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रामकृष्ण परमहंस का ज्ञान का लोटा

रामकृष्ण परमहंस का ज्ञान का लोटा

ramkrishna

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.रामकृष्ण परमहंस सिद्ध संत थे. समस्त सिद्धियों को प्राप्त करने के बाद भी वह शिष्यों को तंत्र साधना के स्थान पर ज्ञान साधना के लिए प्रेरित किया करते थे.

छोटी-छोटी कथाओं और अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं के माध्यम से वह अपने शिष्यों को प्रेरित किया करते थे. श्रीरामकृष्ण परमहंस की पूरी जीवन प्रेरक और हैरान कर देने वाली घटनाओं से भरा पड़ा है.

आज हम आपको एक छोटी सी कथा सुना रहे हैं जिससे आपको सीखने को मिलेगा कि बड़े-बड़े प्रवचनों के स्थान छोटी-छोटी बातों, छोटे-छोटे उदाहऱणों से ज्यादा बड़ी बात की जा सकती है जिसका असर ज्यादा गहरा होता है.

एक समय की घटना है. श्री रामकृष्ण परमहंस रोज बहुत लगन से अपना लोटा राख या मिट्टी से मांजकर खूब चमकाते थे. श्री परमहंस का लोटा खूब चमकता था.

उनके एक शिष्य को श्रीरामकृष्ण के इस कार्य से बड़ा कौतूहल होता. प्रतिदिन इतनी तल्लीनता से गुरू द्वारा लोटे को मांजकर चमकाना देखकर उसे बड़ा विचित्र लगता था.

वह सोचा करता कि सारी दुनिया के वैभव से दूर रहने वाले हमारे गुरूदेव की जान इस लोटे में क्यों अटकी है. जिनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए लोग घंटों प्रतीक्षा करते रहते हैं उन्हें अपना एक मिनटा का समय भी ऐसे कार्यों को देना फिजूल है.

मुझसे या किसी शिष्य से कह सकते हैं. हम उनका लोटा मांज देंगें. और फिर लोटा ही तो है. इसकी चमक के लिए ऐसे ज्ञानी व्यक्ति का एक पल भी देना व्यर्थ है.

यह प्रश्न उसे सताता रहता था. आख़िर उससे रहा नहीं गया. उसने मन की पीड़ा निकाल देने का निश्चय किया.

वह सीधा गुरुदेव श्रीरामकृष्ण परमहंस जी के पास पहुंचा और पूछ ही बैठा- “गुरू महाराज! आपका लोटा तो वैसे ही खूब चमकता है. इतना चमकता है कि इसमें हम अपनी छवि भी देख लें. फिर भी रोज-रोज आप इसे मिट्टी, राख और जून से मांजने में इतनी मेहनत क्यों करते है?

आपका समय तो अनमोल है. जो अनमोल समय आपके दर्शनार्थियों का जीवन बदलेगा उसका एक पल भी इस लोटे के पीछे खर्च करने का मुझे औचित्य समझ नहीं आया.शिष्य के इस भोले से प्रश्न को सुनकर गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस मुस्कुरा उठे.

वह हंसकर बोले- “पुत्र इस लोटे की यह चमक एक दिन की एक मेहनत से नहीं आई है. इसमें आई मैल को हटाने के लिए नित्य-प्रति मेहनत करनी ही पड़ती है.

ठीक वैसे ही जैसे जीवन में आई बुराइयों, बुरे संस्कारों को दूर करने के लिए हमें रोजाना ही संकल्प करना पड़ता है. तुमने कहा कि मेरे दर्शन या प्रवचन से बहुत से लोगों का जीवन बदल सकता है परंतु यह तो तभी होगा न जब मैं स्वयं खुद को चमकाकर मांजकर रखूं.

संकल्प के साथ स्वयं को अच्छा चरित्रवान इंसान बनाने के लिए हमें रोजाना के अभ्यास से ही अपने दुर्गुणों का मैल दूर करना पड़ता है. लोटा हो या व्यक्ति का जीवन, उसे बुराइयों के मैल से बचाने के लिए हमें रोजाना ही कड़ा परिश्रम करना पड़ेगा.

एक दिन की चूक भी स्वीकार नहीं की जा सकती क्योंकि उसी एक दिन की चूक जीवनभर के तप को निगल जा सकती है.

चमक लोटे की हो या इंसान की तभी बची रहेगी जब उसे निर्बाध गति से मांजते रहा जाए.

तुम बहुत होनहार व्यक्ति हो. तुम स्वयं को इस लोटे की भांति समझना. मेरी एक बात को गांठ बांधकर रख लो. कभी भी स्वयं को पूर्णतः परिपक्व और हरप्रकार से योग्य मत समझना बल्कि हमेशा यह भाव रखना कि तुममें सुधार की बहुत संभावना और आवश्यकता है.जब भी तुम्हें लगे कि भटक रहे हो तो लोटे के स्थान पर खुद को रख लेना और तत्काल स्वयं को मांजने लगना.

श्रीरामकृष्ण परमहंस जी की इस बात के बड़े गूढ़ अर्थ हैं. प्रत्येक व्यक्ति को इसी प्रकार नियम से स्वयं को शुद्ध रखने का प्रयास करते रहना चाहिए. संसार की बुराइयां आपको घेरने का प्रयास करेंगी, आपको स्वयं को सुरक्षित रखना होगा.

दूसरा यह कि प्रत्येक कार्य चाहे वह देखने में लोटा मांजने जैसा तुच्छ कार्य ही क्यों न हो अगर मनोयोग से किया जाए तो उसमे विशिष्ट चमक बनकर आकर्षण पैदा करता है.

साधारण काम को भी आप अपने असाधारण एकाग्र मनोयोग से विशिष्ट बना सकते हैं, उसका महत्व बढ़ा सकते हैं. आपके आसपास जो भी सबसे अयोग्य व्यक्ति दिखता हो उसमें किसी तरह की योग्यता बढ़ाने का प्रयास करके आप अपना परीक्षण भी कर सकते हैं कि आप कितने अच्छे गुरू हैं.

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