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राजा ययाति की कथा: कामासक्त भोगी कैसे बन गया संन्यासी

राजा ययाति की कथा: कामासक्त भोगी कैसे बन गया संन्यासी

राजा ययाति की कथा: कामासक्त भोगी कैसे बन गया संन्यासी जब एक क्षण के अहंकार ने वर्षों की तपस्या को नष्ट कर दिया

भोग से वैराग्य तक की राजा ययाति की कथा

राजा ययाति की कथाः अभिमान ने कारण छिन गया स्वर्ग
राजा ययाति की कथाः अभिमान ने कारण छिन गया स्वर्ग

शुक्राचार्य के शाप के कारण राजा ययाति को असमय वृद्धावस्था प्राप्त हो गई। उनका शरीर अचानक जर्जर हो गया और युवावस्था छिन गई।

ययाति ने अपने पुत्रों से अपनी वृद्धावस्था स्वीकार करने और उन्हें अपना यौवन देने का आग्रह किया। उनके सभी पुत्रों ने मना कर दिया, लेकिन सबसे छोटे पुत्र  ने पिता की इच्छा को अपना धर्म मानते हुए अपना यौवन उन्हें सौंप दिया और स्वयं पिता का बुढ़ापा स्वीकार कर लिया।

ययाति ने पुनः युवावस्था प्राप्त की। उन्होंने वर्षों तक संसार के सुखों का अनुभव किया। राजसी वैभव, भोग-विलास और इच्छाओं की पूर्ति में उन्होंने कोई कमी नहीं छोड़ी।

लेकिन समय के साथ उन्हें एक महान सत्य का अनुभव हुआ—

इच्छाओं को भोग से शांत नहीं किया जा सकता। जैसे अग्नि में घी डालने से अग्नि और बढ़ती है, वैसे ही भोग इच्छाओं को और प्रबल बना देते हैं।

तब राजा ययाति को वैराग्य का बोध हुआ। उन्होंने पुरु को उसका यौवन लौटा दिया और राज्य का भार भी उसी को सौंप दिया।

इसके बाद वे वन की ओर चले गए। यहां तक की कथा आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं-
शुक्राचार्य ने दिया वृद्धावस्था का शाप तो भोग-विलास के लिए ययाति ने पुत्र से लिया यौवन का दान

राजा ययाति की कथा शृंखला का यह अंतिम भाग है।

यदि आप राजा ययाति की इस कथा शृंखला को पूरा पढ़ना चाहते हैं तो पहली कथा जहां से शुरुआत कर सकते हैं। उसका लिंक हैः

कच और देवयानी की कथा: प्रेम, अपमान और प्रतिशोध की अमर गाथा


राजा ययाति की कठोर तपस्या

राजा ययाति की कथा को आगे बढ़ाते हैं।

वन में जाकर ययाति ने राजसी जीवन का पूरी तरह त्याग कर दिया। जो राजा कभी महल में रहते थे, वही अब एक साधारण तपस्वी की तरह जीवन बिताने लगे।

उन्होंने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त किया। ऋषियों की सेवा की और क्रोध तथा अहंकार को जीता। देवताओं और पितरों के लिए नियमित अनुष्ठान किए। अतिथियों का सत्कार कभी नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे उनकी तपस्या और कठोर होती गई।

उन्होंने लंबे समय तक केवल प्राकृतिक रूप से प्राप्त फल और वन की वस्तुओं से जीवन चलाया। फिर कुछ समय केवल जल पर रहे और अंततः वायु के सहारे तप करने लगे।

कहा जाता है कि उन्होंने ऐसी कठोर साधना की जिसमें चारों ओर अग्नि प्रज्वलित होती थी, ऊपर सूर्य की तपिश होती थी और वे एक पैर पर खड़े होकर ध्यान करते थे।

राजा ययाति की कथाः राजा बन गया तपस्वी
राजा ययाति की कथाः राजा बन गया तपस्वी

उनकी तपस्या की चर्चा तीनों लोकों में होने लगी। देवता, ऋषि और महापुरुष उनके तप से प्रभावित हुए। अंततः अपने तप, यज्ञ और पुण्य कर्मों के प्रभाव से राजा ययाति को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई।

स्वर्गलोक में देवताओं ने राजा ययाति का आदरपूर्वक स्वागत किया। वे लंबे समय तक देवलोक के सुखों का अनुभव करते रहे।

लेकिन मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, उसके भीतर छिपा होता है। कभी-कभी वर्षों की साधना के बाद भी मन में बचा हुआ एक छोटा सा दोष बड़े पतन का कारण बन जाता है।

ययाति के साथ भी ऐसा ही हुआ।


इंद्र ने ली ययाति की परीक्षा

एक दिन देवराज इंद्र राजा ययाति से मिलने आए। दोनों के बीच धर्म और राजधर्म पर चर्चा होने लगी।

इंद्र ने पूछा— “राजन्! जब आपने संसार का त्याग करके अपना राज्य पुरु को सौंप दिया था, तब आपने उसे क्या शिक्षा दी थी?”

ययाति प्रसन्न हो गए। वे समझ ही न पाए कि यह इंद्र की योजना है।

उन्होंने अपने पुत्र पुरु को दिए गए उपदेशों को याद किया और बताया कि एक राजा के लिए करुणा, दान, मित्रता, विनम्रता और प्रजा की सेवा सबसे महत्वपूर्ण धर्म हैं।

इंद्र ध्यानपूर्वक सुनते रहे।

फिर उन्होंने एक ऐसा प्रश्न पूछा, जो वास्तव में ययाति की परीक्षा थी।

इंद्र बोले— “हे राजन्! आपने वन में रहकर जो महान तपस्या की, जिसके प्रभाव से आपको स्वर्ग प्राप्त हुआ, बताइए—आपके समान तप करने वाला और कौन है? तीनों लोकों में ऐसा कौन है जिसकी तपस्या, आपकी तपस्या के बराबर कही जा सकती है?”

यह प्रश्न सुनकर ययाति को सावधान हो जाना चाहिए था। लेकिन वर्षों से मिले सम्मान और अपनी महान तपस्या की स्मृति ने उनके भीतर छिपे अहंकार को जगा दिया।

उन्होंने कहा— “देवराज! मैंने देवताओं, गंधर्वों, मनुष्यों और महर्षियों में किसी को भी अपने समान तपस्वी नहीं देखा। मैं अपनी तपस्या की तुलना किसी अन्य से कैसे कर सकता हूँ? मुझे नहीं लगता कि किसी का तप मेरी बराबरी का होगा।”


अहंकार ने छीन लिया स्वर्ग

राजा ययाति की कथा- स्वर्ग से पतन
राजा ययाति की कथा- स्वर्ग से पतन

ययाति के ये शब्द सुनकर इंद्र गंभीर हो गए।

उन्होंने कहा—”ययाति! यही तुम्हारी परीक्षा थी और यही तुम्हारी भूल भी। तपस्या का फल विनम्रता है, अहंकार नहीं। तुमने अपने समान या अपने से महान तपस्वियों का अनादर किया है।”

फिर इंद्र बोले— “तुम्हारे इसी अभिमान ने तुम्हारे पुण्यों को क्षीण कर दिया है। जिन पुण्यों के कारण तुम्हें स्वर्ग प्राप्त हुआ था, वे अब समाप्त हो चुके हैं। अब तुम्हें स्वर्गलोक छोड़ना होगा।”

क्षणभर में ययाति को अपनी भूल का एहसास हुआ।

जिस स्वर्ग को पाने के लिए उन्होंने वर्षों तक तप किया था, वही स्वर्ग एक क्षण के अहंकार के कारण उनसे दूर हो रहा था।

इंद्र ने ययाति को स्वर्ग से बाहर फेंक देने का आदेश सुनाया। ययाति ने इस दंड को स्वीकार किया लेकिन बाहर निकलने से पहले इंद्र से एक प्रार्थना की।


धर्मात्माओं के बीच गिरने की प्रार्थना

ययाति ने इंद्र से प्रार्थना की— “हे देवराज! यदि मेरा स्वर्ग से पतन निश्चित है तो मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करें। मुझे ऐसे स्थान पर गिरने दें जहाँ धर्मात्मा ऋषि और पुण्यवान पुरुष रहते हों।”

इंद्र मुस्कुराए और बोले—”ययाति! तुमने लंबे समय तक स्वर्ग का सुख भोगा है। इसलिए यहां से बाहर करने से पहले मैं तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। तुम्हें तुम्हारी इच्छा के अनुसार ही स्थान मिलेगा। लेकिन याद रखना—यह तुम्हारे लिए एक शिक्षा है कि साधना के साथ विनम्रता बनाए रखना आवश्यक है।”

इसके बाद ययाति स्वर्ग से पृथ्वी की ओर गिरने लगे।

उनके तेज को देखकर पृथ्वी के लोगों को लगा मानो स्वयं सूर्यदेव आकाश से उतर रहे हों।


अष्टक और अन्य राजर्षियों से भेंट

ययाति इंद्र की कृपा से पृथ्वी पर राजर्षि अष्टक के आश्रम के निकट गिरे। अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान और शिबि—ये सभी महान राजर्षि थे और संयोग से ययाति के ही वंशज थे।

उन्होंने ययाति का आदरपूर्वक स्वागत किया और उनके जीवन तथा स्वर्ग के अनुभवों के विषय में पूछा।

ययाति ने उन्हें बताया कि कैसे एक क्षण का अहंकार उनके पतन का कारण बना।

ययाति बोले —”मनुष्य को अपने पुण्य पर भी गर्व नहीं करना चाहिए। क्योंकि पुण्य का वास्तविक आभूषण विनम्रता है।”

चूँकि ये चारों राजर्षि ययाति के ही वंशज थे इसलिए वे नहीं चाहते थे कि उनके पूर्वज को स्वर्ग के सुख छोड़कर मृत्यु लोक यानी पृथ्वी पर कष्ट भोगने पड़ें। इसलिए उन्होंने ययाति को फिर से स्वर्ग में स्थान दिलाने के लिए अपना पुण्य अर्पित करने की इच्छा व्यक्त की।

लेकिन ययाति ने कहा—

“मैं क्षत्रिय हूँ। बिना उचित अधिकार के किसी का दान स्वीकार करना मेरे धर्म के विरुद्ध है।”

ययाति और अष्टक के बीच इतनी सुंदर ज्ञान चर्चा हुई है कि वह भारत के दर्शन का उच्च स्तर है। चूँकि हम अभी कहानी कह रहे हैं इसलिए फिलॉसफी या दर्शन की बात को यहां छोड़ते हैं। यदि प्रभु शरणं के प्रेमीजन उसे पढ़ना चाहें तो कमेंट में अपनी इच्छा लिखें। उसे भी शामिल किया जाएगा।

जैसा कि ऊपर लिखा ययाति अपने कुल के लोगों के चार राजर्षियों के बीच गिरे स्वर्ग से गिरे थे। वे चारों उनके नाती यानी पुत्री के पुत्र थे। यह रहस्य भी अब खोलते हैं


पुत्री माधवी और पौत्रों का पुण्य

जब अष्टक और ययाति का अद्भुत ज्ञान संवाद चल रहा था उसी समय ययाति की पुत्री माधवी वहाँ हिरणी के रूप में पहुँचीं।

माधवी ने बताया कि अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान और शिबि उनके पुत्र हैं। इस तरह वे ययाति के दोहित्र अर्थात पुत्री के पुत्र हैं। माधवी हिरणी का रूप धरकर क्यों आई थीं इसकी भी एक रोचक कथा है। संक्षेप में उस कथा का लिंक भी पोस्ट के अंत में दिया जाएगा।

हिरणी बनी माधवी ने कहा— “पिताश्री! पुत्री और उसके पुत्रों का पुण्य भी पिता के लिए कल्याणकारी होता है। इसलिए अपने दोहित्रों के पुण्य को स्वीकार करने में संकोच न करें।”

ययाति ने अपनी पुत्री और पौत्रों के प्रेम को स्वीकार किया।

चारों राजर्षियों के पुण्य और माधवी के आशीर्वाद से ययाति को पुनः स्वर्ग प्राप्त हुआ। ययाति के साथ उनके चारों पौत्र भी स्वर्ग की तरफ चले। इंद्र ने स्वर्ग लोक से पांच विमान भेजे।


शिबि क्यों बने सबसे श्रेष्ठ?

राजा ययाति की कथा- फिर से मिला स्वर्ग
राजा ययाति की कथा- फिर से मिला स्वर्ग

स्वर्ग जाते समय पाँच दिव्य विमान प्रकट हुए। लेकिन उनमें राजा शिबि का विमान सबसे आगे निकल गया।

अष्टक ने आश्चर्य से ययाति से इसका कारण पूछा।

ययाति ने बताया—”शिबि सबसे महान हैं, क्योंकि उन्होंने अपने पास की हर वस्तु धर्म और दान के लिए समर्पित कर दी। त्याग में उनसे बढ़कर कोई नहीं।”

दान और विनम्रता ने उन्हें सबसे ऊँचा स्थान दिलाया है। शिबि के समान परोपकारी व्यक्ति इस धरती पर दूसरा नहीं हुआ है। राजा शिबि की कथा आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं।

कबूतर की बचाने को जान, राजा शिवि ने कर दिया देहदान- महाभारत की नीति कथा


इंद्र का अंतिम संदेश

अपने दौहित्रों के साथ स्वर्ग लौटने के बाद ययाति ने इंद्र से पूछा—

“देवराज! एक छोटी सी भूल के कारण मेरा इतना अर्जित पुण्य कैसे समाप्त हो गया?”

इंद्र ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—”राजन्! मनुष्य के भीतर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे शत्रु रहते हैं। इनमें से अहंकार सबसे सूक्ष्म है। यह साधक को पता भी नहीं चलने देता कि वह पतन की ओर बढ़ रहा है।”

“स्वर्ग प्राप्त करना कठिन है, लेकिन उससे भी कठिन है स्वर्ग के योग्य बने रहना। पुण्य केवल तप से नहीं, विनम्रता से सुरक्षित रहता है।”


राजा ययाति की कथा से सीख

राजा ययाति की कथा हमें जीवन के कई गहरे संदेश देती है—

1. भोग कभी मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर सकते।
वास्तविक शांति त्याग और आत्मसंयम से आती है।

2. तपस्या का सबसे बड़ा फल विनम्रता है।
यदि तप के बाद अहंकार आ गया तो साधना अधूरी रह गई।

3. वर्षों की मेहनत एक क्षण की भूल से नष्ट हो सकती है।

4. पतन के बाद भी धर्म का मार्ग खुला रहता है।
यदि मनुष्य अच्छे लोगों का साथ बनाए रखे तो वह फिर उठ सकता है।

5. महानता केवल पुण्य कमाने में नहीं, बल्कि उसे विनम्रता से संभालने में है।

राजा ययाति ने जीवन में भोग भी देखा, वैराग्य भी देखा, स्वर्ग भी पाया और पतन भी सहा। उनकी कथा हमें यही सिखाती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय बाहरी संसार पर नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे अहंकार पर विजय प्राप्त करना है।

क्योंकि स्वर्ग की ऊँचाई से भी अधिक महत्वपूर्ण है—मन की विनम्रता।

(संदर्भ: महाभारत, आदिपर्व (अध्याय 87-93), उद्योगपर्व (अध्याय 121))

आशा है राजा ययाति की कथा शृंखला की यह अंतिम कहानी आपको पसंद आई होगी। राजा ययाति की कथा में उनकी पुत्री माधवी का भी नाम आता है। वह कथा भी आप प्रभु शरणं पर सरलता से पढ़ सकते हैं। अधिक सरलता से पढ़ने के लिए Prabhu Sharnam ऐप डाउनलोड कर लें।


राजा ययाति की यह कथा एक शृंखला का अंश है। हमारा सुझाव है कि आप पहली कथा जो कच और देवयानी के प्रेम से शुरू होती है, यदि वहां से पढ़ना शुरू करें तो आपको बेहतर समझ आएगा।

कच और देवयानी की कथा: प्रेम, अपमान और प्रतिशोध की अमर गाथा

राजा ययाति की कथा में यदि आप ययाति के विवाह का प्रसंग पढ़ना चाहें कि देवयानी से कैसे विवाह हुआ तो नीचे लिंक से पढ़ें।

भागवत कथाः ययाति का देवगुरु के पुत्र कच द्वारा शापित शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से विवाह

 


संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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