सूना हुआ नरक तो यम की चिंता मिटाने को ब्रह्मा ने रची माया- एकादशी माहात्म्य कथा
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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। इस लाइऩ के नीचे फेसबुकपेज का लिंक है. इसे लाइक कर लें ताकि आपको पोस्ट मिलती रहे.एकादशी भगवान नारायण को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने का बड़ा महिमामयी व्रत है. प्रत्येक महीने के हर पक्ष यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की एकादशी का विधि-विधान से व्रत-पूजा करने वाला प्राणी श्रीहरि को प्रिय होता है.
सृष्टि की व्यवस्था में नारायण पालनहार हैं अर्थात इस सृष्टि का पालन करने वाले. उसी प्रकार हम सभी जीव माता-पिता की कृपा से जन्म प्राप्त करने और फिर पालन-पोषण कर समर्थवान बना दिए जाने के बाद अपने जीवन संघर्ष में जुट जाते हैं.
अब परिवार पालने की जिम्मेदारी आ जाती है. ऐसे में संसार के पालनहार श्रीहरि की शरण लेनी चाहिए. वह हमारा हाथ थामकर हमें कष्टों से निकलने का मार्ग दिखाते हैं. नारद पुराण में आई एकादशी की एक महिमा कथा का आनंद लीजिए.
एक बार की बात है समूचा नरक जैसे सूना हो गया था. यमराज और चित्रगुप्त, दोनों को कोई काम नहीं रहा. जो भी मरकर आता सीधा वैकुण्ठधाम चला जाता.
ऐसे में चित्रगुप्तजी किन के कर्मों का हिसाब रखें और फिर यमराजजी किन्हें और क्या दंड दें!
यह हाल लंबे समय तक चला. बहुत इंतजार के बाद चित्रगुप्तजी से यमराजजी ने मंत्रणा की और निश्चय हुआ कि ब्रहमाजी के पास चलकर समस्या बताई जाए क्योंकि उनकी बनाई व्यवस्था ही बिगड़ रही है.
दोनों ब्रह्माजी की सभा में पहुँचे.
उन्होंने ब्रह्माजी से अपनी परेशानी बताई कि इस तरह चलता रहा तो हमारे पास कोई कार्य ही न रह जाएगा. फिर यमलोक का क्या औचित्य और हमारी क्या उपयोगिता!
ब्रह्मा जी ने पूछा, यह सब कैसे हो गया? मुझे विस्तार से बताओ तो कुछ निदान निकालूं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.यमराज ने कहा- पितामह! धरती पर रुक्मांगद का राज है. वे नारायण का अनन्य भक्त हैं. भगवान विष्णु की पूजा आराधना ही उनका जीवन है.
राजा ने समूची प्रजा के लिए एकादशी-व्रत का कठोर नियम बना रखा है. सबको एकादशी अनिवार्य कर दी है. एकादशी के पुण्य प्रभाव से सारे लोग जीवन त्याग कर सीधे वैकुण्ठ-धाम चले जा रहे हैं. यमलोक में कोई आ ही नहीं रहा है, हम लोग बेकार बैठे हैं.
ब्रह्माजी ने ध्यान लगाया तो पता चला कि एकादशी के दिन रुक्मांगद की ओर से यह घोषणा होती थी कि आज के दिन आठ वर्ष से अधिक और पचासी वर्ष से कम आयु वाला जो भी मनुष्य अन्न खाएगा, उसे दंड मिलेगा.
सभी लोगों के लिए एकादशी के दिन गंगा स्नानकर व्रत रहना होता है. सब उस दिन दान-पुण्य करते हैं सो धर्म के प्रभाव से प्रजा सुखी एवं समृद्ध थी.
राजा की पतिव्रता पत्नी संध्यावली देवी लक्ष्मी सरीखी थीं तो बेटा धर्मांगद योग्य और आज्ञाकारी.
धर्मांगद खुद सेवकों के साथ हाथी के सिर पर रखे नगाड़े बजवाते हुए घोषणा कराता कि ‘सब लोग एकादशी व्रत का पालन करें और भगवान विष्णु का ध्यान धरें.’ यह सब जानकर ब्रहमा जी खुश हुए.
यह और चित्रगुप्त की बातें सुनकर रुक्मांगद की महिमा जानने के बाद उन्होंने मोहिनी नाम की एक सुंदर नारी को प्रकट किया. रूपवती मोहिनी को उन्होंने कुछ सिखा समझा कर धरती पर भेजा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.एक दिन राजा रुक्मांगद जब सैर कर रहे थे, उन्होंने मोहिनी को वीणा बजाते देखा. इतनी सुंदरता देख राजा रुक्मांगद मोहित हो गए. राजा ने मोहिनी से विवाह का प्रस्ताव रखा.
मोहिनी बोली- मैं एक शर्त पर विवाह को तैयार हूं. मैं जो कहूं वह आपको करना होगा. राजा ने वह शर्त मान ली और वे मोहिनी को लेकर लौटे तथा सुख भोगने लगे.
कुछ बरस बाद राजा ने बेटे का पराक्रम और शासन कुशलता और अपनी उम्र देखी तो राजपाट बेटे धर्मांगद को सौंप दिया. एक दिन रुक्मांगद का एकादशी-व्रत चल रहा था.
हमेशा की तरह घोषणा हो चुकी थी कि जो भी भगवान् विष्णु के एकदशी व्रत करने वाले मेरे इस आदेश का पालन नहीं करेगा, उसे कठोर दंड दिया जाएगा.
एकादशी के उसी दिन मोहिनी अपने पति रुक्मांगद से अन्न खाने के लिए जिद करने लगी. उसने कहा कि गृहस्थ राजा को जो खूब मेहनत करता है उसे कभी भी अन्न नहीं छोड़ना चाहिए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा ने मोहिनी को बहुत समझाया. बताया कि एकादशी के दिन जो अन्न खाता है वह पापी नरक जाता है, किंतु मोहिनी न मानी और विवाह के समय की शर्त याद दिलायी कि जो मैं कहूँगी उसे मानना ही होगा.
मोहिनी किसी तौर न मानी और कहा- मेरी बात न मानी और यदि आप एकादशी के दिन अन्न ग्रहण नहीं करेंगे तो आप झूठे साबित होंगे और आप को पाप लगेगा, मैं आपको त्यागकर चली जाऊँगी.
धर्मांगद और रानी संध्यावली ने मोहिनी को न जाने के लिए बहुत समझाया, पर वह जाने के लिये तैयार हो गयी. इधर राजा रुक्मांगद मोहिनी भी एकादशी के दिन अन्न न ग्रहण करने के निश्चय पर अटल थे.
रानी संध्यावली ने मोहिनी से कहा- सखि, महाराज ने बचपन में भी एकादशी के दिन अन्न ग्रहण नहीं किया है. इसके लिए मजबूर करने के अलावा कोई और वर मांग लो. पर मोहिनी जिद पर अड़ी रही.
रानी ने कहा, जो स्त्री अपनी कसम दिलाकर पति से ऐसे गलत काम कराती है जो उसे नहीं करना चाहिए वह औरत नरक वास करती है. नरक से निकलने के बाद बारह जन्मों तक सुअरी और फिर चाण्डाली होती है.
हे मोहिनी पति को अपने व्यवहार से दुखी करने वाली सत्तर युगों तक ‘पूय’ नरक में रहने के बाद सात जन्मों तक छछूंदर, फिर कौआ, सियार और बनती है. अंत में गाय होकर शुद्ध होती है.
पर इतना सुन कर भी मोहिनी की बुद्धि नहीं बदली अब उसने एक नई शर्त रखी- राजा रुक्मांगद अपने हाथों से अपने पुत्र धर्मांगद का सिर काटकर भेंट करें या एकादशी के दिन अन्न खायें.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.राजा रुक्मांगद मोहिनी की नई शर्त सुनकर बेहोश होने लगे पर आज्ञाकारी धर्मांगद ने अपना सिर और रानी संध्यावली ने पुत्र का बलिदान स्वीकार लिया. राजा ने एक बार फिर बहुत समझाया पर वह अपने हठ पर अड़ी रही.
आखिरकार राजा रुक्मांगद तलवार लेकर धर्मांगद का सिर काटने चले. धर्मांगद ने माता-पिता के चरणों में सिर टेककर प्रणाम किया और भगवान् विष्णु के ध्यान में मग्न हो अपना सिर झुका लिया.
भगवान विष्णु राजा रुक्मांगद, रानी संध्यावली और धर्मांगद का धैर्य देख रहे थे. चमचमाती तलवार धर्मांगद के सिर को छूने वाली ही थी, त्यों ही भगवान् श्रीहरि ने प्रकट होकर राजा का हाथ पकड़ लिया.
इस अदभुत नजारे को देवगण भी देख रहे थे. उनके देखते-देखते ही रुक्मांगद अपनी रानी संध्यावली एवं पुत्र धर्मांगद के साथ भगवान् विष्णु में सशरीर विलीन हो गए.
पत्थरदिल मोहिनी भी यह सब देख रही थी. पर राजा के पुरोहित वसु से यह सब देखा नहीं गया. उनके संकल्प लेकर जो मंत्र पढा तो दुष्ट मायावी नारी मोहिनी वही भस्म होकर राख का ढेर बन गई.
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किसी और के कहने पर विश्वास करने से अच्छा एक बार स्वयं आजमाकर देख लिया जाए. इस लाइन के नीचे प्रभु शरणम् एप्प का लिंक है. उसे क्लिक करके एप्प को देखें फिर निर्णय़ करें. ये एक धार्मिक प्रयास है. एक बार तो इसे देखना ही चाहिए.
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