सूर्य की आराधना से श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब को मिली थी कोढ़ से मुक्तिः सूर्य सप्तमी की कथा व पूजन विधि
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सूर्य की उपासना से त्वचा, हृदय और नेत्र संबंधी रोग ठीक होते हैं. इसीलिए माघ शुक्ल की सप्तमी को अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी या आरोग्य सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है.
इस दिन सूर्यदेव की उपासना आरोग्य प्रदान करने वाली होती है. सूर्य सप्तमी व्रत के विषय में यह भी मान्यता है कि इस व्रत के करने से मिलने वाला पुण्य वर्ष भ्रर के सभी रविवार के व्रत के पुण्य के बराबर होता है.
आइए जानते हैं- माघ शुक्ल सप्तमी के सूर्य व्रत की कथाः
भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी जाम्वंती को संतानहीन होने के शोकग्रस्त रहती थीं. जाम्वंती ने अपनी व्यथा श्रीकृष्ण से कही तो उन्होंने भगवान शिव की आराधना करने को कहा.
महादेव ने जाम्वंती से कहा कि उन्हें पुत्र की प्राप्ति नहीं हो सकती परंतु श्रीकृष्ण के संतान रूप में आने की उनकी स्वयं की इच्छा है इसलिए वह स्वयं जन्म लेंगे.
श्रीकृष्ण और जाम्वंती के पुत्र हुए शाम्ब. शाम्ब को अपने बल और शारीरिक सौष्ठव का अभिमान हो गया था. बल के अभिमान में चूर रहते हुए वह किसी का भी सम्मान नहीं करते थे.एक बार दुर्वासा ऋषि भगवान श्रीकृष्ण से मिलने आए. लंबे समय तक कठोर तप के कारण दुर्वासा का शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया था.
शरीर पर केवल अस्थियां शेष थीं. इस कारण वह कुछ अजीब से दिखते थे. ऋषि की जर्जर काया देखकर शाम्ब को हंसी आ गई.
इस अपमान से आहत दुर्वासा के चेहरे पर क्रोध का भाव आया. जिसे शाम्ब ने देखा तो जरूर पर इसका कोई पछतावा भी नहीं हुआ.
शाम्ब ने इसके लिए महर्षि से क्षमा भी नहीं मांगी. अत्यंत क्रोधी स्वभाव के दुर्वासा को शाम्ब की धृष्ठता पर बड़ा क्रोध आ गया.
उन्होंने शाम्ब को शाप दिया.
दुर्वासा बोले- नारायण के अंश होने के कारण तुम्हारे अंदर रूप और बल का होना स्वाभाविक है किंतु विनय, लज्जा, बड़ों का सम्मान और आतिथ्य भी होना चाहिए.
मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम कुष्ठ रोग से पीड़ित हो जाओगे. जिस रूप और बल का तुम्हें अभिमान हुआ है उसका क्षय हो जाएगा और तुम मुझसे भी ज्यादा कुरूप हो जाओगे.ऋषि का शाप तत्क्षण प्रभाव में आ गया. वैद्यों ने बहुत चिकित्सा की लेकिन शाम्ब को रत्तीभर भी लाभ न हुआ. दुखी शाम्ब श्रीकृष्ण के सामने बिलखने लगा और क्षमायाचना कर उनसे अपना रूप वापस मांगने लगा.
श्रीकृष्ण ने कहा- तुमने ऋषि के तेज का अपमान किया है जिसका प्रभाव समाप्त करना घोर अनर्थकारी होगा. तुम ऋषि से भी ज्यादा तेजस्वी सूर्य की शरण में जाओ.
प्रभु के आदेश पर शाम्ब सूर्य भगवान की उपासना करने लगा. उसकी उपासना से प्रसन्न होकर सूर्य एक मूर्ति के रूप में आए और अपना विग्रह प्रदान किया.
शाम्ब ने उस विग्रह की विधिवत आराधना की. इस तरह शाम्ब कुष्ठ रोग से मुक्त हुए. कोणार्क के सूर्य मंदिर में वही विग्रह स्थापित है.
सम्राट हर्षवर्घन के दरबारी कवि मयूरभट्ट ने भी कुष्ठ रोग से पीड़ित हुए तो उन्होंने सूर्य आराधना के लिए सूर्य सप्तक की रचना की. प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें कुष्ठ रोग से मुक्त कर दिया.जो लोग त्वचा, आंख की परेशानी, हड्डियों और जोड़ों की परेशानी से पीड़ित हैं या पिता-पुत्र के मध्य संबंधों में मधुरता नहीं है तो इस व्रत को करना चाहिए. इससे लाभ होता है.
पुत्र के स्वास्थ्य से पीड़ित माताओं को यह व्रत अवश्य करना चाहिए. सूर्यदेव की कृपा से पुत्र की प्राप्ति में आने वाली बाधा मिटती है. पुत्र के ऊपर आए स्वास्थ्य संबंधी संकटों से रक्षा होती है और पुत्र तेजस्वी होता है.
कैसे करें आराधनाः
सूर्योदय से पूर्व किसी जलाशय, नदी, सरोवर या अगर ये उपलब्ध न हों तो घर में ही स्नान करके उगते हुए सूर्य को जल देना चाहिए.
सूर्यदेव को दिए जाने वाले जल में लाल फूल, लाल चंदन या रोली गुड़ मिला लें.
कर्पूर, धूप, लालपुष्प आदि से भगवान सूर्य का पूजन करें. दीपदान करें. अपने सामर्थ्य के अनुसार गरीबों को दान करें एवं भूखों को भोजन कराएं.
आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ विशेष फलदायक होता है.
नमक का त्याग करें. सूर्यास्त के पश्चात शुद्ध मीठा भोजन ग्रहण कर सकते हैं.
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