वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंगः शीश अर्पितकर रावण ने महादेव को किया प्रसन्न, हठधर्मी रावण को रोकने को देवघर में स्थापित हो गए महादेव

वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंगः शीश अर्पितकर रावण ने महादेव को किया प्रसन्न, हठधर्मी रावण को रोकने को देवघर में स्थापित हो गए महादेव

BABA MANDIR
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शिवमहापुराण के कोटिरुद्र संहिता में झारखंड के देवघर स्थित से श्री वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा आई है. उसका वर्णन करता हूं.

राक्षसराज रावण बड़ा शिवभक्त था किंतु जितना बड़ा भक्त था उतना ही बड़ा हठी भी. अहंकार तो ऐसा कूट-कूटकर भरा था कि रावण के अहंकार की उपमा आज भी दी जाती है.

महादेव को प्रसन्न करके उसने एक बार घोर तप किया. कई सौ वर्षों की उसकी साधना से भी महादेव ने उसे दर्शन न दिए तो रावण अब हठ पर उतर आया.

उसने उपासना की विधि बदल दी. अपना तपोक्षेत्र बदलकर हिमालय से दक्षिण की ओर सघन वृक्षों से भरे जंगल में उसने को खोदकर एक गड्ढा तैयार किया. गड्ढे में अग्नि की स्थापना करके आहुतियां देने लगा.

पास में ही उसने संपूर्ण विधि विधान से शिवलिंग भी स्थापित किया था. कठोर नियमों का पालन करता हुआ रावण तप में लगा रहा. वह गर्मी के दिनों में पांच अग्नियों के बीच में बैठकर पंचाग्नि का सेवन करता था.

वर्षाकाल में खुले मैदान में चबूतरे पर सोता था और शीतकाल में गले के बराबर जल के भीतर खड़े होकर साधना करता था. इन तीन कठोर विधियों से रावण की तपस्या चल रही थी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
परंतु महादेव तो उसकी मंशा से परिचित थे इसलिए उसकी हठ साधना पर भी भगवान महेश्वर प्रसन्न नहीं हुए. कठिन तपस्या से जब रावण को सिद्धि नहीं प्राप्त हुई, तब दशानन एक-एक सिर काटकर शिवजी को समर्पित करने लगा.

वह शास्त्र विधि से महादेव की आराधना करता और फिर भेंटस्वरूप पूजन के बाद अपना एक मस्तक काटकर भगवान को समर्पित कर देता था. रक्तरंजित रावण ने इस प्रकार क्रमश: अपने नौ मस्तक काट डाले.

जब वह अपना अन्तिम दसवां मस्तक काटना ही चाहता था. शिवभक्त के प्राण संकट में देखकर भगवान भोलेनाथ साक्षात प्रकट हुए और रावण के सभी मस्तकों को उसके शरीर से पूर्ववत जोड़ दिया.

महादेव ने रावण को उसकी इच्छा के अनुसार अनुपम बल और पराक्रम प्रदान किया. भगवान की स्तुति करते हुए रावण ने कहा– देवेश्वर! मैं आपकी शरण में हूं. आप प्रसन्न हैं तो लंका चलें और मेरा मनोरथ सिद्ध करें.

रावण की बात सुनकर भगवान शिव असमंजस में थे. उन्होंने धर्मसंकट टालने के लिए कहा–तुम जिस शिवलिंग की आराधना कर रहे थे उसे भक्तिभावपूर्वक अपनी राजधानी ले जाओ.परंतु तुम्हें एक बात का खास ध्यान रखना है. रास्ते में तुम इस शिवलिंग को तुमने कहीं पृथ्वी पर रख दिया तो यह वहीं स्थापित होकर अचल हो जाएगा. इस शिवलिंग स्वरूप में तुम्हारे पास विराजमान रहूंगा.

भगवान द्वारा ऐसा कहने पर रावण उस शिवलिंग को साथ लेकर लंका की ओर चल दिया. भगवान जानते थे कि हठयोगी रावण किसी भी समय उनकी उपस्थिति का दुरुपयोग कर सकता है.

इसलिए उन्होंने माया दिखाई. उनकी माया के प्रभाव से रावण को रास्ते में पेशाब करने की ऐसी इच्छा हुई कि वह हठयोगी मूत्र के वेग को रोकने में असमर्थ हो गया.

उसे वहीं एक ग्वाला दिखाई दिया. उसने मूत्र त्यागने के लिए शिवलिंग को उस ग्वाले के हाथ में पकड़ा कर स्वयं पेशाब करने के लिए बैठ गया. प्रभु की लीला ऐसी थी कि उसका मूत्र समाप्त नहीं हुआ.

एक मुहूर्त बीतने के बाद ग्वाला शिवलिंग के भार से पीड़ित हो उठा और उसने शिवलिंग को पृथ्वी पर रख दिया. पृथ्वी पर रखते ही वह मणिमय शिवलिंग वहीं पृथ्वी में स्थिर हो गया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]
इन्द्र आदि देवता जो रावण द्वारा शिवलिंग को लेकर लंका चलने से घबराए थे वे शिवलिंग के स्थापित होने से बड़े प्रसन्न हुए. ऋषियों के संग शास्त्रविधि से शिवलिंग का पूजन किया.

देवताओं ने उसे श्री वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से पूजा. जो मनुष्य श्रद्धा भक्तिपूर्वक भगवान श्री वैद्यनाथ का अभिषेक करता है. उसका शारीरिक और मानसिक रोग अतिशीघ्र नष्ट हो जाता है.

श्रीवैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कई जनकथाएं भी हैं. प्रभु की महिमा प्रभु ही जानें. हम तो सबमें उनका भाव देखते हैं. आपको वे कथाएं भी जरूर सुनाएंगे.

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