इंद्रपुत्र ने चोंच से किया सीताजी पर आघात, रघुनंदन ने फोड़ दी थी आंख. कौए क्यों होते हैं काने?
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.भगवान श्रीराम पंचवटी में वनवास काट रहे थे. प्रभु को आनंद मिले इसलिए वनदेवी ने अपना संपूर्ण ऋंगार किया. वन की शोभा इतनी रमणीय हो गई कि जैसे चिरवसंत हो.
पेड़ों में सुंदर-सुगंधित फूल आए. माता सीता भी वनदेवी के सौंदर्य पर मुग्ध थीं. भगवान श्रीराम ने सबसे सुंदर फूलों को चुना और एक सुंदर माला बनाकर सीताजी को पहना दी.
प्रभु के वनवास की चर्चा देवलोक में होती थी. इंद्रपुत्र जयंत उसे सुना करता था. उसे भरोसा न होता था कि श्रीहरि अवतार लें और समय वन में काटें. उसने उनकी शक्ति की परीक्षा लेने की सोची.
समुद्र मंथन से निकले अमृत को असुरों से बचाने के लिए देवताओं ने अमृत कलश लेकर भागने को कहा था. वह कलश लेकर भागा था और असुरों को खूब परेशान किया था.
इस के लिए देवों ने उसकी सराहना की थी. जयंत को अभिमान हो गया कि वह पवनवेग से चलता है.
अभिमान इतना बढ़ा कि उसने स्वयं श्रीराम की परीक्षा लेने की सोच ली.
क्षुद्र बुद्धि जयंत कौए का वेश धरकर पंचवटी में आया और उसी वृक्ष पर आ बैठा जिसके नीचे प्रभु बैठे थे. वह आज श्रीराम की शक्ति की परीक्षा लेने आया था.प्रभु श्रीराम द्वारा भेंट की गई दी माला को पहनकर देवी सीता बड़ी प्रसन्न थीं. आज भगवान के मन का बोझ कुछ हुआ हल्का हुआ था. उन्हें हमेशा ऐसा लगता था कि एक राजकन्या को उनके कारण वन का कष्ट भोगना पड़ रहा है.
श्रीराम और माता सीता आनंद में मग्न वार्तालाप कर रहे थे. दुष्ट स्वभाव के जयंत से उनकी खुशी बर्दाश्त नहीं हुई.
वह वृक्ष से अचानक उड़ा और पलभर के अंदर सीताजी के पास पहुंचा. उसने सीताजी के पैर में चोंच से प्रहार किया और फिर झटपट उड़कर वृक्ष पर जा बैठा.
प्रहार गहरा था. इससे देवी के पांव से खून बहने लगा. श्रीराम इसे देखकर बहुत क्रोधित हो गए. उन्होंने पहचान लिया कि यह किसने और क्यों किया है.
जयंत उन्हें चिढ़ा रहा था. प्रभु को इस अभिमानी को दंड तो देना ही था. उन्होंने एक सरकंडे को धनुष पर चढ़ाया और बाण को आदेश दिया कि दुष्ट को दंड दे.
प्रभु का आदेश मिलते ही वह सरकंडा ब्रह्मबाण हो गया. ब्रह्मबाण जयंत की ओर लपका तो जयंत जान बचाने के लिए भागा. बाण ने उसका लगातार पीछा किया.
भागता-भागता जयंत अपने पिता देवराज इंद्र के पास पहुंचा और उनसे सहायता की याचना की. उसे लगा कि पिता उसकी रक्षा करेंगे.
इंद्र ने दिव्यदृष्टि से सब जान लिया और स्वयं भयभीत हो गए. अनिष्ट की आशंका से कांपने लगे.इंद्र ने कहा- तेरे प्राणों की रक्षा अब मेरे वश की बात नहीं. जा ब्रह्मदेव की शरण ले, शायद वह तेरी रक्षा कर सकें.
जयंत ने वहां उपस्थित सभी देवों की ओर देखा सभी सिर झुकाए खड़े थे. वह ब्रह्माजी के पास पहुंचा. ब्रह्माजी ने भी असहमति जताई.
एक लोक से दूसरे लोक तक जयंत ने हर जगह दौड़ लगाई, प्राण रक्षा की गुहार लगाई लेकिन सबने हाथ खड़े दिए. जयंत को शरण देकर कोई भी प्रभु के कोप का भागी नहीं बनना चाहता था.
ब्रह्मबाण उसका पीछा कर रहा था. जान बचाने के लिए मारे-मारे फिर रहे जयंत को नारदजी मिल गए. उसने नारदजी से कहा कि आप तो नारायण के प्रियभक्त हैं. नारायण कोप से रक्षा का उपाय बताइए.
नारदजी को उसकी दशा पर दया आ गई. उसकी दुष्टता का उसे पर्याप्त दंड भी मिल चुका था.
नारदजी ने राह सुझाई- जयंत तू इस बाण से छिपता अपने असली रूप में जाकर सीधे माता सीता के चरणों में गिर जा और अभयदान मांग ले. इसके अतिरिक्त तेरी प्राणों की रक्षा का कोई दूसरा उपाय नहीं.
जयंत ने सारी शक्ति जुटाई और पूरे वेग से भागकर पंचवटी पहुंचा. वहां जाकर सीधा देवी के पैरों में गिर गया और प्राणरक्षा की गुहार लगाई.
चूंकि उसने कौए के रूप में प्रहार किया था इसलिए देवी सीता उसके असली रूप में देवी उसे पहचान नहीं पाईं. उन्होंने जयंत को अभयदान दे दिया.
वरदान प्राप्त करने के बाद जयंत ने सारी बात बताई. इसे सुनकर माता भी उलझन में पड़ गईं.उन्होंने प्रभु से जयंत को दिए अभयदान की बात कही और उसके प्राण न लेने का अनुरोध किया. भगवान पसीज गए.
उन्होंने कहा कि बाण को दंड देने का आदेश मिला था और वह बिना दंड दिए वापस नहीं हो सकता. इसलिए इसे अंगभंग का दंड मिलता है. बाण के प्रहार से जयंत की एक आंख फूट गई.
कहा जाता है कौए इसी कारण काने होते हैं. हनुमानजी ने लंका दहन के बाद लौटते समय देवी से पहचान चिह्न मांगा.
सीताजी ने अपना चूड़ामणि देते हुए कहा- आप प्रभु को याद दिलाना कि जब जयंत ने मेरे शरीर पर छोटा सा आघात किया था तो रधुनंदन के तीर ने जयंत का तीनों लोकों में पीछा करके दंडित किया था.
देवी बोलती रहीं- रावण ने हरण कर लिया फिर भी रघुनंदन मेरी सुध नहीं लेते? यदि एक माह के भीतर उन्होंने रावण को दंडित कर मुझे मुक्त नहीं कराया तो मैं अग्नि कुंड में कूदकर प्राण दे दूंगी.
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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