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श्रीराधाजी का रिश्ता लेकर वृषभानुजी गए थे नंदबाबा के घर?

श्रीराधाजी का रिश्ता लेकर वृषभानुजी गए थे नंदबाबा के घर?

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नारद जी ने श्रीराधा और श्रीकृष्ण के विवाह की यह रोचक कथा राजा बहुलाश्व को सुनाई- गर्ग संहिता का एक प्रसंग.

श्री नारद जी राजा बहुलाश्व से बोले, बात जब श्रीराधा और कृष्ण के विवाह की आयी तो राधा के पिता वृषभानुवर से गोपों ने कहा, आप श्रीकृष्ण के पिता नंदराज जी की परीक्षा लीजिये.

कहां आप भलनंद राजा के दामाद, कुबेर जैसे धनी कहां किसान नंदराज. क्या वे इस लायक हैं कि हमारी राधा जैसी रत्न सरीखी बेटी उनके घर जाये.

वृषभानुवर के मित्रों और सलाह देने वालों ने उन्हें समझाया, आपके घर तो देवताओं के विमान जैसे रथ, घोड़े-हाथी, हीरे जवाहरात, सोना-चाँदी इतना भरपूर है कि गउएं भी आभूषण पहनती है.

भोजन-पान भी बहुत प्रचुर है, भंडार भरे पड़े हैं. अतिथि प्रसन्न रहते हैं पर क्या उनका भी वैभव हमारे बराबर है.

वृषभानुवर को बात जंच गई.

वृषभानुवर ने बड़े बड़े मोतियों से बने एक करोड़ हार मंगवाये. हार में ऐसो दुर्लभ मोती लगे थे कि एक एक मोती एक करोड़ सोने के सिक्कों से भी कीमती था.चमकते दमकते इन हारों को सोने से बने बहुत ही सुंदर पात्र में रखा गया. यह पात्र वृषभानुवर ने सभा में मंगवाया जहां वे लोग बैठे थे जो वर को देखने नंदराज जी के वहां जाने वाले थे.

वर देखने वाले मोतियों के हारों से भरे पात्र ले कर नंदराज जी के वहां पहुंचे और बोले, नंदराज वृषभानुवर जी ने अपनी सुशील कन्या के लिये मदन मोहन श्रीकृष्ण को हर तरह से उत्तम वर जानकर हम सब को वर देखने को भेजा है. आप कन्या पक्ष से वर की गोद के लिये दिये इन मोतियों को रखिये.

इसके बाद नंदराज ने जब रिश्ता मंजूर समझे जाने के संकेत के तौर उन मोतियों के हारों से भरे पात्रों ले लिया तब वर देखने आये लोगों ने कहा, नंदराज जी अब इधर वर पक्ष से भी कन्या की गोद भरने के लिये हमें पर्याप्त मोती दे दीजिये. यही हमारे कुल की पुरानी रीति है.

नंदराज ने मोती की मालाओं से भरे पात्र भीतर भिजवाये और खुद भी यशोदाजी के पास पहुंचे और उनसे पूछा, इससे अधिक न सही पर क्या इसके बराबर भी मोती हमारे घर में हैं क्या?यशोदाजी बहुत देर तक सोचती रहीं फिर जवाब दिया, नहीं. हमारे घर में इतने मोतियों के मूल्य के बराबर कोई मोती, माला तो क्या कोई और समान भी नहीं है.

नंदराज ने सोचा आज तो हमारी सारी लाज गयी. लोगों में खूब हंसी उड़ेगी.

इसके बराबर आखिर क्या हो सकता है जो इन्हें दिया जाये. कुछ भी नहीं. अब तो जो जैसा है उसे स्वीकारना चाहिये और जब धन आयेगा तो उससे मोती लेकर बाद में कन्या पक्ष को भिजवा देने के अलावा कोई चारा ही नहीं है.

इसी बीच अचानक भगवान श्रीकृष्ण वहां आये, वे सारी बात सुन समझ गये.

उन्होंने कन्या पक्ष से उपहार में आये उन मोती की मालाओं में से 100 मालायें निकाल लीं और उनमें तोड़ कर सारे मोती अलग अलग कर दिये. भगवान ने उन मोतियों को खेतों में ले जा कर छींट दिया.

नंदराज ने मोती की मालाओं को फिर से गिना और उसमें से सौ माला कम पाया. नंदराज जी बहुत चिंतित हुए कि एक तो वैसे भी इतने मोती कहां से लाता फिर उसमें से भी सौ कम हो गये.

पहले तो महज हंसी उड़ती अब तो भाई बंधुओं में ही मुझ पर कलंक ही लग जायेगा.नंदराज जी ने बहुत सोच विचार कर बलराम और श्रीकृष्ण को बुला कर पूछा कि कहीं तुम दोनों में से किसी ने खेलने के लिये मालाओं को तो नहीं निकाला है, मैं चिंतित हूं.

इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने जवाब दिया- बाबा, हम सारे गोप किसान हैं, एक बीज बोकर ढेर सारा अनाज उपजाते हैं. मैंने उन मोतियों को बीज की तरह खेतों में बो दिये हैं.

नंदराज जी ने कृष्ण को बुरी तरह डांट पिलायी और बोले कि जहां कहीं भी बोये या छींटे गये हों वो मोती, उन्हें तुरंत बीनकर लाओ. श्रीकृष्ण ने कहा जैसी आपकी आज्ञा और बाहर चले तो नंदराज भी भारी चिंता में उनके साथ हो लिये.

नंदराज, बलराम और भगवान श्री कृष्ण मोती बीनने उस जगह पहुंचे जहां वे बोये गये थे.

यहां अजब छटा थी. खेतों में सैकड़ों अनजाने से सुंदर, विशाल और हरे भरे पेड़ दिखाई दिये. इन पेड़ों पर खूब मोटे मोटे चमकदार मोतियों के हजारों गुच्छे लटके हुये थे.

करोड़ों मोती थे और हर एक आकाश में टिमटिमाते तारों की तरह रोशनी बिखेर रहा था. इन दिव्य मोतियों के गुच्छे तोड़ उन्हें अलग कर गाड़ियों पर लदवा कर नंदराज ने घर को रवाना किया.

नंदराज ने इन सब मोतियों को कन्या पक्ष से वर देखने आने वाले लोगों को श्री राधाजी की गोद भराई के लिये दे दिया. यह सब मोती लेकर वे वृषभानुवर के पास पहुंचे और नंदराज के वैभव की तरह तरह से तारीफ की.

नारद जी ने कहा, बहुलाश्व जहां भगवान श्रीकृष्ण ने मोती बोये थे वह बाद में मुक्ता सरोवर नाम का तीर्थ बन गया जहां एक मोती दान करना भी करोड़ मोतियों के दान के बराबर होता है.

स्रोत: गर्ग संहिता

संकलनः सीमा श्रीवास्तव

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