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एक असुर ने शिवजी को बांध लिया, व्रकतुंड ने कराया मुक्त

एक असुर ने शिवजी को बांध लिया, व्रकतुंड ने कराया मुक्त

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iOS मोबाइल ऐप्प के लिए क्लिक करेंश्रीगणेशजी का एक मंत्र आपने अवश्य सुना होगा. हर मांगलिक कार्य के आरंभ में जो मंत्र आवश्यक रूप से पढ़े जाते हैं उनमें है यह मंत्र-

वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ
निर्विघ्नं कुरू में देव, सर्वकार्येषु सर्वदा।

इस मंत्र में श्रीमहागणपतिजी के वक्रतुंड स्वरूप की सर्वप्रथम आराधना की गई है, आह्वान किया गया है. श्रीमहागणेश के भी रूप हैं! आश्चर्यचकित न हों. श्रीमहागणपति के स्वरूपों की ज्यादा चर्चा हुई ही नहीं है. उनके अनेक रूप है.

श्रीमहागणपति को परमदेव और प्रथम पूज्य माना जाता है. ज्यादातर लोग यही जानते हैं कि श्रीमहागणपति शिव-पार्वतीजी के पुत्र हैं. शिव-पार्वतीजी के पुत्र गौरीपुत्र श्रीगणेश तो महागणपति के अवतार हैं.

माता जगदंबा तो जगत्माता हैं. सभी उनके अंश हैं इसमें कहां शंका है, परंतु महागणपति परमदेव हैं. उनका अस्तित्व भी मातृशक्ति के अस्तित्व के साथ ही स्वरूप में आ गया था. वह शिव-पार्वती के साथ सहअस्तित्व के लिए एक रूप धारण करते हैं सांसारिक दृष्टि से उन्हें ही गणेश मान लिया जाता है. इसमें कोई हर्ज भी नहीं है पर यह तो जानना ही चाहिए कि गणपति तत्व वा्स्तव में है क्या?

वास्तव में कौन हैं श्रीमहागणेश, इसकी चर्चा प्रभु शरणम् एप्पस में आरंभ हो चुकी है. आप गणपति रहस्य से परिचित होकर आनंदित हो रहे होंगे. अपने इष्टदेव के बारे में गूढ़ ज्ञान से परिचित होकर कौन भक्त आनंदित नहीं होगा?

गूढ़ ज्ञान पर चर्चा तो हो ही रही है, हम आपको श्रीमहागणेश के अवतारों की कथाएं भी सुनाएंगे. जब गणपति मस्तकविहीन होने के बाद पुनः उठे तो सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियां प्रदान की थीं. अर्थात गणपति की आराधना से सभी देवताओं की आराधना के फल प्राप्त होते हैं.

गणपति उत्सव आरंभ हो चुका है. हम प्रतिदिन गणेशजी के एक अवतार की कथा और एक विशेष मंत्र के बारे में उपयोगी जानकारियां देंगे. आज पढ़िए- गणपति के प्रथम अवतार की कथा.

देवराज इन्द्र देवताओं के राजा हैं. देवों के समस्त ऐश्वर्य-सामर्थ्य के वह स्वामी हैं. ऐश्वर्य और शक्ति के साथ अभिमान आ ही जाता है. वैसे भी देवराज माता लक्ष्मी के उपासक हैं. राजा तो धन और बल को ही साधने में लगा रहता है. इससे जो भाव उत्पन्न होता है- उसे मत्सर कहते हैं.

प्रमाद तो विकार है. देवराज श्रीविष्णु, श्रीब्रह्माजी, श्रीमहादेव, जगदंबा, श्रीमहागणेश आदि देवों एवं ऋषियों-तपस्वियों के दर्शन प्रायः करते ही रहते हैं. उत्तम लोगों के दर्शन से जीव के अंदर बैठा विकार भयभीत रहता है और वह उस शरीर का शीघ्र त्याग करना चाहता है जो अच्छी संगति में रहता हो.

देवराज इंद्र के अंदर बैठे प्रमाद ने इंद्र के शरीर का त्याग किया तो उससे एक भयंकर असुर का जन्म हुआ- असुर का नाम पड़ा मत्सर.

मत्सर विकार का स्वरूप था, आसुरी गुणों से युक्त था था इसलिए देवों के बीच उसे स्थान न मिला. आश्रय के लिए वह देवशत्रुओं की ओर चला. इस प्रकार वह दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य की शरण में पहुंच गया.

शुक्राचार्य ने परख लिया कि मत्सर इंद्र के अंश से पैदा हुआ है अतः देवताओं से ज्यादा शक्तिशाली है. असुर कोटि का होने से इसमें असुरों वाले मायावी लक्षण भी हैं. अतः यही देवताओं को परास्त कर सकता है.

शुक्राचार्य ने मत्सर को भगवान् शिव के पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय की दीक्षा दी और उसे शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करने को कहा. मत्सरासुर शुक्राचार्य द्वारा बताई विधि से शिव आराधना करने लगा.मत्सर ने भगवान् शिव की घोर तपस्या की. आखिरकार शिवजी को उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर दर्शन देना ही पड़ा. मस्तर ने शिवजी से अमरत्व का वरदान मांगा.

भोलेनाथ ने मत्सरासुर को कहा- परमात्मा के अतिरिक्त उत्पन्न होने वाले हर जीव का एक दिन क्षय होना निश्चित है. बस समय का अंतर हो सकता है. कोई पहले जाएगा, कोई बाद में परंतु यह विधान मेरा ही तय किया हुआ है. मैं इसे तुम्हारे लिए परिवर्तित नहीं कर सकता. कुछ और मांग लो.

मत्सरासुर ने मांगा- हे देवाधिदेव आप मुझे अमर नहीं बनाना चाहते तो मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं अभय हो जाऊं. कोई मुझे युद्ध में परास्त न कर सके.

शिवजी ने उसे इच्छित वरदान प्रदान कर दिया. शिवजी से वरदान प्राप्त करके मत्सर लौटा तो शुक्राचार्य ने उसे दैत्यराज नियुक्त कर दिया. अब वह मत्सरासुर कहलाने लगा.

शुक्राचार्य ने मत्सरासुर को आदेश दिया कि दैत्यों की शक्ति को संगठित करो और तीनों लोकों को जीत लो. गुरू का आदेश पाकर मत्सरासुर ने सबसे पहले पृथ्वी विजय आरंभ किया. उसने भूलोकके नरपतियों पर आक्रमण कर दिया.

समस्त राजा मत्सरासुर के अधीन हो गए. पृथ्वी पर मत्सरासुर का शासन हो गया. उसने देवों को निर्बल करने के लिए यज्ञ-हवन आदि बंद करा दिए. मत्सरासुर ने पृथ्वी के बाद पाताल पर आक्रमण करके उसे अपने अधीन कर लिया.

भगवान शिव द्वारा अभय होने का वरदान था इसलिए उसे कोई परास्त नहीं कर पा रहा था. पृथ्वी और पाताल पर अधिकार करने के बाद मत्सरासुर ने स्वर्गलोक पर भी आक्रमण किया. समस्त देवों को पराजित करके स्वर्ग छीन लिया.

समस्त पराजित देवतागण ब्रह्माजी और विष्णुजी को साथ लेकर भगवान शिव की शरण में पहुंचे और उनके भक्त मत्सरासुर के अत्याचारों की पूरी गाथा कह सुनाई.मत्सरासुर को सूचना हुई कि सभी देवता कैलाश पर जुटे हैं. उसने सोचा कि शायद शिवजी की सहायता से देवता उससे युद्ध की तैयारी कर रहे हैं.

त्रिलोक विजय करने के घमंड में चूर मत्सरासुर ने कैलास पर ही आक्रमण की योजना बना ली.

मत्सरासुर ने सेना के साथ भगवान शिव के कैलास लोक पर आक्रमण कर दिया. शिवजी ने स्वयं उसे अभय होने का वरदान दिया था इसलिए उनके समक्ष अपना ही वरदान सामने आ जाता.

मत्सरासुर और शिवजी में घोर युद्ध हुआ परन्तु जैसे ही मत्सरासुर पराजित होने लगा शिवजी की शक्ति विभक्त होकर मत्सरासुर का साथ देने लगती. ऐसा उनके ही वरदान के कारण हो रहा था.

शिवजी मत्सरासुर से समक्ष न टिक सके और उन्हें भी दैत्यराज ने अपने पाश में बांध लिया. अब दुखी देवताओं के पास असुरराज के विनाश का कोई मार्ग ही नहीं नजर आ रहा था.

उसी समय भगवान् दत्तात्रेय वहां पहुंच गये और उन्होंने देवताओं को कहा- शिवजी अपने ही वरदान के आगे विवश हैं. उनकी शक्ति स्वतंः मत्सरासुर की सहायता करेगी. जहां शिव की शक्ति हो वहां आप सब का कोई वश चलने वाला नहीं है. इससे आपकी रक्षा मात्र श्रीमहागणपति की शक्ति कर सकती है.

आप सब श्रीमहागणपति के एकाक्षरी मंत्र “गं” का जप करते हुए उनके वक्रतुण्ड स्वरूप की आराधना करें. आपके संकटों का समाधान अवश्य होगा.

भगवान दत्तात्रेय के परामर्श पर समस्त देवतागण भगवान श्रीगणेश के वक्रतुण्ड स्वरूप का ध्यान करते हुए एकाक्षरी मंत्र का जाप करने लगे.

समस्त देवताओं की आराधना से संतुष्ट होकर भगवान् वक्रतुंड वहां प्रकट हुए और मत्सरासुर का अहंकार तोड़ने और उसका विनाश करने का वरदान दिया.

देवों ने कहा- हे श्रीवक्रतुंड आपकी कृपा से हमारा कष्ट अब दूर होगा इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है. हे देव मत्सरासुर को पराजित करने के लिए होने वाले इस युद्ध में हमें भी शामिल करें. हम शिवजी की शक्तियों के सम्मुख विवश थे.

मत्सरासुर ने हमारे आयुधों और हमारी शक्तियों का घोर उपहास किया है. हे देव! आप सर्वसमर्थ हैं पर हमारी एक मनोकामना है कि आप युद्ध के लिए जाते समय हमारे आयुधों और हमारी शक्तियों को भी धारण कर हमें गौरावन्वित करें और हमारी शक्तियों का पुनः स्थापित करें.

भगवान व्रकतुंड ने उन्हें इच्छित वरदान प्रदान कर दिया. देवताओं ने उन्हें विभिन्न आयुध और अपनी शक्तियां भी प्रदान कर दीं.भगवान् वक्रतुंड ने अपने गणों के साथ मत्सरासुर के नगरों पर आक्रमण कर दिया. पांच दिनों तक भयंकर युद्ध चला इस युद्ध में मत्सरासुर के दोनों पुत्र सुन्दरप्रिय और विषयप्रिय मारे गए.

इससे मत्सरासुर क्रोध में जल उठा. उसने युद्धभूमि में आकर भगवान् वक्रतुंड को बहुत अपशब्द कहे. भगवान् वक्रतुंड ने मत्सरासुर से कहा कि तुझे अगर अपने प्राण प्रिय हैं तो शस्त्र त्यागकर मेरी शरण में आजा अन्यथा तेरी मृत्यु निश्चित है.

वक्रतुंड ने उस समय अत्यंध क्रोधित रूप धारण कर रखा था. उनके शरीर से निकल रही ज्वाला से असुरों का शरीर जल रहा था. वे भयभीत होकर भाग रहे थे. असुरों में खलबली मची थी.

शुक्राचार्य को सूचना मिली. वह स्वयं वहां आए और गणपति का रूप देखकर समझ गए कि आज असुरों का अंत हो जाएगा अगर गणेशजी को तत्काल न रोका गया.

मत्सरासुर को शिवजी ने सभी जीवों से अभय किया था किंतु गणपति तो अपनी आंतरिक ज्वाला से उसे भस्म करने को तैयार थे. शुक्राचार्य ने मत्सरासुर को सुझाव दिया कि प्राण बचाने हैं तो गणपति की शरण में चले जाओ.

मत्सरासुर भय से कांप रहा था. गणपति अपनी ज्वाला से उसकी सारी शक्तियां धीरे-धीरे क्षीण कर रहे थे. उसने गुरू के आदेश को मानने में ही भला समझा और विनयपूर्वक वक्रतुंड की स्तुति करने लगा.

मत्सरासुर ने अनेक प्रकार से भगवान वक्रतुंड की स्तुति की. वक्रतुंड प्रसन्न हुए और मत्सरासुर को अभयदान देकर पाताल में बसने और शांत जीवन बिताने का आदेश दिया.

मत्सरासुर वक्रतुंड के आदेश पर पाताल चला गया. शिवजी समेत सभी देवता बंधनमुक्त हुए. देवताओं ने वक्रतुण्ड की स्तुति की. भगवान शिव ने उन्हें खूब आशीर्वाद और शक्तियां प्रदान कीं. मत्सरासुर बाद में गणेशजी का प्रिय गण बन गया.

श्रीगणेश के एकाक्षरी बीज मंत्र “गं” के जप का प्रभाव आपने ऊपर जाना. एक निश्चित संख्या में इस मंत्र के जप का संकल्प लेकर जप करने वाले पर श्रीगणेश की कृपा होती है.

श्रीगणेश भक्त को कम से कम सवा लाख मंत्र का जप का संकल्प लेना चाहिए और दशांश यानी दस प्रतिशत(12,500) का हवन कर देना चाहिए. जिसका मन बहुत भटकता हो उसे इस मंत्र के जप से एकाग्रता बनाने में बहुत सहायता मिलती है.

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ऊं गं गणपत्यै नमः

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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