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एक गौ को पीड़ा पहुंचाने के पापकृत्य से जनक को करना पड़ा नरक का दर्शन, जनक के दर्शन से नरक भोग रहे पापात्माओं का हुआ उद्धार

एक गौ को पीड़ा पहुंचाने के पापकृत्य से जनक को करना पड़ा नरक का दर्शन, जनक के दर्शन से नरक भोग रहे पापात्माओं का हुआ उद्धार

kamdhenu
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राजा जनक ने स्थूल शरीर का त्याग किया तो उनकी पुण्यआत्मा का स्वागत करने और उसे स्वर्गलोक तक ले जाने के लिए धर्मराज ने एक विशेष विमान विमान भेजा.

स्वर्ग में प्रवेश करने से पहले वह विमान उन्हें नरकलोक की ओर ले चला. विमान पर सवार राजा जनक नरकपुरी से होकर गुजर हे थे तो उन्होंने देखा कि देवदूत अनेकों पापात्माओं को तरह-तरह से प्रताड़ित कर रहे हैं.

जनक क्षणभर के लिए ठिठके. जनक को छूकर जाने वाली हवा जब उन पापात्माओं तक पहुंचती थी तो उन्हें पीड़ा से राहत मिलती थी. जनक की उपस्थिति से राहत महसूस करते नरकवासी उनसे वहीं ठहर जाने की विनती करने लगे.

जनक धर्मसंकट में थे. एक तरफ तो उन्हें स्वर्गलोग की ओर आने के लिए धर्मराज का आदेश मिश्रित निमंत्रण था दूसरी और पापात्माओं की नरक में ठहरने की करूणाभरी याचना.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

जनक सोचने लगे-यदि ये नरकवासी मेरी उपस्थिति से अपने भीषण कष्टों में कुछ आराम का अनुभव करते हैं तो मैं इसी कालपुरी में रहूंगा. जहां मेरी उपस्थिति से किसी का कल्याण हो वही स्थान मेरे लिए स्वर्गतुल्य है.

वह वहीं रूक गए. काल को सूचना हुई और वह राजा जनक के पास आए. उन्होंने समझया कि आपका स्थान नरकलोक में नहीं अपितु विलास से पूर्ण स्वर्गलोक में है. आप यहां से प्रस्थान करें.

जनक ने अपने ठहरने का कारण बताते हुए कहा कि वह वहां से तभी प्रस्थान करेंगे जब काल उन सबको दंडमुक्त कर देंगे. दुविधा में पड़े काल ने प्रत्येक पापी और उसके घृणित कर्मों के विषय में बताकर कहा कि ये दंड के भागी हैं.

जनक ने कहा- जीवों को उसके कर्मों की सजा मिलनी ही चाहिए लेकिन इन्होंने मुझसे याचना की है. यदि असहाय की बात ठुकरा देता हूं तो मैं स्वयं पाप का भागी बनूंगा. अतः उनकी प्रताड़ना से मुक्ति की युक्ति बताइए.

काल ने कहा- यदि आपके कुछ पुण्य इन्हें दे दें तो इनकी मुक्ति हो सकती है किंतु इसमें एक खतरा है. यदि इनके शेष पाप आपके पुण्यों से अधिक निकले तो पुण्यों के अभाव में आप स्वयं स्वर्ग से वंचित हो जाएंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

जनक फिर भी तैयार हो गए. उन्होंने अपने पुण्य देकर पापियों को मुक्त करने को कहा. सभी पापी पापमुक्त हो गए. स्वयं धर्मराज राजा जनक की अगवानी करने वहां पधारे.

उन्होंने कहा- आप धन्य हैं. आपके पुण्य अक्षुण्ण हैं. उसके फल से ऐसे अनंत पापियों का उद्धार हो जाएगा. यह तो बस एक छोटी सी परीक्षा थी. आप स्वर्गलोक की ओर चलें.

पापियों को मुक्ति दिलाकर जनक स्वर्ग की ओर चले. उन्होंने धर्मराज ले पूछा- मैंने कौन सा ऐसा पाप किया था जिसके कारण मुझे नरकलोक के दर्शन हुए और कुछ पल रूकना पड़ा?

धर्मराज ने कहा- संसार में आपके पुण्यों की बराबरी करने वाला कोई नहीं हैं पर आपने एक बार चूक से ही छोटा-सा पाप किया था. आपने एक बार एक गाय को घास खाने से रोका था. उसी के दंडस्वरूप यहां आना पड़ा.

अब आप पूर्णतः दोषमुक्त हैं और स्वर्गलोक का अक्षयकाल तक भोग करने के अधिकारी हैं.

संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्

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