त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंगः गौतम और अहल्या ने तपोबल से जलविहीन ब्रह्मगिरी में बनाया अक्षय जलकुंड, स्त्रियों के विवाद में लगा गोहत्या का पाप

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंगः गौतम और अहल्या ने तपोबल से जलविहीन ब्रह्मगिरी में बनाया अक्षय जलकुंड, स्त्रियों के विवाद में लगा गोहत्या का पाप

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द्वादश ज्योतिर्लिंगों की शृंखला में नासिक के पास गौतमी नदी के तट पर स्थित त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा आपके लिए लेकर आया हूं. इस साल यहां कुंभ भी है.

इस ज्योतिर्लिंग की महिमा और गौतमी के पृथ्वी पर आगमन की कथा बड़ी सुंदर है. दो खंडों में आपको शिल पुराण और स्कंद पुराण आधारित इस ज्योतिर्लिंग की महिमा सुनाउंगा. आज इस धाम की पृष्ठभूमि की चर्चा गौतम ऋषि की कथा से करते हैं.

गौतम ऋषि ने अपनी धर्मपत्नी अहल्या के साथ ब्रह्मगिरि पर्वत पर दस हज़ार वर्षों तक कठोर तप किया. एक बार इस क्षेत्र में सौ वर्षों तक बिल्कुल बारिश नहीं हुई. जल के अभाव में जीवों पर संकट आ गया.

मनुष्यों ने मेघों को बहुत मनाने का प्रयत्न किया लेकिन वर्षा नहीं हुई. हारकर जीवन रक्षा के लिए मनुष्य, पशु-पक्षी आदि जल की खोज में दूसरे स्थानों को जाने लगे.

गौतम और अहिल्या को इससे बड़ी वेदना हुई. गौतम ने छ: महीने तक घोर तप करके जल के देवता वरुण को प्रसन्न किया. उन्होंने वरुणदेव से जल बरसाने की प्रार्थना की.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

वरूण देव ने कहा- मैं देवताओं के विधान के विपरीत बारिश करके उनको रुष्ट नहीं कर सकता लेकिन आपका तप व्यर्थ नहीं जाएगा. मैं जीवन रक्षा के योग्य जल का प्रबंध कर सकता हूं.

वरूणदेव ने कहा- मुनि आप एक गडढ़ा बनाएं. मैं उसमें ‘अक्षय’ जल डाल दूंगा जो कभी समाप्त नहीं होगा. इस तरह जीवों की रक्षा की व्यवस्था हो जाएगी और देवता भी अप्रसन्न नहीं होंगे. गौतम ने एक हाथ गहरा गड्ढा खोद दिया जिसे वरुण ने दिव्य जल से भर दिया.

वरुणदेव ने कहा– हे मुनि! यह अक्षुण्ण जल कभी नष्ट नहीं होगा और तीर्थ बनकर इस पृथ्वी पर आपके ही नाम से प्रसिद्ध होगा. यहां दान-पुण्य, हवन-यज्ञ, तर्पण, देवपूजन और पितरों का श्राद्ध, अक्षय फलदायी होंगे.

इस प्रकार वरुण से अक्षय जल की प्राप्ति के बाद गौतम आनन्द पूर्वक अपने नित्य नैमित्तिक कर्म, यज्ञ आदि सम्पन्न करने लगे. अपने हवन-यज्ञ के लिए धान, जौ, नीवार आदि उगाया.

जल और अन्न सुलभ होते ही वहाँ आकर ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी आदि फिर से बस गए. गौतम कुंड के जल को लेकर एक बार गौतम के आश्रम के समीप रहने वाली कुछ ब्राह्मणों की स्त्रियों का विवाद हो गया.

विवाद इतना बढ़ गया कि वे स्त्रियां अहल्या पर क्रोधित होकर प्रतिशोध के लिए उतारू हो गईं. सभी स्त्रियों ने अपने अपने पतियों से गौतम को नुक़सान पहुंचाने के लिए उकसाया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

उन सभी ने कहा कि गौतम पर स्वयं वरूणदेव की कृपा है. उनके तप के आगे हम असमर्थ हैं. इसलिए अपने मन से गौतम के प्रति द्वेष का त्याग करो. इससे वे स्त्रियां और क्रोधित हो गईं.

उन्होंने अपने पतियों से साफ-साफ कह दिया कि यदि वे सभी मिलकर इतने क्षमतावान नहीं हैं तो वे उनका त्याग कर देंगी. हारकर उन ब्राह्मणों ने गौतम का अनिष्ट करने के लिए गणेशजी की आराधना शुरू की.

गणेशजी के प्रसन्न होने पर उन ब्राह्मणों ने वरदान मांगा कि आप कोई ऐसा उपाय करें जिससे इस क्षेत्र में निवास करने वाले सभी ऋषि-मुनि गौतम के द्रोही हो जाएं और उन्हें यहां से भगा दें.

गणेशजी ने उन सबको बहुत समझाया और इस वरदान की याचना नहीं करने को कहा. गणपति ने याद कराया कि गौतम परोपकारी हैं. अकाल के कारण दु:ख भोग रहे तुम लोगों को उन्होंने उपकार किया. उन्हें सताकर पाप के भागी बनोगे.

गणपति ने ब्राह्मणों को पुनर्विचार करने को कहते हुए कोई और वरदान मांगने को कहा किंतु पत्नियों की जिद के आगे वे झुक गए. वे दुष्ट दुराग्रह पर अड़े रहे और दूसरा वर लेने को तैयार नहीं हुए.

गणेशजी अपने भक्तों के अधीन थे. न चाहते हुए भी गौतम के अनिष्ट के वर को स्वीकार करना पड़ा. गणपति ने भारी मन से कहा कि अपना दिया वचन अवश्य पूर्ण करूंगा.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

गौतम ने अपने खेत में धान और जौ लगाया था. गणेशजी ने अत्यन्त दुबली-पतली और कमज़ोर गाय का रूप धारण किया और धान के खेतों में जाकर चरने लगे.

उसी समय संयोगवश गौतम वहां पहुंच गए. उन्होंने खेत से मुट्ठी भर खर-पतवार उखाड़ा और उससे गाय को हांकने लगे. कोमल खर-पतवारों का स्पर्श होते ही वह गाय कांपती हुई धरती पर गिरी और मर गई.

वे दुष्ट ब्राह्मण और उनकी स्त्रियाँ छिपकर उक्त सारी घटनाएँ देख रही थीं. वे सभी बोल पड़े– गौतम ने गोवध कर डाला. सब जगह यह बात फैल गई कि गौतम ने गोवध किया है.

ईश्वर की इस लीला से दुखी गौतम को राह नहीं सूझ रही थी. आसपास बसे ऋषियों ने गौतम और अहिल्या को अपमानिता करना शुरू किया. उनपर पत्थर बरसाए गए.

गौतम ने उनसे गोहत्या के पाप से मुक्ति की राह पूछी तो उन्होंने असंभव जैसा उपाय बताया लेकिन गौतम ने महादेव की कृपा से उससे मुक्ति पाई. अगली कथा में बताएंगे कि महादेव ने क्या वरदान दिया और कैसे वह स्थान कल्याणकारी त्र्यंबकेश्वर तीर्थ बना.

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संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्