप्त होने वाला है. वह भगवान श्रीविष्णु का स्वरूप होगा. तुम जिस मूर्ति को लाए हो वह भी भगवान विष्णु का अंश है. दोनों आश्वस्त थे कि उनकी तलाश पूरी हो गई है.
राजा ने कहा- जब भगवान द्वारा भेजी लकड़ी से हम इस प्रतिमा का बड़ा स्वरूप बनवा लेंगे तब तुम अपने ससुर से मिलकर उन्हें मूर्ति वापस कर देना. उनके कुलदेवता का विशाल विग्रह एक भव्य मंदिर में स्थापित देखकर उन्हें खुशी ही होगी.
दूसरे दिन सूर्योदय से पूर्व इंद्रद्युम्न विद्यापति तथा मंत्रियों को लेकर सागरतट पर पहुंचे. स्वप्न के अनुसार एक बड़ा कुंदा पानी में बहकर आ रहा था. सभी उसे देखकर प्रसन्न हुए. दस नावों पर बैठकर राजा के सेवक उस कुंदे को खींचने पहुंचे.
मोटी-मोटी रस्सियों से कुंदे को बांधकर खींचा जाने लगा लेकिन कुंदा टस से मस न हुआ. और लोग भेजे गए. सैकड़ों लोग और नावों का प्रयोग करके भी कुंदे को हिलाया तक नहीं जा सका.

राजा का मन उदास हो गया. सेनापति ने एक लंबी सेना कुंदे को खींचने के लिए भेज दी.
सारे सागर में सैनिक ही सैनिक नजर आने लगे लेकिन सभी मिलकर कुंदे को अपने स्थान से हिला तक न सके. सुबह से रात हो गई.
अचानक राजा ने काम रोकने का आदेश दिया. उसने विद्यापति को अकेले में ले जाकर कहा कि वह समस्या का कारण जान गया है. राजा के चेहरे पर संतोष के भाव थे. राजा ने विद्यापति को गोपनीय रूप से कहीं चलने की बात कही.
राजा इंद्रद्युम्न ने कहा कि अब भगवान का विग्रह बन जाएगा बस एक काम करना होगा. मुझे भगवान के संकेत मिल रहे हैं. इंद्रद्युम्न जान गए थे कि प्रभु के विग्रह के लिए आई लकड़ी का कुंदा हिल-डुल भी क्यों नहीं रहा.
राजा ने कहा- विद्यापति इस दिव्य मूर्ति की अब तक जो पूजा करता आया था उससे तुरंत भेंट करके क्षमा मांगनी होगी. बिना उसके स्पर्श किए यह कुंदा आगे नहीं बढ सकेगा.
राजा इंद्रद्युम्न और विद्यापति विश्वावसु से मिलने पहुंचे. राजा ने पर्वत की चोटी से जंगल को देखा तो उसकी सुंदरता को देखता ही रह गया. दोनों भीलों की बस्ती की ओर चुपचाप चलते रहे.
इधर विश्वावसु अपने नियमित दिनचर्या के हिसाब से गुफा में अपने कुलदेवता की पूजा के लिए चले. वहां प्रभु की मूर्ति गायब देखी तो वह समझ गए कि उनके दामाद ने ही यह छल किया है.
विश्वावसु लौटे और ललिता को सारी बात सुना दी. विश्वावसु पीड़ा से भरे घर के आंगन में पछाड़ खाकर गिर गए. ललिता अपने पति द्वारा किए विश्वासघात से दुखी थी. स्वयं को इसका कारण मान रही थी.
पिता-पुत्री दिनभर विलाप करते रहे. दोनों अनहोनी की आशंका से चिंतित थे. अब भीलों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. उनका कुल, उनके लोग नष्ट हो जाएंगे. दोनों यही कहते विलाप कर रहे थे.
भक्त दुखी हो तो फिर भगवान को चैन कहाँ?
सारा दिन विलाप करते निकल गया. दोनों विलाप करते बेसुध हो जाते. सुध आती तो फिर रोने लगते और बेहोश हो जाते. ऐसे ही एक दिन बीत गया.
अगली सुबह विश्वावसु उठे और सदा की तरह दिनचर्या का पालन करते हुए गुफा की तरफ बढ़ निकले. वह जानते थे कि प्रभु का विग्रह वहां नहीं है फिर भी उनके पैर गुफा की ओर खींचे चले जाते थे.
विश्वावसु के पीछे ललिता और रिश्तेदार भी चले. विश्वावसु गुफा के भीतर पहुंचे. जहां भगवान की मूर्ति होती थी उस चट्टान के पास हाथ जोड़कर खडे रहे. फिर उस ऊंची चट्टान पर गिर गए और बिलख–बिलखकर रोने लगे. उनके पीछे प्रजा भी रो रही थी.
एक भील युवक भागता हुआ गुफा के पास आया. उसने बताया कि महाराज और उनके साथ विद्यापति बस्ती की ओर आ रहे हैं. यह सुनकर सब चौंक उठे. विश्वावसु राजा के स्वागत में गुफा से बाहर आए लेकिन उनकी आंखों में आंसू थे.
राजा इंद्रद्युमन विश्वावसु के पास आए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया.
राजा बोले- भीलराज, तुम्हारे कुलदेवता की प्रतिमा का चोर तुम्हारा दामाद नहीं मैं हूं. उसने तो अपने महाराज के आदेश का पालन किया.
यह सुनकर सब चौंक उठे.
विश्वावसु ने राजा को आसन दिया. राजा ने उस विश्वावसु को शुरू से अंत तक पूरी बात बताकर कहा कि आखिर क्यों यह सब करना पड़ा. फिर राजा ने उनसे अपने स्वप्न और फिर जगन्नाथपुरी में सागरतट पर मंदिर निर्माण की बात कह सुनाई.
राजा ने विश्वावसु से प्रार्थना की- भील सरदार विश्वावसु, कई पीढ़ियों से आपके वंश के लोग भगवान की मूर्ति को पूजते आए हैं. भगवान के उस विग्रह के दर्शन सभी को मिले इसके लिए आपकी सहायता चाहिए.
ईश्वर द्वारा भेजे गए लकड़ी के कुंदे से बनी मूर्ति के भीतर हम इस दिव्य मूर्ति को सुरछित रखना चाहते हैं. अपने कुल की प्रतिमा को पुरी के मंदिर में स्थापित करने की अनुमति दो. उस कुंदे को तुम स्पर्श करोगे तभी वह हिलेगा.
विश्वावसु राजी हो गए. राजा सपरिवार विश्वावसु को लेकर सागरतट पर पहुंचे. विश्वावसु ने कुंदे को छुआ. छूते ही कुंदा अपने आप तैरता हुआ किनारे पर आ लगा. राजा के सेवकों ने उस कुंदे को राजमहल में पहुंचा दिया.
अगले दिन मूर्तिकारों और शिल्पियों को राजा ने बुलाकर मंत्रणा की कि आखिर इस कुंदे से कौन सी देवमूर्ति बनाना शुभदायक होगा. मूर्तिकारों ने कह दिया कि वे पत्थर की मूर्तियां बनाना तो जानते हैं लेकिन लकड़ी की मूर्ति बनाने का उन्हें ज्ञान नहीं.
एक नए विघ्न के पैदा होने से राजा फिर चिंतित हो गए. राजा पुनः भगवान का स्मरण करने लगे. भगवान ने प्रेरणा दी कि तुम इसकी चिंता छोड़ो. तुम्हारे पास एक योग्य शिल्पी पधारेंगे. वही इस विग्रह का निर्माण कर सकते हैं. वे नियम के बड़े पक्के हैं. तुम उन्हें मान लेना और अपना वचन मत भंग करना.
भगवान ने योग शिल्पी बनाकर किसे भेजा? क्या भगवान नीलमाधव की प्रतिमा बन गई? या फिर कोई नया विघ्न खड़ा हो गया?
पढ़ें इस कथा के चौथे भाग में.
संकलनः
राजन प्रकाश
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