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श्रीगणेश प्रतिमा स्थापना में आपको नहीं करनी है ये भूल

श्रीगणेश प्रतिमा स्थापना में आपको नहीं करनी है ये भूल

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पौराणिक कथाएँ, व्रत त्यौहार की कथाएँ, चालीसा संग्रह, भजन व मंत्र, गीता ज्ञान-अमृत, श्रीराम शलाका प्रशनावली, व्रत त्यौहार कैलेंडर इत्यादि पढ़ने के हमारा लोकप्रिय ऐप्प “प्रभु शरणम् मोबाइल ऐप्प” डाउनलोड करें.
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आपको गणेशजी की प्रतिमा स्थापना की सरलतम विधि और चतुर्थी की कथा से आज परिचित करा रहे हैं. गणेशजी की पूजा को लेकर लोग अक्सर एक दोष कर देते हैं वह है गणपति के अंगों की विशेष पूजा.

आप गणेशजी के मंत्र देखें तो उसमें उनके शरीर के समस्त अंगों की स्तुति है और उन अंगों से जुड़ी कथाएं हैं जो हम दस दिनों में आपको सुनाएंगे. इसलिए गणेशजी के अंगों की विशेष पूजा जरूर करनी चाहिए.

यह पूजा इतनी सरल है कि आपको खुद लगेगा कि क्यों नहीं करते थे अभी तक पूजा. अधूरी पूजा रखने का क्या लाभ. तो आइएं जानें विस्तृत विधि.

गणेशजी की पूजा सायंकाल में की जाती है. यदि आपने दिन में ही पूजा कर ली है तो भी संध्याकाल में गणपति के अंगों की आरती अवश्य कर लें. यह छोटा सा विधान बड़ा प्रभावशाली है. सुख-संपत्ति, संतान, आरोग्य, बल, बुद्धि और विद्यादायक है.

इस बार चतुर्थी वाले दिन काफी अच्छे संयोग बन रहे हैं. रविवार को ही चतुर्थी शाम 6 बजकर 54 मिनट से लग जायेगी जो कि 5 सितंबर को रात 9 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी.

श्रीगणेश की पूजा और स्थापना सोमवार को सुबह से लेकर रात 9:10 के बीच में कर सकते हैं. वैसे पूजा का सबसे अच्छा वक्त सोमवार को दिन के 11 बजे से लेकर दोपहर के 1 बजकर 38 मिनट तक का है.

सबसे पहले स्वयं और स्थान का पवित्रीकरण कर लें. पवित्रीकरण का मंत्र सरल है-

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः॥

इस मंत्र का उच्चारण करते हुए तीन बार जल स्वयं पर और आसन पर छिड़कें.

अब आप श्रीगणेशजी की विधिवत प्रतिमा स्थापना आरंभ कर सकते हैं.

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श्रीगणेशजी की प्रतिमा स्थापना कैसे करेंः

चतुर्थी के दिन प्रात:काल घर की सफाई करने के बाद स्नानादि कार्यों को पूरा कर लेना चाहिए.

गणेशजी की प्रतिमा की स्थापना के लिए घर के उत्तर दिशा की ओर एक लकड़ी के पीढ़े पर लाल रंग का नया वस्त्र बिछाएं.

नए कलश में जल भरने के बाद उसका मुंह कोरे कपड़े से ढंक दें.

अब मिट्टी से बनी गणेशजी की मूर्ति की स्थापना करें.

गणेशजी की मूर्ति को स्थापित करके सिन्दूर चढ़ाते हुए निम्न तरीके से गणेश जी की पूजा करनी चाहिए:

1.सबसे पहले गणेश प्रतिमा के सामने घी का दीप जलाना चाहिए.

2.शुद्धिकरण के लिए प्रतिमा तथा स्थापना स्थल पर शुद्ध जल छिड़कते हुए गणेश जी के लिए फूलों का आसन सजाना चाहिए.

3.इसके उपरांत गणपति जी का ध्यान करते हुए निष्ठा भाव से पूजा करने का संकल्प लेना चाहिए.

4.गणेश जी की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्त्व होता है, इसलिए दूर्वा से जल छिड़ककर मूर्ति को स्नान करवाना चाहिए.

5.गणेश प्रतिमा पर नए वस्त्र एवं उपवस्त्र चढ़ाने चाहिए.

6.सिन्दूर, फूल, दूर्वा चढ़ाते हुए सुगंधित धूप और दीप से गणेशजी के प्रत्येक अंग की पूजा करनी चाहिए. अक्सर लोग यही भूल करते हैं, वे गणपति के अंगों की पूजा नहीं करते जो गलत है. उनके विभिन्न अंगों की पूजा के सरलतम मंत्र नीचे बताए गए हैं. उसे देखें.

7.गणेश जी की आरती उतारते हुए उन्हें विभिन्न प्रकार के फूल अर्पित करना चाहिए.

8.इसके बाद श्रीफल या नारियल चढ़ा सकते हैं. गणेशजी को 21 लड्डुओं का भोग जरूर लगाना चाहिए. इसमें से पांच लड्डू मूर्ति के पास छोड़कर बाकि भक्तों में प्रसाद के रूप में बांट देना चाहिए.

9.अंत में सभी गलतियों की छमा याचना करते हुए भगवान को प्रणाम करना चाहिए.

10.पूजा के दौरान “गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करना चाहिए.

गणेशजी के प्रत्येक अंग की पूजा करनी चाहिए. प्रायः लोग यह भूल करते हैं. वे गणेशजी के अंगों की पूजा नहीं करते. आइए जानें किस प्रकार होनी चाहिए गणेशजी के अंगों की विधिवत पूजा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.गणपति के अंगों की पूजा इस प्रकार करें.

हर मंत्र के साथ उनके उस अंग को धूप,दीप, आरती दिखाएं.

ऊं गणेश्वराय नमः पादौ पूज्यामि। (पैर पूजन)

ऊं विघ्नराजाय नमः जानूनि पूज्यामि। (घुटने पूजन)

ऊं आखूवाहनाय नमः ऊरू पूज्यामि। (जंघा पूजन)

ऊं हेराम्बाय नमः कटि पूज्यामि। (कमर पूजन)

ऊं कामरीसूनवे नमः नाभिं पूज्यामि। (नाभि पूजन)

ऊं लंबोदराय नमः उदरं पूज्यामि। (पेट पूजन)

ऊं गौरीसुताय नमः स्तनौ पूज्यामि। (स्तन पूजन)

ऊं गणनाथाय नमः हृदयं पूज्यामि। (हृदय पूजन)

ऊं स्थूलकंठाय नमः कठं पूज्यामि। (कंठ पूजन)

ऊं पाशहस्ताय नमः स्कन्धौ पूज्यामि। (कंधा पूजन)

ऊं गजवक्त्राय नमः हस्तान् पूज्यामि। (हाथ पूजन)

ऊं स्कंदाग्रजाय नमः वक्त्रं पूज्यामि। (गर्दन पूजन)

ऊं विघ्नराजाय नमः ललाटं पूज्यामि। (ललाट पूजन)

ऊ सर्वेश्वराय नमः शिरः पूज्यामि। (शीश पूजन)

ऊं गणाधिपत्यै नमः सर्वांगे पूज्यामि। (सभी अंगों को धूप-दीप दिखा लें)

इसके अतिरिक्त गणेशजी की पूजा में ध्यान रखने योग्य कुछ छोटी-छोटी बातें हैं जिनका ध्यान अवश्य रखना चाहिए-हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.गणेश पूजा में आवश्यक बातें जो ध्यान रखें-

आसन समर्पण करते समय आसन पर पांच फूल रखें.

पाद्य में- चार बार जल, दूब, कमल अर्पित करें

अर्घ्य में- चार बार जल, जायफल, लौंग आदि

मधुपर्क में- कांस्य पात्र में घी, मधु और दही दें.

मधुपर्क के आचमन में सिर्फ एक बार जल दें.

स्नान में- पचास बार जल छिड़कें

वस्त्र- बारह अंगुल से बड़ा और नया वस्त्र होना चाहिए

धूप- गूगल का हो और कांसे के पात्र में हो तो अच्छा

नैवेद्य- एक व्यक्ति के भोजन के लिए पर्याप्त होना चाहिए

दीप- कपास की बाती कम से कम चार अंगुल की. घी के दीपक से भगवान की सात बार आरती की जाती है.

दूर्बा व अक्षत- मोटे अंदाजे से संख्या सौ के ऊपर ही रखें.

जो सामग्री उपलब्ध नहीं हो पाती उसके लिए भगवान गणपति का ध्यान करके उनसे क्षमा प्रार्थना कर लें और विनती करें कि हे गजानन, गौरीसुत गणेशजी आप हमें सामर्थ्य दें कि अगले वर्ष आपकी पूजा में समस्त सामग्री से पूर्ण होकर आपकी पूजा करें.

इसके बाद चतुर्थी की कथा कहें. कथा के बाद प्रभु की विधिवत आरती करें और प्रसाद वितरण करें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.गणेश चतुर्थी पूजन की कथाः

एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे थे. देवी पार्वती ने समय व्यतीत करने के लिए भोलेनाथ से चौपड़ खेलने को कहा. महादेव तैयार हो गए. परन्तु वहां कोई और था नहीं. इसलिए इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा?

भोलेनाथ ने कुछ तिनकों से पुतला बनाया और उसमें प्राण प्रतिष्ठा कर दी. पुतला बालक के रूप में जीवित हो गया. महादेव ने बालक से कहा- पुत्र हम चौपड़ खेलना चाहते हैं. तुम इस खेल का निर्णायक बनो. तुम फैसला करना कि चौपड़ में कौन हारा और कौन जीता?

चौपड का खेल तीन बार खेला गया. संयोग से तीनों बार पार्वतीजी जीत गईं. खेल समाप्त होने पर बालक से देवी ने उसका निर्णय पूछा. उसने महादेव को विजयी घोषित कर दिया. पार्वतीजी क्रोधित हो गईं.

उन्होंने कहा- तुममें निर्णायक बनने की क्षमता नहीं है. हार-जीत प्रत्यक्ष देखते हुए भी तुमने कुटिलता से गलत निर्णय सुनाया. इसलिए तुम लंगड़े होकर कीचड में पड़े रहो. बालक ने पैर पकड़ लिए और कहा- आप मेरी माता समान हैं. मैंने द्वेष में ऐसा नहीं किया अज्ञानतावश से हुआ. क्षमा कर दें.

पार्वतीजी पसीज गईं. उन्होंने कहा- यहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी. उनसे पूजा की विधि समझकर तुम गणेश व्रत करो. ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे. यह कहकर शिव-पार्वती कैलाश चले गए. सालभर बाद नाग कन्याएं गणेश पूजन के लिए आईं.

उनसे पूजन विधि ठीक से समझकर बालक ने श्रीगणेश का 21 दिन लगातार व्रत किया. गणेशजी प्रसन्न हो गए और वर मांगने को कहा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.बालक ने मांगा- हे विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वे यह देख प्रसन्न हों.

श्रीगणेश से वरदान प्राप्त कर वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. अपने कैलाश पर्वत पर पहुंचने की कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई. किसी बात पर पार्वतीजी, भोलेनाथ से रुष्ट हो गईं. बातचीत तक बंद हो गई. कैलाश पर रह रहे उस बालक को भी बात पता चली.

उसने शिवजी से कहा- जैसे माता ने कहा था कि गणेश पूजा करके तुम मेरा स्नेह प्राप्त करोगे. नाराज देवी को मनाने के लिए आप भी वही पूजन करिए. भक्त की बात पर भोलेनाथ मुस्कुराए.

वह देवी को प्रसन्न करने के लिए बालक के मन में बसे गणेश आराधना के भाव को बनाए रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने बालक से गणेश पूजा की विधि समझी और व्रत किया.

पुत्र के प्रति इस स्नेह के भाव से पार्वती खुश हो गईं. माता के मन से भगवान भोलेनाथ के लिये जो नाराजगी थी वह समाप्त हो गई.

गणेश को प्रथम पूजनीय बनाने से नाराज शिवपुत्र कार्तिकेय दक्षिण में निवास कर रहे थे. देवी को पुत्र से मिलने की बड़ी इच्छा हुई. वह पुत्र से मिलने को बेचैन हो गईं.

शिवजी ने युक्ति लगाई. उन्होंने पार्वती से कहा- पुत्र को प्राप्त करने के लिए तुम भी गणेश पूजन करो.

एक पुत्र से मिलन को व्याकुल माता ने दूसरे पुत्र की आराधना करनी शुरू कर दी. कार्तिकेय को खबर लगी. वह भागे-भागे कैलाश आए.

माता की पुत्र से भेंट की मनोकामना पूरी हुई. उस दिन से श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरे करने वाला व्रत माना जाता है.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

यह तो बात थी पौराणिक कथा की, श्रीगणेशतत्व को वास्तविक रूप में समझने के लिए एक गंभीर चर्चा की आवश्यकता है और हर गणेशभक्त को यह बात पता भी होनी चाहिए. इसके लिए आप प्रभु शरणम् ऐ्प्पस डाउनलोड कर लें.

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