इस कथा को सुनने से मिलता है मोक्ष
भला कथा सुनने से मोक्ष प्राप्त हो सकता है? मोक्ष क्या है, क्यों उसके लिए इंसान तरसता है. आखिर ऐसा क्या आकर्षण मोक्ष में कि जिसे देखो वही मोक्ष पाना चाहता है. हर ज्ञानी महात्मा इसे पाने के लिए प्रेरित करता रहता है. मोक्ष और मोक्ष का सिद्धांत पानी की तरह साफ हो जाता है यदि हम श्रीमद् भागवत महापुराण को समझें.
ऐसा किस आधार पर कह रहा हूं? आपके मन में यदि यह प्रश्न जानने की इच्छा से आ रहा है तो समझिए आपका मन बिल्कुल पवित्र है शुकदेवजी के जैसा. पवित्र भाव वाले शुकदेव जी को ही इस ज्ञान के योग्य माना गया और उन्होंने इसे प्राप्त भी किया. यदि आपके मन में शंका माखौल उड़ाने के भाव से आ रही है तो फिर यह आपके लिए नहीं है. आप इसे समझ ही न पाएंगे. शुकदेव बनने के लिए भागवत में डूबना पड़ेगा.
यह पोस्ट सिर्फ उनके लिए है जिन्हें हिंदू धर्मग्रंथों के सार को, रहस्य को समझने में आनंद आता है. वे गंभीरता से इसे जानना-समझना और फिर गर्व करना चाहते हैं. अंत तक पढ़िएगा.
यह शुकदेव कौन हैं? उनके मन में भ्रम कैसे आया था? वह भ्रम कैसे मिटा? ऐसा क्यों कहा कि यदि आपके मन में में शंका आई तो आप पवित्र हैं? अब बात इतनी गहरी है तो इसे धीरे-धीरे समझाऊंगा. शुकदेव की कथा से शुरू करता हूं. अंत तक एक-एक शब्द पढ़िएगा, गहराई से.
एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से ऐसे गूढ़ ज्ञान देने का अनुरोध किया जो संसार में किसी भी जीव को प्राप्त न हो. वह अमरत्व का रहस्य प्रभु से सुनना चाहती थीं. अमरत्व का रहस्य किसी कुपात्र के हाथ न लग जाए इस चिंता में पड़कर महादेव पार्वतीजी को लेकर एक निर्जन प्रदेश में गए.
सर्वश्रेष्ठ हिंदू ऐप्प प्रभु शरणम् को एक बार देखें जरूर.
Android ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
लिंक काम न करता हो तो प्लेस्टोर में सर्च करें-PRABHU SHARNAM
उन्होंने एक गुफा चुनी और उस गुफा का मुख अच्छी तरह से बंद कर दिया. महादेव नंदी को गुफा के बाहर पहरे पर बठाया और फिर उन्होंने देवी जगदंबा को कथा सुनानी शुरू की.
पार्वतीजी थोड़ी देर तक तो आनंद लेकर कथा सुनती रहीं.
जैसे किसी कथा-कहानी के बीच में हुंकारी भरी जाती है उसी तरह देवी काफी समय तक हुंकारी भरती रहीं लेकिन जल्द ही उन्हें नींद आने लगी. कहते हैं जो भागवत में डूब जाते हैं उन्हें बीच-बीच में इसीलिए नींद आती है.
भोलेनाथ कथा सुनाते रहे. उस गुफा में तोते यानी शुक का एक घोंसला भी था. तोता उस समय तो गुफा में नहीं था परंतु उसके घोसले में जो अंडा था वह फूट गया और तोते के बच्चे का जन्म हुआ.भोलेनाथ द्वारा सुनाई जा रही कथा को वह तोता भी पूरे हृदय से सुनता रहा.महादेव के मुख से कथा सुनने से उसमें दिव्य शक्तियां आ गईं.
जब तोते ने देखा कि माता सो रही हैं इसलिए कहीं महादेव कथा सुनाना न बंद कर दें इसलिए वह स्वयं पार्वतीजी की जगह हुंकारी भरने लगा.
महादेव कथा सुनाते रहे लेकिन शीघ्र ही महादेव को पता चल गया कि पार्वतीजी के स्थान पर कोई औऱ हुंकारी भर रहा है. वह क्रोधित होकर शुक को मारने के लिए उठे. शुक वहां से निकलकर भागा.
हिंदू धर्म से जुड़ी सभी शास्त्र आधारित जानकारियों के लिए प्रभु शरणम् से जुड़ें. एक बार ये लिंक क्लिक करके देखें फिर निर्णय करें. सर्वश्रेष्ठ हिंदू ऐप्प प्रभु शरणम् फ्री है.
Android ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
लिंक काम न करता हो तो प्लेस्टोर में सर्च करें-PRABHU SHARNAM
भागता-भागता वह व्यासजी के आश्रम में पहुंचा. व्यासजी की पत्नी ने उसी समय जम्हाई ली और शुक सूक्ष्म रूप धारणकर उनके मुख में प्रवेश कर गया और गर्भ में जाकर छुप गया.
महादेव ने जब उसे वेदव्यास की शरण में देखा तो उसे मारने का विचार त्याग दिया क्योंकि शुक एक ज्ञानी के शरण में चला गया था इसलिए वह कथा सुनने का कुपात्र न रहा.
महादेव संतुष्ट होकर चले गए.शुक व्यासजी की पत्नी के गर्भस्थ शिशु हो गए. गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान प्राप्त हो चुका था.
शुक ने सांसारिकता देख ली थी इसलिए वह माया से भरे पृथ्वीलोक के प्रभाव में आना ही नहीं चाहते थे. इसलिए शुक ऋषिपत्नी के गर्भ से बारह वर्ष तक निकले ही नहीं.
व्यासजी ने शिशु से बाहर आने को कहा लेकिन वह यह तर्क देकर मना करता रहा कि संसार तो मोह-माया का बंधन है मुझे उसमें नहीं पड़ना.बारह वर्ष तक गर्भ को धारण करने के कारण ऋषि पत्नी गर्भ की पीड़ा से मरणासन्न हो गईं. नौ महीने के गर्भधारण में इतना कष्ट होता है बाहर वर्ष तक हो तो क्या होगा, अंदाजा लगाइए.
भगवान श्रीकृष्ण को इस बात का ज्ञान हुआ. वह स्वयं वहां आए और उन्होंने शुक को आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा.
श्रीकृष्ण से मिले वरदान के बाद ही शुक ने गर्भ से निकलकर जन्म लिया. जन्म लेते ही शुक ने श्रीकृष्ण और अपने पिता-माता को प्रणाम किया और तपस्या के लिये जंगल चले गए.
आप प्रभु शरणम् से नहीं जुड़ें हैं? आप सच में कुछ मिस कर रहे हैं. एकबार देखिए तो सही, प्रभु शरणम् फ्री है. ट्राई करके देखिए.
Android ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
लिंक काम न करता हो तो प्लेस्टोर में सर्च करें-PRABHU SHARNAM
व्यास जी इतने लंबी प्रतीक्षा के बाद पिता बने थे. उनका पुत्र जन्मते ही वन को जा रहा है यह सोचकर वह व्यथित हो गए. न तो उन्हें पितृत्व का पूर्ण सुख मिला और न ही ऋषिपत्नी को माता का सुख प्राप्त हुआ. ऐसे में व्यासजी और उनकी पत्नी दोनों ही दुखी थे.
व्यासजी ज्ञानी थे. वह यह समझ रहे कि उनका पुत्र जो कह रहा है वह अक्षरशः सत्य है पर माया से मोहित न होने का वरदान तो श्रीकृष्ण ने शुक को दिया था, व्यासजी को नहीं.
व्यासजी मोहित हो गए. व्यासजी पुत्र के पीछे-पीछे दौड़े. ‘पुत्र!, रूको पुत्र! अपने माता-पिता को प्रेम और ममत्व से वंचित मत रखो, ऐसी बातें कहते पुकारते रहे, किन्तु शुक ने उस पर कोई ध्यान न दिया.व्यासजी समझते थे कि उनका पुत्र कोई साधारण जीव नहीं है. जन्म से पूर्व ही वह संपूर्ण शास्त्रों का ज्ञाता है, स्वयं महादेव से उसने ज्ञान प्राप्त किया है. महादेव और श्रीकृष्ण दोनों की असीम अनुकंपा है उस पर चाहते थे कि शुक श्रीमद्भागवत का ज्ञान प्राप्त करें.
परंतु वह पुत्र को श्रीमद्भागवत का ज्ञान दें भी तो कैसे! शुक तो कभी पिता की ओर आते ही न थे.
व्यासजी ने एक सुंदर युक्ति निकाली.उन्होंने श्रीकृष्णलीला का एक श्लोक बनाया और उसका आधा भाग शिष्यों को रटाकर उधर भेज दिया जिधर शुक ध्यान लगाते थे.
एक दिन शुकदेवजी ने भी वह श्लोक सुना. उस श्लोक को सुनकर वह मुग्ध हो गए. उन्हें पूरी कथा सुनने की बड़ी तेज लालसा उत्पन्न हुई. पुनः व्यासजी के शिष्य आए और एक नया श्लोक आधा सुना दिया.
करीब पांच लाख लोग रोज सुबह प्रभु शरणम् की सहायता से अपनी दैनिक पूजा करते हैं. ऐसा कई साल से लगातार हो रहा है. आप भी देखें.
Android ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
लिंक काम न करता हो तो प्लेस्टोर में सर्च करें-PRABHU SHARNAM
अब तो शुकदेव पूरी कथा सुनने का लोभ रोक ही न कर पाए. वह श्रीकृष्ण लीला के आकर्षण में खींचे सीधे अपने पिता के आश्रम तक चले आए.
इससे व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने अपने पुत्र शुकदेव को श्रीमद्भागवत का विधिवत ज्ञान दिया. शुक भागवत में पारंगत हो गए. शुकदेव ने इसी भागवत का ज्ञान राजा परीक्षित को दिया था. जिसके दिव्य प्रभाव से परीक्षित ने मृत्यु के भय को जीत लिया.
शुकदेव जी ने जो कथा परीक्षित को सुनाई उससे उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ. वह मोह-माया के बंधन से छूट गए. शरीर और आत्मा के संयोग और वियोग का क्या दर्शन है इसका सुंदर वर्णन श्रीमद् भागवत में है.भागवत पुराण को महापुराण माना जाता है. इसमें कथाओं के माध्यम से उत्कृष्ट ज्ञान प्रदान किया गया है. भागवत में एक बड़ा ही ज्ञान वाला प्रसंग है भगवान कपिल और उनकी माता देवहूति के बीच की एक चर्चा. इसे ध्यान से समझिएगा.
माता को पता चला है कि उनका पुत्र कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि स्वयं श्रीहरि का अवतार हैं. अब माता देवहूति उन्हें पुत्र माने या गुरू माने इसी उलझन में हैं.देवहुति पूछती हैं- सच्चा सुख और आनंद कहां है, उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
भगवान कपिल ने कहा- माता किसी जड़ वस्तु में आनंद हो ही नहीं सकता. आनंद तो आत्मास्वरूप है. सांसारिक विषय सुख दे सकते हैं पर आनंद नहीं. जो सुख का कारण बनेगा वही दुख का कारण भी बनेगा पर परमात्मा हमेशा आनंद ही देंगे. इसलिए आनंद परमात्मा का स्वरूप है.
भगवान कपिल की बात को सरल शब्दों में समझिए. सांसारिक सुख तो शरीर की खुजली जैसे हैं, आप जब तक खुजाएंगे तब तक आनंद मिलेगा पर नाखून में भरा विष धीरे-धीरे खुजली में भरता जाएगा, जहर शरीर में फैल जाएगा. खुजली का रोग पूरे शरीर में फैल जाएगा.
सर्वोत्तम मिठाई का स्वाद भी केवल जिह्वा तक ही रहता है. जगत के पदार्थों में आनंद नहीं है, बस मिथ्या आनंद का आभास मात्र है. तो फिर आनंद है क्या? अर्जुन ने यही प्रश्न भगवान से किया था.
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- विषयों और इंद्रियों के संयोग से जो सुख उत्पन्न होता है वह आरंभ यानी भोगकाल में अमृत के समान सुख देने वाला लगता है किंतु उसका परिणाम विष के समान होता है. इसे ही राजस सुख कहते हैं.
आप खुद सोचिए, मदिरा और फलों के रस की दुकाने आसपास ही दिख जाएंगी. यदि संतरे के रस में उसका एक बीज गलती से पिस जाए तो उसकी कड़वाहट स्पष्ट हो जाती है और पीने वाला उस रस को बेस्वादु बताकर भला-बुरा कह जाता है.
वही व्यक्ति उसके बाद शराब की दुकान में जाता है. वह शराब पूरी तरह कड़वी होती है. जिह्वा के पास ले जाते समय वह बुरा मुंह तो बनाता है लेकिन फिर भी पीता जाता है. उसे गटकने के लिए और कई ऐसी चीजों सहारा लेता है जो बेस्वादु हैं.
फल के रस और शराब की प्रकृति अलग है. यदि शराब मिठी लगने लगे तो उसे पीने वाला पसंद नहीं करेगा और रस कड़वा लगे तो नहीं निगल पाएगा.
फल यदि कड़वा है तो भी वह शरीर का भला ही करेगा यह बात जानते हुए भी हम उसके कड़वेपन के लिए कड़वी बातें कह जाते हैं जबकि शराब का परिणाम जानते हुए भी उसकी कड़वाहट को शरीर में भरते जाते हैं.
मिथ्या में ही आकर्षण होता है. सत्य तो अप्रिय लगेगा ही. आनंद को अगर तलाश सकते हैं तो प्रभु के नाम में तलाशिए.
जो व्यक्ति भागवत को समझ ले उसे दिव्य दृष्टि मिल जाती है.
दिव्यदृष्टि का मतलब यह नहीं है कि वह हजारों मील दूर की चीजों को संजय की तरह आंख बंदकर देखने लगे बल्कि जीवन है क्या, हम जन्म क्यों लेते हैं, क्यों मृत्यु आवश्यक है, इन बातों का ज्ञान हो जाता है. यही दिव्यदृष्टि है.
मोक्ष का अर्थ केवल यह नहीं कि जीवन त्यागने के बाद एक सुंदर संसार में प्रवेश कर जाएं और पुनः मृत्युलोक में न आना पड़े. जीवनकाल में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो ईश्वर ने हमें बताई हैं जिन्हें हम समझकर उस पर अमल कर लें तो जीवनकाल में मोक्ष का आनंद मिल सकता है. भागवतमहापुराण में यह मर्म बहुत सुंदर और सरल रूप में बताया गया है.
हिंदू धर्मग्रंथों में से खासकर पुराणों में बातें प्रतीक रूप में कही गई हैं. वेद व्यासजी ने सोचा होगा कि समय के साथ मनुष्य की बुद्धि और तीव्र होती जाएगी. एक समय ऐसा आएगा कि बोलने की आवश्यकता ही न रहेगी, बस संकेत मात्र से मनुष्य बात करने लगेगा इसलिए ऐसे ग्रंथों की रचना हुई जिसमें प्रतीक रूप में बात की जाए. पर ऐसा हुआ नहीं.
हमारी बुद्धि इतनी भटकती चली गई कि हम अर्थ का अनर्थ करने लगे. जो प्रत्यक्ष है उसे ही नहीं समझ पाते तो संकेत को कहां से समझेंगे. इसी कारण आजकल ज्यादातर लोग पुराणों आदि का उपहास कर रहे हैं. ये वहीं लोग हैं जो संकेत और प्रतीक को समझ नहीं पाते या समझने का प्रयास नहीं करते. जिन्होंने विज्ञान और ज्ञान दोनों लिया है वे इन पर शंका नहीं करते.
आपको तय करना होगा कि अपने ग्रंथों का आप उपहास करेंगे या फिर प्रयास करेंगे समझने का कि आखिर इसमें कहा क्या गया है. यदि प्रयास करना है तो प्रभु शरणम् से जुड़ जाइए. निःशुल्क ज्ञानचर्चा है.
-राजन प्रकाश
वेद-पुराण-ज्योतिष-रामायण-हिंदू व्रत कैलेंडेर-सभी व्रतों की कथाएं-व्रतों की विधियां-रामशलाका प्रश्नावली-राशिफल-कुंडली-मंत्रों का संसार. क्या नहीं है यहां! एक बार देखिए तो सही…
Android ऐप्प के लिए यहां क्लिक करें
लिंक काम न करता हो तो प्लेस्टोर में सर्च करें-PRABHU SHARNAM
प्रभु शरणं के पोस्ट की सूचना WhatsApp से चाहते हैं तो अपने मोबाइल में हमारा नंबर 9871507036 Prabhu Sharnam के नाम से save कर लें। फिर SEND लिखकर हमें उस नंबर पर whatsapp कर दें। जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी।
हम ऐसी कथाएँ देते रहते हैं. Facebook Page Like करने से ये कहानियां आप तक हमेशा पहुंचती रहेंगी और आपका आशीर्वाद भी हमें प्राप्त होगा: Please Like Prabhu Sharnam Facebook Page
