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यक्ष-युधिष्ठिर संवादः यक्ष ने युधिष्ठिर से जो प्रश्न पूछे थे, वे जीवन का मर्म हैं, जीवनोपयोगी हैं.

यक्ष-युधिष्ठिर संवादः यक्ष ने युधिष्ठिर से जो प्रश्न पूछे थे, वे जीवन का मर्म हैं, जीवनोपयोगी हैं.

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मित्रों, महाभारत की नीति कथाएं प्रतिदिन आपको सुना रहा हूं, आप इसे पसंद भी कर रहे रहे हैं. कई लोगों ने यक्ष-युधिष्ठिर संवाद देने की इच्छा जाहिर की. संवाद व्यापक है. आज उस संवाद के वे प्रश्न दे रहा हूं जिनका आज के जीवन में हमारे साथ सरोकार है. प्रभु का नाम लेकर आनंद लीजिए.

पांडव बनवास काट रहे थे. धर्म को पता था कि युद्ध होकर रहेगा. वह पांडवों की तैयारी आंकना चाहते थे. उन्होंने युधिष्ठिर की परीक्षा लेने की सोची और हिरण का रूप धरकर वहां पहुंचे जहां पांडव निवास कर रहे थे. हिरण पड़ोस की कुटिया में गया और आग जलाने वाली अरणी को सींग में फंसाकर ले भागा.

ब्राह्मण युधिष्ठिर के पास आए और उनसे कहा कि हिरण से अरणी (आग जलाने की लकड़ी) वापस पाने में मदद करें. सभी पांडव हिरण को खोजने निकले. उसका पीछा करते वे थक गए और प्यास लग गई. एक जगह थककर बैठ गए.

युधिष्ठिर ने नकुल से कहा कि आसपास देखो कहीं कोई जलाशय हो तो पीने के पानी का इंतजाम करो. नकुल को एक जलाशय दिखा. नकुल उसमें पानी पीने उतरे. तभी एक आवाज आई- यह जलाशय मेरा है. अगर पानी पीना है तो पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

नकुल ने आसपास देखा तो उन्हें सामने एक पैर पर खड़ा एक बगुला दिखाई दिया. प्यास से बेचैन नकुल ने ध्यान नहीं दिया. पानी पीते ही उनकी मृत्यु हो गई. नकुल को खोजने, युधिष्ठिर ने सहदेव को भेजा. सहदेव ने भी वह आवाज सुनी, अनसुना किया और पानी पीते ही मृत्यु हो गई.

इसके बाद युधिष्ठिर ने अर्जुन और भीम को भेजा. सबकी वही गति हुई. जब चारो भाई नहीं लौटे तो युधिष्ठिर स्वयं चले. जलाशय के किनारे चारो भाई मृत पड़े थे. ऐसे महावीरों को मारना किसी साधारण जीव के तो बस की बात नहीं है. शरीर पर चोट का भी निशान नहीं, यानी कोई युद्ध भी नहीं हुआ था.

युधिष्ठिर कारण जानने जलाशय में उतरे तो उन्हें भी वही आवाज सुनाई दी. युधिष्ठिर ने कहा मैं आपके सभी प्रश्नों का उत्तर दूंगा लेकिन पहले आप अपने वास्तविक रूप में आएं. बगुले ने एक यक्ष का रूप ले लिया.

युधिष्ठिर ने यक्ष का अभिवादन किया और बोले- यक्ष तुम प्रश्न करो. मैं अपने विवेक के अनुसार उत्तर देने की कोशिश करूंगा.

यक्ष ने प्रश्न किया- कौन हूँ मैं?

युधिष्ठिर– तुम न यह शरीर हो, न इन्द्रियां, न मन, न बुद्धि. तुम शुद्ध चेतना हो, वह चेतना जो सर्वसाक्षी है.

यक्ष– जीवन का उद्देश्य क्या है?

युधिष्ठिर– जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है. उसे जानना ही मोक्ष है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

यक्ष– जन्म का कारण क्या है?

युधिष्ठिर- अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं.

यक्ष- जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है?

युधिष्ठिर- जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है.

यक्ष- वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है?

युधिष्ठिर- जैसी वासनाएं वैसा जन्म. यदि वासनाएं पशु जैसी हैं तो पशु योनि में जन्म. यदि वासनाएं मनुष्य जैसी हों तो मनुष्य योनि में जन्म.

यक्ष– संसार में दुःख क्यों है?

युधिष्ठिर- लालच, स्वार्थ और भय संसार के दुःख का कारण हैं.

यक्ष- तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की?

युधिष्ठिर- ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की.

यक्ष– क्या ईश्वर है? कौन है वह? क्या रुप है उसका? वह स्त्री है या पुरुष?

युधिष्ठिर– हे यक्ष! कारण के बिना कार्य नहीं. यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है. तुम हो इसलिए वह भी है. उस महान कारण को ही आध्यात्म में ईश्वर कहा गया है. वह न स्त्री है न पुरुष.

यक्ष-  उसका स्वरूप क्या है?

युधिष्ठिर- वह सत्-चित्-आनन्द है. वह अनाकार ही सभी रूपों में स्वयं को व्यक्त करता है.

यक्ष- वह अनाकार स्वयं करता क्या है?

युधिष्ठिर- वह ईश्वर संसार की रचना, पालन और संहार करता है.

यक्ष- यदि ईश्वर ने संसार की रचना की तो फिर ईश्वर की रचना किसने की?

युधिष्ठिर- वह अजन्मा अमृत और अकारण है.

यक्ष– भाग्य क्या है?

युधिष्ठिर- हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है. परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है. यह परिणाम ही भाग्य है. आज का प्रयत्न कल का भाग्य है.

यक्ष- सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?

युधिष्ठिर- सत्य, सदाचार, प्रेम और क्षमा सुख का कारण हैं. असत्य, अनाचार, घृणा और क्रोध का त्याग शान्ति का मार्ग है.

यक्ष- मन पर नियंत्रण कैसे संभव है?

युधिष्ठिर- इच्छाएं, कामनाएं चित्त में चंचलता पैदा करती हैं. इच्छाओं पर विजय ही मन पर विजय है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

यक्ष- सच्चा प्रेम क्या है?

युधिष्ठिर- स्वयं को सभी में देखना सच्चा प्रेम है. स्वयं को सर्वव्याप्त देखना सच्चा प्रेम है. स्वयं को सभी के साथ एक देखना सच्चा प्रेम है.

यक्ष- तो फिर मनुष्य सभी से प्रेम क्यों नहीं करता?

युधिष्ठिर- जो स्वयं को सभी में नहीं देख सकता वह सभी से प्रेम नहीं कर सकता.

यक्ष- आसक्ति क्या है?

युधिष्ठिर- प्रेम में मांग, अपेक्षा, अधिकार आसक्ति है.

यक्ष- बुद्धिमान कौन है?

युधिष्ठिर- जिसके पास विवेक है वह बुद्धिमान है.

यक्ष- नशा क्या है?

युधिष्ठिर- आसक्ति ही नशा है.

यक्ष- चोर कौन है?

युधिष्ठिर- इन्द्रियों के वे आकर्षण, जो इन्द्रियों को हर लेते हैं वही चोर हैं.

यक्ष- जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?

युधिष्ठिर- जो आत्मा को नहीं जानता वह जागते हुए भी सोया है.

यक्ष- कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?

युधिष्ठिर- यौवन, धन और जीवन अस्थाई हैं. इनका कभी भी पतन हो सकता है.

यक्ष- नरक क्या है?

युधिष्ठिर- इन्द्रियों की दासता नरक है.

यक्ष- मुक्ति क्या है?

युधिष्ठिर- अनासक्ति ही मुक्ति है.

यक्ष- दुर्भाग्य का कारण क्या है?

युधिष्ठिर- मद और अहंकार दुर्भाग्य के सबसे बड़े कारण हैं.

यक्ष- सौभाग्य का कारण क्या है?

युधिष्ठिर- सत्संग और सबके प्रति मैत्री भाव से सौभाग्य होता है.

यक्ष- सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?

युधिष्ठिर- जिसके मन में कोई लालसा न हो और  जो सबकुछ छोड़ने को तैयार हो, वही दुखों का नाश कर सकता है.

यक्ष- मरते समय तक यातना कौन देता है?

युधिष्ठिर- गुप्त रूप से किया गया अपराध मरते समय तक मन को अस्थिर रखकर यातना देता है.

यक्ष- दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?

युधिष्ठिर- सांसारिक सुखों की क्षण-भंगुरता का.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

यक्ष- संसार को कौन जीतता है?

युधिष्ठिर- जिसमें सत्य और श्रद्धा है वह विश्वविजयी हो सकता है.

यक्ष- भय से मुक्ति कैसे संभव है?

युधिष्ठिर- भय से मुक्ति का एकमात्र रास्ता वैराग्य है.

यक्ष- मुक्त कौन है?

युधिष्ठिर- जो अज्ञान से परे है, वह मुक्त है.

यक्ष- अज्ञान क्या है?

युधिष्ठिर- आत्मज्ञान का अभाव ही अज्ञान है.

यक्ष- दुःखों से मुक्त कौन है?

युधिष्ठिर- जो कभी क्रोध नहीं करता, वह दुखों से मुक्त है.

यक्ष- वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?

युधिष्ठिर का उत्तर था- माया अस्तित्व में है भी और नहीं भी.

यक्ष- माया क्या है?

युधिष्ठिर- नाम और रूपधारी नाशवान संसार ही माया है.

यक्ष- परम सत्य क्या है?

युधिष्ठिर-ब्रह्म ही परम सत्य है.

युधिष्ठिर के उत्तरों से संतुष्ट यक्ष ने उन्हें जल पीने दिया.

युधिष्ठिर जब जल पी चुके तो यक्ष ने कहा- चारों भाइयों में से मैं एक को जीवित कर सकता हूं. किसे जीवित कराना चाहते हो?

युधिष्ठिर ने कहा- आप माद्री पुत्र नकुल को जीवित कर दें.

यक्ष ने पूछा- तुम दस हजार हाथियों के बल वाले भीम और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन को छोड़कर नकुल को क्यों जीवित कराते हो?

युधिष्ठिर बोले- विपत्ति में भी धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए. यदि कुंती का सबसे बड़ा बेटा जीवित है तो माद्री का भी सबसे बड़ा पुत्र जीवित होना चाहिए.

यक्ष ने फिर पूछा- यदि दो को जीवित करना हो तो और किसे जीवित कराना चाहोगे?

युधिष्ठिर ने कहा कि वह सहदेव को जीवित कराना चाहेंगे क्योंकि वह सबसे छोटा है और उसके हिस्से का प्रेम और सेवा दोनों बाकी है.

यक्ष युधिष्ठिर की धर्मनिष्ठा से गदगद हो गया. उसने चारों भाइयों को जीवित कर दिया.

युधिष्ठिर ने कहा- आप वास्तव में कौन हैं? मैं आपका वास्तविक परिचय जानने को उत्सुक हूं. यक्ष ने परिचय देते हुए कहा- मैं तुम्हारा पिता धर्म हूं. तुम्हारी परीक्षा लेने आया था जिससे तुम सफल रहे.

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