पार्वती स्तोत्र हिंदी अर्थ एवं पाठ विधि | Parvati Stotram

पार्वती स्तोत्र हिंदी अर्थ एवं पाठ विधि (Parvati Stotram)

श्री पार्वती स्तोत्रम् जगज्जननी भगवती पार्वती की एक अत्यंत पावन और फलदायी स्तुति है। सुखी वैवाहिक जीवन, मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति और पारिवारिक शांति के लिए इसका पाठ परम कल्याणकारी माना गया है। पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ सभी श्लोकों को सरल पद-विच्छेद (अन्वय) और हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत किया गया है।

संपूर्ण पार्वती स्तोत्रम् (सरल उच्चारण एवं अर्थ सहित)

श्लोक १

विबुध-अधिप-तेजिनीश-कान्ते वदन-आभा-जित-यामिनीश-कान्ते ।

नव-कुन्द-विराजमान-दन्ते नलिनाभं प्रणमाम्यहं पदं ते ॥ १॥

अर्थ: हे देवराज इन्द्र और देवताओं को तेज प्रदान करने वाले भगवान शिव की प्रियतमे! आपके मुख की कांति ने चंद्रमा की शोभा को भी जीत लिया है। आपके दन्त नवीन कुन्द पुष्प के समान श्वेत एवं सुन्दर हैं। हे माता! मैं आपके चरण-कमलों में सादर प्रणाम करता हूँ।

श्लोक २

विकच-अम्बुरुहां विलास-चोरैः अतिशीतैः प्रवहत्-दया-अम्बु-पूरैः ।

शशिशेखर-चित्त-नृत्त-रङ्गैः तरसा आलोकय देवि माम् अपाङ्गैः ॥ २॥

अर्थ: खिले हुए कमलों की शोभा को हरने वाले, अत्यंत शीतल, करुणा और दया रूपी जल की धारा बहाने वाले तथा चंद्रशेखर भगवान शिव के हृदय को आनंदित करने वाले अपने कृपादृष्टि युक्त कटाक्षों से, हे देवि! शीघ्र मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक ३

अवनीधर-नायकस्य कन्ये कृपणं मां परिपालय अतिधन्ये ।

विधि-माधव-वासव-आदि-मान्ये द्रुतम् उन्मूलित-भक्त-लोक-दैन्ये ॥ ३॥

अर्थ: हे पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री! हे परम धन्य माता! मुझ दीन-हीन की रक्षा कीजिए। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि समस्त देवों द्वारा आप पूजित हैं और अपने भक्तों के दारिद्र्य व कष्टों का तुरंत निवारण करने वाली हैं।

श्लोक ४

कुच-निन्दित-शातकुम्भ-शैले मणि-काञ्ची-वलय-उल्लसत्-दुकूले ।

परिपालय मां भवानि बाले त्रि-जगत्-रक्षण-जागरूक-लीले ॥ ४॥

अर्थ: हे मां भवानी! मणियों से जटित करधनी और कंकणों से सुशोभित वस्त्र धारण करने वाली तथा तीनों लोकों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहने वाली, हे करुणामयी माता! मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक ५

स्व-रुचा जित-तप्त-शातकुम्भे कच-शोभा-जित-काल-मेघ-डम्भे ।

परिपालय मां त्रसत्-निशुम्भे मकुट-उल्लासि-सुधा-मयूख-डिम्भे ॥ ५॥

अर्थ: अपनी दिव्य आभा से तपे हुए सुवर्ण की कांति को परास्त करने वाली, अपने घने केशों की शोभा से मेघों के अभिमान को दूर करने वाली, निशुंभ को भयभीत करने वाली और मुकुट में बालचंद्र को धारण करने वाली हे माँ! मेरी रक्षा करें।

श्लोक ६

कुसुमायुध-जीवन-अक्षि-कोणे परितो माम् अव पद्मराग-शोणे ।

स्मर-वैरि-वशीकृत-प्रवीणे चरण-अब्ज-आनत-सत्क्रिया-धुरीणे ॥ ६॥

अर्थ: कामदेव को पुनः जीवनदान देने वाली कृपादृष्टि से युक्त, कामदेव के शत्रु भगवान शिव को अपने प्रेम से वश में करने वाली और अपने चरणों में झुके हुए भक्तों का कल्याण करने में प्रवीण, हे माता! सब ओर से मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक ७

गिरिजे गगन-उपम-अवलग्ने गिरि-तुङ्ग-स्तन-गौरवेण भुग्ने ।

वस मे हृदये तव-अङ्ग-लग्ने तव संदर्शन-मोद-सिन्धु-मग्ने ॥ ७॥

अर्थ: हे गिरिराजकुमारी! आप मेरे उस हृदय में सदा निवास करें जो आपके श्रीचरणों में लीन है और आपके दिव्य दर्शन के आनंद-सागर में मग्न रहता है।

श्लोक ८

सकल-उपनिषत्-सरोज-वाटी-कलहंस्याः तव मे कवित्व-धाटी ।

कृपया आविर्-अभूत् इयं तु पेटी वहतु त्वत्-गुण-रम्य-रत्न-कोटीः ॥ ८॥

अर्थ: समस्त उपनिषद रूपी कमल-वन की कलहंसी स्वरूप हे भगवती! आपकी कृपा से ही यह काव्य-रचना प्रकट हुई है। यह स्तुति रूपी पेटी आपके मनोहर गुणों रूपी करोड़ों रत्नों को सदा धारण करे।

पार्वती स्तोत्र पाठ के लाभ एवं नियम

  1. उत्तम जीवनसाथी एवं वैवाहिक सुख: कुंवारी कन्याओं द्वारा इसके नियमित पाठ से सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है तथा दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है।

  2. पूजा विधि: प्रतिदिन प्रातः अथवा सोमवार/शुक्रवार को मां पार्वती के सम्मुख घी का दीपक जलाकर धूप-दीप और अक्षत-पुष्प अर्पित करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करें।

  3. मनोकामना पूर्ति: अखंड सौभाग्य और पारिवारिक कष्टों से मुक्ति के लिए प्रदोष काल या नवरात्रि में इसका पाठ अत्यंत चमत्कारी फल देता है।

 

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