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किसी को हीन न जानिए, एक महामूर्ख उतथ्य ने तर्कशास्त्र का सृजन किया

किसी को हीन न जानिए, एक महामूर्ख उतथ्य ने तर्कशास्त्र का सृजन किया

MaaSherawali

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पत्नी ने देवदत्त से कहा- आप अनेक राजाओं के पुरोहित हैं, मनोकामना यज्ञ कराते हैं. क्या अपनी संतान के लिए पुत्र कामेष्टी यज्ञ नहीं कर सकते?

देवदत्त ने कहा- मैंने आज तक अपनी विद्या का प्रयोग अपने उपकार के लिए नहीं किया लेकिन तुम्हारी इच्छा रखते हुए पुत्र प्राप्ति के लिए मैं पुत्र कामेष्टि यज्ञ करूंगा.

देवदत्त ने कई ऋषि-मुनियों को पुरोहित बनाया और तमसा नदी के किनारे पुत्र कामेष्टी यज्ञ आरंभ हुआ. यज्ञ करने वालों में से एक गोभिल ऋषि मंत्र पढ़ते समय उच्चारण का दोष कर देते थे.

देवदत्त ने अशुद्ध उच्चारण के लिए गोभिल को टोक दिया. गोभिल इस बात से क्रोध से भड़क गए. उन्होंने शाप दिया- तुम मुझे मूर्ख समझते हो! मेरा शाप है कि तुम्हारी जो संतान होगी वह मूर्ख होगी.

देवदत्त ने उन्हें समझा-बुझाकर शांत कराया और शाप वापस लेने को कहा. गोभिल ऋषि ने कहा कि उन्हें शाप वापस लेना नहीं आता परंतु उसमें थोड़ा संशोधन कर देता हूं. तुम्हारा पुत्र जन्म से मूर्ख भले हो किंतु समय आने पर प्रकांड विद्वान बनेगा.

देवदत्त के घर में एक पुत्र ने जन्म लिया. उसका नाम रखा गया उतथ्य. उसे पढ़ने के लिए गुरूकल भेजा तो गया लेकिन शाप के कारण वह एक अक्षर नहीं सीख पाया. सारे देश में शोर हो गया कि देवदत्त जैसे विद्वान का अपना पुत्र ही मूढ़ है.

लोगों के प्रतिदिन के तानों से देवदत्त दुखी तो थे लेकिन वह जानते कि यह शाप के कारण हो रहा है लेकिन उतथ्य को यह पता नहीं था. अपने कारण माता-पिता के हो रहे अपमान से दुखी उसने घर छोड़ने का निर्णय किया.एक रात उतथ्य चुपचाप घर से ऐसे स्थान पर जाने के लिए निकला जहां उसे कोई पहचानता न हो. वह दूर गंगा के किनारे पहुंचा और वहां एक कुटी बनाकर रहने लगा.

उतथ्य को कोई पूजा विधि, मंत्र, शास्त्र आदि तो आते नहीं थे इसलिए वह दिनभर गंगा किनारे धूमता रहता. उसका आचरण साधुओं जैसा था. कैसा भी संकट आ जाए पर वह कभी झूठ नहीं बोलता था.

इस कारण लोग उसे सत्यव्रत कहने लगे. सत्यव्रत ज्ञानी पुरुषों की सेवा करता. इस कारण सत्यव्रत का भी बड़ा सम्मान था. एक दिन वह अपनी कुटी के सामने बैठा था. तभी उसे एक सूअर आता दिखा.

सूअर की पीठ में एक तीर लगा था और खून बहने के कारण वह अचेत हो रहा था. उसके पीछे-पीछे शिकारी भी आ रहा था. उतथ्य को दया आई. उसने सुअर को पास की झाड़ियों में छिपा दिया.

उतथ्य धर्मसंकट में था कि यदि शिकारी ने सुअर का पता पूछ लिया तो उसे सत्य बताना ही पड़ेगा. इस तरह तो शरणागत के प्राण चले जाएंगे. उसने बोलने से बचने के लिए उपाय निकाला.

वह ध्यान में लगे होने का स्वांग करने लगा. शिकारी भी उसकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगा. जब वह समाधि से उठा तो शिकारी को अपने पैरों के पास बैठा पाया. उतथ्य को समझ न आया क्या करें.इससे पहले कि शिकारी कुछ बोलता, उतथ्य ने उसे जीवहत्या के कारण होने वाले पाप के बारे में बताने लगा. उसके उपदेश से शिकारी की मति सुधर गई और उसने हत्याकर्म त्यागने का वचन देकर चला गया.

शिकारी के जाते ही अचानक घायल सूअर से भगवती दुर्गा प्रकट हो गईं. देवी ने कहा- मैं तुम्हारी दयालुता और सत्य बोलने के संकल्प से प्रसन्न हूं. मैं तुम्हारी परीक्षा ले रही थी.

तुमने हृदय से मनन किया है जो अध्ययन के ज्ञान से ऊपर है. मेरे आशीर्वाद से आज से तुम सभी शास्त्रों में पारंगत हो जाओगे और तुम्हारी विद्वता का संसार में सम्मान होगा.

वरदान देकर देवी अंतर्धान हो गई. देवी की कृपा से उतथ्य शापमुक्त हो गए और बाल्मीकि की तरह उतथ्य मुनि भी एक महान कवि बन गए.

कहते हैं तर्कशास्त्र की उत्पत्ति और उसके विकास में उतथ्य का ही सर्वाधिक योगदान है.

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