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कबूतर की बचाने को जान, राजा शिवि ने कर दिया देहदान- महाभारत की नीति कथा

कबूतर की बचाने को जान, राजा शिवि ने कर दिया देहदान- महाभारत की नीति कथा

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उशीनर के राजा शिवि ययाति की बेटी माधवी के पुत्र थे. माधवी और उनके पुत्रों के बारे में हम भागवत प्रसंगों में बताएंगे. शिवि के दान धर्म की कथा देवतागण स्वर्गलोक में भी सुनाया करते थे. इंद्र और अग्नि ने शिवि की दानशीलता की परीक्षा लेने की सोची.

अग्निदेव ने कबूतर का रूप धरा और इंद्र ने बाज का. कबूतर अपनी जान बचाने के लिए उड़ता हुआ शिवि की गोद में पहुंचा और प्राणरक्षा की गुहार लगाई.

शिकार का पीछा करता इंद्र के रूप में बाज भी वहां आ पहुंचा. कबूतर ने कहा- महाराज अभी मेरी आयु बहुत कम है. परिवार का मैं ही सहारा हूं. आप मेरी जान बचाइए.

बाज ने कहा- महाराज मैं वृद्ध हो चुका हूं. ज्यादा तेज पक्षी का शिकार नहीं कर सकता. कई दिनों से कुछ नहीं खाया है. आप मुझसे मेरा आहार छीनकर पाप के भागी न बनें.

कबूतर और बाज दोनों को इंसानों की तरह बोलते देख शिवि चकित थे. राजा को लगा कि जरूर ये दोनों दिव्य प्राणी हैं जो किसी शाप से पक्षी बन गए हैं. इनके साथ अगर उचित न्याय न हुआ तो वह पाप के भागी बनेंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

राजा ने बाज से कहा- जो राजा अपनी शरण में आए जीव को उसके शत्रु को सौंप देता है, उसके राज्य में समय पर वर्षा नहीं होती, संतान छोटी अवस्था में मर जाती है, पितरों को पितृलोक में रहने का स्थान नहीं मिलता तथा देवता उसकी पूजा स्वीकार नहीं करते.

इसलिए है बाज मैं अपने शरणागत इस कबूतर को तुम्हें नहीं सौंप सकता. मैं तुम्हारी भूख शांत करने के लिए कबूतर से भी ज्यादा मांस दूंगा.

राजा की बात सुनकर बाज बोला- महाराज मुझे कबूतर से अधिक मांस नहीं चाहिए. यह कबूतर ही देवताओं द्वारा मेरे लिए भेजा गया आहार है. मैं देवों का आभारी हूं. मैं तो इस कबूतर को ही खाउंगा. मुझे दूसरा आहार नहीं चाहिए.

महाराज शिवि ने कहा- बाज मैं अपने प्राण दे दूंगा लेकिन इस कबूतर को नहीं दूंगा. जिस कार्य से मेरी और मेरे प्रजा का अहित होता हो वह कार्य मैं नहीं कर सकता. तुम्हें इसके बदले जो भी आहार चाहिए वह बोलो, मैं सबकुछ देने को तैयार हूं.

इंद्ररूपी बाज ने कहा- राजन! तुम्हारे शरीर के मांस से बेहतर मांस क्या होगा. यदि आप कबूतर को नहीं छोड़ना चाहते तो इसके वजन के बराबर मांस अपनी जंघा से काटकर दे दीजिए. इस तरह मेरी जान भी बच जाएगी और कबूतर की भी.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

शिवि ने एक तराजू मंगाया. एक पलड़े में कबूतर को रखा दूसरे में अपनी बायीं जंघा से मांस काटकर रखा. काफी सारा मांस काटकर रखने से भी पलड़ा न हिला.

एक जंघा का पूरा मांस काट देने से भी पलड़ा न हिला तो उन्होंने दूसरी जंघा काटकर पलड़े पर रखा. पलड़ा फिर भी न हिला.

राजा ने एक-एक कर अपने सभी अंगों का मांस काटकर तराजू पर रख दिया तो भी वह कबूतर के वजन के बराबर न हुआ. पूरे शरीर से खून की धारा बह रही थी लेकिन उनके चेहरे पर पीड़ा न थी.

उन्हें चिंता बस इस बात की थी कि अगर कबूतर के वजन के बराबर मांस न हुआ तो बाज कबूतर को ले जाएगा और वचन में बंधे होने के कारण वह बाज को रोक भी न पाएंगे.

अब शिवि के शरीर पर बस हड्डियों का ढांचा भर बचा था. कोई राह नहीं दीख रही थी. सो शिवि कबूतर की जान बचाने के लिए वह खुद तराजू के पलड़े में बैठ गए. ऐसा करते ही कबूतर और बाज दोनों अपने असली रूप में प्रकट हो गए.

दोनों देवों ने राजा की प्रशंसा की और उन्हें स्वस्थ कर दिया. देवों ने वरदान दिया-शरणागत की रक्षा और प्रजापालक व धर्मरक्षक वीरों का जब भी जिक्र होगा, शिवि का नाम सुनकर देवता भी प्रशंसा में सिर झुकाएंगे.

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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