परमात्मा कौन है, उनका आदिस्वरूप क्या हैः एक विचारोत्तेजक आलेख
अब आप बिना इन्टरनेट के व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र , श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ तथा उपयोग कर सकते हैं.इसके लिए डाउनलोड करें प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प.
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सभी आदरणीय प्रभुभक्तों को प्रभु शरणम् अभिवादन! आपके लिए दो सूचनाएं लेकर आया हूं. पहली, हम जल्द ही तीर्थाटन शृंखला आरंभ करने वाले हैं. इस शृंखला में हिंदू धर्मों के प्रसिद्ध और किंचित कारणों से प्रसिद्धि में पीछे रह गए तीर्थस्थानों का महात्म्य और उससे जुड़ी सारी सूचनाएं लेकर आएंगे.
गर्मियां आ रही हैं. आप घूमने जाएं तो आसपास मौजूद हिंदुत्व के किसी अद्भुत स्थान का दर्शन करने का लाभ प्राप्त करने से वंचित न रह जाएं, यही इसका उद्देश्य है.
उस पवित्रस्थल के दर्शन से जुड़ी सभी छोटी-बड़ी सूचनाएं होंगी. एप्प में चैट का विकल्प शुरू करने के पीछे एक उद्देश्य यह भी था. रविवार को खाटू धाम की यात्रा का विवरण प्रस्तुत करेंगे. आप उसके आधार पर अपने आस-पास के तीर्थस्थलों के बारे में बताएं. हम उसे आपके नाम से प्रकाशित करेंगे.
दूसरी सूचना, आपकी मांग पर हम अब शिवजी की कथाओं की सीरिज आरंभ करने जा रहे हैं. एकादश रूद्र शिव की कथाओं से शुरुआत होगी. उसके बाद शिव पुराण व अन्य पुराणों की कथाएं आएंगी. आप लोग कथाओं का आनंद लीजिए और दूसरों को भी एप्प से जोड़िए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एप्प चलाने में कई बड़ी कठिनाइयां आ रही हैं, आप ईश्वर से प्रार्थना करें कि हमें सामर्थ्य दें कि उन कठिनाइयों को जीतकर भी हम प्रभुनाम के प्रचार में जुटे रहें. हमें आपके शुभकामनाओं की बड़ी जरूरत है.
सृष्टि के आधार त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश ही परमात्मा के आदिस्वरूप हैं. कई प्रश्न इन दिनों मेल पर और Whatsapp के माध्यम से पूछे जा रहे हैं. गीता प्रेस के एक आलेख में इस पर ज्ञानवर्धक लेख पढ़ा था.
वह आलेख त्रिदेवों के रहस्य से परिचित कराने में दीपक का कार्य करता है. गीता प्रेस को आभार व्यक्त करते हुए उस आलेख के अंश आपके समक्ष रख रहा हूं. कल से एकादशरूद्र की कथा आरंभ करूंगा.
– राजन प्रकाश
आलेख का अंशः
सनातन में पंचदेवोपासना अनादि काल से चली आ रही है. विष्णु के मानने वाले वैष्णव, शिव उपासक शैव, शक्ति उपासक शाक्त, सूर्य उपासक सौर गणपति आराधक गाणपत्य संप्रदाय विश्वभर में हैं. पंचदेवों में शिव, शक्ति और गणेश तो, शिव परिवार से ही हैं.
मनुष्यों, देवताओं के अतिरिक्त असुर भी शिवोपासना करते हैं इसलिए शैवों की संख्या अधिक होगी. स्वयं शिव विष्णु की उपासना करते हैं और विष्णु शिव को जगतगुरू मानते हैं. उपासना की पद्धतियां अनेक हैं, परामात्मा तो एकाकार ही हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.तीनों लोकों का पालन करने वाले श्रीहरि भीतर से तमोगुणी हैं तो बाहर से सतोगुणी. तीनों लोकों को उत्पन्न करने वाले ब्रह्मदेव भीतर और बाहर दोनों से रजोगुणी हैं. शिव संहारक हैं इसलिए इन गुणों से परे हैं.
सुख का रूप सतोगुण है, दुख का रूप तमोगुण है और क्रिया का रूप रजोगुण है. श्रीहरि सृष्टि का पालन करते हैं इसलिए देखने में सृष्टि सुख का रूप प्रतीत होती है परंतु वास्तव में देखें तो यह दुखरूप है.
श्रीहरि का कार्य बाहर से सतोगुणी होने पर भी तत्व से तमोगुणी है. इसलिए भगवान श्रीविष्णु के वस्त्र आभूषण आदि तो सुंदर हैं किंतु स्वरूप श्यामवर्ण है.
शिव सृष्टि का संहार करते हैं. वह देखने में दुखरूप हैं पर वास्तव में संसार को मिटाकर परमात्मा में मिलाना उनका सुखरूप है. इसलिए शिव का बाहरी शृंगार तमोगुणी होने पर भी स्वरूप सतोगुणी है. इसी सतोगुण स्वभाव के कारण वह शीघ्र प्रसन्न भी हो जाते हैं.
ब्रह्मदेव सदा सृष्टि निर्माण करते हैं. क्रियात्मक स्वरूप रक्तवर्ण होता है इसलिए वे रक्तवर्ण हैं. त्रिदेवों में परस्पर कार्यभेद नहीं है. जो भेद हम समझते हैं, वास्तव में वह उनकी लीला है.
शिवपुराण में भगवान शिव के निर्गुण स्वरूप को सदाशिव, सगुण स्वरूप को महेश्वर, विश्व का सृजन करने वाले स्वरूप को ब्रह्मा, पालन करने वाले स्वरूप को विष्णु और संहारक स्वरूप को रूद्र कहा गया है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.रूद्र का दूसरा अर्थ है जो संपूर्ण दुखों से मुक्त करा दे. सागर मंथन से हलाहल निकला तो उस दुख से मुक्त कराने के लिए स्वयं सृजक रूप ब्रह्मा और पालक रूप श्रीहरि ने महादेव का स्मरण किया. इसलिए सभी एकाकार हैं.
गणपति का वाहन चूहा है, शिव का कंठाहार सर्प है. दोनों बैरी हैं पर महादेव की शरण में शांत भाव से साथ में रहते हैं. शिवभूषण सर्प और शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर बैरी हैं. नीलकंठ में विष है तो चंद्रमौलि रूप में शीश पर चंद्रमा है जो अमृत का प्रतीक हैं.
माता भवानी का वाहन सिंह और भोलेनाथ का बैल, दोनों में बैर. शिव काम को भस्म करते हैं और भवानी कई रूपों में उनकी जंघा पर स्थित हैं, यहां भी परस्पर विरोधी भाव.
तीसरे नेत्र से प्रलय की अग्नि निकलती है तो शीश पर शीतल धारामयी गंगा. प्रजापति यानी सबसे बड़े राजनीतिज्ञ के दामाद हैं परंतु स्वयं भोलेनाथ मस्तमौला. अर्थात परमात्मा के स्वरूप को समझने के लिए परमात्मा में खो जाना पड़ेगा.
शिव के एकादशरूपों के माध्यम से प्रकृति की आवश्यकताओं को और उसके अनुरूप त्रिदेवों द्वारा आपसी सांमजस्य से बनाई व्यवस्था को समझने में थोड़ी सुविधा होगी.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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