भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुः अजगर से पिंगला वेश्या तक से मिली जीवन की शिक्षाएँ
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुः अजगर से पिंगला वेश्या तक से मिली जीवन की शिक्षाएँ (भाग दो)
हमने भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा शृंखला के पहले भाग में पृथ्वी से कबूतर तक उनके आठ गुरुओं के बारे में जाना. भगवान ने उनसे क्या सीखा और आज के युग में हमें उससे क्या सीख लेनी चाहिए- यह सब जाना।
पहला भाग इस लिंक से पढ़ेंः
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु: प्रकृति से मिली जीवन बदलने वाली 24 अमूल्य शिक्षाएँ
पहले भाग की कथा में दत्तप्रभु को धैर्य, क्षमा, साक्षी–भाव, शांति, तप, संतुलन और आसक्ति के खतरे की शिक्षा मिली। दूसरे भाग में हम यह जानेगें कि भगवान ने अजगर, समुद्र, पतंग, मधुमक्खी, हाथी, मधु निकालने वाले, हिरन, मछली और पिंगला वेश्या से जीवन का कौन सा पाठ पढ़ा?
कथा के इस दूसरे भाग में हम इन्द्रियों के जाल और उनसे निकलने की राह सीखेंगे।

9. भगवान दत्तात्रेय के नवें गुरु अजगर ने सिखाया– जो प्राप्त है वह पर्याप्त है
भगवान दत्तात्रेय ने अजगर को देखा। उन्होंने उसे अन्य हिंसक पशुओं की तरह कभी शिकार की खोज में दौड़ते-भागते नहीं देखा। जो सामने आ जाए, उसी से काम चला लेता है। कभी ज्यादा, कभी कम पर भीतर से शांत। इस पर भी वह लंबा जीता है।
दत्तात्रेय जी ने अजगर को देखकर जाना कि सुख–दुःख, लाभ–हानि, भोजन–अभाव – ये सब प्रारब्ध के हिस्से हैं। साधक के लिए आवश्यक है कि वह ईमानदारी से अपने कर्म करे और परिणाम को प्रभु पर छोड़ दे।
वे कहते हैं कि अजगर को लोग आलस्य के पर्याय की तरह देखते हैं मैंने उसे अति की चिंता से मुक्त जीव की तरह देखा। इसलिए मैं उसे अपना गुरु समझता हूँ।
हमारे लिए सीखने की बात–
“परिश्रम मेरा, परिणाम प्रभु का।”
10. समुद्र – बाहर लहरें हों, भीतर गम्भीरता
समुद्र का जल ऊपर लहरों में चंचल दिखता है, पर गहराई में कहीं एक निश्चलता है जो बदलती नहीं। बरसात में नदियाँ उससे मिलती हैं, गर्मी में कुछ जल सूखता है, पर समुद्र अपनी गहराई नहीं खोता।
दत्तप्रभु ने समुद्र से भी शिक्षा ली। उन्होंने सिखा कि पद, धन, प्रतिष्ठा, बीमारी आदि बाहरी घटनाएँ मात्र हैं। ये समुद्र के ऊपर की लहरें भर हैं। साधक की असली पहचान उसकी भीतर की गम्भीरता से होती है। यदि थोड़ी प्रशंसा से हम बहुत फूल जाएँ, और थोड़ी आलोचना से पूरी तरह टूट जाएँ यहीं से विनाश का आरंभ होता है। इसलिए उन्होंने समुद्र को भी अपना गुरु मान लिया।
11. पतंगा – आँखों का जाल
दत्तात्रेय जी ने एक शाम दीपक के ऊपर पतंगे को देखा। पतंगा दीपक की लौ के रूप पर ऐसा मोहित था कि वह उसके ही आसपास नाच रहा था। रौशनी उसे आकर्षित करती थी। वह बार–बार उसके आसपास चक्कर लगाता रहा। लेकिन इस आकर्षण में और चक्कर लगाते रहने से थके होने के कारण उसका संतुलन बिगड़ गया। पतंगा उस लौ के इतने समीप आ गया कि जलकर नष्ट हो गया।
दत्तात्रेय जी ने पतंगे से विकारों से दूरी की शिक्षा ली। वे कहते हैं: हे राजा यदु! काम–विकार आँखों से उठकर बुद्धि पर कब्जा कर ले, तो परिणाम आग ही होता है। केवल रूप–मोह में विवेक खो देना पतंगे की तरह स्वयं को जला देने जैसा है। इसलिए एक साधक को इस विषय पर विशेष सतर्क रहना चाहिए। अन्यथा उसकी साधना के पतन में उतना भी समय नहीं लगेगा जितना पतंगे के अंत में लगा।
प्रभु शरणं के पाठकों के लिए याद रखने की बात –“आंखें सुंदरता देखें, पर बुद्धि सतर्क रहे।”
12. मधुमक्खी/भौंरा से मिली संग्रह और सार ग्रहण की दो शिक्षाएँ
भौंरा फूल–फूल पर जाकर थोड़ा–थोड़ा रस लेता है। भूमिका साफ है – हर जगह से सार ले, पर किसी एक फूल के अहंकार में न फँसे। दत्तप्रभु को भौंरे से भी एक शिक्षा मिली। उन्होंने बताया कि मैंने भौंरे से यह सीखा कि जितना संभव हो उतने स्रोतों से ज्ञान ग्रहण करना चाहिए।
लेकिन किसी एक ज्ञान या विचार को ही अंतिम सत्य मानकर दूसरे की निन्दा में नहीं फंसना चाहिए। इस सृष्टि में हम जो जानते हैं वह इसका बहुत छोटा हिस्सा है। हम जो नहीं जानते हैं वह हमारे जानने से बहुत अधिक बड़ा है। इसलिए जीवन में ज्ञान प्राप्त करने में कोई संकोच न रखो।
उसी तरह मधुमक्खी परिश्रम से मधु बनाती है, पर जब संग्रह अत्यधिक हो जाता है तो मधुहारी एक ही बार में उससे पूरा मधु छीन ले जाता है। हे राजन मैंने पाया कि मधुमक्खी जब अपना छत्ता लगाती है तो वह सबकुछ भूलकर सिर्फ मधु का संग्रह करती रहती है। यह संग्रह ही उसके लिए काल बन जाता है।
मैंने मधुमक्खी से यह शिक्षा ली कि संग्रह जितना बड़ा होगा उससे जुड़ी चिंता, भय और असुरक्षा भी उतनी ही बड़ी होगी।
हमारे लिए सीखः आवश्यक संग्रह ठीक है, अहंकार–जनित संग्रह दुख का बीज है।
13. हाथी – देह के बल में भी एक कमजोरी
हाथी बल, आकार, सामर्थ्य में बहुत आगे है। पर शिकारी उसे हथिनी के मोह से पकड़ लेते हैं। हथिनी का पास जाना, उसके संग समय बिताना – इनके आकर्षण में हाथी इतना खो जाता है कि जाल को पहचान नहीं पाता, और बंध जाता है।
भगवान ने हाथी को अपना गुरु माना क्योंकि उन्होंने उससे एक बड़ी शिक्षा ली। उन्होंने जाना कि काम–विकार इतना शक्तिशाली होता है कि बलवान को भी गिरा सकता है।
हमारे लिए सीखः देह–बल, धन–बल, पद–बल – सब पीछे रह जाते हैं, यदि विवेक काम–विकार के सामने आत्मसमर्पण कर दे।
14. मधु निकालने वाला – लोभ का परिणाम
दत्तात्रेय जी ने मधु निकालने वाले उस व्यक्ति से भी सीखा जो मधुमक्खियों के वर्षों के परिश्रम को एक दिन में उठाकर ले गया।
उन्होंने समझा कि मधुमक्खियाँ मेहनत से मिठास जमा करती हैं, पर भोग किसी और को मिलता है।
दत्तात्रेय जी यदु से कहते हैं: कई गृहस्थ भी जीवन भर धन–संग्रह में लगे रहते हैं। न स्वयं आनंद से भोगते हैं, न धर्म में, न दान में लगाते हैं। अंत में उनका संचित धन किसी और के काम आता है – वारिस, चोर, राजा या किसी अन्य लाभार्थी के।
प्रभु शरणं के पाठकों के लिए सीख :
“संग्रह को धर्म और दान से संतुलित करना ही बुद्धिमत्ता है।”
15. हिरन – कानों के जाल की कहानी
दत्तात्रेय जी ने हिरन को पकड़ने वाले शिकारी को देखा। उन्होंने देखा कि हिरण मधुर संगीत से मोहित हो जाता है। शिकारी मधुर ध्वनि का उपयोग करते हैं, और हिरन धीरे–धीरे जाल के करीब आता है, फिर पकड़ लिया जाता है।
दत्तात्रेय जी ने हिरन से सीखा कि हर मधुर ध्वनि कल्याणकारी नहीं होती। गीत, संगीत और मनोरंजन भी विवेक से चुने जाने चाहिए। जो मन को ऊपर उठाए, उसे जगह दो; जो मन को नीचे खींचे, उसे सीमित करो।
16. मछली – जिह्वा का जाल
काँटे में लगा मांस का टुकड़ा मछली को इतना प्रिय लगता है कि वह अपनी पूरी सावधानी भूल जाती है। स्वाद की लालसा में वह काँटे को पकड़ लेती है –और वहीं उसके जीवन का अंत हो जाता है।
दत्तात्रेय जी मछली से स्पष्ट कहते हैं कि रसना–इन्द्रिय सबसे कठिन है। भूख के समय वही सबसे ज्यादा सक्रिय होती है। जब तक मनुष्य स्वाद की पराकाष्ठा से ऊपर उठकर संतुलन सीख नहीं लेता, वह पूर्ण जितेन्द्रिय नहीं कहलाता।
प्रभु शरणं के पाठक के लिए सबक:
“भोजन करते समय, हर ग्रास से पहले एक बार प्रभु का स्मरण करिए। धीरे–धीरे स्वाद का केंद्र बदल जाएगा –
थाली से हटकर कृपा की ओर।”
17. पिंगला वेश्या से शिक्षा से दुआर हटाकर प्रभु के दरवाज़े पर लौटने की कथा
दत्तात्रेय की भेंट विदेहनगरी मिथिला की एक वेश्या पिंगला से हुई। पिंगला रात–भर किसी धनी ग्राहक की आशा में सजकर बैठी रही। रात की शुरुआत में उसे आशा बहुत थी कि आज कोई आएगा। वह उसे पैसा देगा, सुख देगा और जीवन को थोड़ा हल्का कर जाएगा।’
गली में जैसे ही किसी राहगीर के कदम की आहट आती, पिंगला को उम्मीद मिलती कि शायद वह आ गया है जिसकी उसे प्रतीक्षा है। बहुत देर तक उसके पास कोई नहीं आया। उसकी आशा थोड़ी कमजोर तो हुई फिर भी वह दरवाजे पर ही खड़ी रही।
आधी रात होने तक कोई नहीं आया। अब उसका शरीर नहीं, उसकी आत्मा एक थकान से दब गई। तब अचानक उसके भीतर एक प्रश्न उठ गया – “मैं उन लोगों के पीछे भाग रही हूँ जिनका खुद अपना कल का ठिकाना नहीं हैं। ऐसे लोगों में मैं सहारे की आस लगाए बैठी हूँ। यह कैसी मूर्खता में फँसी हुई। कोई मेरा सच्चा सहारा हो सकता है तो वह है सदा मेरे भीतर रहने वाला ईश्वर हो सकता है।”
दत्तप्रभु ने यदु को बताया कि हे राजा मैंने इस कथा का जो निचोड़ समझा वह यह था कि आशा सबसे बड़ा दुख है, और आशा का त्याग (वैराग्य) सबसे बड़ा सुख। जब तुम लोगों पर टिके हुए भरोसे को समेटकर प्रभु पर रख देते हो,तभी पहली बार तुम सचमुच चैन की नींद सो पाते हो। इसलिए मैंने पिंगला वेश्या को भी अपना गुरु मानता हूँ क्योंकि उससे भी मैंने अनमोल ज्ञान पाया है।
भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा के अगले भाग में जानेंगे:
दत्त प्रभु ने कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंगी कीट से क्या सिखा कि उसे भी अपना गुरु माना है –
पढ़िए कथा का तीसरा अंशः