स्वयं महालक्ष्मी हैं बिल्व पत्रः बेलपत्र चढ़ाने की विधि, नियम, 10 जरूरी बातें
स्वयं महालक्ष्मी हैं बिल्व पत्रः बेलपत्र चढ़ाने की विधि, नियम व 10 जरूरी बातें
सावन का महीना हो, सोमवार का व्रत हो या देवाधिदेव महादेव की दैनिक पूजा—भगवान शिव की आराधना बिना बेलपत्र (Bilva Patra) के अधूरी मानी जाती है। शिव पुराण के अनुसार, बेलपत्र भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है और इसे अर्पित करने मात्र से भोलेनाथ अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि साक्षात महालक्ष्मी ने क्यों धरा था बिल्व रूप? और भगवान शिव को यह त्रिपत्र इतना प्रिय क्यों है? इसके अलावा, बेलपत्र तोड़ने, चढ़ाने और उसके रखरखाव के कुछ विशेष नियम होते हैं, जिन्हें जानना हर शिव भक्त के लिए बेहद आवश्यक है। आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं बेलपत्र की महिमा, पौराणिक कथा, चढ़ाने की सही विधि और इससे जुड़ी 10 बेहद जरूरी बातें।
इस पोस्ट में आप जानेंगे
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1. भगवान शिव को बेलपत्र क्यों प्रिय है?
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2. महालक्ष्मी को श्रीविष्णु के प्रेम पर संदेह क्यों हुआ?
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3. शिव जी का वरदान और लक्ष्मी जी का बिल्व रूप धरना
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4. भगवान शिव को बेलपत्र क्यों और कैसे अर्पित करें? (10 जरूरी नियम व विधान)
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4.1 भगवान शिव को बेलपत्र क्यों पसंद है?
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4.2 बेलपत्र कितने प्रकार के होते हैं?
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4.3 बेलपत्र तोड़ने के नियम: कब और किस दिन नहीं तोड़ना चाहिए?
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4.4 बेलपत्र कितने दिन तक बासी नहीं होता?
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4.5 क्या बेलपत्र घर में लगाना चाहिए?
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4.6 महादेव को कितने बेलपत्र चढ़ाने चाहिए?
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4.7 बेलपत्र चढ़ाने की सही विधि और नियम
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4.8 बेलपत्र चढ़ाते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
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4.9 शिवलिंग पर चढ़े बेलपत्र का क्या करना चाहिए?
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4.10 बेलपत्र चढ़ाने के आध्यात्मिक और स्वास्थ्य लाभ
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शिवजी को बेलपत्र क्यों प्रिय है?
योगिनीतंत्रम् ग्रंथ में एक बड़ी सुंदर कथा आती है जिससे पता चलता है कि शिवजी को बेलपत्र क्यों प्रिय है? बेलपत्र चढ़ाने की विधि, नियम क्या हैं? बिल्व पत्र या बेल पत्र कैसा होना चाहिए? बेलपत्र चढ़ाने के क्या पुण्य लाभ हैं?

आइए संक्षेप में पहले वह कथा सुनते हैं-
नारदजी ने एकबार भोलेनाथ की स्तुति कर पूछा – प्रभु आपको प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम और सुलभ साधन क्या है. हे त्रिलोकीनाथ आप तो निर्विकार और निष्काम हैं, आप सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं. फिर भी मेरी जानने की इच्छा है कि आपको क्या प्रिय है?
शिवजी बोले- नारदजी वैसे तो मुझे भक्त के भाव सबसे प्रिय हैं, फिर भी आपने पूछा है तो बताता हूं. मुझे जल के साथ-साथ बिल्वपत्र बहुत प्रिय है। जो अखंड बिल्वपत्र मुझे श्रद्धा से अर्पित करते हैं मैं उन्हें अपने लोक में स्थान देता हूं।
नारदजी भगवान शंकर औऱ माता पार्वती की वंदना कर अपने लोक को चले गए. उनके जाने के पश्चात पार्वती जी ने शिव जी से पूछा- हे प्रभु मेरी यह जानने की बड़ी उत्कट इच्छा हो रही है कि आपको बेलपत्र इतने प्रिय क्यों है. कृपा करके मेरी जिज्ञासा शांत करें.
शिवजी बोले- हे शिवे! बिल्व के पत्ते मेरी जटा के समान हैं। उसका त्रिपत्र यानी तीन पत्ते- ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं। शाखाएं समस्त शास्त्र का स्वरूप हैं। विल्ववृक्ष को आप पृथ्वी का कल्पवृक्ष समझें जो ब्रह्मा-विष्णु-शिवस्वरूप है। स्वयं महालक्ष्मी ने शैल पर्वत पर विल्ववृक्ष रूप में जन्म लिया था।
यह सुनकर पार्वती जी कौतूहल में पड़ गईं। उन्होंने पूछा- देवी लक्ष्मी ने आखिर विल्ववृक्ष का रूप क्यों लिया? आप यह कथा विस्तार से कहें।
भोलेनाथ ने देवी पार्वती को कथा सुनानी शुरू की।
महालक्ष्मी को श्रीविष्णु के प्रेम पर संदेह क्यों हुआ?
हे देवी, सत्ययुग में ज्योतिरूप में मेरे अंश का रामेश्वर लिंग था। ब्रह्मा आदि देवों ने उसका विधिवत पूजन-अर्चन किया था। फलतः मेरे अनुग्रह से वाणी देवी सरस्वती सबकी प्रिया हो गईं। वह भगवान विष्णु को सतत प्रिय हो गईं।
मेरे प्रभाव से भगवान केशव के मन में वाग्देवी के लिए जितनी प्रीति हुई वह स्वयं लक्ष्मी को नहीं भाई। अतः लक्ष्मी देवी चिंतित और रूष्ट होकर परम उत्तम श्रीशैल पर्वत पर चली गईं।
वहां उन्होंने मेरे लिंग विग्रह की उग्र तपस्या प्रारम्भ कर दी। हे परमेश्वरी कुछ समय बाद महालक्ष्मी जी ने मेरे लिंग विग्रह से थोड़ा उर्ध्व में एक वृक्ष का रूप धारण कर लिया और अपने पत्र पुष्प द्वारा निरंतर मेरा पूजन करने लगी।
इस तरह उन्होंने कोटि वर्ष ( एक करोड़ वर्ष) तक आराधना की। अंततः उन्हें मेरा अनुग्रह प्राप्त हुआ। महालक्ष्मी ने मांगा कि श्रीहरि के हृदय में मेरे प्रभाव से वाग्देवी के लिए जो स्नेह हुआ है वह समाप्त हो जाए।
शिवजी बोले- मैंने महालक्ष्मी को समझाया कि श्रीहरि के हृदय में आपके अतिरिक्त किसी और के लिए कोई प्रेम नहीं है। वाग्देवी के प्रति तो उनकी श्रद्धा है।
शिव जी का वरदान और लक्ष्मी जी बनीं बेलपत्र
यह सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न हो गईं और पुनः श्रीविष्णु के ह्रदय में स्थित होकर निरंतर उनके साथ विहार करने लगी।
हे पार्वती! महालक्ष्मी के हृदय का एक बड़ा विकार इस प्रकार दूर हुआ था। इस कारन हरिप्रिया उसी वृक्षरूप में सर्वदा अतिशय भक्ति से भरकर यत्नपूर्वक मेरी पूजा करने लगीं। बिल्व इस कारण मुझे बहुत प्रिय है और मैं विल्ववृक्ष का आश्रय लेकर रहता हूं।
विल्ववृक्ष को सदा सर्वतीर्थमय एवं सर्वदेवमय मानना चाहिए। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। विल्वपत्र, विल्वफूल, विल्ववृक्ष अथवा विल्वकाष्ठ के चन्दन से जो मेरा पूजन करता है वह भक्त मेरा प्रिय है. विल्ववृक्ष को शिव के समान ही समझो. वह मेरा सरीर है।
जो विल्व पर चंदन से मेरा नाम अंकित करके मुझे अर्पण करता है मैं उसे सभी पापों से मुक्त करके अपने लोक में स्थान देता हूं। उस व्यक्ति को स्वयं लक्ष्मीजी भी नमस्कार करती हैं. जो विल्वमूल में प्राण छोड़ता है उसको रूद्र देह प्राप्त होता है।
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भगवान शिव को बेलपत्र क्यों और कैसे अर्पित करें?

सावन का महीना हो या फिर सोमवार का दिन, देवाधिदेव महादेव की पूजा बिना बेलपत्र (बिल्वपत्र) के अधूरी सी लगती है। शिव पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। बेलपत्र चढ़ाने की विधि, नियम और वे सभी महत्वपूर्ण रहस्य और नियम जो हर शिवभक्त को पता होना चाहिए।
1. भगवान शिव को बेलपत्र क्यों पसंद है?
शास्त्रों के अनुसार, बेलपत्र भगवान शिव की पूजा में प्रयुक्त होने वाली छह दिव्य वस्तुओं में से एक है। इसकी तीन पत्तियां भगवान शिव के त्रिनेत्र, त्रिशूल और त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतीक मानी जाती हैं। वहीं, पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब महादेव ने हलाहल विष का पान किया था, तब उनके शरीर की भयंकर उष्णता (जलन) को शांत करने के लिए ठंडी तासीर वाले बेलपत्र का ही उपयोग किया गया था। तभी से यह महादेव को अतिप्रिय है।
2. बेलपत्र कितने प्रकार के होते हैं?
सामान्य तौर पर बेलपत्र तीन पत्तियों (दल) वाला होता है। हालांकि, प्रकृति की कृपा से चार, पांच या इससे अधिक पत्तियों वाले दुर्लभ बेलपत्र भी मिलते हैं, जिन्हें सनातन परंपरा में अत्यंत भाग्यशाली और चमत्कारिक माना जाता है।
3. बेलपत्र तोड़ने के नियम: कब और किस दिन नहीं तोड़ना चाहिए?
बेलपत्र तोड़ने के भी कुछ निश्चित नियम हैं। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति और विशेष तौर पर सोमवार के दिन बेलपत्र कभी नहीं तोड़ना चाहिए। यदि इन दिनों में पूजा करनी हो, तो एक दिन पहले ही बेलपत्र तोड़कर रख लेना चाहिए।
4. बेलपत्र कितने दिन तक बासी नहीं होता?
यह बेलपत्र की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि यह कभी बासी नहीं होता। यदि आपके पास पहले से तोड़ा हुआ हरा-भरा और अखंड बेलपत्र रखा है, तो उसे साफ जल से धोकर दोबारा भी शिवलिंग पर अर्पित किया जा सकता है।
5. क्या बेलपत्र घर में लगाना चाहिए?
जी हाँ, वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में बेलपत्र (बिल्व) का पौधा लगाना बेहद शुभ फलदायी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस पौधे के सानिध्य से घर के वास्तु दोष, पितृ दोष और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है तथा माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
6. महादेव को कितने बेलपत्र चढ़ाने चाहिए?
नियम के अनुसार कम से कम 3 बेलपत्र (त्रिदल) अर्पित करना उत्तम माना जाता है। इसके अलावा आप अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार 5, 11, 21 या 108 बेलपत्र भी चढ़ा सकते हैं। मुख्य बात यह है कि पत्ते पूरी तरह स्वस्थ होने चाहिए।
7. बेलपत्र चढ़ाने की विधि, नियम, विधान आदि क्या हैं?
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शुद्धता: बेलपत्र चढ़ाने से पहले उसे साफ जल से अच्छी तरह धो लें।
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दिशा और सतह: बेलपत्र का चिकना और चमकदार हिस्सा हमेशा शिवलिंग को स्पर्श करना चाहिए। पत्ती का डंठल हमेशा जलाधारी (जहां से जल शिवलिंग से नीचे बहता है) की दिशा में होना चाहिए।
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अखंडित होना: इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पत्ता कहीं से भी कटा-फटा या छेद वाला नहीं होना चाहिए। 3 से कम पत्तियों वाला पत्ता न चढ़ाएं।
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8. बेलपत्र चढ़ाते समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?

वैसे शिव जी की पूजा को बहुत विधानों में नहीं बांधा गया है। इसलिए शिवजी को अतिप्रिय बेलपत्र चढ़ाने को भी ज्यादों नियमों में नहीं बांधा जाना चाहिए। शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करते समय मन में पूर्ण भाव के साथ ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना भी पर्याप्त है।
यदि आप पाठ कर सकें तो बिल्व पत्र अर्पण करते बिल्वाष्टकम् के इस अति प्रसिद्ध श्लोक का उच्चारण करें—
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्।
त्रिजन्म पापसंहारं बिल्वपत्रं शिव अर्पणम्।।भावार्थः तीन दलों (पत्तियों) वाला, जो तीन गुणों (सत्व, रज, तम) का स्वरूप है, तीन नेत्रों वाले और त्रिशूल रूपी आयुध धारण करने वाले भगवान शिव को मैं यह बिल्व पत्र अर्पित करता हूँ। यह बिल्व पत्र तीन जन्मों के पापों का संहार करने वाला है।
9. शिवलिंग पर चढ़े बेलपत्र का क्या करना चाहिए?
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प्रसाद रूप में: जो बेलपत्र शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है, वह अमृत तुल्य प्रसाद बन जाता है। आप इसे आदरपूर्वक अपने पास रख सकते हैं या इसका थोड़ा सा अंश प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकते हैं।
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तिजोरी में रखें: एक साफ और अखंड बेलपत्र को पूजा के पश्चात अपनी तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखने से कृपा बनी रहती है।
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विसर्जन: यदि बेलपत्र पुराना या सूख गया है, तो उसे कचरे में न डालें, बल्कि किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दें या पेड़ की जड़ की मिट्टी में दबा दें। यह खाद का रूप धर लेगा।
10. बेलपत्र चढ़ाने के आध्यात्मिक और स्वास्थ्य लाभ
धार्मिक दृष्टिकोण से इसे चढ़ाने से त्रिदोष शांत होते हैं और राहु-केतु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं। वहीं आयुर्वेद के अनुसार, इसके सेवन से पाचन शक्ति मजबूत होती है, इम्यूनिटी बढ़ती है और रक्त शर्करा (डायबिटीज) को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
हर हर महादेव!
संकलन व संपादन:
राजन प्रकाश
( डिस्कलेमरः यह पोस्ट ज्योतिर्विदों और धर्मशास्त्र के जानकारों के साथ परामर्श के बाद तैयार की गई है। इस पोस्ट का उद्देश्य सिर्फ एक प्रचलित जानकारियां देना है। इसका उद्देश्य कोई गलत जानकारी देना या अंधविश्वास फैलाना नहीं हैं। बेलपत्र चढ़ाने की विधि पोस्ट में बताएं किसी भी राय पर अमल करने से पहले विषय के विशेषज्ञ से परामर्श लें।)
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