पुण्यात्मा गोकर्ण ने अपने भाई को दिलाई प्रेत योनि से मुक्तिः भागवत महात्म्य कथा में गोकर्ण प्रसंग भाग-1
भागवत महापुराण की कथा शृंखला बीच में रूक गई थी. आज से वह पुनः आरंभ हो रही है. हम अब तक की प्रकाशित सभी भागवत कथाओं को एक बार फिर से दे रहे हैं.
इस तरह जो लोग नए जुड़े हैं वे इसे पढ़ सकेंगे और जो पुराने हैं उनका तारतम्य बना रहेगा. आज 10 कथाएं एक साथ हैं. प्रतिदिन एक-एक कथा दी जाएगी. जल्द ही पुरानी कथाएं पूर्ण हो जाएंगी तो नई कथाओं का आरंभ होगा.
तुंगभद्रा नदी के तट पर बसे एक सुन्दर नगर में आत्मदेव नाम का एक धर्मपरायण ब्राह्मण रहता था. उसका विवाह धुंधुली नामक एक उच्च कुल की सुन्दर कन्या से हुआ था.
धुंधुली रूप में जितनी सुन्दर थी, स्वभाव से उतनी ही दुष्ट, लोभी, ईर्ष्यालु व क्रूर. झगड़ालू पत्नी के साथ भी आत्मदेव की गृहस्थी सन्तोषपूर्ण चल रही थी.
विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी दोनों को सन्तान नहीं हुई. सभी तरह के पूजा- हवन कराके देख लिए आत्मदेव के संतान न हुई.
समाज से मिलने वाले ताने के कारण हताश आत्मदेव ने प्राण त्यागने की मंशा से अपना घर छोड़कर निकल गया. वह एक सरोवर के किनारे पहुंचे.
उसी के किनाने दुखी हृदय से बैठ गए. तभी एक तेजस्वी सन्यासी वहाँ से गुजर रहे थे. आत्मदेव को इस प्रकार दुःखी देखकर उन्होंने चिन्ता का कारण पूछा.
आत्मदेव ने अपना दुखड़ा रो दिया. तेजस्वी सन्यासी ने आत्मदेव की ललाट देखकर कहा– “तुम्हारे पूर्वजन्म के कर्मों के कारण सन्तान योग नहीं है. इसलिए यह विचार छोड़ो और भगवत् भजन करो.”
आत्मदेव ने कहा कि यदि उसके संतान योग नहीं है तो जीने का क्या फायदा. वह प्राण त्याग देगा. उसका हठ देखकर सन्यासी ने उसे एक दिव्य फल देकर कहा इसे पत्नी को खिला देना.
आत्मदेव घर लौट आए और सारी कहानी बताकर वह फल पत्नी को खाने के लिए दिया. किन्तु उस दुष्टा ने सोचा कि संतान पैदा करने और पालने में बड़ा कष्ट है.
इसलिए उसने फल को खाने के बजाय कहीं छुपाकर रख दिया और आत्मदेव से झूठ में कह दिया कि उसने फल खा लिया है.
कुछ दिनों बाद धुंधुली की बहन मृदुली उससे मिलने आयी. मृदुली के बच्चे थे. धुंधुली ने उससे संतान उत्पत्ति के कष्ट के बारे में पूछा फिर फल वाली बात बता दी.
परंतु उसे भय था कि यदि उसकी बात खुल गई तो आत्मदेव उसे त्याग देगा. मृदुली ने अपनी बहन से कहा- मेरे गर्भ में जो शिशु है, पैदा होने के बाद तुझे सौंप दूंगी. तब तक तू गर्भवती होने का स्वांग करती रह.
मृदुली ने कहा कि वह अपने प्रसव के बाद कह देगी कि उसे मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ. फिर वह बच्चा धुंधुली को दे देगी. बहन की राय पर धुंधुली ने फल गाय को खिला दिया.
सब कुछ योजना अनुसार हुआ. मृदुली ने पुत्र-जन्म के बाद उसे धुंधुली को सौंप दिया. और बालक के मृत्यु की सूचना फैला दी. पुत्र के जन्म से आत्मदेव प्रसन्न थे.
धुंधुली ने आत्मदेव से कहा कि वह प्रसव के कारण बहुत दुर्बल हो गई है. उसकी बहन का बच्चा मृत हुआ इसलिए वह सेवा के लिए बहन को बुला लाएं ताकि दोनों का मन लगा रहे.
मृदुली पुत्र का पालन पोषण करने के लिए आत्मदेव के साथ धुंधुली के पास आ गयी. बालक का नाम धुंधुली के नाम पर धुंधुकारी रखा गया.
उधर जिस गाय को वह दिव्य फल खिलाया गया था, उसके पेट से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ. बालक का शरीर तो मानव का था, बस कान गाय जैसे बड़े थे.
दिव्य बालक को देखकर आत्मदेव बडे प्रभावित थे. उन्होंने स्वयं उसे पालने का निश्चय किया. गाय जैसे कान के कारण बालक का नाम गोकर्ण पड़ा.
धुंधुकारी और गोकर्ण एक ही घर में एक साथ पलकरबड़े हुए. बड़ा होने पर एक ही साथ शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरुकुल भेजे गए लेकिन वहाँ दोनो के संस्कार एक दूसरे उलट थे.
गोकर्ण वेदों और शास्त्रों का अध्ययन करके परम ज्ञानी बन गया, जबकि बुरे संस्कारों वाला धुंधुकारी उद्दण्डता और तामसी प्रवृत्तियों के कारण अज्ञानी हो गया.
धुंधुकारी के भीतर बुरी से बुरी वस्तुएं एकत्र करना, चोरी करना, लोगों के बीच झगड़ा करा देना और दीन– दुखियों को कष्ट पहुँचाने जैसे दोष भरे थे.
वह खतरनाक हथियार लेकर घूमा करता और सज्जनो, मासूम पशु-पक्षियों व अन्य जीवों के लिए आततायी बन जाता. उसे पूजा-अराधना जैसे कार्य तुच्छ लगते थे.
उम्र बढ़ने के साथ धुंधुकारी व्यभिचार में लिप्त होकर वेश्यागमन करने लगा. इससे आत्मदेव की प्रतिष्ठा तार-तार होने लगी. आत्मदेव फिर से शोक में डूब गए.
गोकर्ण से आत्मदेव का दुःख देखा न गया. उसने उन्हें वैराग्य का उपदेश दिया. जगत को नश्वर और पुत्र, स्त्री व धन को मोह-माया का बन्धन बताते हुए सभी दुःखों का कारण बताया.
सुख की प्राप्ति के लिए उपदेश देकर गोकर्ण ने आत्मदेव को मोक्ष की प्राप्ति हेतु वनगमन करने की सलाह दे डाली।
गोकर्ण से वैराग्य का उपदेश लेकर आत्मदेव वैराग्य धारण कर वन की ओर प्रस्थान कर गए. वन में भगवत् साधना करते हुए उन्हें परम धाम की प्राप्ति हो गयी.
पिता के नहीं रहने से धुंधली ने कैसे व्याभिचार की सीमाएं लांघ ली. वेश्याओं ने उसकी हत्या की और वह प्रेत बन गया. तब गोकर्ण ने कैसे उसे प्रेत योनि से मुक्ति दिलाई. शेष कथा अगले पोस्ट में.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्