शिवरात्रि पूजा का महत्वः सावन की शिवरात्रि की पूूजा की सरलतम विधि
शिवरात्रि पूजा का महत्व और सावन की शिवरात्रि का सृष्टि से सरोकार
शिवजी को सावन मास अति प्रिय है। वैसे तो प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मास शिवरात्रि होती है, लेकिन श्रावण मास और फाल्गुन मास की शिवरात्रि पूजा महत्व विशेष महत्व कहा गया है। इस पोस्ट में हम विशेष रूप से सावन में शिवरात्रि पूजा का महत्व क्या है, इस पर चर्चा करेंगे।
सावन में प्रकृति भी जैसे शिवमय हो जाती है। चारों ओर वर्षा की बूंदें, हरियाली और गंगाजल लेकर भोलेनाथ के मंदिरों की ओर जाते कांवड़िए—भक्ति का अद्भुत वातावरण बना देते हैं। इस पावन अवसर पर भक्त भगवान शिव, माता पार्वती और पूरे शिव परिवार की पूजा करके सुख-शांति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
शिवजी की विधिवत पूजा कैसे होती है, अभिषेक के नियम क्या हैं, प्रदोष काल में शिवजी की पूजा कैसे करनी चाहिए, महादेव के किन मंत्रों से मनचाहे अभीष्ट प्राप्त होते हैं—इन सभी की सरल और संक्षिप्त जानकारी इस पोस्ट में आपको मिलेगी।

सावन की शिवरात्रि का महत्व
भगवान शिव विरक्त हैं, माया से मुक्त हैं, फिर भी उन्होंने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इससे संसार को यह संदेश मिलता है कि साधना और गृहस्थ जीवन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सृष्टि को चलाने के लिए त्याग के साथ-साथ परिवार, समाज और कर्तव्य का पालन भी आवश्यक है।
सावन की शिवरात्रि भक्तों को यह स्मरण कराती है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी अपने मन को भगवान शिव के चरणों से जोड़े रख सकता है।
भक्तों की मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन भगवान शिव अपने अंशरूप में शिवलिंग में विशेष रूप से विद्यमान रहते हैं। इसलिए इस दिन किया गया जलाभिषेक, मंत्र-जाप और पूजन अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
शिवजी को प्रसन्न करने के लिए बड़े-बड़े आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। पंचाक्षर मंत्र—
ॐ नमः शिवाय
का जाप करते हुए एक लोटा शुद्ध जल भी श्रद्धा से चढ़ाया जाए, तो भोलेनाथ भक्त के भाव को स्वीकार करते हैं।
शिवरात्रि पूजा का महत्व बताने से पहले जानते हैं पुराणों में शिवरात्रि के बारे में क्या कहा गया है।
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फाल्गुन मास की शिवरात्रि का पौराणिक महत्व: फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात मां पार्वती और भगवान शिव का विवाह हुआ था, इसलिए यह तिथि अत्यंत उत्तम मानी गई है।
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सावन का विशेष महत्व: सावन मास भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। सोमवार और सावन की शिवरात्रि के दिन भगवान शिव अंशरूप में प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहते हैं।
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सृष्टि और शिवरात्रि: शिवपुराण के अनुसार, सृष्टि के निर्माण के समय महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में शिव का रूद्र रूप प्रकट हुआ था। यह पावन पर्व मानव जाति को स्मरण कराता है कि सात्विक शक्तियों को जीवित रखें, अन्यथा सृष्टि का नाश अवश्यंभावी है।
सावन की शिवरात्रि पूजा विधि (Pradosh Kaal Puja Vidhi)

यदि आप सावन की शिवरात्रि पूजा सही तरीके से करना चाहते हैं, तो इन नियमों का पालन करें। इस विधि से शिवरात्रि की पूजा का महत्व विशेष माना जाता हैः
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शिवरात्रि के दिन व्रत का संकल्प लें और भगवान शंकर, माता पार्वती तथा पूरे शिव परिवार की विधि-विधान से पूजा करें।
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पूरा दिन निराहार रहकर व्रत का पालन करना कठिन हो, तो प्रदोष काल (संध्याकाल) तक व्रत रखकर पूजा के बाद सात्विक आहार ग्रहण कर सकते हैं।
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रात्रि में स्वच्छ वस्त्र धारण कर शुद्ध आसन पर बैठें और भगवान भोलेनाथ का ध्यान करें।
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शिवलिंग का अभिषेक: जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर, गंगाजल और गन्ने के रस में से जो भी उपलब्ध हो, उससे शिवलिंग का अभिषेक करें।
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अभिषेक के पश्चात बेलपत्र, शमीपत्र, कुशा, दूब, भांग, धतूरा और श्रीफल (नारियल) अर्पित करें।
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इस व्रत में चारों पहर की पूजा का विशेष महत्व माना गया है। लेकिन सावन की शिवरात्रि में चारों प्रहर की पूजा की उतनी परंपरा नहीं है। संभव न हो तो इसे छोड़ा भी जा सकता है।
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सावन की शिवरात्रि पूजा महत्व और व्रत की विधि
सावन की शिवरात्रि पर भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं। परंपरा में पूरे दिन निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा करने का विधान बताया गया है।
यदि कोई भक्त पूरे दिन निराहार नहीं रह सकता, तो प्रदोष काल तक व्रत रखकर संध्या में पूजा के बाद सात्त्विक आहार ग्रहण कर सकता है। भगवान शिव भक्त की भावना देखते हैं; स्वास्थ्य को कष्ट देना भक्ति की अनिवार्य शर्त नहीं है।
व्रत रखने वाले भक्त फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बना सात्त्विक भोजन ग्रहण कर सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और रोगियों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार ही व्रत रखना चाहिए।
सच्चा व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं है। क्रोध, झूठ, निंदा, अहंकार और कटु वाणी का त्याग करना भी शिवभक्ति का ही अंग है।
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शिवरात्रि में चारों प्रहर की पूजा का महत्व
सावन की शिवरात्रि की रात्रि में चारों प्रहर पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है। भक्त प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक करके भगवान शिव का ध्यान और मंत्र-जाप करते हैं।
यदि पूरी रात पूजा करना संभव न हो, तो अपनी सुविधा के अनुसार प्रदोष काल या रात्रि में महादेव का स्मरण करें। श्रद्धा से किया गया एक बार का नाम-जाप भी भोलेनाथ को प्रिय है।
चारों प्रहर में इन मंत्रों का जाप किया जा सकता है—
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पंचाक्षर मंत्रः ॐ नमः शिवाय
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महामृत्युंजय मंत्रः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
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शिव गायत्री मंत्रः ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
रुद्राभिषेक करने से भगवान शंकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता है। रुद्राभिषेक करते समय मंदिर की परंपरा और पूजा-विधि का सम्मान करें।
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मासिक और सावन शिवरात्रि के 17 अचूक मंत्र
संकट मुक्ति, कर्ज से छुटकारा और गृहकलह दूर करने के लिए शिव मंदिर में दीपक जलाकर इन 17 मंत्रों से भगवान शिव का स्मरण करें:
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ॐ शिवाय नम:
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ॐ सर्वात्मने नम:
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ॐ त्रिनेत्राय नम:
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ॐ हराय नम:
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ॐ इन्द्र्मुखाय नम:
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ॐ श्रीकंठाय नम:
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ॐ सद्योजाताय नम:
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ॐ वामदेवाय नम:
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ॐ अघोरहृदयाय नम:
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ॐ तत्पुरुषाय नम:
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ॐ ईशानाय नम:
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ॐ अनंतधर्माय नम:
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ॐ ज्ञानभूताय नम:
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ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:
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ॐ प्रधानाय नम:
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ॐ व्योमात्मने नम:
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ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम:
इन मंत्रों का जाप करने के बाद अपने इष्ट को प्रणाम करके शिव गायत्री मंत्र का जाप करें—
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्।
इसके बाद शिवजी का ध्यान करते हुए प्रार्थना करें—
हे भोलेनाथ! मेरे सिर से ऋण का भार उतार दीजिए। मेरे घर का कलह-क्लेश मिटा दीजिए। मुझे निर्भार जीवन जीने की शक्ति दीजिए। मेरा मन आपकी भक्ति में आगे बढ़ता रहे। मैं केवल अपनी समस्याओं को याद न करता रहूं, बल्कि आपका नाम लेकर सही मार्ग पर चलता रहूं।
राशि अनुसार करें महादेव की पूजा (Rashi Anusar Shiv Puja)

भगवान शिव सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। जलाभिषेक ही उनकी पूजा का सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है। फिर भी ज्योतिषीय परंपराओं में राशि के अनुसार अलग-अलग द्रव्यों से शिवजी का अभिषेक करने की मान्यता है।
शिवरात्रि की पूजा का विशेष महत्व कहा गया है। विशेष कष्टों के निदान और राशि अनुकूल कृपा पाने के लिए इन द्रव्यों से अभिषेक करें:
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मेष: जल से महादेव का अभिषेक करें।
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वृषभ: गंगा जल या गंगा जल मिश्रित जल अर्पित करें।
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मिथुन: भगवान को बेलपत्र जरूर अर्पित करें।
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कर्क: दूध से शिवलिंग का अभिषेक करें।
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सिंह: अनार का रस या जल के साथ रक्त चंदन अर्पित करें।
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कन्या: गन्ने के रस से स्नान कराएं।
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तुला: चांदी से निर्मित सर्प अर्पित करें।
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वृश्चिक: लाल वस्त्र अर्पित कर जल और रक्त चंदन का लेप करें।
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धनु: केसर युक्त कच्चा गाय का दूध अर्पित करें।
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मकर व कुंभ: जलाभिषेक कर थोड़े काले तिल अर्पित करें।
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मीन: पीले पदार्थों का भोग लगाएं और हल्दी का लेप करें।
जैसा कि हमने ऊपर बताया कि शिवजी सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं। बस भावना पूरी होनी चाहिए। इसलिए यदि ऊपर बताए गए राशि अनुसार उपाय करना संभव न हो तो जलाभिषेक या गाय के कच्चे दूध से अभिषेक का भी वही फल होता है। संभव हो तो बेलपत्र भी चढ़ा दे। इतना भी पर्याप्त है।
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शिवरात्रि पूजा का महत्वः शिवपुराण के अचूक उपाय और फल
शिव-पार्वती को सर्वसुख प्रदान करने वाला माना गया है। संसार की पीड़ाओं और जीवन की बाधाओं से मुक्ति के लिए सावन की शिवरात्रि पर कुछ सरल उपाय किए जा सकते हैं।
अन्न अर्पित करने की परंपरा
धार्मिक मान्यताओं में भगवान शिव को अलग-अलग अन्न चढ़ाने के अलग-अलग फल बताए गए हैं—
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चावल चढ़ाने से धन-समृद्धि की कामना की जाती है।
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तिल अर्पित करने से पापों के नाश की प्रार्थना की जाती है।
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जौ चढ़ाने से सुख में वृद्धि की कामना की जाती है।
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गेहूं अर्पित करने से संतान और परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
भगवान को अर्पित किए गए अन्न को बाद में जरूरतमंदों में बांट देना चाहिए। अन्नदान और सेवा भी भगवान शिव की पूजा का ही एक रूप है।
शिवरात्रि पूजा का महत्वः विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक
धार्मिक मान्यताओं में शिवजी को अलग-अलग द्रव्य अर्पित करने के अलग-अलग फल बताए गए हैं—
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जलाभिषेक से सुख, शांति और आरोग्य की प्रार्थना की जाती है।
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शक्कर मिला दूध चढ़ाकर बुद्धि और मानसिक शांति की कामना की जाती है।
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गन्ने का रस अर्पित करके आनंद और समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।
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गंगाजल चढ़ाकर पवित्रता और मोक्ष की कामना की जाती है।
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शहद चढ़ाकर जीवन में मधुरता और मधुर वाणी की प्रार्थना की जाती है।
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शुद्ध घी अर्पित करके शक्ति और स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
किसी बीमारी या स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में भगवान का स्मरण करने के साथ उचित चिकित्सकीय सलाह और उपचार भी अवश्य लें।
भगवान शिव को प्रिय फूल
सावन की शिवरात्रि पर भक्त श्रद्धानुसार भगवान शिव को ये फूल और पत्र अर्पित कर सकते हैं—
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लाल और सफेद आंकड़े के फूल।
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चमेली।
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अलसी के फूल।
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शमीपत्र।
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बेला।
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जूही।
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कनेर।
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हरसिंगार।
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धतूरे का फूल।
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बेलपत्र।
यदि सभी सामग्री उपलब्ध न हो, तो केवल शुद्ध जल और बेलपत्र से भी पूजा की जा सकती है। भोलेनाथ को भक्त का निर्मल मन सबसे अधिक प्रिय है। शिवरात्रि की पूजा का इसीलिए तो विशेष महत्व है।
सावन की शिवरात्रि का संदेश
सावन की शिवरात्रि केवल पूजा और व्रत की तिथि नहीं है। यह अपने भीतर की भक्ति, करुणा और सात्त्विकता को जगाने का अवसर है।
भगवान शिव ने विष को अपने कंठ में धारण करके संसार की रक्षा की। इससे हमें सीख मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखें, दूसरों के प्रति करुणा रखें और अपने भीतर की नकारात्मकता को भक्ति में बदलने का प्रयास करें।
शिवरात्रि हमें यह भी स्मरण कराती है कि सात्त्विक गुणों को जीवित रखना आवश्यक है। सत्य, दया, संयम, सेवा और भक्ति से जीवन में शिवत्व जागता है।
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शिवरात्रि की पूजा का महत्व जितना संभव हो सके उतने शिवभक्तों तक पहुँचाएं। यह भी एक तरह की शिवजी की सेवा है। आप इस पोस्ट का लिंक शेयर करके यह पुण्यकार्य कर सकते हैं।
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