आपके घर की तरक्की कहीं इसी कारण तो नहीं रूक रही!

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सूचनाः श्राद्ध माहात्म्य और फिर नवरात्रि की पूजा से जुड़ी सभी उपयोगी जानकारियां नामी विद्वानों द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं तो ऊपर दिया गया लिंक क्लिक करके प्रभु शरणम् ऐप्पस जरूर डाउनलोड कर लें. फेसबुक पर संभव है पोस्ट छूट जाए पर ऐप्पस पर तो छूटने का प्रश्न ही नहीं है. फ्री ऐप्पस है. डाउनलोड कर लें. इससे जुड़ी विशेष शृंखला चलाई जाएगी.
श्राद्ध क्यों जरूरीः-
भारतीय शास्त्रों में देवकार्य अर्थात पूजा-हवन, व्रत, यज्ञ को जितनी प्रमुखता दी गई है उससे कम महत्ता पितृपूजा को नहीं है. श्राद्धकर्म परम कल्याणकारी कार्य है. पितरों की संतुष्टि के लिए विधिपूर्वक श्राद्धकर्म करना चाहिए.
जो व्यक्ति सिर्फ देवकार्य करते हैं लेकिन श्राद्धकार्य नहीं करते उनके देवकार्य का वह लाभ नहीं प्राप्त होता जो होना चाहिए था.
सरल भाषा में समझें तो जिस घर में बड़े-बूढ़े भूखे प्यासे हैं उस घर में आकर देवता भोज कैसे ग्रहण करेंगे. वैसे तो पितरों को प्रतिदिन जल से श्राद्ध करना चाहिए.
जो ऐसा नहीं कर पाते उनके लिए श्राद्ध के विशेष दिन बताए गए हैं. जो इन दिनों में भी श्राद्ध नहीं करते, पितृगण उनका रूधिर यानी रक्तपान करते हैं.
श्राद्ध की महत्ता ऐसी है कि माता सीता ने पितरों के लिए पिंडदान और श्राद्ध किया था. सप्तर्षियों में शामिल अगस्तय ऋषि ने एक बार वृक्ष से उलटा लटककर रोते हुए अपने पितरों को देखा. अपने पुण्य कर्मों से उन्हें स्वर्ग प्राप्त हुआ था किंतु फिर भी वे दुखी थे.
अगस्त्य ऋषि विवाह नहीं कर रहे थे. उनके पितरों को आशंका थी कि यदि वंश समाप्त हो गया तो उन्हें श्राद्ध-तर्पण नहीं मिलेगा इससे उन्हें स्वर्ग से निष्कासित होकर इसी तरह दुखी रहना पड़ेगा. पितरों द्वारा श्राद्ध जैसे पितृकार्य की महत्ता सुनने के बाद महर्षि अगस्त्य को निर्णय बदलना पड़ा था.माना जाता है कि पितृपक्ष की अवधि में हमारे पितृगण पृथ्वी पर आते हैं. एक पक्ष यानी 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने और संतुष्ट होने के बाद पितर पितृलोक को लौट जाते हैं. इस दौरान पितृ अपने परिजनों के समीप ही स्थित रहकर आनंद का अनुभव करना चाहते हैं.
इसलिए पितृपक्ष में कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे पितृगण की मर्यादा खंडित हो और वे नाराज हों.
पितरों को प्रसन्न रखने के लिए विशेष ध्यान देने की बातें-
– पितृपक्ष के दौरान यथासंभव ब्राह्मण, जामाता, भांजा, मामा, गुरु, नाती को भोजन कराना चाहिए.
– ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं. फिर यह भोजन पितृगणों को प्राप्त नहीं होता.
– पितृपक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को पीड़ा न दें. प्रतिदिन रसोई में से गाय, कुत्ते, कौआ, बिल्ली आदि के लिए सबसे पहले अंश निकाल दें और उन्हें खिलाएं. इससे पितरों को तृप्ति होती है.
– शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर रखने का भी विधान है.
– द्वार पर आए किसी भी प्राणी का यथासंभव सत्कार करना चाहिए.
कैसे निर्धारित हो श्राद्ध की तिथि, कुछ मान्यताएं. अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.
श्राद्ध की तिथि निर्धारण की कुछ मान्यताएं-
श्राद्ध की सबसे उत्तम तिथि वह है जिस तिथि को पूर्वजों का निधन होता है. उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना सबसे उत्तम है. जिन्हें परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं उनके लिए पितृपक्ष में कुछ विशेष तिथियां कही गई हैं. वे पितरों का उस दिन श्राद्ध कर सकते हैं.
भाद्रशुक्ल पूर्णिमाः श्राद्ध की शुरुआत भाद्रशुक्ल की पूर्णिमा से ही हो जाती है. 16 सिंतबर यानी सोमवार को इस साल यह तिथि है. इस तिथि को नाना-नानी पक्ष का श्राद्ध किया जाता है.
यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध तर्पण करने वाला न हो और उनकी मृत्यु की तिथि याद न हो तो इस दिन नाती उनका श्राद्ध कर सकते हैं.
पंचमी तिथिः ऐसे पितर जिनका देहांत अविवाहित अवस्था में ही हो गया उनका श्राद्ध कर्म इस तिथि को करना चाहिए.
नवमी: सौभाग्यवती स्त्री जिसकी मृत्यु उसके पति से पूर्व हुई हो उनका श्राद्ध नवमी को किया जाता है.
यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है इसलिए इसे मातृनवमी भी कहा जाता है. इस तिथि पर श्राद्ध कर्म से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है.
चतुर्दशीः जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो यानी स्वाभाविक मृत्यु न हुई हो और उनके श्राद्ध का दिवस ज्ञात नहीं है, ऐसे लोगों को श्राद्ध चतुर्दशी को करें.
सर्वपितृमोक्ष अमावस्या: यह श्राद्ध की सबसे उत्तम तिथि है उनके लिए जिन्हें अपने पितरों के श्राद्ध की तिथि ज्ञात नहीं या किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं. इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है.
इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है.
जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो उनका श्राद्ध भी अमावस्या को ही श्राद्ध करना चाहिए.कैसे करें पिंडदान, श्राद्धकर्मः-
– पिंडदान में श्वेत वस्त्र ही धारण करें.
– जौ के आटा या खोया से पिंड का निर्माण कर लें.
– फिर चावल, कच्चा सूत, पुष्प, चंदन, मिठाई, फल, अगरबत्ती, धूप, मधु, तिल, जौ, दही आदि से पूजन कर लें.
– पिंड को हाथ में ले लें फिर नीचे बताया मंत्र पढ़ने के बाद पिंड को अंगूठा और तर्जनी के मध्य से छोडें.
मंत्रः-
इदं पिण्डं (फिर पितर का नाम लें) तेभ्यः स्वधा.
इस तरह कम से कम तीन पीढ़ी के पितरों को पिंडदान करना चाहिए.
इस तरह पिंड दान करने के बाद निम्न मंत्र को तीन बार पढ़कर पितरों की आराधना करनी चाहिए. यह मंत्र ब्रह्माजी द्वारा रचित है.
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।।
– इसके बाद पिंड को उठाकर जल में प्रवाहित कर देना चाहिए.
– श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें. प्रातः एवं सायंकाल में श्राद्ध की मनाही है.
– श्राद्ध करते समय दाहिने से बाएं नहीं बल्कि बाएं से दाहिने (घड़ी की सूई के घूमने की दिशा के विपरीत) परिक्रमा करनी चाहिए.
– श्राद्धकर्म दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूरा करें.
– जिस दिन श्राद्ध करें उस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.
– श्राद्ध के दिन क्रोध, चिड़चिड़ापन और कलह से दूर रहें. पशु-पक्षियों के प्रति प्रेमभाव रखें.
– पितरों को भोजन सामग्री देने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करना उत्तम है. केले के पत्ते या लकड़ी के बर्तन का भी प्रयोग किया जा सकता है.श्राद्ध दिवसः
पूर्णिमा श्राद्ध 16/09/2016
प्रतिपदा श्राद्ध 17/09/2016
दूसरा श्राद्ध 18/09/2016
तीसरा व चौथा 19/09/2016
पांचवा श्राद्ध 20/09/2016
छठवां श्राद्ध 21/09/2016
सातवां श्राद्ध 22/09/2016
आठवां श्राद्ध 23/09/2016
नवम श्राद्ध 24/09/2016
दशम श्राद्ध 25/09/2016
एकादश श्राद्ध 26/09/2016
द्वादश श्राद्ध 27/09/2016
त्रयोदश श्राद्ध 28/09/2016
चतुर्दश श्राद्ध 29/09/2016
अमावस्या श्राद्ध 30/09/2016
यह भ्रामक है कि इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जितना भोजन खिलाएंगे वह सारा पदार्थ उसी आकार, वजन और मात्रा में पितरों को मिल जाएगा. वास्तव में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है जिस योनि में वह प्राणी है.
सच्चे मन, विश्वास, श्रद्धा के साथ किए श्राद्ध से पितरों को आत्मिक शांति मिलती है. वे हम पर आशीर्वाद की वर्षा करते हैं. श्राद्ध तिथि में पृथ्वी पर किया जाने वाला पिंडदान, दीर्घजीवन, आज्ञाकारी संतान, सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला होता है.
संकलनः डॉ. धर्मेंद्र कुमार पाठक,
पीएचडी, वेदशास्त्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय
(डॉ धर्मेंद्र कुमार पाठक राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के जयपुर परिसर में वेद विभाग के सहायक.प्रोफेसर हैं.)
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