मन मंदिर में ही रहते हैं राम, खोजोगे तब तो पाओगे

मन मंदिर में ही रहते हैं राम, खोजोगे तब तो पाओगे

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उनके साथ कहीं भी दुर्व्यवहार हो जाना आम बात हो गई. लोगों को उनसे दूर रखने का प्रयास किया जाता. जो पास जाता उसे भी तंग किया जाता. परंतु संत इन सबसे बेफिक्र अपनी मस्ती में गाते चले जाते–

मन मंदिर में रहता है वो अंतर में ही पाओगे.
ब्रह्मज्ञान की दृष्टि लेकर, घट मे ज्योत जलाओ रे

संत की इस बात से लोगों में एक जिज्ञासा भी होती. वे उनके भजन चाव से सुनते. विरोधियों का गुस्सा एक बार आपे से बाहर हो गया. सब ने मिल कर सोचा आज संत को शांत ही कर दिया जाए.

वह गलियों में अपना भजन गाते मस्ती में घूम रहे थे तभी उन पर पत्थरों की बरसात कर दी लोगों ने. संत लहूलूहान होकर अचेत होकर जमीन में लोट गए.

तभी वहां से एक डॉक्टर निकले. उन्हें संत पर दया आई. उनकी चोट पर दवा आदि लगाई. तो कुछ देर में संत की चेतना लौटी. डॉक्टर शीघ्र आराम के लिए सुई देने की तैयारी कर रहे थे कि संत चिल्लाए- नहीं यह मत लगाना. इससे बहुत दर्द होगा.डॉक्टर को बड़ा अचंभा हुआ. वह बोले- शरीर पर इतने जख्म लगे तब दर्द नहीं हुआ. तब तक हंसते रहे गाते रहे जब तक बेहोश न हुए और अब दर्द की बात करते हैं.

संत बोले- सूई अगर मेरे मांस में लगेगी तो कोई आपत्ति नहीं मुझे पर खून में लगे इस पर चिंता है क्योंकि मेरे रक्त के कण कण में राम हैं.
उन्हें नहीं चुभनी चाहिए. इसलिए इसे दूर ही रखो.

डॉक्टर तो अब गुस्से में बौखला गया. उसने कहा- तब कहां था तुम्हारा राम जब सब लोग तुम पर हर ओर से पत्थर बरसा रहे थे?

संत शांत स्वर में बोले- तब भी वह यहीं था पर वह जानता है कि कांटों में मेरा भक्त खिलता है. वह आगे बढ़कर बार-बार बचाने आ रहा था पर मैं ही विनती कर रहा था प्रभु इनका क्रोध शांत हो जाने दीजिए! देखो वे सब मुझे मारने के बाद चले तो गए.

डॉक्टर ने पूछा तो क्या अब आपके राम मान गए, वह शांत हो गए?

संत ने कहा- भक्त को कष्ट हो तो भगवान को कहां चैन होता है. अब मेरे राम और प्रकृति काम कर रहे हैं. मैं तो यहां मजे में विश्राम कर रहा हूँ!

डॉक्टर ने पूछा- वह कैसै महाराज, पहेलियां मत बुझाओ? संत ने कहा- वैधजी आप प्रमाण चाहते हैं तो स्वयं जाकर देख लो मेरे भगवान का कार्य! जिस गली में से मुझे उठा लाए हो वहां जाओ मेरे राम का काम दिख जाएगा.

डॉक्टर ने भी सोचा चलो देख ही लिया जाए.इसके बाद इस संत का भ्रम दूर किया जाएगा. वह उस गांव में पहुंचे जहां संत पर पत्थर बरसाए गए थे.

गए तो क्या देखा कि भयंकर आंधी तूफान से सब परेशान हैं. सब की आत्मा से एक ही आवाज आ रही है. संत के साथ हमने ठीक नहीं किया. इसी कारण यह सब हो रहा है.

हम सब को एक साथ चलकर संत से क्षमा मांगना चाहिए. सभी पछता रहे थे और वे चल पड़े. खोजते हुए पहुंचे. उनकी अंतरात्मा में राम ने चोट की और बाहर की चोट प्रकृति ने दी तो तो सब संत क्षमा मांगने लगे.

संत ने कहा- हम तो रामनाम की धुन में मगन रहने वाले बस ईश्वर का मार्ग बताते हैं. तुम सब ने जो पत्थर नहीं फूल फेंके थे तभी तुम भगवान की राह पर चले आए हो. यही सच्चा प्रेम है. हम सब मिलकर ईश्वर और प्रकृति की प्रार्थना करके उन्हें शांत करें.

मेरे भगवान तेरे पथ पर हम सदा चलते रहें. प्रेम आपस में करे और सब के संग मिलकर चलें

संत की शोभा और गरिमा उनकी दयालुता में ही है. संत परमार्थी होते हैं तभी तो ईश्वर भी उनके बस में होते हैं. संत वचन न पलटे, पलट जाए ब्रह्माण्ड.

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